मैं एक कवि हूँ ।कविता लिखना और सुनना बहुत अच्छा लगता है ।मैं सेवानिवृत्त वरिष्ठ अध्यापक हूँ मुझें चुटकलें .शायरी .गजल .बहुत अच्छे लगते है ।

# होठ "
# कविता ***
अनकही बात होठो ,से कह दूँ जरा ।
आ पास मेरे ,होठो से लगा लूँ जरा ।।
तेरे फडफडाते होठ ,कुछ कहना चाहते ।
मेरे दिल की धडकन ,उन पर सजा लूँ जरा ।।
आ तेरे होठ की ,मिठास ले लूँ जरा ।
तुझे हुस्न की रानी ,कह लूँ जरा ।।
तेरे लब पर मेरा ,ही नाम रहे ।
तेरे लब सदा ,मेरे दिल के तराने गाते रहे ।।
खुदा ही हसीन तौहफें ,को निहार लूँ जरा ।
आ तेरे होठ ,जरा सजा लूँ जरा ।।

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# आज की प्रतियोगिता "
# विषय .होठ "
# कविता ***
तेरे रसीले होठ ,सुदंर लगते है ।
तेरे होठो की लाली ,गजब ढ़ाती है ।।
तेरे होठ तेरे ,यौवन में चार चाँद लगाते है ।
तेरे होठो से ,तू अप्सरा लगती है ।।
तेरे होठ सबका ,जी चुराते है ।
तेरे होठ कुछ कहना ,चाहते है ।।
तेरे होठ प्रेम में ,फडफडाते है ।
तेरे होठ हर बार ,नया रुप धरते है ।।
तेरे होठ लिपिस्टिक से ,सबकी आँखों में ,बस जाते है ।
तेरे होठ खुबसूरत ,गीत गुनगुनाते है ।।
तेरे रसीले होठ ,हर कोई चुमना चाहते है ।
तेरे सुदंर होठ ,तुझे हुस्न की परी बनाते है ।।
तेरे होठ रसीले ,नाजुक लगते है ।
तेरे होठ दिल की बात ,कहना चाहते है ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,कवि ,अमदाबाद ,गुजरात ।

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आप सभी मित्रों के आशिर्वाद व कृपा से मैंने कविता पाठ किया जिसमें सम्मान पत्र मिला ,आपका ऐसा ही स्नेह मिलता रहे और मैं अमदाबाद का नाम रोशन करुँ ,यही कामना है मेरी ।

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# आज की प्रतियोगिता "
# विषय .कमी **
# कविता "
क्या कमी रह गयी मेरे प्यार में ,
जो मेरे से मुँह मोड़ लिया ।
क्या कमी रह गयी मेरे रुप में ,
जो आँखों से ही गिरा दिया ।।
क्या कमी रह गयी मेरे यौवन में ,
एक नजर देखना गंवारा नहीं हुआ ।
क्या कमी रह गयी मेरी दोस्ती में ।।
दो कदम साथ चलना छोड़ दिया ।
क्या कमी रह गयी मेरे दिल में ।।
दिल से दिल मिलाना छोड़ दिया ।
क्या कमी रह गयी मेरी नजरों में ।।
नयन से नयन मिलाना छोड़ दिया ।
क्या कमी रह गयी मेरी हसरत में ।।
दिल की बातें बताना छोड दिया ।
क्या कमी रह गयी मेरी यारी में ,
मुझसे यारी निभाना छोड़ दिया ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,कवि ,अमदाबाद ,गुजरात ।

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# मुक्तक "
# विषय .मुरलीधर **
मुरलीधर तेरे श्रृंगार अनोखे लागे ।
मुरलीधर तेरी मुरली सुहानी लागे ।।
कान्हाँ तेरे जैसा जग में कोई नहीं ठहरा ।
मुरलीधर तेरा मोरपंख सुहाना लागे ।।
..........................
राधा के मोहन तेरी अदा निराली लागे ।
राधा के मोहन तेरी बाँकी चितवन सुहानी लागे ।।
कान्हाँ तेरे जैसा अवतारी पुरुष कोई नही ठहरा ।
राधा के मोहन तेरी छटा सुहानी लागे ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,कवि ,अमदाबाद ,गुजरात ।
सभी को जन्माष्टमी की बधाई और शुभकामना हो ।

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कविता ..
कितना सोना तुझे ,रब ने बनाया ,जी करे देखता रहूँ ।
कितना सुदंर रंगो से तुझे सजाया ,जी ही नही भरे ।।
तुझे देख कर हर कोई ललचाये ,तुझे वाह वाह ही कहे ।
तेरी छटा कितनी सुहानी ,आँखें सदा देखती ही रहे ।।
तेरे रुप ने सब का दिल मोहा ,एकटक देखता ही रहे ।
कुदरत का अनमोल तू खजाना , कभी कभी ही दिखें ।।
सप्त रंगो की अनमोल छटा ,हर कोई दाँतो तले अंगुली दबाये ।
तुझे अनमोल इन्द्रधनुष कहे ,देख कर दिल बाग बाग हो जाये ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,कवि ,अमदाबाद ,गुजरात ।

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# आज की प्रतियोगिता "
# विषय .दयालुता "
# कविता ***
दयालुता मानव मात्र ,का गहना है ।
दयालुता से मानव ,सुशोभित होता है ।।
दयालुता से करुणा ,झलकती है ।
दयालु व्यक्ति ,परोपकारी होता है ।।
दयालु व्यक्ति ,किसी को तड़पता नहीं देख सकता है ।
किसी के आंसू पौछना ,दयालुता ही है ।।
जीव मात्र के दुःख दूर करना ,दयालुता है ।
दयालुता में ही ,ईश्वर का वास है ।।
मानव वही है जो ,प्राणीमात्र पर दया करें ।
दया धर्म का मूल है ,पाप मूल अभिमान है ।।
जब तक धट में प्राण है ,दया नहीं छोड़नी है ।
दयालुता ही सबसे ,बडा पुण्य है ।।
दयालुता में ही ,मानवता छिपी है ।
दयालु व्यक्ति ,किसी को दुःख नही देता है ।।
ईश्वर को तो नही देखा ,पर जीव मात्र में ईश्वर का निवास है ।
दयालुता से भी ,स्वर्ग मिलता है ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,कवि ,अमदाबाद ,गुजरात ।

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#आज की प्रतियोगिता "
# विषय .मारना "
# कविता ***
किसी को जान से ,मारना पाप है ।
किसी को नजरों से गिराना ,धोखा है ।।
किसी को धूलधूसरीत करना ,अमानवीयता है ।
किसी के साथ हैवानियत करना ,अपराध है ।।
किसी खिलते फूल को कुचलना ,दानवता है ।
किसी की चुगली करना ,पाप है ।।
किसी के आंसू पौछना ,पुण्य है ।
किसी को आंसू देना ,पाप है ।।
किसी का धन छिनना ,कपटता है ।
किसी को सहारा देना ,मानवता है ।।
किसी को खुश करना ,मित्रता है ।
किसी के सुख दुःख में काम आने वाला ,ही दोस्त है ।।

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# आज की प्रतियोगिता "
# विषय .कर्मा "
# कविता ***
मेरा कर्मा तू ,मेरा धर्मा तू ।
तू ही मेरा रहमो करम ,तू ही ईमान तू ।।
तेरी कृपा से ,भवसागर पार करुँ ।
ये मेरी अंतिम ,अभिलाषा तू ।।
अब तो रहम कर ,इस जग पर तू ।
हम सब तेरे ,पुत्र समान ठहरे ।।
क्यूँ सताता है ,अपने पुत्रों को तू ।
हम तो तेरे दिल ,के टूकड़े ठहरे ।।
अब तो तेरी माया ,समेट ले प्रभु तू ।
सब प्राणों के लिए ,तरस रहे ।।
अपनी अमी की ,वर्षा कर तू ।
तेरे को निश दिन ,सब पुकार रहे ।।
दयासागर तुझे कहते ,
अब तो करुणा बरसा दें ।
इस संसार में सब ,अमन चाहते ।।
कुछ सुकून के पल ,हमको तू दे दें ।
अब फिर भुल नहीं होगी ,अहम् छोड़ तेरी शरण आयें ।।

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# विषय .काजल ,अंजन " ** कविता **
कजरारी आँखें ,काजल से सुहानी लगती ।
हर नार काजल की ,दीवानी लगती ।।
काजल बिन आँखों की ,शोभा फिकी सी लगती ।
अंजन बिन नारी ,सुदंरता का खजाना नहीं लगती ।।
काजल भरी आँखें ,पल में दिल लुट लेती ।
हर नारी यह ,अनमोल श्रृंगार करती ।।
काजल से किसी की ,नजर नहीं लगती ।
काजल से नार ,दीवानी सी लगती ।।
हर नार काजल ,लगाने उतावली दिखती ।
काजल लगा कर ,आँखें कजरारी सी लगती ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,कवि ,अमदाबाद ,गुजरात ।

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