The threshold of the house, the responsibility of men and social taunts in Hindi Short Stories by Shivam Kumar Pandey books and stories PDF | घर की देहरी, पुरुष का दायित्व और सामाजिक ताने

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घर की देहरी, पुरुष का दायित्व और सामाजिक ताने

भारतीय समाज में सदियों से पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाओं को लेकर कुछ अघोषित नियम तय रहे हैं। पारंपरिक व्यवस्था में माना जाता रहा है कि पुरुष का मुख्य काम घर से बाहर जाकर आजीविका कमाना है, जबकि महिला का दायित्व घर संभालना, बच्चों का लालन-पालन करना और भोजन बनाना है। हालाँकि, बदलते समय के साथ इन धारणाओं में काफी बदलाव आया है, फिर भी ग्रामीण और छोटे शहरों के कई इलाकों में पुरानी सोच की जड़ें काफी गहरी हैं।

जब कोई लड़का या पुरुष घर के बाहर जाकर आर्थिक जिम्मेदारी नहीं उठाता और अपना अधिकांश समय केवल घर के कामों में लगाता है—विशेषकर खाना पकाने या रसोई संभालने में—तो समाज उसे आसानी से स्वीकार नहीं करता। ऐसे पुरुषों को अक्सर ग्रामीण और देहाती बोली में तरह-तरह के तानों का सामना करना पड़ता है।
सामाजिक तानों और अपमान के शब्द
देहाती क्षेत्रों और स्थानीय बोली में घर बैठकर खाना बनाने वाले या सिर्फ घर के काम करने वाले पुरुषों को अपमानित करने के लिए कई तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है:
  घरघुस्सू: जो पुरुष बाहर की दुनिया से कटकर सिर्फ घर के भीतर ही सिमटा रहता है, उसे ताना मारते हुए 'घरघुस्सू' कहा जाता है।
  मेहरा: कुछ क्षेत्रों में यह शब्द उन पुरुषों के लिए इस्तेमाल होता है जो महिलाओं जैसे काम करते हैं या पुरुषों वाली सामाजिक जिम्मेदारी नहीं निभाते।
  जनाना: हालांकि यह शब्द हमारी मूल पारंपरिक संस्कृति का हिस्सा नहीं है, लेकिन समय के साथ बोलचाल में महिलाओं जैसे काम करने वाले पुरुषों को चिढ़ाने के लिए प्रयोग होने लगा।
  बेलन चलाने वाला या रसोइया: किसी पुरुष की मेहनत और सहयोग को सराहने के बजाय जब समाज उसकी तुलना 'बेलन चलाने वाले' से करता है, तो इसका मकसद उसे छोटा महसूस कराना होता है।
  पल्लू से बंधा या घरखोर: जो अपनी स्वतंत्रता और आजीविका की जिम्मेदारी छोड़कर केवल घर के कामों तक सीमित रहता है, उसे समाज में ऐसे ही उपहासजनक नामों से पुकारा जाता है।
अपमान का मुख्य कारण: असंतुलन
यहाँ सोचने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज केवल घर के काम करने पर इतना तीखा उपहास क्यों उड़ाता है? इसका मुख्य कारण असंतुलन है। समाज किसी पुरुष के घर के काम करने का विरोध तब और अधिक उग्रता से करता है जब वह बाहर की आर्थिक जिम्मेदारी (कमाई) पूरी तरह छोड़ देता है।
एक पुरुष के लिए पहली प्राथमिकता यह मानी जाती है कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो, कोई रोजगार या व्यवसाय पकड़े, और परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूती दे। यदि कोई पुरुष बाहर का काम बिल्कुल नहीं करता और केवल घर में ही रहता है, तो समाज उसे स्वावलंबी नहीं मानता और उसका सम्मान घट जाता है।
सही दृष्टिकोण: संतुलन और स्वावलंबन
अगर इस विषय पर एक व्यावहारिक और सम्मानजनक दृष्टिकोण अपनाया जाए, तो बात बहुत स्पष्ट है:
  पहला कदम - बाहर की जिम्मेदारी (आर्थिक स्वावलंबन): हर युवा और पुरुष को सबसे पहले अपने घर से बाहर कदम निकालना चाहिए। चाहे कोई नौकरी हो, खेती-किसानी हो या कोई छोटा-बड़ा व्यापार—बाहर का काम पकड़ना अनिवार्य है। यह न केवल पुरुष को आत्म-सम्मान देता है, बल्कि समाज की नजरों में भी उसकी उपयोगिता साबित करता है।
  दूसरा कदम - घर के कामों में सहयोग: जब कोई पुरुष बाहर की जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा हो, और उसके बाद अपने खाली समय में घर के कामों में हाथ बटाता है—जैसे खाना पकाना, सफाई करना या बच्चों को संभालना—तो यह बहुत ही सराहनीय कदम बन जाता है।
  महिलाओं को राहत: जब एक कमाऊ पुरुष घर के कामों में भी मदद करता है, तो इससे घर की महिलाओं (माँ, बहन या पत्नी) का मानसिक और शारीरिक बोझ कम होता है। उन्हें आराम और सुकून मिलता है।
निष्कर्ष
यदि कोई पुरुष बिना बाहर का काम किए सिर्फ घर में बैठकर खाना बनाता है, तो समाज की संकीर्ण मानसिकता उसे 'मेहरा' या 'घरघुस्सू' कहकर ताने देगी और अपमानित करेगी। लेकिन यदि वही पुरुष बाहर अपनी आर्थिक जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाता है और फिर घर आकर रसोई या अन्य कामों में मदद करता है, तो तानों की जगह उसकी तारीफ होने लगती है।
सच्चा पुरुषार्थ और समझदारी इसी में है कि व्यक्ति पहले आत्मनिर्भर बने, बाहर का काम संभाले, और फिर परिवार के हर सदस्य को सुख और आराम देने के लिए घर के कामों में बराबरी से सहयोग करे। यही सोच परिवार को खुशहाल और समाज को प्रगतिशील बनाती है।