Jay sharee Krishna

महाभारत से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न (Mahabharat Question Answer in Hindi) : 'महाभारत कैसे शुरू हुआ' 'महाभारत में मूल रूप से कितने श्लोक थे' 'महाभारत कौन से युग में हुई थी' 'महाभारत कितना पुराना है' 'महाभारत कब लिखी गई थी'महाभारत संबंधी सवाल जवाब सबसे ज्यादा गूगल पर सर्च होते है क्यूंकि इस तरह के प्रश्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कम और क्विज प्रोग्रामों खासकर केबीसी में सबसे ज्यादा पूछा जाता है। साथ ही अपने बौद्धिक विकास के लिए रामायण प्रश्नोत्तरी को अभी पढ़े। आपको यहां महाभारत के अनेक पात्रों, पात्रों के माता, पिता, पत्नी, पर्वतों, नगरों तथा नदियों आदि के बारें में जिज्ञासापूर्ण व खोजपरक पढ़ने को मिलेगें।



1. महाभारत का मूल नाम क्या है? – जय संहिता।
2. महाभारत का युद्ध कहाँ हुआ? – कुरुक्षेत्र।
3. महाभारत का युद्ध कितने दिनों तक चला था? – 18 दिन
4. महाभारत का वास्तविक नाम क्या है? – जयसंहिता।
5. महाभारत किस वर्ग में आता है? – स्मृति
6. महाभारत के अध्यायों को क्या कहते हैं? – पर्व।
7. महाभारत के पर्वो (अध्याय) की संख्या कितनी है? – 18 पर्व
8. महाभारत के युद्ध का धृतराष्ट्र को वर्णन किसने किया? – संजय।
9. महाभारत के युद्ध का मुख्य कारण क्या था? – द्रौपदी के केश
10. महाभारत के रचयिता का क्या नाम है? – वेद व्यास।
11. महाभारत के रचयिता महर्षि व्यास के पिता कौन थे? – पराशर
12. महाभारत के लेखन का कार्य किसने किया? – गणेश जी ने।
13. महाभारत को अन्य किन नामों से जाना जाता है? – जय, भारत
14. महाभारत में कितने अक्षौहिणी सेना समाप्त हुई? – 18
15. महाभारत में कीचक वध किस पर्व के अंतर्गत आता है? – विराट पर्व
16. महाभारत में कृष्ण की सेना किसकी ओर से लड़ी? – कौरवों की ओर से
17. महाभारत में कौरव तथा पाण्डव सेनाओं का सम्मिलित संख्याबल कितने अक्षौहिणी था? – 18 अक्षौहिणी
18. महाभारत में धर्म पुत्र किसे कहा गया है? – युधिष्ठिर।
19. महाभारत में बलराम की भूमिका क्या थी? – तीर्थाटन के लिए चले गये
20. महाभारत में युधिष्ठिर के अतिरिक्त किस और राजा के जुए में राजपाठ हारने का वर्णन है? – राजा नल।
21. महाभारत में राज्य के कितने महत्त्वपूर्ण अंग बताये गए हैं? – 7
22. महाभारत में रामायण का वर्णन किस पर्व में है? – वन पर्व में।
23. महाभारत में श्लोकों की कुल संख्या कितनी है? – एक लाख।
24. महाभारत में सुषेण किसका पुत्र था? – कर्ण
25. महाभारत युद्ध का सेनापतित्व किसने किया? – शल्य और अश्वत्थामा


26. महाभारत युद्ध के उपरान्त कौरव सेना के कितने महारथी शेष बचे? – 3
27. महाभारत युद्ध के कौन से दिन कृष्ण अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर चक्र उठाकर भीष्म को मारने दौड़े? – तीसरे दिन।
28. महाभारत युद्ध के कौन-से दिन पितामह भीष्म शर-शैय्या को प्राप्त हुए? – 10वें दिन
29. महाभारत युद्ध के दौरान कौरव सेना में कितने अध्यक्ष बनाए गए? – पाँच।
30. महाभारत युद्ध के पश्चात जो महारथी जीवित बचे उनकी संख्या कितनी थी? – 18
31. महाभारत युद्ध के पश्चात् कितने वर्षों तक धृतराष्ट्र, गांधारी एवं कुंती युधिष्ठिर के राज्य में रहे? – 15 वर्ष
32. महाभारत युद्ध के पश्चात् पांडवों की ओर से कौन-2 जीवित बचे? – पांचों पांडव , श्रीकृष्ण तथा सात्यिक।
33. महाभारत युद्ध में कर्ण के सारथी का नाम क्या था? – शल्य
34. महाभारत युद्ध में कौन-से दिन श्रीकृष्ण ने शस्त्र न उठाने की अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ा? – 9वें दिन
35. महाभारत युद्ध में कौरव पक्ष के कुल कितने सेनापति बने? – पाँच।
36. महाभारत युद्ध में चक्रव्यूह की रचना किसने की? – द्रोणाचार्य ने
37. महाभारत युद्ध में भीष्म ने कितने दिन युद्ध किया? – 10 दिन
38. महाभारत वन पर्व के अंतर्गत कितने अध्याय हैं? – 315
39. कौन ऋषि जन्मेजय को महाभारत की कथा सुनाते हैं? – वैशम्पायन।
40. द्रोणाचार्य का वध महाभारत में युद्ध के कौन से दिन हुआ था? – 15वें दिन

41. द्रौपदी के चीरहरण का वर्णन महाभारत के किस पर्व में है? – सभा पर्व में।
42. नल दमयंती कथा महाभारत के किस पर्व में है? – वन पर्व में।
43. भगवद् गीता किस ग्रंथ का एक भाग है? – महाभारत।
44. भगवद् गीता महाभारत के किस पर्व में वर्णित है? – भीष्म पर्व।
45. लाक्षागृह का वर्णन महाभारत के किस पर्व में है? – आदि पर्व में।
46. अंजनपर्वा का वध किसके हाथों हुआ? – अश्वत्थामा
47. अज्ञातवास के दौरान अर्जुन क्या काम करते थे? – नर्तकी बनकर नृत्य तथा गान सिखाते थे।
48. अज्ञातवास के दौरान नकुल क्या काम करते थे? – अश्वपाल थे।
49. अज्ञातवास के दौरान युधिष्ठिर क्या काम करते थे? – राजा विराट को पांसे खेलना सिखाते थे।
50. अज्ञातवास के दौरान सहदेव क्या काम करते थे? – गोशाला अधिकक्ष।
51. अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा किस की पुत्री थी? – विराट की।
52. अभिमन्यु की माता का क्या नाम था? – सुभद्रा।
53. अभिमन्यु के पुत्र का नाम क्या था? – परीक्षित
54. अम्बा किस राज्य की राजकुमारी थी? – काशी
55. अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा किसकी पुत्री थी? – मणिपुर के राजा चित्रवाहन की।
56. अर्जुन के धनुष का नाम क्या था? – गांडीव
57. अर्जुन के पुत्र इरावत की माता कौन थीं? – उलूपी
58. अर्जुन के पुत्र इरावान का वध किसके हाथों हुआ? – अल्मबुश द्वारा।
59. अर्जुन के शंख का क्या नाम था? – देवदत्त
60. अर्जुन के शंख का क्या नाम था? – देवदत्त।
61. अर्जुन को गांडीव धनुष एवं श्रीकृष्ण को चक्र किसने दिया? – अग्नि के कहने पर वरुण देव ने।
62. अश्वत्थामा की माता का क्या नाम था? – कृपि
63. अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में जिस बालक की रक्षा की, उसका नाम क्या था? – परीक्षित
64. अश्वत्थामा द्वारा छोड़े गये ब्रह्मास्त्र को किसने शांत किया था? – व्यास
65. अश्वत्थामा हाथी को किसने मारा? – भीम ने।
66. अश्वमेघ यज्ञ में घोड़े के पीछे रक्षा के लिए कौन पांडव गया? – अर्जुन।
67. इन्द्र का कर्ण से कवच एवं कुंडल मांगना किस पर्व में है? – विराट पर्व में।
68. उलूपी व चित्रांगदा किसकी पत्नी थी? – अर्जुन
69. एकचक्रा नगरी में भीम ने किस राक्षस का वध किया था? – बकासुर
70. एकलव्य के पिता का नाम क्या था? – हिरण्यधनु।
71. कर्ण का बचपन का नाम क्या था? – वसुषेण।
72. कर्ण का वध किसके हाथों हुआ? – अर्जुन के द्वारा।
73. कर्ण की जन्मदात्री माता का क्या नाम था? – कुंती।
74. कर्ण के धनुष का नाम क्या था? – विजय।
75. कर्ण के वध के उपरान्त किसके कहने पर दुर्योधन ने शल्य को सेनापति नियुक्त किया? – अश्वत्थामा
76. कर्ण को अमोघ शक्ति किसने प्रदान की थी? – इन्द्र
77. कर्ण को पालने वाली माता का क्या नाम था? – राधा
78. कर्ण ने अपने कवच कुंडल किसे दान किए? – इन्द्र को
79. कर्ण वध के पश्चात किसने दुर्योधन को पाण्डवों से संधि का विचार दिया? – कृपाचार्य
80. किस अप्सरा ने अर्जुन को नपुंसक होने का शाप दिया? – उर्वशी
81. किस स्थान को ‘ब्रह्मा की यज्ञीय वेदी’ कहा जाता है? – कुरुक्षेत्र
82. किसने जरासंध का वध किया था? – भीम।
83. कीचक कौन था? – राजा विराट की पत्नी सुदेशना का भाई।
84. कुंती किसकी पत्नी थी? – पांडु।
85. कुन्ती पुत्र अर्जुन के पोते का नाम क्या था? – परीक्षित
86. कुबेर के पुत्र का नाम था? – नलकूबर
87. कुरुक्षेत्र में किस स्थान पर कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया? – ज्योतीसर
88. कृष्ण के वंश का क्या नाम था? – भीमसात्वत
89. कृष्ण के वंश का नाश होने का कारण क्या था? – गान्धारी का श्राप
90. कृष्ण के विराट स्वरूप का वर्णन गीता के किस अध्याय में आता है? – ग्यारहवें में।
91. कृष्ण के सारथी का क्या नाम था? – दारुक।
92. कौरवों की एकमात्र बहन दु:शला का विवाह किससे हुआ? – जयद्र्थ।
93. कौरवों व पांडवों के शस्त्र गुरु का नाम बताओ। – द्रोणाचार्य।
94. गांधारी किस प्रदेश के राजकुमारी थी? – गांधार।
95. गांधारी ने कितनी बार अपने आँखों की पट्टी खोली? – दो बार
96. गुरु की मूर्ति बनाकर धनुर्विद्या का ज्ञान प्राप्त करने वाले भील का नाम बताओ। – एकलव्य।
97. घटोत्कच की माँ का क्या नाम था? – हिडिम्बा
98. चक्रव्यूह की रचना किसने की? – गुरु द्रोणाचार्य ने।
99. चक्रव्यूह को तोड़ता हुआ कौन मारा गया? – अभिमन्यु
100. चक्रव्यूह में फँसने के बाद अभिमन्यु को कितने महारथियों ने मिलके मारा? – छ:


101. जरासंध किस प्रदेश का राजा था? – मगध।
102. जुए में हारकर पांडवों को कितने वर्ष का वनवास मिला? – 12 वर्ष वनवास तथा 1 वर्ष अज्ञातवास।
103. दानवीर कर्ण का अंतिम दान क्या था? – सोने का दाँत
104. दु:शासन का वध किसने किया? – भीम ने।
105. दुर्योधन कितनी अक्षौहिणी सेना का स्वामी था? – 11 अक्षौहिणी
106. दुर्योधन की बहन कौन थी? – दुःशला
107. दुर्योधन के पुत्र का नाम क्या था? – लक्ष्मण।
108. दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण का वध किसने किया? – अभिमन्यु ने।
109. दुर्योधन तथा भीम में कौन पहले पैदा हुए? – दोनों एक ही दिन पैदा हुए।
110. दुशासन की छाती का रक्त पीने का प्रण किस पाण्डव ने किया था? – भीम
111. द्रोणाचार्य किसके हाथों मारे गए? – धृष्टध्युमन
112. द्रोणाचार्य की पत्नी कौन थीं? – कृपि
113. द्रोणाचार्य के पिता कौन थे? – भारद्वाज
114. द्रोणाचार्य के बाद कौरवों का सेनापति कौन बना? – कर्ण।
115. द्रोणाचार्य ने कितने दिन सेनापति का भार संभाला? – पाँच दिन।
116. द्रौपदी का जन्म का नाम क्या था? – कृष्णा।
117. द्रौपदी किस प्रदेश की राजकुमारी थी? – पांचाल।
118. द्रौपदी के पांचों पुत्रों का वध किसने किया? – अश्वत्थामा ने तलवार से काट डाला।
119. द्रौपदी के पिता द्रुपद का वध किसके हाथों हुआ? – द्रोणाचार्य
120. द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न का वध किसने किया? – अश्वत्थामा ने
121. धृतराष्ट्र का जन्म किसके गर्भ से हुआ था? – अम्बिका
122. धृतराष्ट्र की माता का क्या नाम था? – अंबिका।
123. धृतराष्ट्र के पुत्रों को क्या नाम दिया गया था? – कौरव।
124. नकुल के शंख का क्या नाम था? – सुघोष।
125. निषाद जाति से सम्बन्धित कौन था? – एकलव्य
126. पांडव नकुल किस कला में निपुण था? – घोड़ो को परखने में
127. पांडवों का द्रौपदी के साथ विवाह किस पर्व में वर्णित है? – आदि पर्व में।
128. पांडवों के अज्ञातवास के समय अर्जुन का छद्म नाम क्या था? – बृहन्नला।
129. पांडवों के अज्ञातवास के समय नकुल का छद्म नाम क्या था? – ग्रंथिक।
130. पांडवों के अज्ञातवास के समय भीम का छद्म नाम क्या था? – बल्लव।
131. पांडवों के अज्ञातवास के समय युधिष्ठिर का छद्म नाम क्या था? – कंक।
132. पांडवों के अज्ञातवास के समय सहदेव का छद्म नाम क्या था? – अरिष्ट नेमि।
133. पांडवों के पुरोहित का नाम क्या था? – धौम्य ऋषि।
134. पांडवों ने अपने अज्ञातवास का एक वर्ष कहाँ बिताया? – विराट नगर।
135. पांडवों में सर्वप्रथम विवाह किसका हुआ? – भीम का हिडिंबा के साथ।
136. पांडु के पुत्रों को क्या नाम दिया गया था? – पांडव।
137. पाण्डव नकुल की माता का नाम क्या था? – माद्री
138. पाण्डवों के महाप्रयाण के बाद राजगद्दी पर कौन बैठा? – परीक्षित
139. बलराम की पत्नी कौन थीं? – रेवती
140. बलराम के अतिरिक्त तटस्थ रहने वाले योद्धा कौन थे? – विदर्भराज रुकमी।
141. बलराम जी का अंत कैसे हुआ? – समाधि लेकर स्वर्ग गए।
142. भगवद् गीता में कितने अध्याय है? – 18 (अठारह)
143. भगवद् गीता में श्लोकों की कुल संख्या कितनी है? – 700
144. भगवान कृष्ण का जन्म कहाँ हुआ? – मथुरा।
145. भगवान शिव से कौन सा अस्त्र अर्जुन ने प्राप्त किया? – पाशुप्तास्त्र।
146. भीम के शंख का क्या नाम था? – पौंड्र।
147. भीम द्वारा मारा गया ‘अश्वत्थामा’ नाम का हाथी किस राजा का था? – इन्द्रवर्मा
148. भीष्म और द्रोणाचार्य को धनुर्विद्या किसने सिखाई? – परशुराम।
149. भीष्म कितनी सेना समाप्त करके जल गृहण करते थे? – दस हज़ार
150. भीष्म कितने दिन सेनापति रहे? – 10 दिन
151. भीष्म पितामह का असली नाम क्या था? – देवव्रत।
152. भीष्म पितामह कितने दिन तक शरशैय्या पर पड़े रहे? – 58 दिन
153. भीष्म पितामह के देह त्याग का वर्णन किस पर्व में है? – अनुशासन पर्व में।
154. भीष्म पितामह के माता-पिता का क्या नाम था? – गंगा-शांतनु।
155. भूरिश्रवा का दाहिना हाथ किसने काटा? – अर्जुन ने
156. मगध नरेश जरासंध ने मथुरा पर कितनी बार चढ़ाई की थी? – 18
157. महर्षि भृगु की पत्नी का नाम क्या था? – पुलोमा
158. यक्ष से युधिष्ठिर ने किस पाण्डव का जीवन दान माँगा था? – सहदेव
159. यह ज्ञात हो जाने पर कि कर्ण पाण्डवों का भाई था, युधिष्ठिर ने किसे शाप दिया? – नारी जाति को
160. युद्ध के कौन से दिन कर्ण की मृत्यु हुई? – सत्रहवें दिन।
161. युद्ध के कौन से दिन चक्रव्यूह की रचना की गई? – तेरहवें दिन।
162. युद्ध में कौरवों का प्रथम सेनापति कौन था? – भीष्म पितामह।
163. युद्ध में पांडवों का प्रथम सेनापति कौन था? – धृष्टध्युमन।
164. युद्ध में पांडवों व कौरवों की सेनाओं का क्या अनुपात था? – 7:11
165. युद्ध में भीम ने किसकी भुजाएँ तोड़कर प्रतिज्ञा पूरी की? – दु:शासन।
166. युद्ध में विजयी होने पर पांडवों ने कौन सा यज्ञ किया? – अश्वमेघ यज्ञ।
167. युधिष्ठिर के जुये के खेल का वर्णन किस पर्व में है? – सभा पर्व में।
168. युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में ब्राह्मणों के चरण धोने का कार्य किसने किया? – श्रीकृष्ण ने
169. युधिष्ठिर के लिए सभा-भवन का निर्माण किसने किया था? – मय दानव ने
170. युधिष्ठिर के शंख का क्या नाम था? – अनंतविजय।
171. युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ करने की सलाह किसने दी थी? – नारद
172. रणभूमि में श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन अर्जुन के अतिरिक्त और किसने किये? – संजय
173. राजा नल किस प्रदेश के राजा थे? – निषध देश के।
174. राजा नल की रानी दमयंती किसकी पुत्री थी? – विदर्भ देश के राजा भीमक की।
175. राजा नल ने किससे जुए में अपना राजपाठ हारा? – अपने भाई पुष्कर से।
176. राजा परीक्षित के पुत्र का नाम क्या था? – जनमेजय
177. राजा विराट की पत्नी कौन थीं? – सुदेष्णा
178. राजा विराट के महल में अर्जुन किस नाम से जाने गये? – बृहन्नला
179. लाक्षागृह से जीवित बच निकलने के बाद पाण्डव किस नगरी में जाकर रहे? – एकचक्रा
180. वभ्रुवाहन किसका पुत्र था? – अर्जुन
181. वसुदेव की बहन कौन थी? – पृथा, राजा शूर सेन की पुत्री, उसका नाम कुंती भी था।
182. विराट नगर में पाण्डव नकुल ने क्या नाम ग्रहण किया था? – ग्रंथिक
183. वीर बर्बरीक किसके पुत्र थे? – घटोत्कच
184. व्यास की माता का क्या नाम था? – सत्यवती
185. शकुंतला के पोषक पिता का नाम क्या था? – कण्व
186. शकुनि का वध युद्ध के कौन से दिन हुआ? – 18वें दिन।
187. शांतनु ने किस केवट कन्या से विवाह किया? – सत्यवती।
188. शिखंडी किसके शिष्य थे? – द्रोणाचार्य
189. शिशुपाल का वध किसने किया था? – कृष्ण
190. श्री कृष्ण कुल का विनाश युद्ध के कितने वर्ष बाद हुआ? – 36 वर्ष बाद।
191. श्रीकृष्ण के नाना कौन थे? – देवक
192. श्रीकृष्ण के शंख का क्या नाम था? – पाँचजन्य।
193. सती-सावित्री के पति का नाम क्या था? – मालवी-अश्वपति।
194. सहदेव के शंख का क्या नाम था? – मणिपुष्पक।
195. सूर्य और कुंती का पुत्र कौन है? – वसुषेण (कर्ण)
196. हरिवंश पुराण में कितने पर्व हैं? – 3
197. हरिवंश पुराण में तीन पर्व हैं। इन पर्वों में कुल कितने अध्याय हैं? – 318
198. हिडिम्बा किसकी पत्नी थी? – भीम
199. महाभारत के 18 पर्वो के नाम – आदि पर्व, सभा पर्व, वन पर्व, विराट पर्व, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, सौप्तिकी पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशासन पर्व, आश्वमेघक पर्व, आश्रयवासिक पर्व, मौसल पर्व, महाप्रस्थानिक पर्व, स्वर्गारोहण पर्व

-Dangodara mehul

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रामायण पर आधारित सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी

रामायण का सबसे पुराना संस्करण संस्कृत भाषा में बना है और इसमें लगभग 24,000 श्लोक हैं. रामायण का हिंदू धर्म में एक विशेष स्थान है. आइये इस लेख के माध्यम से रामायण पर आधारित प्रश्नोत्तरी हल करते

प्राचीन भारतीय महाकाव्य रामायण में भगवान राम और देवी सीता के जन्मयात्रा का वर्णन है. रामायण के सात अध्याय हैं, जो काण्ड के नाम से जाने जाते हैं. इसमें  सबको रिश्तो के कर्तव्यों को समझाया गया है. इसमें एक आदर्श पिता, आदर्श पुत्र, आदर्श पत्नी, आदर्श भाई, आदर्श सेवक, आदर्श राजा इत्यादि को दिखाया गया है. वाल्मीकि रामायण को आदिकाव्य के रूप में जाना जाता है जहाँ आदि का अर्थ है मूल या पहला और काव्य का अर्थ है कविता.

1. रामायण की रचना मूल रूप से किसने की थी?
A. ऋषि वाल्मीकि
B. तुलसी दास
C. संत एक नाथ
D. अभिनंदन
Ans. A
व्याख्या: रामायण की रचना मूल रूप से ऋषि वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में की थी.
2. लक्ष्मण को किसका अवतार माना जाता है?
A. भगवान विष्णु
B. भगवान शिव
C. भगवान ब्रह्मा
D. शेषनाग
Ans. D
व्याख्या: भगवान राम को भगवान विष्णु का अवतार और लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार माना जाता है.

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3. गायत्री मंत्र के लिए निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है / हैं?
A. रामायण के हर 1000 श्लोक के बाद आने वाले पहले अक्षर से गायत्री मंत्र बनता है.
B. गायत्री मंत्र में 24 अक्षर होते हैं.
C. यजुर्वेद में सबसे पहले गायत्री मंत्र का उल्लेख किया गया है.
D. केवल A और B सही हैं
Ans. D
व्याख्या: गायत्री मंत्र में 24 अक्षर होते हैं और वाल्मीकि रामायण में 24,000 श्लोक हैं. रामायण के प्रत्येक 1000 श्लोक के बाद आने वाले पहले अक्षर से गायत्री मंत्र बनाता है. यह मंत्र इस पवित्र महाकाव्य का सार है. ऋग्वेद में सबसे पहले गायत्री मंत्र का उल्लेख किया गया है.

4. उस जंगल का नाम बताएं जहाँ भगवान राम, लक्ष्मण और देवी सीता वनवास के दौरान रूके थे?
A. अरन्या
B. अरण्यक
C. दंडकारण्य
D. करण्या
Ans. C
व्याख्या: दंडकारण्य में, भगवान राम, देवी सीता और लक्ष्मण ने अपना वनवास बिताया.
5. किस वैद्य ने भगवान राम को लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी के बारे में बताया था?
A. विशारण 
B. सुषेण 
C. वराहमिहिर
D. महावीराचार्य
Ans. B
व्याख्या: सुषेण वैद्य ने भगवान राम को लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी के बारे में बताया था.
10 दुर्लभ परंपराएं जो आज भी आधुनिक भारत में प्रचलित हैं.
6.भगवान राम के पिता का नाम क्या था?
A. शालिशुका
B. बृहद्रथ
C. राजाधिराज
D. दशरथ 
Ans. D
व्याख्या: दशरथ भगवान राम के पिता थे. वह अयोध्या के राजा थे और उनकी तीन पत्नियाँ थीं जिनका नाम कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा था.
7. भावार्थ रामायण किसने लिखी थी?
A. माधव कंडाली
B. एकनाथ 
C. कृतिबास
D. बुद्ध रेड्डी
Ans. B
व्याख्या: भावार्थ रामायण को एकनाथ ने लगभग 16वीं शताब्दी में मराठी में लिखा था.
8. निम्नलिखित में से कौन रामचरितमानस के काण्ड हैं?
A. बालकाण्ड 
B. अरण्यकाण्ड 
C. किष्किन्धाकाण्ड 
D. उपरोक्त सभी सही हैं
Ans. D
व्याख्या: रामचरितमानस को सात काण्डों में विभक्त किया गया है: बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड (युद्धकाण्ड) और उत्तरकाण्ड.
9. उस धनुष का नाम बताइये जिसका उपयोग भगवान राम ने सीता स्वयंवर में किया था?
A. पिनाक
B. पिंडका
C. आनंदका
D. रुलापांड
Ans. A
व्याख्या: भगवान राम ने सीता स्वयंवर में भगवान शिव के धनुष का पिनाक का उपयोग किया था.
10. रावण किस वाद्य यंत्र को बजाया करता था?
A. वीणा
B. सरोद 
C. मंजीरा
D. उपरोक्त में से कोई नहीं 
Ans. A 
व्याख्या: लंका का रजा रावण, वीणा वाद्य यंत्र बजाने में निपुण था.
ये स्पष्टीकरण के साथ प्राचीन भारतीय महाकाव्य रामायण पर आधारित कुछ दिलचस्प प्रश्न और उत्तर थे. 

-Dangodara mehul

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भक्त ध्रुव की कथा |

विष्णु पुराण में भक्त ध्रुव की कथा ( Bhakt dhruv story in hindi ) आती है , ध्रुव की कहानी ने इस बात को सिद्ध किया कि कैसे एक छोटा बालक भी दृढ़ निश्चय और कठोर तपस्या के बल पर भगवान को धरती पर आने को विवश कर सकता है।
स्वायम्भुव मनु और शतरूपा के पुत्र उत्तानपाद मनु के बाद सिंहासन पर विराजमान हुए। उत्तानपाद अपने पिता मनु के समान ही न्यायप्रिय और प्रजापालक राजा थे।
उत्तानपाद की दो रानियां थी। बड़ी का नाम सुनीति और छोटी का नाम सुरुचि था। सुनीति को एक पुत्र ध्रुव और सुरुचि को भी एक पुत्र था जिसका नाम उत्तम

ध्रुव बड़ा होने के कारण राजगद्दी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी था पर सुरुचि अपने पुत्र उत्तम को पिता के बाद राजा बनते देखना चाहती थी।
इस कारण वो ध्रुव और उसकी माँ सुनीति से ईर्ष्या करने लगी और धीरे धीरे उत्तानपाद को अपने मोहमाया के जाल में बांधने लगी।
इस प्रकार सुरुचि ने ध्रुव और सुनीति को उत्तानपाद से दूर कर दिया। उत्तानपाद भी सुरुचि के रूप पर मोहित होकर अपने पारिवारिक कर्तव्यों से विमुख हो गए और सुनीति की उपेक्षा करने लगे।

भगवान विष्णु द्वारा ध्रुव को वर प्रदान करना

विमाता सुरुचि द्वारा बालक ध्रुव का अपमान

एक दिन बालक ध्रुव पिता से मिलने की जिद करने लगा, माता ने तिरस्कार के भय से और बालक के कोमल मन को ठेस ना लगे इसलिए ध्रुव को बहलाने लगी पर ध्रुव अपनी जिद पर अड़ा रहा। अंत में माता ने हारकर उसे पिता के पास जाने की आज्ञा दे दी।
जब ध्रुव पिता के पास पहुँचा तो देखा कि उसके पिता राजसिंघासन पर बैठे हैं और वहीँ पास में उसकी विमाता सुरुचि भी बैठी है। अपने भाई उत्तम को पिता की गोद में बैठा देखकर ध्रुव की इक्षा भी पिता की गोद में बैठने की हुई।
पर उत्तानपाद ने अपनी प्रिय पत्नी सुरुचि के सामने गोद में चढ़ने को लालायित प्रेमवश आये हुए अपने पुत्र का आदर नहीं किया।
अपनी सौत के पुत्र ध्रुव को पिता की गोद में चढ़ने को उत्सुक देखकर सुरुचि को क्रोध आ गया और कहा – ” अरे लल्ला, बिना मेरे पेट से जन्म लिए किसी अन्य स्त्री का पुत्र होकर तू क्यों इतनी बड़ी इक्षा करता है।
तू अज्ञानी है इसीलिए ऐसी अलभ्य वस्तु की इक्षा करता है। चक्रवर्ती राजाओं के बैठने के लिए बना यह राजसिंहासन तो सिर्फ मेरे पुत्र उत्तम के ही योग्य है तू इस व्यर्थ की इक्षा को अपने मन से निकाल दे। “

माता सुनीति द्वारा ध्रुव को उपदेश

अपनी विमाता का ऐसा कथन सुनकर ध्रुव कुपित होकर पिता को छोड़कर अपनी माता के महल को चल दिया। उस समय क्रोध से ध्रुव के होंठ कांप रहे थे और वो जोरों से सिसकियाँ ले रहा था।
अपने पुत्र को इस प्रकार अत्यंत क्रोधित और खिन्न देखकर सुनीति ने ध्रुव को प्रेमपूर्वक अपनी गोद में बिठाकर पूछा – ” बेटा, तेरे क्रोध का क्या कारण है। किसने तेरा निरादर करके तेरे पिता का अपमान करने का साहस किया है। ”
ये सुनकर ध्रुव ने अपनी माता को रोते हुए वह सब बात बताई जो उसकी विमाता ने पिता के सामने कही थी। अपने पुत्र से सारी बात सुनकर सुनीति अत्यंत दुखी होकर बोली –
” बेटा, सुरुचि ने ठीक ही कहा है, तू अवश्य ही मन्दभाग्य है जो मेरे गर्भ से जन्म लिया। पुण्यवानों से उसके विपक्षी भी ऐसी बात नहीं कह सकते। पूर्वजन्मों में तूने जो कुछ भी किया है उसे कौन दूर कर सकता है और जो नहीं किया है उसे तुझे कौन दिला सकता है।
इसलिए तुझे अपनी विमाता की बातों को भूल जाना चाहिए। हे वत्स, पुण्यवानों को ही राजपद, घोड़े, हाथी आदि प्राप्त होते हैं, ऐसा जानकर तू शांत हो जा।
यदि सुरुचि के वाक्यों से तुझे अत्यंत दुःख हुआ है तो सर्वफलदायी पुण्य के संग्रह करने का प्रयत्न कर।
तू सुशील, पुण्यात्मा और समस्त प्राणियों का हितैषी बन क्योंकि जिस प्रकार नीची भूमि की ओर ढलकता हुआ जल अपने आप ही जलाशयों में एकत्र हो जाता है।
उसी प्रकार सत्पात्र मनुष्य के पास समस्त सम्पत्तियाँ अपने आप ही आ जाती हैं। “
माता की बात सुनकर ध्रुव ने कहा – ” माँ, अब मैं वही प्रयत्न करूँगा जिससे सम्पूर्ण लोकों में आदरणीय सर्वश्रेष्ठ पद को प्राप्त कर सकूँ। अब मुझे पिता का सिंघासन नहीं चाहिए वह मेरे भाई उत्तम को ही मिले।
मैं किसी दुसरे के दिए हुए पद का इक्षुक नहीं हूँ, मैं तो अपने पुरुषार्थ से ही उस परम पद को पाना चाहता हूँ जिसको पिताजी ने भी नहीं प्राप्त किया है। ”


ध्रुव का वन गमन

अपनी माता से इस प्रकार कहकर ध्रुव सुनीति के महल से निकल पड़ा और नगर से बाहर वन में पहुँचा। वहाँ ध्रुव ने पहले से ही आये हुए सात मुनीश्वरों ( सप्तर्षियों ) को मृग चर्म के आसन पर बैठे देखा।
ध्रुव ने उन सबको प्रणाम करके उनका उचित अभिवादन किया और नम्रतापूर्वक कहा – ” हे महात्माओं, मैं सुनीति और राजा उत्तानपाद का पुत्र ध्रुव हूँ। मैं आत्मग्लानि के कारण आपके पास आया हूँ। “
यह सुनकर ऋषि बोले – ” राजकुमार, अभी तो तू सिर्फ चार-पाँच वर्ष का बालक जान पड़ता है।
तेरे चिंता का कोई कारण भी दिखाई नहीं देता है क्योंकि अभी तो तेरे पिता जीवित हैं फिर तेरी ग्लानि का क्या कारण है ? ”
तब ध्रुव ने ऋषियों को वह सब बात बताई जो सुरुचि ने उसे कहे थे। ये सुनकर ऋषिगण आपस में कहने लगे – ” अहो, क्षात्रतेज कैसा प्रबल है, जिससे इस नन्हे बालक के ह्रदय से भी अपनी विमाता के दुर्वचन नहीं टलते। “
ऋषि बोले – ” हे क्षत्रियकुमार, तूने जरूर कुछ निश्चय किया है, अगर तेरा मन करे तो वह हमें बता। हे तेजस्वी, हमें यह भी बता कि हम तेरी क्या सहायता करें। “
ध्रुव ने कहा – ” हे मुनिगण, मुझे न तो धन की इक्षा है और ना ही राज्य की। मैं तो केवल एक उसी स्थान को चाहता हूँ जिसको पहले किसी ने न भोगा हो।
हे मुनिश्रेष्ठ, आप लोग बस मुझे यह बता दें कि क्या करने से मुझे वह श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो सकता है। “
ध्रुव के इस प्रकार से पूछने पर सभी ऋषिगण एक एक करके ध्रुव को उपदेश देने लगे।


सप्तर्षियों द्वारा भक्त ध्रुव को उपदेश

मरीचि बोले – ” हे राजपुत्र, बिना नारायण की आराधना किये मनुष्य को वह श्रेष्ठ स्थान नहीं मिल सकता अतः तू उनकी ही आराधना कर। “

अत्रि बोले – ” जो परा प्रकृति से भी परे हैं वे परमपुरुष नारायण जिससे संतुष्ट होते हैं उसी को वह अक्षय पद प्राप्त होता है, यह मैं एकदम सच कहता हूँ। “

अंगिरा बोले – ” यदि तू अग्रस्थान का इक्षुक है तो जिस सर्वव्यापक नारायण से यह सारा जगत व्याप्त है, तू उसी नारायण की आराधना कर। “

पुलस्त्य बोले – ” जो परब्रह्म, परमधाम और परस्वरूप हैं उन नारायण की आराधना करने से मनुष्य अति दुर्लभ मोक्षपद को भी प्राप्त कर लेता है। “

पुलह बोले – ” हे सुव्रत, जिन जगत्पति की आराधना से इन्द्र ने इन्द्रपद प्राप्त किया है तू उन यज्ञपति भगवान विष्णु की आराधना कर। “

क्रतु बोले – ” जो परमपुरुष यज्ञपुरुष, यज्ञ और योगेश्वर हैं, उन जनार्दन के संतुष्ट होने पर कौन सी वस्तु दुर्लभ रह जाती है। “

वसिष्ठ बोले – ” हे वत्स, विष्णु भगवान की आराधना करने पर तू अपने मन से जो कुछ चाहेगा वही प्राप्त कर लेगा, फिर त्रिलोकी के श्रेष्ठ स्थान की तो बात ही क्या है। “

ध्रुव ने कहा – ” हे महर्षिगण, आपलोगों ने मुझे आराध्यदेव तो बता दिया। अब कृपा करके मुझे यह भी बता दीजिये कि मैं किस प्रकार उनकी आराधना करूँ। “
ऋषिगण बोले – ” हे राजकुमार, तू समस्त बाह्य विषयों से चित्त को हटा कर उस एकमात्र नारायण में अपने मन को लगा दे और एकाग्रचित्त होकर ‘ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ‘ इस मंत्र का निरंतर जाप करते हुए उनको प्रसन्न कर। “


भक्त ध्रुव की कठोर तपस्या

यह सब सुनकर ध्रुव उन ऋषियों को प्रणाम करके वहां से चल दिया और यमुना के तट पर अति पवित्र मधु नामक वन (मधुवन) में पहुँचा।
जिस मधुवन में नित्य श्रीहरि का सानिध्य रहता है उसी सर्वपापहारी तीर्थ में ध्रुव कठोर तपस्या करने लगा।
इस प्रकार दीर्घ काल तक कठिन तपस्या करने से ध्रुव के तपोबल से नदी, समुद्र और पर्वतों सहित समस्त भूमण्डल अत्यंत क्षुब्ध हो गए और उनके क्षुब्ध होने से देवताओं में खलबली मच गयी।
तब देवताओं ने अत्यंत व्याकुल होकर इन्द्र के साथ परामर्श करके ध्रुव का ध्यान भंग करने का आयोजन किया।
देवताओं ने माया से कभी हिंसक जंगली पशुओं के द्वारा तो कभी राक्षसों के द्वारा ध्रुव के मन में भय उत्पन्न करने की कोशिश की परन्तु विफल रहने पर ध्रुव की माता के रूप में भी उसका ध्यान भंग करने का प्रयत्न किया।
पर ध्रुव एकाग्रचित्त होकर सिर्फ भगवान विष्णु के ध्यान में ही लगा रहा और किसी की ओर देखा तक नहीं।
जब सब प्रकार के प्रयत्न विफल हो गए तब देवताओं को बड़ा भय हुआ और सब मिलकर श्रीहरि की शरण में गए।
देवता बोले – ” हे जनार्दन, हम उत्तानपाद के पुत्र की तपस्या से भयभीत होकर आपकी शरण में आये हैं।
हम नहीं जानते कि वह इन्द्रपद चाहता है या उसे सूर्य, वरुण या चन्द्रमा के पद की अभिलाषा है। आप हमपर प्रसन्न होइए और उसे तप से निवृत्त कीजिये। “
श्री भगवान बोले – ” हे देवगण, उसे इन्द्र, सूर्य, वरूण, कुबेर आदि किसी पद की अभिलाषा नहीं है। आप सबलोग निश्चिंत होकर अपने स्थान को जाएँ। मैं तपस्या में लगे हुए उस बालक की इक्षा को पूर्ण करके उसे तपस्या से निवृत्त करूँगा। ”
श्रीहरि के ऐसा कहने पर देवतागण उन्हें प्रणाम करके अपने स्थान को चले गए।

भगवान विष्णु द्वारा ध्रुव को वर प्रदान करना

भगवान विष्णु अपने भक्त ध्रुव की कठिन तपस्या से संतुष्ट होकर उसके सामने प्रकट हो गए।
श्री भगवान बोले – ” हे उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव, तेरा कल्याण हो। मैं तेरी तपस्या से प्रसन्न होकर तुझे वर देने के लिए प्रकट हुआ हूँ। मैं तुझसे अति संतुष्ट हूँ अब तू अपनी इक्षानुसार वर माँग। “
भगवान विष्णु के ऐसे वचन सुनकर बालक ध्रुव ने आँखें खोलीं और ध्यानावस्था में देखे हुए भगवान को शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए साक्षात अपने सामने खड़े देखा।
तब उसने भगवान को साष्टांग प्रणाम किया और सहसा रोमांचित तथा परम भयभीत होकर भगवान की स्तुति करने की इक्षा की। पर इनकी किस प्रकार स्तुति करूँ, ये सोचकर ध्रुव का मन व्याकुल हो गया।
ध्रुव ने कहा – ” भगवन, मैं आपकी स्तुति करना चाहता हूँ पर अपने अज्ञानवश कुछ कह नहीं पा रहा अतः आप मुझे इसके लिए बुद्धि प्रदान कीजिये। “
तब भगवान विष्णु ने अपने शंख से ध्रुव का स्पर्श किया। इसके बाद क्षण मात्र में ध्रुव भगवान की उत्तम प्रकार से स्तुति करने लगा। जब ध्रुव की स्तुति समाप्त हुई तब भगवान बोले –
” हे ध्रुव, तुमको मेरा साक्षात् दर्शन हुआ है इससे निश्चित ही तेरी तपस्या सफल हो गयी है पर मेरा दर्शन तो कभी निष्फल नहीं होता इसलिए तुझे जिस वर की इक्षा हो वह मांग ले। “
ध्रुव बोला – ” हे भगवन, आपसे इस संसार में क्या छिपा हुआ है। मैं मेरी सौतेली माता के गर्वीले वचनों से आहत होकर आपकी तपस्या में प्रवृत्त हुआ हूँ जिन्होंने कहा था कि मैं अपने पिता के राजसिंहासन के योग्य नहीं हूँ।
अतः हे संसार को रचने वाले परमेश्वर, मैं आपकी कृपा से वह स्थान चाहता हूँ जो आजतक इस संसार में किसी को भी प्राप्त न हुआ हो। “
श्री भगवान बोले – ” वत्स, तूने अपने पूर्व जन्म में भी मुझे संतुष्ट किया था इसलिए तू जिस स्थान की इक्षा करता है वह तुझे अवश्य प्राप्त होगा।
पूर्वजन्म में तू एक ब्राह्मण था और मुझमें निरंतर एकाग्रचित्त रहने वाला, माता पिता का सेवक तथा स्वधर्म का पालन करने वाला था।
बाद में एक राजपुत्र से तेरी मित्रता हो गयी। उसके वैभव को देखकर तेरी इक्षा हुई कि ‘ मैं भी राजपुत्र होऊँ ‘ अतः हे ध्रुव, तुझको अपनी मनोवांछित इक्षा प्राप्त हुई ।
जिस स्वायम्भुव मनु के कुल में किसी को स्थान मिलना अति दुर्लभ है उन्हीं के घर में तूने उत्तानपाद के यहाँ जन्म लिया।
जिसने मुझे संतुष्ट किया है उसके लिए इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं है। मेरी कृपा से तू निश्चय ही उस स्थान को प्राप्त करेगा जो त्रिलोकी में सबसे उत्कृष्ट है और समस्त ग्रहों और तारामंडल का आश्रय है।
मेरे प्रिय भक्त ध्रुव, मैं तुझे वह निश्चल (ध्रुव) स्थान देता हूँ जो सूर्य, चंद्र आदि ग्रहों, सभी नक्षत्रों और सप्तर्षियों से भी ऊपर है।
तेरी माता सुनीति भी वहाँ तेरे साथ निवास करेगी और जो लोग प्रातःकाल और संध्याकाल तेरा गुणगान करेंगे उन्हें महान पुण्य प्राप्त होगा। “
धन्य है ध्रुव की माता सुनीति जिसने अपने हितकर वचनों से ध्रुव के साथ साथ स्वयं भी उस सर्वश्रेष्ठ स्थान को प्राप्त कर लिया।
ध्रुव के नाम से ही उस दिव्य लोक को संसार में ध्रुव तारा के नाम से जाना जाता है।
ध्रुव का मतलब होता है स्थिर, दृढ़ , अपने स्थान से विचलित न होने वाला जिसे भक्त ध्रुव ने सत्य साबित कर दिया।
भक्त ध्रुव की कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि जिसके मन में दृढ निश्चय और ह्रदय में आत्मविश्वास हो वह कठोर पुरुषार्थ के द्वारा इस संसार में असंभव को भी संभव कर सकता है।
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-Dangodara mehul

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माना जाता है कि एक घटना के बाद श्रीकृष्ण ने निर्णय लिया था कि कुरुक्षेत्र को ही युद्धभूमि बनाना है। यही वह स्थान था जिसे उन्होंने युद्ध जैसी घटना के लिए सबसे उपयुक्त माना।

क्या किसी स्थान का प्रभाव मनुष्य के मन पर होता है? आध्यात्मिक ग्रंथों का मानना है कि ऐसा होता है। अगर मनुष्य मंदिर में जाता है तो उसका शीश सहज ही भगवान के सामने झुक जाता है। स्थान का वातावरण कहीं न कहीं उसे प्रभावित जरूर करता है।

माना जाता है कि एक घटना के बाद श्रीकृष्ण ने निर्णय लिया था कि कुरुक्षेत्र को ही युद्धभूमि बनाना है। यही वह स्थान था जिसे उन्होंने युद्ध जैसी घटना के लिए सबसे उपयुक्त

जब महाभारत का बिगुल बजने वाला था तो श्रीकृष्ण ऐसे स्थान की तलाश कर रहे थे जहां इस जंग का आगाज किया जा सके। उन्होंने कई दूत विभिन्न स्थानों की ओर भेजे ताकि वे भी कोई स्थान ढूंढ सकें।

तब एक दूत कुरुक्षेत्र पहुंचा। वहां उसने देखा कि दो भाई खेत में काम कर रहे हैं। बड़े भाई ने छोटे भाई को कहा कि वह मेड़ से बहते हुए बारिश के पानी को रोके, लेकिन उसने बड़े भाई को मना कर दिया। उसने कहा, मुझे हुक्म देते हो, तुम ही क्यों नहीं कर लेते?

यह सुनकर बड़े भाई को गुस्सा आ गया। उसने चाकू से छोटे भाई की हत्या कर दी और उसकी लाश को मेड़ के पास घसीटकर ले गया।

इतना निंदनीय कार्य करने के बाद भी उसे कोई पश्चाताप नहीं था। जब कृष्ण ने इस घटना के बारे में सुना तो वे बोले, जिस स्थान पर भाई अपने भाई का सम्मान न करे, एक-दूसरे को मारें और मारकर पश्चाताप भी न हो। ऐसे स्थान पर भला प्रेम, नीति, विनम्रता जैसे शुभ गुण कैसे रह सकते हैं?

आखिरकार कुरुक्षेत्र को ही युद्ध के लिए चुना गया, जहां एक भाई ने दूसरे भाई का और अपने प्रियजनों का रक्त बहाया।

श्रीकृष्ण के इस कथन से हमें सीखना चाहिए कि जहां विनम्रता, आदर, प्रेम और परोपकार हैं वहीं स्वर्ग है। जहां ये शुभ गुण हैं वहीं रहना सुखप्रद है। जहां ये गुण नहीं हैं वहां युद्ध और विनाश होता है। अतः हमें इन गुणों को अपने घर, समाज और राष्ट्र में स्थान देना चाहिए।

-Dangodara mehul

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*ऐसी जानकारी सोश्यल नेटवर्किंग साइटों पर बार-बार नहीं आती, और आगे भेजें, ताकि लोगों को सनातन धर्म की जानकारी हो सके आपका आभार धन्यवाद होगा*

1-अष्टाध्यायी पाणिनी
2-रामायण वाल्मीकि
3-महाभारत वेदव्यास
4-अर्थशास्त्र चाणक्य
5-महाभाष्य पतंजलि
6-सत्सहसारिका सूत्र नागार्जुन
7-बुद्धचरित अश्वघोष
8-सौंदरानन्द अश्वघोष
9-महाविभाषाशास्त्र वसुमित्र
10- स्वप्नवासवदत्ता भास
11-कामसूत्र वात्स्यायन
12-कुमारसंभवम् कालिदास
13-अभिज्ञानशकुंतलम् कालिदास
14-विक्रमोउर्वशियां कालिदास
15-मेघदूत कालिदास
16-रघुवंशम् कालिदास
17-मालविकाग्निमित्रम् कालिदास
18-नाट्यशास्त्र भरतमुनि
19-देवीचंद्रगुप्तम विशाखदत्त
20-मृच्छकटिकम् शूद्रक
21-सूर्य सिद्धान्त आर्यभट्ट
22-वृहतसिंता बरामिहिर
23-पंचतंत्र। विष्णु शर्मा
24-कथासरित्सागर सोमदेव
25-अभिधम्मकोश वसुबन्धु
26-मुद्राराक्षस विशाखदत्त
27-रावणवध। भटिट
28-किरातार्जुनीयम् भारवि
29-दशकुमारचरितम् दंडी
30-हर्षचरित वाणभट्ट
31-कादंबरी वाणभट्ट
32-वासवदत्ता सुबंधु
33-नागानंद हर्षवधन
34-रत्नावली हर्षवर्धन
35-प्रियदर्शिका हर्षवर्धन
36-मालतीमाधव भवभूति
37-पृथ्वीराज विजय जयानक
38-कर्पूरमंजरी राजशेखर
39-काव्यमीमांसा राजशेखर
40-नवसहसांक चरित पदम् गुप्त
41-शब्दानुशासन राजभोज
42-वृहतकथामंजरी क्षेमेन्द्र
43-नैषधचरितम श्रीहर्ष
44-विक्रमांकदेवचरित बिल्हण
45-कुमारपालचरित हेमचन्द्र
46-गीतगोविन्द जयदेव
47-पृथ्वीराजरासो चंदरवरदाई
48-राजतरंगिणी कल्हण
49-रासमाला सोमेश्वर
50-शिशुपाल वध माघ
51-गौडवाहो वाकपति
52-रामचरित सन्धयाकरनंदी
53-द्वयाश्रय काव्य हेमचन्द्र

*वेद-ज्ञान:-*

*प्र.1- वेद किसे कहते है ?*
*उत्तर- ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है।*

*प्र.2- वेद-ज्ञान किसने दिया ?*
*उत्तर- ईश्वर ने दिया।*

*प्र.3- ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?*
*उत्तर- ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।*

*प्र.4- ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?*
*उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिए।*

*प्र.5- वेद कितने है ?*
*उत्तर-चार*
1-ऋग्वेद
2-यजुर्वेद
3-सामवेद
4-अथर्ववेद

*प्र.6- वेदों के ब्राह्मण ।*
वेद ब्राह्मण
1 - ऋग्वेद - ऐतरेय
2 - यजुर्वेद - शतपथ
3 - सामवेद - तांड्य
4 - अथर्ववेद - गोपथ

*प्र.7- वेदों के उपवेद कितने है।*
*उत्तर - चार।*
वेद उपवेद
1- ऋग्वेद - आयुर्वेद
2- यजुर्वेद - धनुर्वेद
3 -सामवेद - गंधर्ववेद
4- अथर्ववेद - अर्थवेद

*प्र 8- वेदों के अंग हैं ।*
*उत्तर - छः ।*
1 - शिक्षा
2 - कल्प
3 - निरूक्त
4 - व्याकरण
5 - छंद
6 - ज्योतिष

*प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?*
*उत्तर- चार ऋषियों को।*
वेद ऋषि
1- ऋग्वेद - अग्नि
2 - यजुर्वेद - वायु
3 - सामवेद - आदित्य
4 - अथर्ववेद - अंगिरा

*प्र.10- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?*
*उत्तर- समाधि की अवस्था में।*

*प्र.11- वेदों में कैसे ज्ञान है ?*
*उत्तर- सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान।*

*प्र.12- वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?*
उत्तर- चार ।
ऋषि विषय
1- ऋग्वेद - ज्ञान
2- यजुर्वेद - कर्म
3- सामवे - उपासना
4- अथर्ववेद - विज्ञान

*प्र.13- वेदों में।*

ऋग्वेद में।
1- मंडल - 10
2 - अष्टक - 08
3 - सूक्त - 1028
4 - अनुवाक - 85
5 - ऋचाएं - 10589

यजुर्वेद में।
1- अध्याय - 40
2- मंत्र - 1975

सामवेद में।
1- आरचिक - 06
2 - अध्याय - 06
3- ऋचाएं - 1875

-Dangodara mehul

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*इसे सेव कर सुरक्षित कर लेवे। ऐसी पोस्ट कम ही आती है।*
विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियो पर किया अनिल अनुसंधान )

■ काष्ठा = सैकन्ड का 34000 वाँ भाग
■ 1 त्रुटि = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
■ 2 त्रुटि = 1 लव ,
■ 1 लव = 1 क्षण
■ 30 क्षण = 1 विपल ,
■ 60 विपल = 1 पल
■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
■ 7 दिवस = 1 सप्ताह
■ 4 सप्ताह = 1 माह ,
■ 2 माह = 1 ऋतू
■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,
■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी
■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग
■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,
■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,
■ 4 युग = सतयुग
■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
■ 72 महायुग = मनवन्तर ,
■ 1000 महायुग = 1 कल्प
■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )
■ महालय = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )

सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में बना। ये हमारा भारत जिस पर हमको गर्व है l
दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।

तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।

चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।

पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।

छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य।

सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।

-Dangodara mehul

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પ્રકૃતિ માણસ કઇક તો ઈશારો કરવા માગે છે!!!!

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