destiny of daughter in Hindi Women Focused by Vandna Sharma books and stories PDF | बेटी का भाग्य

Featured Books
Categories
Share

बेटी का भाग्य



अगस्त माह का अंतिम दिन था। तापमान भले ही कम था, पर उमस बहुत थी। चौरे से लगे आंगन में एक तखत पड़ा था और तीन-चार बेंत की कुर्सियां। एक कोने में बच्चों के बैठने के लिए मूढ़े रखे थे। सारा परिवार एक जगह बैठा था।

रीना राखी पर अपने मायके आई थी। स्त्री की उम्र चाहे कितनी ही हो जाए, मायके का मोह कभी नहीं छूटता। रीना के बेटे की परीक्षा राखी के अगले ही दिन थी, लेकिन मायके में दो दिन और रुकने के मोह में उसने बेटे की परीक्षा छुड़वा दी।

इसी बात पर रीना के पिताजी रामप्रसाद उसे डाँट रहे थे।
"क्या जरूरत थी बेटे की परीक्षा छुड़वाने की? पड़ोस के वर्मा जी की बेटी भी राखी बाँधकर उसी दिन चली गई। पहले तो तुम्हें आना ही नहीं चाहिए था जब बच्चे की परीक्षा थी। और जब तुम्हारे भाई तुम्हें बुलाते ही नहीं तो आती ही क्यों हो? वहीं से राखी कूरियर कर दिया करो। फालतू का मोह पाले रहती हो।"

बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि रीना के बेटे ने बीच में ही पूछ लिया, "मम्मी, खाने में क्या बनाओगी?"

रीना कुछ जवाब दे पाती, उससे पहले ही पिताजी फिर ऊँची आवाज में बोले, "जब दूसरों के घर जाते हैं तो उनके हिसाब से खाते हैं। जिसके घर आए हो उसकी मर्जी से मिलेगा खाना। मेहमान को अपनी मर्जी नहीं बतानी चाहिए।"

फिर रीना की ओर मुड़कर बोले, "और तू... दो बार दिया कर खाना इसे दिन में। खाना खा-खा कर मोटा हो रहा है, पढ़ने में कमजोर है। तेरी बहन को देख, कितनी होशियार है। वो तेरी तरह घूमने में पैसे खराब नहीं करती, अपने बेटे को सारा दिन पढ़ाती है। तू तो हर त्योहार पर बैग उठाकर चली आती है।"

रीना ने बड़ी मुश्किल से अपने आंसुओं को रोका और वहाँ से उठकर कपड़े धोने चली गई।

करीब दो घंटे बाद पिताजी की आवाज फिर आई, "रीना कहाँ चली गई? पहले रोटी सेंक दे, खाने का काम खत्म कर।"

रीना चुपचाप रसोई में चली गई। शायद पिताजी का मूड उस दिन खराब था। बुढ़ापे में चिड़चिड़ापन आ ही जाता है, यह सोचकर वह सब सहती रही।

पर थोड़ी ही देर में पिताजी फिर चिल्लाए, "ये कैसा खाना बनाया है? सब भूल गई खाना बनाना? रोटी भी मोटी सेंकी है। मन नहीं है तो मत बना, उलट-टाल कर रही है।"

रीना खामोशी के साथ खाना बनाती रही और मन ही मन सोचती रही - मैं भी नहीं आया करूँगी अब किसी त्योहार पर। अपना काम छोड़कर मायके आओ, ससुराल के भी ताने सुनो और मायके में भी अपमान सहो। छोटी ही सही करती है, जो आती ही नहीं। पिताजी को भी वही सही लगती है।

एक सवाल उसके दिल में बार-बार उठ रहा था - एक लड़की का भाग्य ऐसा क्यों लिखते हो प्रभु? मायके में भी परायापन और ससुराल में भी पराए घर से आई हूँ कहकर पराया कर दिया जाता है।

आज सारे रिश्ते स्वार्थ पर टिके हैं। जो कामयाब है, पैसे वाला है, उसे रिश्ते ढूँढने नहीं पड़ते। सब उसके पास चलकर स्वयं आ जाते हैं। जो अपनी जिंदगी में ईमानदारी से संघर्ष कर रहा है, वही सबकी आँख में खटकता है।

रात होते-होते रीना ने अपना सारा काम निपटा लिया और अपनी पैकिंग करने लगी। सुबह जल्दी ही स्टेशन के लिए निकलना था। मन में एक ही बात थी - शायद दोबारा न आऊँ। पर फिर खुद ही सोचा, मुझसे ही मोह नहीं छूटता इस मायके का।

रात भर रीना को नींद नहीं आई। सुबह पाँच बजे उसने अपना बैग उठाया। पिताजी रोज की तरह चौरे पर बैठे चाय पी रहे थे। रीना ने आगे बढ़कर झुककर उनके पैर छुए। पिताजी ने कुछ कहा नहीं, बस सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दे दिया। उस स्पर्श में डाँट से ज्यादा चिंता थी, पर रीना अब समझने लगी थी कि कुछ प्रेम जताया नहीं जाता, बस महसूस किया जाता है।

स्टेशन के रास्ते में बेटे ने मासूमियत से पूछा, "मम्मी, अगली राखी पर फिर आएंगे न नाना के यहाँ?"

रीना ने बेटे का हाथ कसकर पकड़ लिया। उसकी आँखें भर आईं, पर इस बार आंसुओं में शिकायत नहीं थी।

वह बोली, "आएंगे बेटा, जरूर आएंगे। कुछ रिश्ते निभाने के लिए नहीं, बस महसूस करने के लिए होते हैं। मायका भले ही पराया कर दे, पर बेटी के दिल से मायका कभी पराया नहीं होता।"

ट्रेन चल पड़ी। रीना खिड़की से अपने शहर को धीरे-धीरे दूर जाते देख रही थी। उसने तय कर लिया था कि अब वह कम आएगी, पर जब भी आएगी किसी से किसी उम्मीद के बिना, सिर्फ अपने मोह के लिए आएगी।

समाप्त
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली