मुझे हमेशा अंकों में उलझते हुए भी शब्दों से खेलते हुए सुकून की तलाश रही है। बचपन से ही मनोभावों को डायरी के पन्नों में छुपाया है, कविताओं के रूप में। प्रकृति से राग और अपनों से अनुराग के कुछ पल, मानवीय संवेदनाओं में डूबा मन कभी खुश होता, कभी उदास, कभी प्रेम में डूबा तो कभी अलगाव की पीड़ा से बेचैन। जिंदगी के कई पहलुओं को नजदीक से जाना तो कुछ आज तक अनछुए ही रहे। जीवन की संगति और विसंगति से उपजी रचनाओं में खुशी, उदासी, प्रेम, पर्व, अलगाव, संस्कार और अपनत्व जैसे जिंदगी के रंग भरने का प्रयास रहता है।

#देह_की_दहलीज_पर

सही मायनों में जीवनसाथी का मतलब है एक दूसरे की हर परेशानी को समझ कर सहयोग करना, दाम्पत्य जीवन की साझी परेशानियों के इतर भी खुलकर बात करना। कामिनी और मुकुल हमेशा ही पति पत्नी होकर भी अच्छे दोस्त रहे हैं। अब ऐसा क्यों हो रहा है? कामिनी अक्सर सोचती कि छः बाई छः की नितांत अपनी परिधि में दुनिया जहान की सारी समस्याओं का हल मिल जाता है, किन्तु यहाँ उपजी समस्या का हल ढूँढने कहाँ जाएं?


Kavita Verma लिखित कहानी "देह की दहलीज पर - 19" मातृभारती पर फ़्री में पढ़ें
https://www.matrubharti.com/book/19887708/deh-ki-dahleez-par-19

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#देह_की_दहलीज_पर

इंसान जन्म के साथ ही अनेक रिश्तों में बंध जाता है। रिश्तों का यह बंधन कभी खुशी देता है, कभी गम, किन्तु उनके साथ ही लड़ते-झगड़ते, मिलते-बिछुड़ते और हँसते-खिलखिलाते ज़िंदगी का सफर चलता है। सभी रिश्तों का बंधन चांस की बात है, बस पति-पत्नी का रिश्ता ही चॉइस से बनता है। यह एक ऐसा रिश्ता है जो ज़िंदगी के हर उतार चढ़ाव को आसानी से पार कर लेता है, बशर्ते कि एक दूसरे का हाथ थामे रहे। जितना सिंपल होता है, उतना ही कॉम्प्लिकेटेड भी, किन्तु सबसे खूबसूरत रिश्ता है ये...!
लेकिन जब जीवन में एकरसता आने लगे या कि अचानक बदलाव हो तो पति पत्नी का रिश्ता अपनी मधुरता खोने लगता है। एक उम्र के बाद मूड स्विंग्स के कारण स्वभाव में आया चिड़चिड़ापन परिवार में समस्या उत्पन्न करता है। जब तन, मन और बंधन में भी खालीपन और बोझिलता एक साथ हावी होने लगे, कोई उसकी वजह समझ ही नहीं पाता। इस उपन्यास की नायिका कामिनी और उसकी सहेली नीलम दोनों ही उच्च शिक्षित नौकरीपेशा महिलाएं हैं। प्रतिष्ठित और सशक्त पारिवारिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि के बाद भी दोनों अपने अपने रिश्तों में आई तब्दीली की वजह समझ ही नहीं पातीं। कामिनी यह देखकर आश्चर्यचकित होती है कि उसकी गृह सहायिका पति से पिटाई और तमाम अभावों के बावजूद भी ज़िंदगी में खुश है। दूसरी तरफ कामिनी का पति मुकुल है जो एक सफल बिज़नेसमैन है और कामिनी से बेइंतेहा प्यार करता है। पद, पैसा, प्यार और प्रतिष्ठा सबकुछ होने के बाद भी उनके रिश्तों में तनाव है, आखिर क्यों...? सुयोग-प्रिया, अभय-शालिनी-तरुण और अरोरा अंकल आंटी कितने ही किरदार हैं जो ज़िन्दगी के विभिन्न पड़ावों पर अलग वजहों से उलझे हैं और समाधान तलाश कर आगे भी बढ़े हैं। हमारी जीवनचर्या और हमारे हार्मोन्स एक दूसरे से किस कदर प्रभावित होते हैं, यह जानना तकलीफदेह भी हो सकता है और रोचक भी.... ज़िंदगी में खुश रहने के लिए प्यार अहम तत्व है, तब... जब यह तन और मन दोनों को तृप्त करे... साधन संपन्न और प्यार से तृप्त ज़िंदगी में भी कामिनी कहीं न कहीं खुद को तृषित पाकर अचंभित है... यह कैसी प्यास है? उसकी वजह तलाशना जरूरी है। क्यों दिल के रिश्ते देह की दहलीज पर आकर बिखरने लगते हैं? क्या आप जानना नहीं चाहेंगे? इस उपन्यास में आपको उन सारे सवालों के समाधान मिलेंगे, जो आपके दिमाग की घण्टी बजाते रहते हैं... हम सब सह लेखिकाओं ने अलग अलग उम्र में वैवाहिक रिश्तों में आने वाली दरार की वजह पता लगाने के साथ कोशिश की है उसका हल ढूँढने की, जो कि पारिवारिक, सामाजिक, शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी उन रिश्तों की तहकीकात करती है। जब आप उपन्यास पढ़ेंगे तो इसके पात्र आपको अपने आसपास नज़र आएंगे। आज आपके अपने प्रिय पोर्टल मातृभारती पर इस उपन्यास की अंतिम कड़ी प्रकाशित हो चुकी है..... अब कैसा इंतज़ार...?? पढ़िए सम्पूर्ण उपन्यास एक साथ...!

Kavita Verma लिखित उपन्यास "देह की दहलीज पर" मातृभारती पर फ़्री में पढ़ें
https://www.matrubharti.com/novels/16686/deh-ki-dahleez-par-by-kavita-verma

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#देह_की_दहलीज_पर

सही मायनों में जीवनसाथी का मतलब है एक दूसरे की हर परेशानी को समझ कर सहयोग करना, दाम्पत्य जीवन की साझी परेशानियों के इतर भी खुलकर बात करना। कामिनी और मुकुल हमेशा ही पति पत्नी होकर भी अच्छे दोस्त रहे हैं। अब ऐसा क्यों हो रहा है? कामिनी अक्सर सोचती कि छः बाई छः की नितांत अपनी परिधि में दुनिया जहान की सारी समस्याओं का हल मिल जाता है, किन्तु यहाँ उपजी समस्या का हल ढूँढने कहाँ जाएं?
आज शाम पढ़िए उपन्यास की अगली कड़ी...

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दाम्पत्य के रंग... प्रस्तुत कड़ी बहुत ही सहजता से दाम्पत्य के गूढ़ पहलुओं को उजागर करती है। कैरियर और मैरिज दोनों ही जरूरी हैं, तब सामंजस्य किस तरह किया जाए... बदलती परिस्थिति में थोड़ा खुद को भी बदला जाए...!

Kavita Verma लिखित कहानी "देह की दहलीज पर - 18" मातृभारती पर फ़्री में पढ़ें
https://www.matrubharti.com/book/19887395/deh-ki-dahleez-par-18

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#देह_की_दहलीज_पर

सही मायनों में जीवनसाथी का मतलब है एक दूसरे की हर परेशानी को समझ कर सहयोग करना, दाम्पत्य जीवन की साझी परेशानियों के इतर भी खुलकर बात करना। कामिनी और मुकुल हमेशा ही पति पत्नी होकर भी अच्छे दोस्त रहे हैं। अब ऐसा क्यों हो रहा है? कामिनी अक्सर सोचती कि छः बाई छः की नितांत अपनी परिधि में दुनिया जहान की सारी समस्याओं का हल मिल जाता है, किन्तु यहाँ उपजी समस्या का हल ढूँढने कहाँ जाएं?
कल शाम पढ़िए उपन्यास की अगली कड़ी...

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दाम्पत्य का एक अनूठा रंग... जब एक दूसरे को समझते हुए... एक दूसरे की ओर बढ़ते हुए... कितना कुछ बदल जाता है...

Dr. Vandana Gupta लिखित कहानी "सिर्फ हमारे लिए" मातृभारती पर फ़्री में पढ़ें
https://www.matrubharti.com/book/19871763/sirf-hamare-liye

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#देह_की_दहलीज_पर
यह जो उथल पुथल हमारे तन मन में होती है, इसके जिम्मेदार हार्मोन्स हैं, यह बात काउंसलर से मिलकर राकेश को समझ में आ रही है, रजोनिवृत्ति की ओर बढ़ती नीलम की अवस्था भी इसीलिए वह समझ पा रहा है... यही तो है दाम्पत्य जीवन की मधुरता... अपने साथ अपनों को भी समझना... खूबसूरती से आ रीता गुप्ता जी द्वारा लिखी यह कड़ी पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत भी करवाइए... हमें इंतज़ार रहेगा...
Kavita Verma लिखित कहानी "देह की दहलीज पर - 15" मातृभारती पर फ़्री में पढ़ें
https://www.matrubharti.com/book/19886769/deh-ki-dahleez-par-15

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#कीमती
ज़िन्दगी कीमती है और कुछ रिश्ते उससे भी ज्यादा कीमती हैं। जब रिश्तों में उलझन आने लगे तो उन्हें कैसे सुलझाना चाहिए?
दाम्पत्य में सब कुछ पारदर्शी होते हुए भी तन-मन की कुछ परतें अपारदर्शी रह जाती हैं, जहाँ पर पति और पत्नी के अलावा कोई और चाह कर भी नहीं पहुँच सकता। उपन्यास "देह की दहलीज पर" तन और मन की इन्हीं गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास कर आगे बढ़ता जा रहा है... क्या कामिनी-मुकुल, नीलम-राकेश, सुयोग-प्रिया, अरोरा अंकल आंटी के दाम्पत्य के कीमती रंगों में झांक कर देखा है आपने..? अभय की मौत से शालिनी की ठहरी जिंन्दगी में ख्वाब और ख्वाहिशें तो नहीं रुक पाए? क्या होगा अब आगे....? जानने के लिए साथ बने रहिए... आज शाम छः बजे अगली कड़ी प्रकाशित होगी...!

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#विश्व_पर्यावरण_दिवस_विशेष

#आ_अब_लौट_चलें

क्या सोचा था कभी हमने
कि इक दिन ऐसा आएगा
मानव की कैद से मुक्त होकर
प्रकृति का जर्रा जर्रा मुस्काएगा

भौगोलिक सीमाओं से परे
आज जनजीवन थर्राया है
लाँघकर दीवारें धर्म जाति की
यह कौन घुसपैठिया आया है

शायद प्रकृति के कर्मवीर
हमको समझाने आए हैं
यह एक नमूना भेजकर
भविष्य का दर्शन कराए हैं

थम गया है सबकुछ यकायक
कैसा नया दौर ये आया है
चेतावनी देकर मृत्यु की सबको
पुराने युग में लौटा लाया है

खाओ पियो और ऐश करो
या भूखे प्यासे तुम मरो
यह दो ही विकल्प नहीं होते
कर्मवीरों ने यह समझाया है

प्राकृतिक संपदा को सहेजना
अब तो सबको सीखना होगा
अपनी सांस्कृतिक धरोहर को
अपनाकर जंग जीतना होगा

विश्वयुद्ध का इतिहास देखकर
नई राह पर चलना होगा
जैविक युद्ध से बचने का
अब सबक हमें सीखना होगा

©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक
(05/06/2020)

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#देह_की_दहलीज_पर

कामिनी, शालिनी, सुयोग... तीनों की अपनी दुनिया, अपने सपने, अपने सुख और अपने दुःख... एक ही सोसाइटी में रहते हुए ये सब मिलते भी हैं और एक सम्मोहन में डूबने लगते हैं... क्या और कौन सही है या गलत.... धीरे धीरे सबके तन मन की परतें खुल रही हैं... कब क्यों और कैसे..? इन सवालों का जवाब तलाशती कहानी रोचक तरीके से आगे बढ़ रही है... आप भी पढ़िए.....

Kavita Verma लिखित कहानी "देह की दहलीज पर - 13" मातृभारती पर फ़्री में पढ़ें
https://www.matrubharti.com/book/19886446/deh-ki-dahleez-par-13

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