दीपक बुंदेला लेखक, निर्माता-निर्देशक टीवी सीरियल लेखन और एसोसिएट डायरेक्टर (मिले सुर मेरा तुम्हारा, भक्ति सागर, गज़ल स्पेसल, फ़िल्मी चक्कर, चाणक्य, टीपू सुल्तान, जय हनुमान, विवाह, अजीब और भाभी ) वीडियो सांग डायरेक्शन (मेड इन इंडिया, ठंडा ठंडा पानी, तेरे बालों में मोती पिरो दू, एक लड़की प्यारी प्यारी लग भाग 200गानों का फिल्मांकन और नए लोगों को इंटरडूस किया ) फीचर फ़िल्म- इन क्रिएटिब डायरेक्टर (लाल दुपट्टा मल मल का, जीना तेरी गली में, सूर्य पुत्र शनि देव, माँ वैष्णों देवी, बेबफा सनम. वर्तमान में

नारी तुम प्रेम हो, आस्था हो, विश्वास हो,
टूटी हुई उम्मीदों की एकमात्र आस हो.

19/12/2001

मिरे मौत की खबर तो फैलाओ यारों
हम भी तो देखें कितने चाहने वाले हैं..

फ़िक्र दिल में होती हैं
शब्दों में नहीं
गुस्सा शब्दों में होता हैं
दिल में नहीं
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बिना सोचे समझें किसी को पसंद भी ना करो और किसी खोओ भी मत...

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ऐसे दोस्त से गुरेज हैं
जो एक जताने के लिए और
4-6 दिल बहलाने के लिए रखते हैं...

कल बेटी दिवस था,
हर जगह बेटियों के प्रति सम्मान देखने को मिला सब ने अपनी भावनाये बेटियों के प्रति व्यक्त की सिर्फ कल भर के लिए....?

क्या आज और आने वाले कल के लिए हमने उस बेटी के प्रति कितनी भावनाये और सम्मान को वरकरार रखा हैं...?

क्या हमारी संस्कृति यहीं सोच रखती हैं.. इस आधुनक जीवन की सोच में सिर्फ कल के दिन ही हम उनके प्रति सम्मन दें बाकी दिनों में क्या...?

क्या आज, कल या फिर आने वाला कल बेटियों के प्रति सम्बेदनाये व्यक्त नहीं होंगी...?

दर असल हमारे रिस्ते नाते सब दिवस पर विश करने के लिए बनते जा रहें हैं...

सिर्फ मेरा कहना इतना भर हैं कि हम कहा जा रहें हैं...?

क्या आने वाले दिनों में हम सिर्फ भवनाये सिर्फ व्यक्त करके अपने इंसान होने का या इंसानियत का परिचय देंगे...?

अब वो दिन भी दूर नहीं परिवार और समाज के सारे रिस्ते नातो के नाम पर इस बाजारू कारण के खातिर दिवस बनेंगे... और वास्तविक सम्बेदनाओ का यही दिवस रहेंगे...

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चराग दिल में जलाओ बहुत अंधेरा हैं....