Mulla Nasruddin in Hindi Children Stories by MB (Official) books and stories PDF | मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन

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मुल्ला नसरुद्दीन

जंगली फूल

मुसीबत

मुल्ला का कुरता

शरीफ चोर

अकलमंदी

रस्सी

मुल्ला नसरुद्दीन के गुरु की मजार

परंपरा रू मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन की दो बीवियाँ

मुल्ला नसरुद्दीन की बीवी का नाम

मुल्ला नसरुद्दीन और बेईमान काजी

खुशबू की कीमत

मुल्ला नसरुद्दीन के चंद छोटे किस्से — 3

मुल्ला नसरुद्दीन के चंद छोटे किस्से — 2

मुल्ला नसरुद्दीन के चंद छोटे किस्से

मुल्ला नसरुद्दीन और बेचारा पर्यटक

मुल्ला नसरुद्दीन और गरीब का झोला

मुल्ला नसरुद्दीन का भाषण

मुल्ला नसरुद्दीन और भिखारी

मुल्ला नसरुद्दीन रू दावत

”रोटी क्या है?“

हाजिरजवाबी

ताबूत

जंगली फूल

सर्दियों का पूरा मौसम नसरुद्दीन ने अपने बगीचे की देखरेख में बिताया. वसंत आते ही हर तरफ मनमोहक फूलों ने अपनी छटा बिखेरी. बेहतरीन गुलाबों और दूसरे शानदार फूलों के बीच नसरुद्दीन को कुछ जंगली फूल भी झांकते दिख गए.

नसरुद्दीन ने उन फूलों को उखाड़कर फेंक दिया. कुछ दिनों के भीतर वे जंगली फूल और खरपतवार फिर से उग आये.

नसरुद्दीन ने सोचा क्यों न उन्हें खरपतवार दूर करनेवाली दवा का छिडकाव करके नष्ट कर दिया जाए. लेकिन किसी जानकार ने नसरुद्दीन को बताया कि ऐसी दवाएं अच्छे फूलों को भी कुछ हद तक नुकसान पहुंचाएंगी. निराश होकर नसरुद्दीन ने किसी अनुभवी माली की सलाह लेने का तय किया.

”ये जंगली फूल, ये खरपतवार३“, माली ने कहा, ”यह तो शादीशुदा होने की तरह है, जहाँ बहुत सी बातें अच्छीं होतीं हैं तो कुछ अनचाही दिक्कतें और तकलीफें भी पैदा हो जातीं हैं“.

”अब मैं क्या करूं?“, नसरुद्दीन ने पूछा.

”तुम अगर उन्हें प्यार नहीं कर सकते हो तो बस नजरंदाज करना सीखो. इन चीजों की तुमने कोई ख्वाहिश तो नहीं की थी लेकिन अब वे तुम्हारे बगीचे का हिस्सा बन गयीं हैं.“

मुसीबत

नसरुद्दीन एक शाम अपने घर से निकला. उसे किन्हीं मित्रों के घर उसे मिलने जाना था. वह चला ही था कि दूर गाँव से उसका एक दोस्त जलाल आ गया. नसरुद्दीन ने कहा, ”तुम घर में ठहरो, मैं जरूरी काम से दो—तीन मित्रों को मिलने जा रहा हूँ और लौटकर तुमसे मिलूंगा. अगर तुम थके न हो तो मेरे साथ तुम भी चल सकते हो“.

जलाल ने कहा, ”मेरे कपड़े सब धूल—मिट्टी से सन गए हैं. अगर तुम मुझे अपने कपड़े दे दो तो मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ. तुम्हारे बगैर यहां बैठकर मैं क्या करूंगा? इसी बहाने मैं भी तुम्हारे मित्रों से मिल लूँगा“.

नसरुद्दीन ने अपने सबसे अच्छे कपड़े जलाल को दे दिए और वे दोनों निकल पड़े.

जिस पहले घर वे दोनों पहुंचे वहां नसरुद्दीन ने कहा, ”मैं इनसे आपका परिचय करा दूं, ये हैं मेरे दोस्त जलाल. और जो कपड़े इन्होंने पहने हैं वे मेरे हैं“.

जलाल यह सुनकर बहुत हैरान हुआ. इस सच को कहने की कोई भी जरुरत न थी. बाहर निकलते ही जलाल ने कहा, ”कैसी बात करते हो, नसरुद्दीन! कपड़ों की बात उठाने की क्या जरूरत थी? अब देखो, दूसरे घर में कपड़ों की कोई बात मत उठाना“.

वे दूसरे घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, ”इनसे परिचय करा दूं. ये हैं मेरे पुराने मित्र जलालय रही कपड़ों की बात, सो इनके ही हैं, मेरे नहीं हैं“.

जलाल फिर हैरान हुआ. बाहर निकलकर उसने कहा, ”तुम्हें हो क्या गया है? इस बात को उठाने की कोई क्या जरूरत थी कि कपड़े किसके हैं? और यह कहना भी कि इनके ही हैं, शक पैदा करता है, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?“

नसरुद्दीन ने कहा, ”मैं मुश्किल में पड़ गया. वह पहली बात मेरे मन में गूंजती रह गई, उसकी प्रतिक्रिया हो गई. सोचा कि गलती हो गई. मैंने कहा, कपड़े मेरे हैं तो मैंने कहा, सुधार कर लूं, कह दूं कि कपड़े इन्हीं के हैं“. जलाल ने कहा, ”अब ध्यान रखना कि इसकी बात ही न उठे. यह बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए“.

वे तीसरे मित्र के घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, ”ये हैं मेरे दोस्त जलाल. रही कपड़ों की बात, सो उठाना उचित नहीं है“. नसरुद्दीन ने जलाल से पूछा, ”ठीक है न, कपड़ों की बात उठाने की कोई जरुरत ही नहीं है. कपड़े किसी के भी हों, हमें क्या लेना देना, मेरे हों या इनके हों. कपड़ों की बात उठाने का कोई मतलब नहीं है“.

बाहर निकलकर जलाल ने कहा, ”अब मैं तुम्हारे साथ और नहीं जा सकूंगा. मैं हैरान हूं, तुम्हें हो क्या रहा है?“

नसरुद्दीन बोला, ”मैं अपने ही जाल में फंस गया हूं. मेरे भीतर, जो मैं कर बैठा, उसकी प्रतिक्रियाएं हुई चली जा रही हैं. मैंने सोचा कि ये दोनों बातें भूल से हो गयीं, कि मैंने अपना कहा और फिर तुम्हारा कहा. तो मैंने तय किया कि अब मुझे कुछ भी नहीं कहना चाहिए, यही सोचकर भीतर गया था. लेकिन बार—बार यह होने लगा कि यह कपड़ों की बात करना बिलकुल ठीक नहीं है. और उन दोनों की प्रतिक्रिया यह हुई कि मेरे मुंह से यह निकल गया और जब निकल गया तो समझाना जरूरी हो गया कि कपड़े किसी के भी हों, क्या लेना—देना“.

यह जो नसरुद्दीन जिस मुसीबत में फंस गया होगा बेचारा, पूरी मनुष्य जाति ऐसी मुसीबत में फंसी है. एक सिलसिला, एक गलत सिलसिला शुरू हो गया है. और उस गलत सिलसिले के हर कदम पर और गलती बढ़ती चली जाती है. जितना हम उसे सुधारने की कोशिश करते हैं, वह बात उतनी ही उलझती चली जाती है.

मुल्ला का कुरता

मुल्ला नसरुद्दीन ने नया कुरता बनवाने के लिए पैसे जमा किये. बड़े जोश—ओ—खरोश से वह दर्जी की दुकान पर गया. नाप लेने के बाद दर्जी ने कहा, ”एक हफ्ते के बाद आइये. अल्लाह ने चाहा तो आपका कुरता तैयार मिलेगा“.

हफ्ते भर के इंतजार के बाद मुल्ला दुकान पर गया. दर्जी ने कहा, ”काम में कुछ देर हो गयी. अल्लाह ने चाह तो आपका कुरता कल तक तैयार हो जायेगा.“

अगले दिन मुल्ला फिर दुकान पर पहुंचा. उसे देखते ही दर्जी ने कहा, ”माफ करिए, अभी कुछ काम बाकी रह गया है. बस एक दिन की मोहलत और दे दें. अगर अल्लाह ने चाहा तो कल आपका कुरता तैयार हो जाएगा.“

”तुम तो मुझे यह बताओ कि इसमें और कितनी देर लगेगी३“, मुल्ला ने मन मसोसकर कहा३

”अगर तुम अल्लाह को इससे अलग रखो“.

शरीफ चोर

एक रात मुल्ला नसरुद्दीन का गधा चोरी हो गया. अगले दिन मुल्ला ने गधे के बारे में पड़ोसियों से पूछताछ की.

चोरी की खबर सुनकर पड़ोसियों ने मुल्ला को लताड़ना शुरू कर दिया. एक ने कहा, ”तुमने रात को अस्तबल का दरवाजा खुला क्यों छोड़ दिया?“

दूसरे ने कहा, ”तुमने रात को चौकसी क्यों नहीं बरती. तुम होशियार रहते तो चोर गधा नहीं चुरा पाता!“

तीसरे ने कहा, ”तुम घोड़े बेचकर सोते हो, तभी तुम्हें कुछ सुनाई नहीं दिया जब चोर अस्तबल की कुंडी सरकाकर गधा ले गया“.

यह सब सुनकर मुल्ला ने फनफनाते हुए कहा, ”ठीक है भाइयों! जैसा कि आप सभी सही फरमाते हैं, सारा कसूर मेरा है और चोर बेचारा तो पूरा पाक—साफ है“.

अकलमंदी

नसरुद्दीन अपने घर के बाहर रोटियों के टुकड़े बिखेर रहा था.

उसे यह करता देख एक पड़ोसी ने पूछा — ”ये क्या कर रहे हो मुल्ला!?“

”शेरों को दूर रखने का यह बेहतरीन तरीका है“ — मुल्ला ने कहा.

”लेकिन इस इलाके में तो एक भी शेर नहीं है!“ — पड़ोसी ने हैरत से कहा.

मुल्ला बोला — ”तरीका वाकई कारगर है, नहीं क्या?“

रस्सी

एक सूफी रहस्यवादी ने मुल्ला नसरुद्दीन और उसके एक शागिर्द का रास्ता रोक लिया. यह जांचने के लिए कि मुल्ला के भीतर आत्मिक जागृति हो चुकी है या नहीं, सूफी ने अपनी उंगली उठाकर आसमान की ओर इशारा किया.

इस इशारे से सूफी यह प्रदर्शित करना चाहता था कि ‘एक ही सत्य ने सम्पूर्ण जगत को आवृत कर रखा है'.

मुल्ला का शागिर्द आम आदमी था. वह सूफी के इस संकेत को समझ नहीं सका. उसने सोचा — ”यह आदमी पागल है. मुल्ला को होशियार रहना चाहिए“.

सूफी का यह इशारा देखकर मुल्ला ने अपने झोले से रस्सी का एक गुच्छा निकाला और शागिर्द को दे दिया.

शागिर्द ने सोचा — ”मुल्ला वाकई समझदार है. अगर पागल सूफी हमपर हमला करेगा तो हम उसे इस रस्सी से बाँध देंगे“.

सूफी ने जब मुल्ला को रस्सी निकालते देखा तो वह समझ गया कि मुल्ला कहना चाहता है कि ‘मनुष्य की क्षुद्र बुद्धि सत्य को बाँध कर रखने का प्रयास करती है जो आकाश पर रस्सी लगाकर चढ़ने के समान ही व्यर्थ और असंभव है'.

मुल्ला नसरुद्दीन के गुरु की मजार

मुल्ला नसरुद्दीन इबादत की नई विधियों की तलाश में निकला. अपने गधे पर जीन कसकर वह भारत, चीन, मंगोलिया गया और बहुत से ज्ञानियों और गुरुओं से मिला पर उसे कुछ भी नहीं जंचा.

उसे किसी ने नेपाल में रहनेवाले एक संत के बारे में बताया. वह नेपाल की ओर चल पड़ा. पहाड़ी रास्तों पर नसरुद्दीन का गधा थकान से मर गया. नसरुद्दीन ने उसे वहीं दफन कर दिया और उसके दुःख में रोने लगा. कोई व्यक्ति उसके पास आया और उससे बोला — ”मुझे लगता है कि आप यहाँ किसी संत की खोज में आये थे. शायद यही उनकी कब्र है और आप उनकी मृत्यु का शोक मना रहे हैं.“

”नहीं, यहाँ तो मैंने अपने गधे को दफन किया है जो थकान के कारण मर गया“ — मुल्ला ने कहा.

”मैं नहीं मानता. मरे हुए गधे के लिए कोई नहीं रोता. इस स्थान में जरूर कोई चमत्कार है जिसे तुम अपने तक ही रखना चाहते हो!“

नसरुद्दीन ने उसे बार—बार समझाने की कोशिश की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. वह आदमी पास ही गाँव तक गया और लोगों को दिवंगत संत की कब्र के बारे में बताया कि वहां लोगों के रोग ठीक हो जाते हैं. देखते—ही—देखते वहां मजमा लग गया.

संत की चमत्कारी कब्र की खबर पूरे नेपाल में फैल गयी और दूर—दूर से लोग वहां आने लगे. एक धनिक को लगा कि वहां आकर उसकी मनोकामना पूर्ण हो गयी है इसलिए उसने वहां एक शानदार मजार बनवा दी जहाँ नसरुद्दीन ने अपने ‘गुरु' को दफन किया था.

यह सब होता देखकर नसरुद्दीन ने वहां से चल देने में ही अपनी भलाई समझी. इस सबसे वह एक बात तो बखूबी समझ गया कि जब लोग किसी झूठ पर यकीन करना चाहते हैं तब दुनिया की कोई ताकत उनका भ्रम नहीं तोड़ सकती.

परंपरा रू मुल्ला नसरुद्दीन

कई लोगों की भीड़ में मुल्ला नसरुद्दीन नमाज अदा करने के दौरान आगे झुका. उस दिन उसने कुछ ऊंचा कुरता पहना हुआ था. आगे झुकने पर उसका कुरता ऊपर चढ़ गया और उसकी कमर का निचला हिस्सा झलकने लगा.

मुल्ला के पीछे बैठे आदमी को यह देखकर अच्छा नहीं लगा इसलिए उसने मुल्ला के कुरते को थोड़ा नीचे खींच दिया.

मुल्ला ने फौरन अपने आगे बैठे आदमी का कुरता नीचे खींच दिया.

आगेवाले आदमी ने पलटकर मुल्ला से हैरत से पूछा — ”ये क्या करते हो मुल्ला?“

”मुझसे नहीं, पीछेवालों से पूछो“ — मुल्ला ने कहा — ”शुरुआत वहां से हुई है“.

मुल्ला नसरुद्दीन की दो बीवियाँ

मुल्ला नसरुद्दीन की दो बीवियाँ थीं जो अक्सर उससे पूछा करती थीं कि वह उन दोनों में से किसे ज्यादा चाहता है.

मुल्ला हमेशा कहता — ”मैं तुम दोनों को एक समान चाहता हूँ“ — लेकिन वे इसपर यकीन नहीं करतीं और बराबर उससे पूछती रहतीं — ”हम दोनों में से तुम किसे ज्यादा चाहते हो?“

इस सबसे मुल्ला हलाकान हो गया. एक दिन उसने अपनी प्रत्येक बीवी को एकांत में एक—एक नीला मोती दे दिया और उनसे कहा कि वे इस मोती के बारे में दूसरी बीवी को हरगिज न बताएं.

और इसके बाद जब कभी उसकी बीवियां मुल्ला से पूछतीं — ”हम दोनों में से तुम किसे ज्यादा चाहते हो?“ — मुल्ला उनसे कहता — ”मैं उसे ज्यादा चाहता हूँ जिसके पास नीला मोती है“.

दोनों बीवियां इस उत्तर को सुनकर मन—ही—मन खुश हो जातीं.

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मुल्ला की दो बीवियां थीं जिनमें से एक कुछ बूढ़ी थी और दूसरी जवान थी.

”हम दोनों में से तुम किसे ज्यादा चाहते हो?“ — एक दिन बूढ़ी बीवी ने मुल्ला से पूछा.

मुल्ला ने चतुराई से कहा — ”मैं तुम दोनों को एक समान चाहता हूँ“.

बूढ़ी बीवी इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई. उसने कहा — ”मान लो अगर हम दोनों बीवियाँ नदी में गिर जाएँ तो तुम किसे पहले बचाओगे?“

”अरे!“ — मुल्ला बोला — ”तुम्हें तो तैरना आता है न?“

मुल्ला नसरुद्दीन की बीवी का नाम

एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन और उसका एक दोस्त साथ में टहलते हुए अपनी—अपनी बीवी के बारे में बातचीत कर रहे थे. मुल्ला के दोस्त का ध्यान इस बात की और गया कि मुल्ला ने कभी भी अपनी बीवी का नाम नहीं लिया.

”तुम्हारी बीवी का नाम क्या है, मुल्ला?“ — दोस्त ने पूछा.

”मुझे उसका नाम नहीं मालूम“ — मुल्ला ने कहा.

”क्या!?“ — दोस्त अचम्भे से बोला — ”तुम्हारी शादी को कितने साल हो गए?“

”अट्ठाईस साल“ — मुल्ला ने जवाब दिया, फिर कहा — ”मुझे शुरुआत से ही ये लगता रहा कि हमारी शादी ज्यादा नहीं टिकेगी इसलिए मैंने उसका नाम जानने की कभी जहमत नहीं उठाई“.

मुल्ला नसरुद्दीन और बेईमान काजी

एक दिन जब मुल्ला नसरुद्दीन बाजार में टहल रहा था तब अचानक ही एक अजनबी उसके रास्ते में आ गया और उसने मुल्ला को एक जोरदार थप्पड़ रसीद कर दिया. इससे पहले कि मुल्ला कुछ समझ पाता, अजनबी फौरन ही अपने हाथ जोड़कर माफी मांगने लगा — ”मुझे माफ कर दें! मुझे लगा आप कोई और हैं“.

मुल्ला को इस सफाई पर यकीन नहीं हुआ. वह अजनबी को अपने साथ शहर काजी के सामने ले गया और उससे वाकये की शिकायत की.

चालाक मुल्ला जल्द ही यह भांप गया कि काजी और अजनबी एक दूसरे को भीतर—ही—भीतर जानते थे. काजी के सामने अजनबी ने अपनी गलती कबूल कर ली और काजी ने तुरत ही अपना फैसला सुना दिया — ”मुल्जिम ने अपनी गलती कबूल कर ली है इसलिए मैं उसे हर्जाने के बतौर मुल्ला को एक रुपया अदा करने का हुक्म देता हूँ. अगर मुल्जिम के पास एक रुपया इस वक्‌त नहीं हो तो वह फौरन ही उसे लाकर मुल्ला को सौंप दे“.

फैसला सुनकर अजनबी रुपया लाने के लिए चलता बना. मुल्ला ने अदालत में उसका इंतजार किया. देखते—देखते बहुत देर हो गई लेकिन अजनबी वापस नहीं आया.

काफी देर हो जाने पर मुल्ला ने काजी से पूछा — ”हुजूर, क्या आपको लगता है कि किसी शख्स को राह चलते बिला वजह थप्पड़ मार देने का हर्जाना एक रुपया हो सकता है?“

”हाँ“ — काजी ने जवाब दिया.

काजी का जवाब सुनकर मुल्ला ने उसके गाल पर करारा चांटा जड़कर कहा — ”वह आदमी जब एक रुपया लेकर वापस आ जाये तो आप वह रुपया अपने पास रख लेना“ — और मुल्ला वहां से चल दिया.

खुशबू की कीमत

राह चलते एक भिखारी को किसी ने चंद रोटियां दे दीं लेकिन साथ में खाने के लिए सब्जी नहीं दी. भिखारी एक सराय में गया और उसने सराय—मालिक से खाने के लिए थोड़ी सी सब्जी मांगी. सराय—मालिक ने उसे झिड़ककर दफा कर दिया. भिखारी बेचारा नजर बचाकर सराय की रसोई में घुस गया. चूल्हे के ऊपर उम्दा सब्जी पक रही थी. भिखारी ने देग से उठती हुई भाप में अपनी रोटियां इस उम्मीद से लगा दीं कि सब्जी की खुशबू से कुछ जायका तो रोटियों में आ ही जायेगा.

अचानक ही सराय—मालिक रसोई में आ धमका और भिखारी का गिरेबान पकड़कर उसपर सब्जी चुराने का इल्जाम लगाने लगा.

”मैंने सब्जी नहीं चुराई!“ — भिखारी बोला — ”मैं तो सिर्फ उसकी खुशबू ले रहा था!“

”तो फिर तुम खुशबू की कीमत चुकाओ!“ — सराय—मालिक बोला.

भिखारी के पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं थी. सराय—मालिक उसे घसीटकर काजी मुल्ला नसरुद्दीन के पास ले गया.

मुल्ला ने सराय—मालिक की शिकायत और भिखारी की बात इत्मीनान से सुनी.

”तो तुम्हें अपनी सब्जी की खुशबू की कीमत चाहिए न?“ — मुल्ला ने सराय—मालिक से पूछा.

”जी. आपकी बड़ी महरबानी होगी“ — सराय—मालिक बोला.

”ठीक है. मैं खुद तुम्हें तुम्हारी सब्जी की खुशबू की कीमत अदा करूँगा“ — मुल्ला बोला — ”और मैं खुशबू की कीमत सिक्कों की खनक से चुकाऊँगा“.

यह कहकर मुल्ला ने अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाले और उन्हें हथेली में लेकर जोरों से खनकाया और उन्हें वापस अपनी जेब में रख लिया.

ठगाया—सा सराय—मालिक और हैरान—सा भिखारी, दोनों अपने—अपने रास्ते चले गए.

मुल्ला नसरुद्दीन के चंद छोटे किस्से — 3

कल मुल्ला नसरुद्दीन के किस्सों पर हिमांशु जी की अच्छी टिपण्णी आई — ”मुल्ला के यह किस्से रोचक तो हैं ही, अर्थगर्भित भी हैं। मुझे तो यह प्रबोध देते जान पड़ते हैं हमेशा।“ — सच कहते हैं हिमांशु. कभी— मुल्ला के बेतुके से प्रतीत होने वाले किस्से भी जेन कथाओं की भांति जीवन और संसार के किसी गहरे पक्ष की ओर इंगित करते हैं.

यह कोई जरूरी नहीं कि ये किस्से वाकई मुल्ला के ही हों. यह भी तय नहीं है कि मुल्ला नसरुद्दीन नामक कोई शख्स वाकई कभी हुआ भी हो या नहीं. कुछ लोग अभी भी तुर्की में उसकी कथित कब्र देखने जाते हैं. खैर, मुल्ला के छोटे—छोटे किस्सों की कड़ी में प्रस्तुत हैं चंद और छोटे किस्सेरू

किस्मत सबकी पलटा खाती है. एक वक्‌त ऐसा भी आया कि मुल्ला को खाने के लाले पड़ गए. बहुत सोचने के बाद मुल्ला को लगा कि भीख मांगने से अच्छा पेशा और कोई नहीं हो सकता इसलिए वो शहर के चौक पर खड़ा होकर रोज भीख मांगने लगा.

मुल्ला के बेहतर दिनों में उससे जलनेवालों ने जब मुल्ला को भीख मांगते देखा तो उसका मजाक उड़ाने के लिए वे उसके सामने एक सोने का और एक चांदी का सिक्का रखते और मुल्ला से उनमें से कोई एक सिक्का चुनने को कहते. मुल्ला हमेशा चांदी का सिक्का लेकर उनको दुआएं देता और वे मुल्ला की खिल्ली उड़ाते.

मुल्ला का एक चाहनेवाला यह देखकर बहुत हैरान भी होता और दुखी भी. उसने एक दिन मौका पाकर मुल्ला से उसके अजीब व्यवहार का कारण पूछा — ”मुल्ला, आप जानते हैं कि सोने के एक सिक्के की कीमत चांदी के कई सिक्कों के बराबर है फिर भी आप अहमकों की तरह हर बार चांदी का सिक्का लेकर अपने दुश्मनों को अपने ऊपर हंसने का मौका क्यों देते हैं.“

”मेरे अजीज दोस्त“ — मुल्ला ने कहा — ”मैंने तुम्हें सदा ही समझाया है कि चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं जैसी वो दिखती हैं. क्या तुम्हें वाकई ये लगता है कि वे लोग मुझे बेवकूफ साबित कर देते हैं? सोचो, अगर एक बार मैंने उनका सोने का सिक्का कबूल कर लिया तो अगली बार वे मुझे चांदी का सिक्का भी नहीं देंगे. हर बार उन्हें अपने ऊपर हंसने का मौका देकर मैंने चांदी के इतने सिक्के जमा कर लिए हैं कि मुझे अब खाने—पीने की फिक्र करने की कोई जरुरत नहीं है.“

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एक दिन मुल्ला के एक दोस्त ने उससे पूछा — ”मुल्ला, तुम्हारी उम्र क्या है?“

मुल्ला ने कहा — ”पचास साल.“

”लेकिन तीन साल पहले भी तुमने मुझे अपनी उम्र पचास साल बताई थी!“ — दोस्त ने हैरत से कहा.

”हाँ“ — मुल्ला बोला — ”मैं हमेशा अपनी बात पर कायम रहता हूँ“.

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”जब मैं रेगिस्तान में था तब मैंने खूंखार लुटेरों की पूरी फौज को भागने पर मजबूर कर दिया था“ — मुल्ला ने चायघर में लोगों को बताया.

”वो कैसे मुल्ला!?“ — लोगों ने हैरत से पूछा.

”बहुत आसानी से!“ — मुल्ला बोला — ”मैं उन्हें देखते ही भाग लिया और वे मेरे पीछे दौड़ पड़े!“

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एक सुनसान रास्ते में घूमते समय नसरुद्दीन ने घोड़े पर सवार कुछ लोगों को अपनी और आते देखा. मुल्ला का दिमाग चलने लगा. उसने खुद को लुटेरों के कब्जे में महसूस किया जो उसकी जान लेने वाले थे. उसके मन में खुद को बचाने की हलचल मची और वह सरपट भागते हुए सड़क से नीचे उतरकर दीवार फांदकर कब्रिस्तान में घुस गया और एक खुली हुई कब्र में लेट गया.

घुडसवारों ने उसे भागकर ऐसा करते देख लिया. कौतूहलवश वे उसके पीछे लग लिए. असल में घुडसवार लोग तो साधारण व्यापारी थे. उन्होंने मुल्ला को लाश की तरह कब्र में लेटे देखा.

”तुम कब्र में क्यों लेटे हो? हमने तुम्हें भागते देखा. क्या हम तुम्हारी मदद कर सकते हैं? तुम यहाँ क्या कर रहे हो?“ — व्यापारियों ने मुल्ला से पूछा.

”तुम लोग सवाल पूछ रहे हो लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर सवाल का सीधा जवाब हो“ — मुल्ला अब तक सब कुछ समझ चुका था — ”सब कुछ देखने के नजरिए पर निर्भर करता है. मैं यहाँ तुम लोगों के कारण हूँ, और तुम लोग यहाँ मेरे कारण हो“.

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मुल्ला एक दिन दूसरे शहर गया और उसने वहां एक दूकान के सामने एक आदमी खड़ा देखा जिसकी दाढ़ी बेतरतीब बढ़ी हुई थी. मुल्ला ने उस आदमी से पूछा — ”क्यों मियां, तुम दाढ़ी कब बनाते हो?“

उस आदमी ने जवाब दिया — ”दिन में 20—25 बार.“

मुल्ला ने कहा — ”क्यों बेवकूफ बनाते हो मियां!“

आदमी बोला — ”नहीं. मैं नाइ हूँ.“

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एक दिन मुल्ला का एक दोस्त उससे एक—दो दिन के लिए मुल्ला का गधा मांगने के लिए आया. मुल्ला अपने दोस्त को बेहतर जानता था और उसे गधा नहीं देना चाहता था. मुल्ला ने अपने दोस्त से यह बहाना बनाया कि उसका गधा कोई और मांगकर ले गया है. ठीक उसी समय घर के पिछवाड़े में बंधा हुआ मुल्ला का गधा रेंकने लगा.

गधे के रेंकने की आवाज सुनकर दोस्त ने मुल्ला पर झूठ बोलने की तोहमत लगा दी.

मुल्ला ने दोस्त से कहा — ”मैं तुमसे बात नहीं करना चाहता क्योंकि तुम्हें मेरे से ज्यादा एक गधे के बोलने पर यकीन है.“

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एक बार मुल्ला को लगा कि लोग मुफ्त में उससे नसीहतें लेकर चले जाते हैं इसलिए उसने अपने घर के सामने इश्तेहार लगायारू ”सवालों के जवाब पाइए. किसी भी तरह के दो सवालों के जवाब सिर्फ 100 दीनार में“

एक आदमी मुल्ला के पास अपनी तकलीफ का हल ढूँढने के लिए आया और उसने मुल्ला के हाथ में 100 दीनार थमाकर पूछा — ”दो सवालों के जवाब के लिए 100 दीनार ज्यादा नहीं हैं?“

”नहीं“ — मुल्ला ने कहा — ”आपका दूसरा सवाल क्या है?“

मुल्ला नसरुद्दीन के चंद छोटे किस्से — 2

मुल्ला अपने शागिदोर्ं के साथ एक रात अपने घर आ रहा था कि उसने देखा एक घर के सामने कुछ चोर खड़े हैं और ताला तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

मुल्ला को लगा कि ऐसे मौके पर कुछ कहना खतरे से खाली न होगा इसलिए वह चुपचाप चलता रहा. मुल्ल्ला के शागिदोर्ं ने भी यह नजारा देखा और उनमें से एक मुल्ला से पूछ बैठा — ”वे लोग वहां दरवाजे के सामने क्या कर रहे हैं?

”श्श्श३“ — मुल्ला ने कहा — ”वे सितार बजा रहे हैं.“

”लेकिन मुझे तो कोई संगीत सुनाई नहीं दे रहा“ — शागिर्द बोला.

”वो कल सुबह सुनाई देगा“ — मुल्ला ने जवाब दिया.

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एक दिन बाजार में कुछ गाँव वालों ने मुल्ला को घेर लिया और उससे बोले — ”नसरुद्दीन, तुम इतने आलिम और जानकार हो. तुम हम सबको अपना शागिर्द बना लो और हमें सिखाओ कि हमें कैसी जिन्दगी जीनी चाहिए और क्या करना चाहिए“.

मुल्ला ने कुछ सोचकर कहा — ”ठीक है. सुनो. मैं तुम्हें पहला सबक यहीं दे देता हूँ. सबसे जरूरी बात यह है कि हमें अपने पैरों की अच्छी देखभाल करनी चाहिए और हमारी जूतियाँ हमेशा दुरुस्त और साफसुथरी होनी चाहिए“.

लोगों ने मुल्ला की बात बहुत आदरपूर्वक सुनी. फिर उनकी निगाह मुल्ला के पैरों की तरफ गई. मुल्ला के पैर बहुत गंदे थे और उसकी जूतियाँ बेहद फटी हुई थीं.

किसी ने मुल्ला से कहा — ”नसरुद्दीन, लेकिन तुम्हारे पैर तो बहुत गंदे हैं और तुम्हारी जूतियाँ भी इतनी फटी हैं कि किसी भी वक्‌त पैर से अलग हो जाएँगी. तुम खुद तो अपनी सीख पर अमल नहीं करते हो और हमें सिखा रहे हो कि हमें क्या करना चाहिए!“

”अच्छा!“ — मुल्ला ने कहा — ”लेकिन मैं तो तुम लोगों की तरह किसी से जिन्दगी जीने के सबक सिखाने की फरियाद नहीं करता!“

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आधी रात के वक्‌त घर के बाहर दो व्यक्तियों के झगड़ने की आवाज सुनकर मुल्ला की नींद खुल गई. कुछ वक्‌त तक तो मुल्ला इंतजार करता रहा कि दोनों का झगड़ा खत्म हो जाये और उसे फिर से नींद आ जाये लेकिन झगड़ा जारी रहा.

कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. मुल्ला अपने सर और बदन को कसकर रजाई से लपेटकर घर के बाहर आया. उसने उन दोनों झगड़ा करनेवालों को अलग करने की कोशिश की. वे दोनों तो अब मारपीट पर उतारू हो गए थे.

मुल्ला ने जब उन दोनों को न झगड़ने की समझाइश दी तो उनमें से एक आदमी ने यकायक मुल्ला की रजाई छीन ली और फिर दोनों आदमी भाग गए.

नींद से बोझिल और थका हुआ मुल्ला घर में दाखिल होकर बिस्तर पर धड़ाम से गिर गया. मुल्ला की बीबी ने पूछा — ”बाहर झगड़ा क्यों हो रहा था?“

”रजाई के कारण“ — मुल्ला ने कहा — ”रजाई चली गई और झगडा खतम हो गया“.

मुल्ला नसरुद्दीन के चंद छोटे किस्से

एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे पर बैठकर किसी दूसरे शहर से अपने गाँव आया. लोगों ने उसे रोककर कहा — ”मुल्ला, तुम अपने गधे पर सामने पीठ करके क्यों बैठे हो?“ मुल्ला ने कहा — ”मैं यह जानता हूँ कि मैं कहाँ जा रहा हूँ लेकिन मैं यह देखना चाहता हूँ कि मैं कहाँ से आ रहा हूँ.

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उसी शाम मुल्ला रसोई में कुछ बना रहा था. वह अपने पड़ोसी के पास गया और उससे एक बरतन माँगा और वादा किया कि अगली सुबह उसे वह बरतन लौटा देगा.

अगले दिन मुल्ला पड़ोसी के घर बरतन लौटाने के लिए गया. पडोसी ने मुल्ला से अपना बरतन ले लिया और देखा कि उसके बरतन के भीतर वैसा ही एक छोटा बरतन रखा हुआ था. पड़ोसी ने मुल्ला से पूछा — ”मुल्ला! यह छोटा बरतन किसलिए?“ मुल्ला ने कहा — ”तुम्हारे बरतन ने रात को इस बच्चे बरतन को जन्म दिया इसलिए मैं तुम्हें दोनों वापस कर रहा हूँ.“

पड़ोसी को यह सुनकर बहुत खुशी हुई और उसने वे दोनों बरतन मुल्ला से ले लिए. अगले ही दिन मुल्ला दोबारा पड़ोसी के घर गया और उससे पहलेवाले बरतन से भी बड़ा बरतन माँगा. पडोसी ने खुशी—खुशी उसे बड़ा बरतन दे दिया और अगले दिन का इंतजार करने लगा.

एक हफ्ता गुजर गया लेकिन मुल्ला बरतन वापस करने नहीं आया. मुल्ला और पडोसी बाजार में खरीदारी करते टकरा गए. पडोसी ने मुल्ला से पूछा — ”मुल्ला! मेरा बरतन कहाँ है?“ मुल्ला ने कहा — ”वो तो मर गया!“ पडोसी ने हैरत से पूछा — ”ऐसा कैसे हो सकता है? बरतन भी कभी मरते हैं!“ मुल्ला बोला — ”क्यों भाई, अगर बरतन जन्म दे सकते हैं तो मर क्यों नहीं सकते?“

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एक दिन मुल्ला और उसका एक दोस्त कहवाघर में बैठे चाय पी रहे थे और दुनिया और इश्क के बारे में बातें कर रहे थे. दोस्त ने मुल्ला से पूछा — ”मुल्ला! तुम्हारी शादी कैसे हुई?“

मुल्ला ने कहा — ”यार, मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा. मैंने अपनी जवानी सबसे अच्छी औरत की खोज में बिता दी. काहिरा में मैं एक खूबसूरत, और अक्लमंद औरत से मिला जिसकी आँखें जैतून की तरह गहरी थीं लेकिन वह नेकदिल नहीं थी. फिर बगदाद में भी मैं एक औरत से मिला जो बहुत खुशदिल और सलीकेदार थी लेकिन हम दोनों के शौक बहुत जुदा थे. एक के बाद दूसरी, ऐसी कई औरतों से मैं मिला लेकिन हर किसी में कोई न कोई कमी पाता था. और फिर एक दिन मुझे वह मिली जिसकी मुझे तलाश थी. वह सुन्दर थी, अक्लमंद थी, नेकदिल थी और सलीकेदार भी थी. हम दोनों में बहुत कुछ मिलता था. मैं तो कहूँगा कि वह पूरी कायनात में मेरे लिए ही बनी थी३“ दोस्त ने मुल्ला को टोकते हुए कहा — ”अच्छा! फिर क्या हुआ!? तुमने उससे शादी कर ली!“

मुल्ला ने ख्यालों में खोए हुए चाय की एक चुस्की ली और कहा — ”नहीं दोस्त! वो तो दुनिया के सबसे अच्छे आदमी की तलाश में थी.“

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एक दिन मुल्ला बाजार गया और उसने एक इश्तेहार लगाया जिसपर लिखा था रू ”जिसने भी मेरा गधा चुराया है वो मुझे उसे लौटा दे. मैं उसे वह गधा ईनाम में दे दूंगा“.

”नसरुद्दीन!“ — लोगों ने इश्तेहार पढ़कर कहा — ”ऐसी बात का क्या मतलब है!? क्या तुम्हारा दिमाग फिर गया है?“

”दुनिया में दो ही तरह के तोहफे सबसे अच्छे होते हैं“ — मुल्ला ने कहा — ”पहला तो है अपनी खोई हुई सबसे प्यारी चीज को वापस पा लेना, और दूसरा है अपनी सबसे प्यारी चीज को ही किसी को दे देना.“

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मुल्ला के ऐसे ही और कई छोटे किस्सों को पढ़ने के लिए थोड़ा सा इंतजार करें. इंतजार का फल बहुत मीठा होता है.

मुल्ला नसरुद्दीन और बेचारा पर्यटक

मुल्ला नसरुद्दीन एक बार तीर्थयात्रा पर मक्का गए और रास्ते में मदीना में भी रुके. जब वह वहां की मुख्य मस्जिद में घूम रहे थे तब एक हैरान—परेशान विदेशी पर्यटक उनके पास आया और उसने मुल्ला से पूछा — ”जनाब, आप मुझे यहीं के बाशिंदे लगते हैं. क्या आप मुझे इस मस्जिद के बारे में बता सकते हैं? मेरी पर्यटन की पुस्तिका खो गई है और ये बहुत पुरानी और महत्वपूर्ण मस्जिद लगती है.“

नसरुद्दीन को भी उस मस्जिद के बारे में कुछ पता नहीं था लेकिन वह पर्यटक को यह जताना नहीं चाहता था. उसने बड़े उत्साह से पर्यटक को मस्जिद के बारे में बताना शुरू किया — ”आप सही कहते हो. यह मस्जिद वाकई बहुत पुरानी और खास है. इसे सिकंदर महान ने अरब फतह करने की खुशी में बनवाया था.“

पर्यटक को यह सुनकर अच्छा लगा लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे पर अविश्वास का भाव आ गया. पर्यटक ने मुल्ला से कहा — ”लेकिन मेरी जानकारी के हिसाब से तो सिकंदर महान यूनानी था, मुस्लिम नहीं था.“

मुल्ला ने मुस्कुराते हुए कहा — ”हूँ, तो आप कुछ—कुछ जानते हो. दरअसल, उस जंग में सिकंदर महान को इतनी दौलत मिली कि उसने अल्लाह के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करने के लिए इस्लाम कबूल लिया.“

”ओह हो!“— पर्यटक आश्चर्य से बोला — लेकिन सिकंदर महान के वक्‌त में तो इस्लाम दुनिया में आया ही नहीं था!?“

”बहुत सही!“ — मुल्ला ने कहा — ”असल में, सिकंदर महान अपने प्रति अल्लाह की दानशीलता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने जंग के खात्मे के फौरन बाद नए मजहब को चलाया और वह इस्लाम का प्रवर्तक बन गया.“

पर्यटक ने नवीनीकृत आदर के साथ मस्जिद पर अपनी निगाह डाली. लेकिन इससे पहले कि मुल्ला इस सबसे बोर होकर भीड़ में खिसक लेता, पर्यटक ने फिर से अपने मन में उठते हुए नए प्रश्न को उसके सामने रख दिया — ”लेकिन इस्लाम के प्रवर्तक तो हजरत मोहम्मद थे न? इसे तो मैंने निश्चित रूप से एक किताब में पढ़ा है कि हजरात मोहम्मद ने ही इस्लाम धर्म की नींव रखी थी, सिकंदर महान ने नहीं.“

मुल्ला ने कहा — ”भाई खूब! तुम तो वाकई बहुत जानकार आदमी लगते हो! मैं इसी बात पर आ रहा था. दरअसल, सिकंदर महान को लगा कि वे नई शख्सियत अपनाने के बाद ही पैगम्बर बन सकते थे इसीलिए उन्होंने अपने पुराने नाम को त्याग दिया और फिर ताजिंदगी मोहम्मद ही कहलाये.“

”सच में!?“ — पर्यटक हैरत से बोला — ”ये तो बहुत प्रेरणादायक बात है३ लेकिन, सिकंदर महान तो हजरत मोहम्मद से कई सदियों पहले हुए थे! क्या मैं गलत हूँ?“

”सौ फीसदी!“ — मुल्ला हंसते हुए बोला — ”तुम किसी दूसरे सिकंदर महान के बारे में बात कर रहे हो. मैं तो तुम्हें उसके बारे में बता रहा था जिसे लोग मोहम्मद कहते थे!“

मुल्ला नसरुद्दीन और गरीब का झोला

एक दिन मुल्ला कहीं जा रहा था कि उसने सड़क पर एक दुखी आदमी को देखा जो ऊपरवाले को अपने खोटे नसीब के लिए कोस रहा था. मुल्ला ने उसके करीब जाकर उससे पूछा — ”क्यों भाई, इतने दुखी क्यों हो?“

वह आदमी मुल्ला को अपना फटा—पुराना झोला दिखाते हुए बोला — ”इस द्‌नुनिया में मेरे पास इतना कुछ भी नहीं है जो मेरे इस फटे—पुराने झोले में समा जाये.“

”बहुत बुरी बात है“ — मुल्ला बोला और उस आदमी के हाथ से झोला झपटकर सरपट भाग लिया.

अपना एकमात्र माल—असबाब छीन लिए जाने पर वह आदमी रो पड़ा. वह अब पहले से भी ज्यादा दुखी था. अब वह क्या करता! वह अपनी राह चलता रहा.

दूसरी ओर, मुल्ला उसका झोला लेकर भागता हुआ सड़क के एक मोड़ पर आ गया और मोड़ के पीछे उसने वह झोला सड़क के बीचोंबीच रख दिया ताकि उस आदमी को जरा दूर चलने पर अपना झोला मिल जाए.

दुखी आदमी ने जब सड़क के मोड़ पर अपना झोला पड़ा पाया तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा . वह खुशी से रो पड़ा और उसने झोले को उठाकर अपने सीने से लगा लिया और बोला — ”मेरे झोले, मुझे लगा मैंने तुम्हें सदा के लिए खो दिया!“

झाड़ियों में छुपा मुल्ला यह नजारा देख रहा था. वह हंसते हुए खुद से बोला — ”ये भी किसी को खुश करने का शानदार तरीका है!“

मुल्ला नसरुद्दीन का भाषण

एक बार शहर के लोगों ने मुल्ला नसरुद्दीन को किसी विषय पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया. मुल्ला जब बोलने के लिए मंच पर गया तो उसने देखा कि वहां उसे सुनने के लिए आये लोग उत्साह में नहीं दिख रहे थे.

मुल्ला ने उनसे पूछा — ”क्या आप लोग जानते हैं कि मैं आपको किस विषय पर बताने जा रहा हूँ?“

श्रोताओं ने कहा — ”नहीं.“

मुल्ला चिढ़ते हुए बोला — ”मैं उन लोगों को कुछ भी नहीं सुनाना चाहता जो ये तक नहीं जानते कि मैं किस विषय पर बात करनेवाला हूँ.“ — यह कहकर मुल्ला वहां से चलता बना.

भीड़ में मौजूद लोग यह सुनकर शमिर्ंदा हुए और अगले हफ्ते मुल्ला को एक बार और भाषण देने के लिए बुलाया. मुल्ला ने उनसे दुबारा वही सवाल पूछा — ”क्या आप लोग जानते हैं कि मैं आपको किस विषय पर बताने जा रहा हूँ?“

लोग इस बार कोई गलती नहीं करना चाहते थे. सबने एक स्वर में कहा — ”हाँ.“

मुल्ला फिर से चिढ़कर बोला — ”यदि आप लोग इतने ही जानकार हैं तो मैं यहाँ आप सबका और अपना वक्‌त बर्बाद नहीं करना चाहता.“ मुल्ला वापस चला गया.

लोगों ने आपस में बातचीत की और मुल्ला को तीसरी बार भाषण देने के लिए बुलाया. मुल्ला ने तीसरी बार उनसे वही सवाल पूछा. भीड़ में मौजूद लोग पहले ही तय कर चुके थे कि वे क्या जवाब देंगे. इस बार आधे लोगों ने ‘हां' कहा और आधे लोगों ने ‘नहीं' कहा.

मुल्ला ने उनका जवाब सुनकर कहा — ”ऐसा है तो जो लोग जानते हैं वे बाकी लोगों को बता दें कि मैं किस बारे में बात करनेवाला था.“ यह कहकर मुल्ला अपने घर चला गया.

मुल्ला नसरुद्दीन और भिखारी

एक दिन एक भिखारी ने मुल्ला नसरुद्दीन का दरवाजा खटखटाया. मुल्ला उस समय अपने घर की ऊपरी मंजिल पर था. उसने खिड़की खोली और भिखारी से कहा — ”क्या चाहिए?“

”आप नीचे आइये तो मैं आपको बताऊँगा“ — भिखारी ने कहा.

मुल्ला नीचे उतरकर आया और दरवाजा खोलकर बोला — ”अब बताओ क्या चाहते हो.“

”एक सिक्का दे दो, बड़ी मेहरबानी होगी“ — भिखारी ने फरियाद की. मुल्ला को बड़ी खीझ हुई. वह घर में ऊपर गया और खिड़की से झाँककर भिखारी से बोला — ”यहाँ ऊपर आओ“.

भिखारी सीढियाँ चढ़कर ऊपर गया और मुल्ला के सामने जा खडा हुआ. मुल्ला ने कहा — ”माफ करना भाई, अभी मेरे पास खुले पैसे नहीं हैं.“

”आपने ये बात मुझे नीचे ही क्यों नहीं बता दी? मुझे बेवजह इतनी सारी सीढियाँ चढ़नी पड़ गईं!“ — भिखारी चिढ़कर बोला.

”तो फिर तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया“ — मुल्ला ने पूछा — ”जब मैंने ऊपर से तुमसे पूछा था कि तुम्हें क्या चाहिए!?“

मुल्ला नसरुद्दीन रू दावत

खुशी की बात यह है की मुल्ला नसरुद्दीन खुद हमें यह कहानी सुना रहे हैंरू—

”एक दिन ऐसा हुआ कि किसी ने किसी से कुछ कहा, उसने किसी और से कुछ कहा और इसी कुछ—के—कुछ के चक्कर में ऐसा कुछ हो गया कि सब और यह बात फैल गई कि मैं बहुत खास आदमी हूँ. जब बात हद से भी ज्यादा फैल गई तो मुझे पास के शहर में एक दावत में खास मेहमान के तौर पर बुलाया गया.

मुझे तो दावत का न्योता पाकर बड़ी हैरत हुई. खैर, खाने—पीने के मामले में मैं कोई तकल्लुफ नहीं रखता इसीलिए तय समय पर मैं दावतखाने पहुँच गया. अपने रोजमर्रा के जिस लिबास में मैं रहता हूँ, उसी लिबास को पहनकर दिनभर सड़कों की धूल फांकते हुए मैं वहां पहुंचा था. मुझे रास्ते में रूककर कहीं पर थोडा साफ—सुथरा हो लेना चाहिए था लेकिन मैंने उसे तवज्जोह नहीं दी. जब मैं वहां पहुंचा तो दरबान ने मुझे भीतर आने से मना कर दिया.

”लेकिन मैं तो नसरुद्दीन हूँ! मैं दावत का खास मेहमान हूँ!“

”वो तो मैं देख ही रहा हूँ“ — दरबान हंसते हुए बोला. वह मेरी तरफ झुका और धीरे से बोला — ”और मैं खलीफा हूँ.“ यह सुनकर उसके बाकी दरबान दोस्त जोरों से हंस पड़े. फिर वे बोले — ”दफा हो जाओ बड़े मियां, और यहाँ दोबारा मत आना!“

कुछ सोचकर मैं वहां से चल दिया. दावतखाना शहर के चौराहे पर था और उससे थोड़ी दूरी पर मेरे एक दोस्त का घर था. मैं अपने दोस्त के घर गया.

”नसरुद्दीन! तुम यहाँ!“ — दोस्त ने मुझे गले से लगाया और हमने साथ बैठकर इस मुलाकात के लिए अल्लाह का शुक्र अदा किया. फिर मैं काम की बात पर आ गया.

”तुम्हें वो लाल कढ़ाईदार शेरवानी याद है जो तुम मुझे पिछले साल तोहफे में देना चाहते थे?“ — मैंने दोस्त से पूछा.

”बेशक! वह अभी भी आलमारी में टंगी हुई तुम्हारा इंतजार कर रही है. तुम्हें वह चाहिए?

”हाँ, मैं तुम्हारा अहसानमंद हूँ. लेकिन क्या तुम उसे कभी मुझसे वापस मांगोगे? — मैंने पूछा.

”नहीं, मियां! जो चीज मैं तुम्हें तोहफे में दे रहा हूँ उसे भला मैं वापस क्यों मांगूंगा?

”शुक्रिया मेरे दोस्त“ — मैं वहां कुछ देर रुका और फिर वह शेरवानी पहनकर वहां से चल दिया. शेरवानी में किया हुआ सोने का बारीक काम और शानदार कढ़ाई देखते ही बनती थी. उसके बटन हाथीदांत के थे और बैल्ट उम्दा चमड़े की. उसे पहनने के बाद मैं खानदानी आदमी लगने लगा था.

दरबानों ने मुझे देखकर सलाम किया और बाइज्जत से मुझे दावतखाने ले गए. दस्तरखान बिछा हुआ था और तरह—तरह के लजीज पकवान अपनी खुशबू फैला रहे थे और बड़े—बड़े ओहदेवाले लोग मेरे लिए ही खड़े हुए इंतजार कर रहे थे. किसी ने मुझे खास मेहमान के लिए लगाई गई कुर्सी पर बैठने को कहा. लोग फुसफुसा रहे थे — ”सबसे बड़े आलिम मुल्ला नसरुद्दीन यही हैं“. मैं बैठा और सारे लोग मेरे बैठने के बाद ही खाने के लिए बैठे.

वे सब मेरी और देख रहे थे कि मैं अब क्या करूँगा. खाने से पहले मुझे बेहतरीन शोरबा परोसा गया. वे सब इस इंतजार में थे कि मैं अपना प्याला उठाकर शोरबा चखूँ. मैं शोरबा का प्याला हाथ में लेकर खड़ा हो गया. और फिर एक रस्म के माफिक मैंने शोरबा अपनी शेरवानी पर हर तरफ उड़ेल दिया.

वे सब तो सन्न रह गए! किसी का मुंह खुला रह गया तो किसी की सांस ही थम गई. फिर वे बोले — ”आपने ये क्या किया, हजरत! आपकी तबियत तो ठीक है!?“

मैंने चुपचाप उनकी बातें सुनी. उन्होंने जब बोलना बंद कर दिया तो मैंने अपनी शेरवानी से कहा — ”मेरी प्यारी शेरवानी. मुझे उम्मीद है कि तुम्हें यह लजीज शोरबा बहुत अच्छा लगा होगा. अब यह बात साबित हो गई है कि यहाँ दावत पर तुम्हें ही बुलाया गया था, मुझे नहीं.“

”रोटी क्या है?“

एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन पर राजदरबार में मुकदमा चला की वे राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा बन गए हैं और राज्य भर में घूमकर दार्शनिकों, धर्मगुरुओं, राजनीतिज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों के बारे में लोगों से कह रहे हैं की वे सभी अज्ञानी, अनिश्चयी और सत्य से अनभिज्ञ हैं. मुकदमे की कार्रवाई में भाग लेने के लिए राज्य के दार्शनिकों, धर्मगुरुओं, नेताओं, और अधिकारियों को भी बुलाया गया.

दरबार में राजा ने मुल्ला से कहा — ”पहले तुम अपनी बात दरबार के सामने रखो“.

मुल्ला ने कहा — ”कुछ कागज और कलमें मंगा लीजिये.“ कागज और कलमें मंगा ली गईं.

”सात बुद्धिमान व्यक्तियों को एक—एक कागज और कलम दे दीजिये“ — मुल्ला ने कहा. ऐसा ही किया गया.

”अब सातों तथाकथित बुद्धिमान सज्जन अपने—अपने कागज पर इस प्रश्न का उत्तर लिख दें — ‘रोटी क्या है?श्“

बुद्धिमान सज्जनों ने अपने—अपने उत्तर कागज पर लिख दिए. सभी उत्तर राजा और दरबार में उपस्थित जनता को पढ़कर सुनाए गए.

पहले ने लिखा — ”रोटी भोजन है“.

दूसरे ने लिखा — ”यह आटे और पानी का मिश्रण है“.

तीसरे ने लिखा — ”यह ईश्वर का वरदान है“.

चौथे ने लिखा — ”यह पकाया हुआ आटे का लौंदा है“.

पाँचवे ने लिखा — ”इसका उत्तर इसपर निर्भर करता है कि ‘रोटी' से आपका अभिप्राय क्या है?“

छठवें ने लिखा — ”यह पौष्टिक आहार है“.

और सातवें ने लिखा — ”कुछ कहा नहीं जा सकता“.

मुल्ला ने सभी उपस्थितों से कहा — ”यदि इतने विद्वान और गुणी लोग इसपर एकमत नहीं हैं कि रोटी क्या है तो वे और दूसरी बातों पर निर्णय कैसे दे सकते हैं? वे यह कैसे कह सकते हैं कि मैं लोगों को गलत बातें सिखाता हूँ? क्या आप महत्वपूर्ण मामलों में परामर्श और निर्णय देने का अधिकार ऐसे लोगों को दे सकते हैं? जिस चीज को वे रोज खाते हैं उसपर वे एकमत नहीं हैं फिर भी वे एकस्वर में कहते हैं कि मैं लोगों की मति भ्रष्ट करता हूँ!“

हाजिरजवाबी

मुल्ला नसीरुद्दीन ने एक दिन अपने शिष्यों से कहा — ”मैं अंधेरे में भी देख सकता हूँ“।

एक विद्यार्थी ने कौतूहलवश उससे पूछा — ”ऐसा है तो आप रात में लालटेन लेकर क्यों चलते हैं?“

”ओह, वो तो इसलिए कि दूसरे लोग मुझसे टकरा न जायें“ — मुल्ला ने मुस्कुराते हुए कहा।

ताबूत

एक स्थान पर कई मुस्लिम धर्मगुरु एकत्र हुए और कई विषयों पर चर्चा करते—करते उनमें इस बात पर विवाद होने लगा कि शवयात्रा के दौरान ताबूत के दायीं ओर चलना चाहिए या बायीं ओर चलना चाहिए।

इस बात पर समूह दो भागों में बाँट गया। आधे लोगों का कहना था की ताबूत के बायीं ओर चलना चाहिए जबकि बाकी लोग कह रहे थे कि बायीं ओर चलना चाहिए। उन्होंने मुल्ला नसीरुद्दीन को वहां आते देखा और उससे भी इस विषय पर अपनी राय देने के लिए कहा। मुल्ला ने उनकी बात को गौर से सुना और फिर हँसते हुए कहा — ”ताबूत के दायीं ओर चलो या बायीं और चलो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सबसे जरूरी बात यह है कि ताबूत के भीतर मत रहो!“

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