डॉ. हंसा दीप टोरंटो, कैनेडा हिन्दी में पीएच.डी., यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक।  दो उपन्यास “कुबेर”, व “बंद मुट्ठी”, कहानी संग्रह “चश्मे अपने-अपने”, उपन्यास बंद मुट्ठी गुजराती में अनूदित। अद्यतन कहानी संग्रह “प्रवास में आसपास”। साझा संकलन “बारह चर्चित कहानियाँ”। वागर्थ, यथावत, कथाबिम्ब, भाषा, कथा समवेत, परिंदे, लहक, दुनिया इन दिनों, कथाक्रम, समहुत, सुख़नवर, शीतलवाणी, दस्तक टाइम्स, गंभीर समाचार, उदय सर्वोदय, चाणक्य वार्ता, विभोम स्वर, समावर्तन, गर्भनाल, सेतु, कालजयी, ककसाड़, साहित्य अमृत, विश्वगाथा, चेतना, हस्ताक्षर, साहित्य कुंज, श्री सर्वोत्तम (मराठी), पर्ण (मराठी), सुबह सवेरे आदि प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में हाल ही में कहानियाँ प्रकाशित। hansadeep8@gmail.com 1512-17 Anndale Drive, North York, Toronto, ON-M2N2W7 Canada + 647 213 1817

सूरज-सा चमकना हर कोई चाहता है पर इतनी आग में तपना कोई नहीं चाहता।

चालीस तक उड़ते रहने के ख्वाब, साठ तक ठहराव, साठ के बाद उतरने के खयाल। मिट्टी से चले थे, मिट्टी में मिलने जा रहे।

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वे फीते के साथ तैयार रहते हैं। किसी का कद एक इंच बढ़ा तो उनकी कुल्हाड़ी एक इंच जमीन काट देती है।

मेरे बड़े-से घर में वह एक रोशनदान की तरह है जो है तो बहुत छोटा मगर वह न हो तो दम घुटने लगता है।

उन दोनों की आँखों से आँखों की बातों ने मेरी आँखें खोल दीं।

जरा-सा स्पर्श प्यार की अनुभूति दे जाता है, दोस्त से मन की बात करना दोस्ती का अहसास दे जाता है।

उनकी धारदार भाषा की धार इतनी तीखी थी कि आँसू धार-धार बहने लगे।

अपनी कमजोरी पर कम जोर दें क्योंकि जितना जोर देंगे उतना यह हमें चबाती रहेगी।

गरम-गरम तेल में डालने पर हर किसी को दर्द होता है, हरी मिर्ची को भी। अपने उस दर्द को वह सबको महसूस करवाती है, खाँसने को मजबूर करती है।

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लंबी दूरी के रिश्ते अपने-अपने वजूद में ढले सिक्के हैं जो समय के साथ चलते हैं, कभी भी उनका चलन बंद हो सकता है।

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