मुझे हमेशा अंकों में उलझते हुए भी शब्दों से खेलते हुए सुकून की तलाश रही है। बचपन से ही मनोभावों को डायरी के पन्नों में छुपाया है, कविताओं के रूप में। प्रकृति से राग और अपनों से अनुराग के कुछ पल, मानवीय संवेदनाओं में डूबा मन कभी खुश होता, कभी उदास, कभी प्रेम में डूबा तो कभी अलगाव की पीड़ा से बेचैन। जिंदगी के कई पहलुओं को नजदीक से जाना तो कुछ आज तक अनछुए ही रहे। जीवन की संगति और विसंगति से उपजी रचनाओं में खुशी, उदासी, प्रेम, पर्व, अलगाव, संस्कार और अपनत्व जैसे जिंदगी के रंग भरने का प्रयास रहता है।

खोओगे जब हमें तुम...
पाएंगे तब तुम्हें हम...
-डॉ वन्दना गुप्ता

इमारतें ऊँची बना ली , पर "दिल" तो छोटा कर लिया .
रास्ते चौड़े किए, पर नजरिया तंग कर लिया ,
दूरियाँ को कम किया , पर फासला बढ़ा लिया....!!!!

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ना दिन अच्छा है, ना हाल अच्छा है,
किसी जोगी ने कहा था कि ये साल अच्छा है .…!
मैंने पूछा लोग कब चाहेंगे, मुझे मेरी तरह,
बस मुस्कुरा के कह दिया सवाल अच्छा है ...!!!

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खामोशी बोलती है

"नीति अभी तक नहीं लौटी.." सुधा की गेट पर चिपकी आँखे उसकी चिंता बयां कर रहीं थीं।
"आ जाएगी, तुम्हारी समझदार और लायक बेटी वही तो है" भुवनेश निश्चिंत थे।
पर वह बेचैन हो रही थी... नीति उसकी छोटी बेटी वाकई जरूरत से ज्यादा समझदार है। बड़ी बेटी प्रीति जिद्दी और गुस्सैल है।

"मम्मा ये टॉप कितना सुंदर है, मुझे चाहिए ही.." प्रीति ने उसकी कीमत जानकर भी जिद की थी और सुधा को वह खरीदना पड़ा था। तब नीति ने कितनी आसानी से खुद के लिए पसन्द की हुई ड्रेस रिजेक्ट कर दी थी यह कहकर कि.. " दीदी का यह टॉप मुझे ही मिलना है.." सुधा बेटी की समझदारी पर खुश हो गयी थी।
प्रीति की आवाज़ और नीति की खामोशी घर की पहचान बन चुकी थी। खाने में भी प्रीति अपनी पसंदीदा डिश जिद कर बनवाती और नीति चुपचाप दीदी की पसन्द को अपनी पसन्द बनाती रही।
प्रीति कई बार देर से लौटी, तब इतनी चिंता नहीं हुई थी, शायद उसकी बेतरतीबी की आदत हो गयी थी। दोनों बहनें एक ही कमरे में रहती किन्तु बेड और स्टडी टेबल को देखकर ही पहचाना जा सकता था कि कौन सा हिस्सा किसका है। सुधा भी हमेशा नीति की तारीफ करते हुए प्रीति की जिंदगी को संवारने का प्रयास करती रही। नीति को भी उसकी जरूरत हो सकती है, यह सोचने का मौका कभी मिला ही नहीं..!
इसीलिए आज उसका समय पर नहीं लौटना बेचैन कर रहा था। मोबाइल भी स्वीच ऑफ आ रहा था।

अचानक से मैसेज नोटिफिकेशन ने ध्यान भंग किया..
"मम्मी! मेरा इंतज़ार मत करना, आपने हमेशा दीदी को ही पैम्पर किया है, मैं तो आपकी जिंदगी में होकर भी नहीं हूँ। मैं हमेशा इंतज़ार करती रही कि आप मेरा वार्डरोब भी जमाओ, मेरी चादर की सलवटें भी निकालो या कि मेरी किताबें ठीक करते हुए कभी उसमें रखा गुलाब भी देखो और बिना कहे ही मेरी पसंदीदा डिश मेरे सामने परोसो... पर..... आपका फोकस दीदी पर ही रहा हमेशा... नीरव मेरा बहुत ध्यान रखता है.. मैंने अपनी जिंदगी उसके साथ बिताने का फैसला कर लिया है क्योंकि वह मेरे बिना कहे ही मेरी हर बात समझता है। मैं चाहती तो आपसे मिलवा भी सकती थी, फिर लगा कि मेरी जिंदगी में आपने दखल नहीं दिया क्योंकि कभी झांका ही नहीं... इसलिए उससे कोर्ट मैरिज कर रही हूँ।माँ आपका इंतज़ार करूँगी... बाय.."

आज सुधा को पहली बार प्रीति की आवाज़ से ज्यादा नीति की खामोशी का शोर सुनाई दिया...!

©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक

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मूरत

उसने दुनिया की हर वह चीज़ उसके कदमों में डाल दी, जिसकी वह तलबगार थी। उसने प्रकृति के हर उस अनमोल उपहार से उसे नवाजा, जिससे उसकी सूरत और सीरत दोनों निखरती गयी।

उसके हृदय में प्रेम का सागर हिलोरे मारता था। फूलों की कोमलता उसके अंग प्रत्यंग के साथ स्वभाव में भी झलकती थी। आकाश की व्यापकता और धरती की सहिष्णुता उसके प्रमुख श्रृंगार थे। उसकी माँग में चाँद सितारे टांक कर, स्याह रातों से सुरमा उधार लेकर, भोर की किरण से ताज़गी और प्रकृति से हर श्रृंगार लेकर उसके चेहरे पर सजाकर वह उसे सुंदरता की प्रतिमूर्ति में ढालकर अपनी हथेलियों पर रखता था। वह भी खुश थी.. उसे जरूरत भी क्या थी अपने बारे में सोचने की... वह तो उसकी हर जरूरत पूरी कर खुश होती थी। दोनों संतुष्ट थे क्योंकि वह सिर्फ दिल से सोचती थी।

फिर आज क्या हुआ...? इतनी सुंदर मूर्ति खंडित हो गयी... क्यों..??

क्योंकि मूर्ति जीवंत हो गयी थी और उसने दिमाग से सोचना शुरू कर दिया था....!

©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक

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खूब करता है...
वो मेरे ज़ख्म का इलाज,
कुरेद कर देख लेता है..
और कहता है वक्त लगेगा......!!

धुरी

"सुनो! आज हमारे बेटे का सपना पूरा हो गया।" दिवाकर अपनी पत्नी के साथ जलसे में शामिल होने दिल्ली आया था। यह गणतंत्र दिवस उसके लिए नयी खुशियां लेकर आया था, क्योंकि उसके इकलौते बेटे का चयन एयर फ़ोर्स में फ्लाइंग ऑफिसर के रूप में हो गया था।

"हाँ.. आपने पिताजी के विरोध के बाद भी बेटे को सहयोग किया, दोनों को समझाया तभी आज यह खुशी नसीब हुई।"

"सही कह रही हो किरण मेरे पिताजी एक कृषक हैं, वे हमेशा जमीन से जुड़े रहे, उनके लिए आकाश में उड़ने का सपना एक डर के समान था, शायद इसीलिए वे सहमत नहीं हुए थे।"

आसमान में लहराते तिरंगे को देखकर किरण फिर बोली.. "तिरंगे में नीचे हरा रंग हरियाली और सम्पन्नता का प्रतीक है, जो जमीन से जुड़े आपके पिताजी के श्रम को दर्शा रहा है और ऊपर केशरिया रंग शक्ति का प्रतीक है जो हमारे युवा बेटे की ऊर्जा को दर्शाते हुए आसमान में उड़ने की प्रबल इच्छाशक्ति दर्शा रहा है।"

"हमारे कृषि प्रधान देश के लिए किसान और सेना दोनों ही महत्वपूर्ण और सम्माननीय हैं और मुझे गर्व है कि मैं इनके बीच की कड़ी बन सका।"

"आपने सही सामंजस्य बनाया, इसीलिए पिता और पुत्र दोनों का हाथ पकड़कर घर में शांति स्थापित कर सके, और केसरिया और हरे रंग के बीच के सफेद रंग की तरह से दो पीढ़ियों को जोड़कर रखा।"

"उस सफेद पट्टी पर दिख रहे नीले चक्र को देखो, हम तीन रंगों की बात करते हैं, किन्तु गतिशीलता के प्रतीक उस चक्र पर ध्यान नहीं देते, किरण तुमने चौबीस घण्टे गतिशील रहते हुए मुझे जो सहयोग दिया यह उसी का प्रतिफल है।"

©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक
(27/01/2019)

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एहसास

उस सूखते पेड़ को देखा
भावुक हुआ मन
और
सोचने लगा दिमाग
बोल उठा वह शिकायती लहजे में
कि
टुकड़ों में बंटा हुआ मेरा वजूद
जिसने जब जैसा चाहा
इस्तेमाल किया मुझे
मेरी चाहतों को दरकिनार कर
अपने अपने हिस्से की
थोड़ी सी छाया
थोड़ा सा सुकून
थोड़े से फल
थोड़ी सी जरूरत
सब कुछ माँगा मुझसे
मैंने बाखुशी दिया
अब मेरी बारी है
मुझे भी चाहिए
सिर्फ थोड़ा सा प्यार
थोड़ी सी देखभाल
मेरे लिए नहीं
मेंरे अस्तित्व के लिए
क्योंकि
मेरे बिना खतरे में है
तुम्हारा भी अस्तित्व..
सोचते सोचते यकायक
तलब उठी चाय की
और मेरे बिना कहे ही
हमेशा की तरह
नमूदार हो गयी मेरी पत्नी
चाय का कप हाथ में लेकर
और मैं
चाय के घूँट के साथ
उतारता रहा कुछ भीतर
घूँट घूँट जीती जिंदगी
सरकती रही सामने
और फिर..
पत्नी और पेड़
घुलमिल गए
एक दूसरे में...!!

©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक
(16/11/2018)

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यूँ तो हवा के रुख को समझती है पतंगें,
फिर भी बुरे हालत से लड़ती है पतंगें,

कटती है, उतरती है औ' चढ़ती है पतंगें,
उम्मीद के धागे से ही बढ़ती है पतंगें

गिरती है, सम्हलती है, मचलती है पतंगें,
बेखौफ तमन्नाओं सी उड़ती है पतंगे

मकर सक्रांति की शुभकामनाएँ...... ☺️

-डॉ वन्दना गुप्ता

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आखिर कब तक??
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(चिंतन--सत्य घटना पर आधारित)

क्या...????
एकदम से चौंक गई थी डॉ सुष्मिता......
बात ही कुछ ऐसी थी...

उनके क्लीनिक में उनके सामने एक 20 वर्षीय किशोरी बैठी थी जो यूटेरस का ऑपेरशन करवाने आयी थी।

"जी ऐसा है कि हमारे गाँव में बच्चे होने के बाद बच्चेदानी निकलवा देते हैं।" साथ आई 21 वर्षीय किशोरी ने कहा... मैंने भी 2 बच्चों के बाद यही किया है। इसके भी 3 बच्चे हो गए हैं, नहीं निकलवाई तो लेन लग जायेगी हम गरीब कैसे पालेंगे इत्ते बच्चों को...

"हाँ पर ये एकमात्र उपाय नहीं है, अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है?? आजकल तो 25 साल के पहले शादी ही नहीं करना चाहती लड़कियाँ और तुम सिर्फ 20 की उम्र में तीन बच्चों को जन्म देकर यूटेरस निकलवाने आ गयी??"
".........."
"खैर जो हुआ उसे नहीं बदल सकते पर मैं तुम्हें इस ऑपेरशन की हरगिज इजाजत नहीं दे सकती... और भी उपाय हैं, नहीं अपनाना चाहो तो नसबंदी का ऑपेरशन कर देती हूँ.."
डॉ सुष्मिता ने समझाने की कोशिश की...

"जी मैडम पर उससे माहवारी तो बंद न होवे है"... वह धीरे से बुदबुदाई...

"देखो ऐसा है कि यूटेरस निकलवाने से दूसरे कई कॉम्प्लिकेशन हो जाएंगे, फिर अभी तुम्हारी उम्र ही कितनी है... बीमारियां घर कर गई तो कैसे काटोगी जिंदगी... " डॉ ने फिर समझाने की कोशिश की..

"जी मैडमजी बात ये है कि... " वह सकुचाई..

"हाँ हाँ खुलकर बोलो क्या बात है..."

"जी वो ऐसा है कि महीनों के दिनों में रसोई में काम नहीं कर सके, सो...."

"तो क्या...."

"तो बच्चादानी निकलवाने से सब झंझट से छूट जाएंगे... घर का काम भी पूरे महीने कर सकेंगे और टेंशन फ्री भी रहेंगे..."

सहज शारीरिक प्रक्रिया के टैबू में उलझी ये मानसिकता आखिर कब तक औरतों की जान जोखिम में डालती रहेगी???

©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक

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