Student,Writer

प्रेम,प्यार, इश्क़ ,मोहब्बत के
एक अक्षर अपाहिज हैं!??
नहीं नहीं अपाहिज नहीं हैं,इंसान पूर्ण नहीं होता और ना ही कोई संबंध,केवल एक दूसरे का सहारा जरूर होते हैं ,जो उनके अस्तित्व को बनाए रखती है।
#केवल

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आओ सुनाऊं आपको एक किस्सा
एक प्रतिशत आबादी के पास,
है संपति का निन्यानबे प्रतिशत हिस्सा।
अकसर रुपया सारी गलतियों में टांका लगा देता है
और गरीब मामूली गलती केलिए ज़िन्दगी भर पछताता है।

गरीब बहलाते खुद का पेट रोटी नहीं नसीब हो जब
साठ सत्तर रुपए देकर तुम फुसलाते हो उन्हें तब।
क्या इनकी गरीबी की पहचान कभी बदलेगी?
क्या वो दो पैसों की पुड़िया इनका भाग्य भी बदेलगी?

अरे,तू क्या जाने कीमत किसी कम नसीब की
कभी झोली खाली होती नहीं किसी गरीब की
उसके आंसु बहा बहा कर भी कम नहीं होते
तू क्या जाने कितनी अमीर होती आंखे गरीब की।
खड़े हैं लोग आशा में गली गली के मोड़ पर
एक से हटाओ ध्यान,ध्यान दो करोड़ पर।
है यह समानता नहीं, कि एक तो अमीर हो
दूसरा व्यक्ति चाहे ही फकीर हो
न्याय हो तो आर पार एक ही लकीर हो।
मिले सूरज आसमां से,किरणें मिले धरती से
हो समानता ऐसी,मनुष्य अपना गम भूला दे

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है यह हम सभी की कहानी..
नाम है शतरंज,पर्याय है संभावना।

हाथी,घोड़े, ऊंट,बादशाह का है बोलबाला राज्य में
और हर तरफ है दबदबा और मान वजीर का।
प्यादा,
इसपे पूछता है छोटा ही क्यूं मैं रहूं?
जहां सब हैं शक्तिशाली वहां एक ही क्यूं चलूं?
बखूबी समझता है शतरंज प्यादे की इस उलझन को,
कहता प्यादे से कि तू सर्वशक्तिमान है
तू है वो जो पढ़ सके दुश्मन की चाल
मार सके जो शत्रु पक्ष
और झेल सके जो पहला वार।
मत तोड़ खुद को जब भी किस्मत ने अकेला छोड़ा
तू भी वजीर बन जाएगा अगर धैर्य रखो थोड़ा।
तू एक भले चलता है,पर चलता है तू सीध में
एक अहम हिस्सा बनकर उभरेगा तू जीत में

उसकी बातें सुनकर प्यादा चलता है सीध में
विश्वास है इतना कि लड़ जाएगा भीड़ से
वो एक फिर से चलता है,चलता है वो सीध में
और सीमाओं को लांघकर,वो बदलता है वजीर में।

एक प्यादे की वजीर बनने की है संभावना
नाम है शतरंज ,पर्याय है संभावना।
है यह हम सभी की कहानी,
नाम है ज़िन्दगी,पर्याय है संभावना।

#Chess
#pyada
#wazir
#inspiration
#matrubharti

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कहां गए वो आंगन....

घर के चारदीवारी से खुले आसमान को निहारता था वो आंगन...
इतना बड़ा तो न था कि अट जाए मन के कोनों में
पर था जैसे हवा होती है,
जितनी चाहिए भर लो सांसों में।
हमारे किलकारियों को अवसर देता था गूंजने को पूरे आसमान में,
खुरदुरा एहसास उसका
था हमारे तलवों की मालिश सा।
कूटती थी धान ,फटकती थी सूप दादी और मम्मी
तो गुनगुनाता था संग आंगन भी।
वो सिलती बुनती तो वह
रोशनी की लकीरें खींचता
और बजता रहता घड़ी की सुइयों सा तीनों पहर।
सजते थे मंडप बनते थे रिश्ते
था ऐसा अनोखा पवित्र जगह,
रोते थे सारे जहां बेटी की विदाई में,तो ठिठोली भी होती थी वहां दुल्हन की मुहदिखाई में।
दादी नानी के किस्सों का भंडार था वो,
पहले दीए का हकदार भी वही तो था
आंगन जमीन का एक टुकड़ा न था
वह धूप
पहली बारिश
जेठ की शाम
और खुली सांस लेने का एक मौका था
था नहीं जायदाद वो।।।।

#Angan
#matrubharti

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