Such Abhi Zinda Hein (Bhag -4) in Hindi Novel Episodes by Ashok Mishra books and stories PDF | Such Abhi Zinda Hein (Bhag -4)

Such Abhi Zinda Hein (Bhag -4)

सच अभी जिंदा है

भाग — 4

अशोक मिश्र

प्रिय पप्पू को

जो किसी शरारती बच्चे की तरह जीवन की राह में

खेलते—कूदते एक दिन साथ छोड़कर चला गया।

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सच अभी जिंदा है

फिर फोन पर बोले, ‘सर...अब क्या बताएं। वह तो ऑफिस में ही नहीं बैठते हैं। जब संपादक ही दफ्तर से गायब रहेगा, तो दूसरों पर अनुशासन कैसे रखा जा सकता है? आज भी सर... वो ऑफिस कहां आए हैं। सुना है, कनॉट प्लेस गए हैं। ऑफिस आते भी हैं, तो घंटे—आधे घंटे के लिए और फिर चलते बनते हैं। सर...एक बात कहूं। बुरा मत मानिएगा। चौरसिया जी, संपादक होने लायक तो हैं ही नहीं। आपकी कृपा से संपादक हो गए हैं, तो किसी को भाव नहीं देते हैं। आप भी सर...एकदम भोले नाथ हैं। किसी की थोड़ी—सी आराधना पर प्रसन्न हो जाते हैं। भोलेनाथ की तरह सब कुछ लुटा देते हैं। आपकी सिधाई और सज्जनता का लोग लाभ उठाते हैं। बस, आपकी वजह से सब कुछ बर्दाश्त कर रहा हूं। चौरसिया को अगर मैंने भर्ती किया होता, तो अब तक कान पकड़कर बाहर कर देता। ऐसे नाकारा और विध्वसंक व्यक्ति को एक पल संस्थान में बर्दाश्त नहीं करता।'

उधर से कुछ कहा गया। दत्ता जल्दी से बोले, ‘नहीं सर...अभी आप कुछ मत बोलिए। मैं देखता हूं, एकाध बार उन्हें हिंट करता हूं। इसके बाद भी सुधार नहीं हुआ, तो आप जैसा कहेंगे, वही करूंगा।'

‘सर...कुछ मामलों में मैं आपका फेवर चाहता हूं। संपादक जी आपके पास जितने भी बिल भेजते हैं, उनमें से ज्यादातर फर्जी होते हैं। कई बार तो खर्च एक रुपये किया जाता है, बिल पांच रुपये का पेश किया जाता है। ...हां...सर...वही तो मैं कह रहा हूं। अब आपको क्या बताउं+। आप देखिएगा। सुना है, आज वे अपने काम से कनॉट प्लेस गए हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद आपको जो बिल भेजा जाएगा, उसमें कनॉट प्लेस में किसी पार्टी से मीटिंग के नाम पर लंबा—चौड़ा बिल भी शामिल होगा। हां...हां सर...मैं चेक कराता हूं। ठीक है सर...मैं रखता हूं। प्रणाम।'

रिसीवर रखने के बाद दत्ता ने पहले तो अपनी मूंछें कुतरीं। फिर अपने आपसे बोले, ‘बेटा चौरसिया...अब देखता हूं, तू कहां तक उड़ान भरता है? तेरे बिल अब तभी पास होंगे, जब मैं चाहूंगा।' यह कहकर दत्ता काफी देर तक ठहाका लगाकर हंसते रहे।

थोड़ी देर बाद उन्होंने मोबाइल पर नंबर डायल किया, ‘हेलो...प्रतिमा...शुभ्रांशु दत्ता बोल रहा हूं। सुनो...चौरसिया जी के जितने भी बिल हेड ऑफिस जाएंगे, उन्हें मुझसे पूछे बिना सीएमडी साहब के सामने पेश मत करना। अगर किसी तरह बिल पास भी हो जाए, तो चेक बनने मत देना। जब तक नौकरी जाने का खतरा न हो। ठीक है? और बताओ, तुम कैसी हो? हां...मैं ठीक हूं। ...पिछली बार तुमसे मिला तो था। यह बताओ...जब भी आगरा आया हूं। तुमसे मिले बिना दिल्ली आया होउं+, तो बताओ। पिछली बार तुम बहुत खूबसूरत लग रही थी। अगली बार आगरा आउं+गा, तो मुझे फतेहपुर सीकरी, सिकंदरा और ताजमहल घुमाने का जिम्मा तुम्हारा रहेगा। ठीक है न!'

अगले दिन जैसे ही चौरसिया पृथ्वी एक्सप्रेस के दफ्तर पहुंचे। बाहर ही दत्ता मिल गए। अभिवादन के बाद दत्ता ने कहा, ‘चौरसिया जी, कैसी रही कनॉट प्लेस की मीटिंग?'

‘मीटिंग नहीं ...मेरे एक रिश्तेदार दिल्ली आए थे। वे कनॉट प्लेस में मुझसे मिलना चाह रहे थे। सो, उनसे मिलने चला गया था। आपसे बताया तो था।'

‘अच्छा चौरसिया जी! यह बताएं, आपने पुराने बिल हेड ऑफिस को भेज दिए हैं कि नहीं?'

‘पुराने बिल भेज तो दिए थे, लेकिन अभी तक चेक बनकर नहीं आए हैं। कई बार प्रतिमा से कहा भी, लेकिन वह हर बार कोई न कोई बहाना बना देती है। कभी सीएमडी साहब बैठे नहीं हैं, तो कभी बस सर चेक बन गया है, आज कोरियर वाला नहीं आया, कल भिजवा दूंगी। पिछले पच्चीस—तीस दिन से यही हो रहा है। अभी पिछले हफ्ते के टूर का बिल भेजना है। पहले पुराना बिल क्लियर करें, तो नया भेजूं। अगर एकाध दिन में पुराने बिल क्लियर नहीं किए गए, तो मैं आगे से विजिट ही नहीं करूंगा। अच्छा आप बताइए। जितने भी विजिट किए हैं, अखबार के सरकुलेशन और मार्केटिंग का पैसा जमा हुआ है कि नहीं। पिछले महीने ही सात लाख रुपये वसूल कर लाया हूं। पंद्रह हजार रुपये का बिल अभी तक अटका हुआ है। यही क्यों, कई पुराने बिल अभी तक पेंडिंग पड़े हैं। ऐसा ही रहा, तो क्यों जाउं+गा मैं वसूली करने। और फिर...मैं संपादक हूं, किसी मुनीम का बकाया वसूलने वाला कारिंदा नहीं। मार्केटिंग और सरकुलेशन वाले करते क्या हैं? यह उनकी जिम्मेदारी है। वे वसूलें बकाया।' चौरसिया तैश में आ गए थे।

‘अरे...आप मुझे दीजिए अपना बिल...मैं पास करवाता हूं। आप भी सर...पता नहीं किस पचड़े में फंसे रहते हैं। प्रतिमा की क्या औकात है, जो आपका या हमारे किसी साथी का बिल रोक देगी। सर...आप इतने सीधे हैं कि क्या बताउं+। मैं तो यही कहूंगा। आप संपादक हैं। किसी को काटिए नहीं, मेरा मतलब नुकसान नहीं पहुंचाइए। लेकिन फुफकारिये तो...आपका समय—समय पर फुफकारते रहना जरूरी है, ताकि उनमें एक डर बना रहे, जरूरत पड़ी तो आप काट भी सकते हैं।' दत्ता ने बिना मांगे सुझाव पेश कर दिया।

‘हां...देखता हूं एकाध दिन में चेक नहीं आता, तो हेड ऑफिस जाकर पता करूंगा। आखिर क्या मामला है? अपने बिल के लिए फुटैंची टाइप लोगों से मुंह लगना भी ठीक नहीं है। यह मेरी आदत भी नहीं है।'

‘आपको किसी काम से हेड ऑफिस जाना हो, तो जाइए। मेरी सलाह मानिए, इस छोटे से काम के लिए मत जाइए। अभी डांटता हूं प्रतिमा को। आप आगे से अपने सारे बिल मुझे दीजिए। इन बिलों को पास कराने और चेक मंगाने की जिम्मेदारी मेरी है।'

‘चलिए...देखता हूं। आगे से आपको ही बिल पकड़ा दूंगा।' इतना कहकर चौरसिया आगे बढ़ गए।

शिवाकांत ऑफिस से निकला। नमो नारायण का फोन आया, ‘सर जी, कहां हैं आप इस समय?'

‘बस ऑफिस से निकल रहा हूं। क्यों...?'

‘कुछ नहीं। संपादक जी कह रहे थे, आज उनके आवास पर ‘राष्ट्रीय प्रोग्राम' है। आ जाओ, तो मजा आ जाए।' नमो नारायण की चहकती हुई आवाज सुनाई दी।

‘ठीक है...आधे घंटे में पहुंचता हूं। मैं पियूंगा नहीं।' शिवाकांत ने हेलमेट पहनते हुए कहा।

रवींद्र चौरसिया के घर पहुंचा, तो महफिल जम चुकी थी। नमो नारायण, निखिलेश निखिल और लखनऊ ब्यूरो चीफ कमल किशोर पधार चुके थे। उसे देखते ही संपादक रवींद्र चौरसिया ने झूमते हुए कहा, ‘अब पूरे पांच पांडव हो गए हैं। अब कौरवों की मैय्यू कर सकता हूं। लाओ भाई...पैमाना लाओ। जाम छलकाया जाए।'

नमो नारायण ने किचन से एक प्याला उठाया। लाकर शिवाकांत के सामने रख दिया। शिवाकांत ने मना किया, लेकिन चौरसिया ने कहा, ‘यार...यहां मैं तुम्हारा संपादक नहीं हूं। यहां आकर तुम्हारा न पीना वैसे ही है, जैसे रंडी के कोठे पर जाकर पाक साफ होने की दुहाई देना। जब पांच पांडव जमा ही हो गए हैं, तो फिर न पीकर महफिल खराब मत करो। एक ही पैग ले लो। ज्यादा पीने को मजबूर नहीं करूंगा।'

संपादक के कहने पर शिवाकांत ने पैग उठा लिया। इस पर कमल किशोर ने

हवा में अपना गिलास लहराकर कहा, ‘पांडवों की जय और कौरवों की पराजय के लिए चियर्स...।' सबने शराब सिप की। नमो नारायण ने नमकीन उठाकर फांकते हुए कहा, ‘सर जी...पांडव तो हैं, लेकिन एक अदद द्रौपदी की कमी रह गई। क्यों निखिल जी, ऐसे में एक द्रौपदी होनी चाहिए थी कि नहीं। भले ही वह साकी का काम करती।'

‘तुम लोगों के दिमाग में हमेशा गंदगी भरी रहती है। यहां द्रौपदी का क्या काम

...हमेशा चोंच से चोंच लड़ाते फिरते हो, लेकिन फिर भी पेट नहीं भरता। उधर, चैनल में हर आदमी क्वार के कूकुर की तरह बौराया घूमता है। इधर तुम लोग रंडापा बतियाते रहते हो। हर समय बस सेक्स ही सूझता है तुम लोगों को। सच बताउं+। चाहे चैनल हो या अखबार...किसी महिला या लड़की को मैं देखना नहीं चाहता। मेरा वश चले, तो सबके ‘जीपीएल' मारकर संस्थान से बाहर कर दूं।' इतना कहकर निखिल ने अपना गिलास उठाया और एक ही घूंट में बाकी बची शराब हलक के नीचे उतार ली और गिलास को किनारे सरका दिया। कमल किशोर ने उन्हें और लेने का इशारा किया, तो वे बोले, ‘रहने दो। मैं अब नहीं पियूंगा। घर जा रहा हूं। तुम जैसे रंडलों के साथ दारू नहीं पी सकता।'

‘भाई साहब! कभी—कभी आप मुझे घोर नारी विरोधी लगते हैं। नारी को लेकर कोई फ्रस्टेशन है क्या? महिलाओं और लड़कियों को अखबार या चैनल में नौकरी करने का हक नहीं है? जितनी भी गंदगी दिखाई देती है, भले ही वह किसी भी रूप में हो, उसके लिए सिर्फ वही जिम्मेदार हैं? पुरुष नहीं?'

चौरसिया ने हस्तक्षेप किया, ‘तुम लोग कहां की फिजूल बहस करने लगे। शिवाकांत, सबसे बाद में तुमने ऑफिस छोड़ा था न। सारे एडीशन समय पर छूट गए थे?' निखिल उठते—उठते बैठ गए।

‘हां भाई साहब! सारे पेज समय पर छूट गए थे। जब मैं चला हूं, तो दत्ता सर के सिवा सारे लोग जा चुके थे। वे कुछ लिख रहे थे।'

‘साले के घर—परिवार नहीं है क्या? सुबह दस बजे ऑफिस आ जाता है, रात दो बजे तक वहीं रहता है। आखिर वह इतनी देर तक वहां करता क्या है? जैसे ऑफिस वाले इससे आजिज रहते हैं, वैसे ही बीवी भी इससे परेशान रहती होगी। भगा देती होगी सुबह—सुबह। जाकर ऑफिस में लोगों की गांड में चरस बोओ, मेरी जान तो छूटेगी।' इतना कहकर चौरसिया हंसे। उन्होंने नमकीन मुंह में डाली और चबाने लगे।

‘सर...इतनी देर रुकेगा नहीं, तो सीएमडी को बताएगा कैसे, मैं इतनी देर तक काम करता हूं। बाकी सभी देर से आते हैं, कोई काम नहीं करते हैं। देखिए, मैं कितनी मेहनत करता हूं। एक दिन मैं उसके पास बैठा था, पहले पेज की खबरों पर कुछ डिस्कस करना था। तभी एमडी या सीएमडी का फोन आ गया। पट्ठा लगा सबकी शिकायत करने। चूंकि मैं उसके पास बैठा था, इसलिए मुझे बख्श दिया। सुना है, रोज सीएमडी को हम सबकी शिकायत मेल से भेजता है। हेड ऑफिस में सबकी शिकायतों की एक फाइल खुली हुई है।' नमो नारायण ने तीसरा पैग खत्म किया था। शराब कुछ—कुछ असर दिखाने लगी थी।

‘दत्ता शिकायत इसलिए करता है, ताकि वह जो स्याह—सफेद करता है, उस पर पर्दा पड़ा रहे। क्या मैं नहीं जानता हूं। कम से कम पांच लाख रुपये प्रति महीने अखबार के लिए कागज खरीदने में, लगभग अस्सी—नब्बे हजार रुपये कागज वेस्टेज में, दो से ढाई लाख रुपये प्लेटों की खरीद में इधर—उधर करता है। इससे पहले जिस अखबार में यह था, उसमें वहां पैंतीस हजार रुपये पाता था। फर्जी सैलरी स्लिप बनाकर इसने अपनी पुरानी सैलरी पच्चासी हजार दिखाई। अब सवा लाख रुपये उठा रहा है। बस, एक सुबूत हाथ लग जाए, सीधा जेल न भिजवा दूं, तो कहना। मुझे किसी दिन खुजा के तो देखे, चखाता हूं मजा।' चौरसिया तरन्नुम में झूमने लगे थे।

‘सर...सुना है, कानपुर के ब्यूरो चीफ संदीप तिवारी से इसने एक लाख रुपये मांगा है। कहता है, नहीं दोगे, तो तुम्हें निकाल दूंगा।' कमल किशोर ने जैसे नया खुलासा किया।

‘ये सबके सब चूतिये हैं। मैं तो कब से कह रहा हूं। मुझे एक सुबूत मिल जाए। मैं सीधा इसे अंदर करा दूंगा। तुम सब मुझे एक भी फर्जी बिल, बाउचर या कोई लिखित शिकायत उपलब्ध करा दो, सीधा पुलिस थाने में कंप्लेन लिखाकर अंदर करा दूंगा। मैनेजमेंट को बाद में बताउं+गा। एचआर, एडमिन से लेकर एकाउंट तक में साले ने अपने आदमी बिठा रखे हैं। कोई कुछ बताता ही नहीं है।' चौरसिया के स्वर में बेबसी उभर आई थी। उन्होंने खीझ में एक लंबा घूंट भरा, तो लगा कि भीतर की आग थोड़ी और भड़क उठी है।

‘सर...एक बात कहूं। बुरा मत मानिएगा। आगरा के ब्यूरो चीफ प्रतीक शर्मा ने आपके ही कहने पर दत्ता के खिलाफ लिखित शिकायत की थी। उसने आपके ही कहने पर उस पत्रा को मीडिया से संबंधित खबरें प्रसारित करने वाले कुछ न्यूज पोर्टलों को भी दी थी, लेकिन जब उसके पक्ष में लड़ने का मौका आया, तो आपने शर्मा को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। आपके ही चलते अलीगढ़ में सर्कुलेशन का काम देखने वाले विजय पासवान को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। आपने ही उसे भी यही झांसा दिया। दत्ता के खिलाफ कोई सुबूत जुटा दो, तो देखो मैं ये करता हूं, मैं वो करता हूं। बस मुझे एक सुबूत मिल जाए, तो मैं उसे रप से नाप दूंगा। पर हुआ क्या? वह बेचारा आपके चक्कर में मारा गया। उसकी नौकरी तो गई ही गई, उस पर सरकुलेशन के पैसे की हेराफेरी का भी आरोप लगा।' शिवाकांत ने यह क्या बात कही, मानो बिजली गिरा दी हो। वहां सन्नाटा खिंच गया। सारे लोग अवाक रह गए। होठों तक जाता गिलास थम गया। सबसे ज्यादा आहत चौरसिया हुए। उन्होंने हाथों में पकड़ा हुआ गिलास रख दिया।

सिर्फ बोल फूटे निखिल के, ‘क्या घटिया बात कह रहे हो? तुम भी दत्ता की बोली बोलने लगे।'

‘सवाल दत्ता या चौरसिया की बोली बोलने का नहीं, न्याय का है? जब आपने कहा, दत्ता के खिलाफ लिखकर दो। उसने लिखकर दिया। सीएमडी को पत्रा भेजा, एमडी को भेजा, आपको भेजा। आपके इशारे पर कुछ खबरिया पोर्टलों को वह पत्रा भेजा गया, तो फिर आप उसके पक्ष में क्यों नहीं खड़े हुए? इसलिए कि आपको खुलकर उसके पक्ष में आना पड़ता। आपको एक मोर्चा खोलना पड़ता। इससे आपकी नौकरी को खतरा पैदा हो सकता था? अगर आप अपने साथियों के पक्ष में खड़े नहीं हो सकते, तो स्वार्थ के लिए आपको किसी की नौकरी से खेलने का क्या हक है? अब तक जितने भी लोग टर्मिनेट हुए हैं, वो आप द्वारा रखे गए थे। जब एक—एक कर उन्हें निकाला जा रहा था, तो आप मूकदर्शक की तरह खड़े तमाशा देख रहे थे। आपको अपनी नौकरी की चिंता खाए जा रही थी। इस पर भी आप चाहते हैं कि लोग आपके साथ चलें। आपका नेतृत्व स्वीकार करें...पर क्यों?' शिवाकांत का चेहरा लाल हो उठा।

‘मुझसे ज्यादा खुजाओ नहीं। मैंने किसी का ठेका नहीं ले रखा है। मेरा काम नौकरी देना था, नौकरी बचाना नहीं। नौकरी करनी है, तो नौकरी बचाना सीखना होगा। जितने भी लोग टर्मिनेट हुए हैं, वे नाकारा थे, काहिल थे, काम चोर थे। मेरे वश में होता, तो उन्हें बहुत पहले मैं खुद ही टर्मिनेट कर चुका होता। जब मैंने शर्मा से कहा, जैसा मैं कहता हूं, वैसा करो। लेकिन नहीं। अपनी बुद्धि घुसाओगे, तो होगा क्या? मैंने कहा, तुम दत्ता के खिलाफ मुझे लिखकर दो। मैं उस मामले को आगे बढ़ाउं+गा। नहीं ...नेता बनने का शौक था। मेल सबको फारवर्ड कर दिया। मेरा कहा नहीं मानेगा, तो भुगतेगा कौन...मैं?' चौरसिया का लहजा तल्ख हो उठा। वे गिलास में व्हिस्की डालकर पानी मिलाने लगे।

‘और सुनो...शिवाकांत...तुम जिनकी तरफदारी कर रहे हो, वे कोई दूध के धुले नहीं हैं। इससे पहले जब वे लोग दत्ता की दी हुई मलाई चाट रहे थे, तो तुम्हें बुरा नहीं लग रहा था। मैं एक बात बता दूं, वे सारे लोग सर के कारण टर्मिनेट नहीं हुए हैं, अपने कर्मों से हुए हैं। यह तो सर की मेहरबानी है, जो इतने दिन उन्होंने नौकरी कर ली...। कोई दूसरा होता, तो इससे पहले निकाल बाहर कर देता।' निखिल ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा, ‘साला...तुम्हीं जैसे लोगों ने पृथ्वी एक्सप्रेस अखबार और वी एक्सप्रेस चैनल को कोठे से बदतर बना दिया है। जहां देखो राजनीति...जिधर जाओ राजनीति...राजनीति तो तुम लोगों का जैसे ओढ़ना—बिछौना हो गया है। उधर, चैनल हेड और उनके चमचों ने करोड़ों रुपये डकार लिए। डिस्ट्रीब्यूशन के नाम पर कंपनी को करोड़ों रुपये का चूना लगाया। दत्ता जी चेक पर चेक अलग से काटे जा रहे हैं। फ्रीलांसरों से पहले लिखाते हैं, बारह सौ रुपये प्रति आर्टिकल पेमेंट करते हैं, फिर छह सौ रुपये वसूल लेते हैं। मुझे सब मालूम है, मेरा मुंह मत खुलवाओ।'

‘और बताउं+...दत्ता ने जितने भी आदमी रखे हैं, उनको मोबाइल, टैक्सी, पेपर और मैग्जीन का पैसा मिलता है। सुकांत अस्थाना को तो घर के किराये से लेकर बच्चों की फीस तक मिलती है। जितनी उसकी तनख्वाह है, उससे ज्यादा पैसा तो उसे बाउचर पेमेंट के जरिये दिया जाता है। तब तुम्हारी जुबान पर ताला लग जाता है।' निखिल ने ऐश ट्रे में सिगरेट को इस तरह मसल दिया, मानो किसी की गर्दन मरोड़ी हो।

पनीर का टुकड़ा मुंह में डालते हुए चौरसिया बोले, ‘मैं टुच्ची पॉलिटिक्स नहीं करता। मैं पॉलिटीशियन हूं। नेता जी के साथ कई बार रैलियां की हैं। अखिलेश ने मैनपुरी में मेरे साथ दस किमी की पदयात्राा की है। मैंने कई लोगों को सांसद और विधायक बनवाया है। मध्य प्रदेश में कई ऐसे नेता हैं जिनके जीतने की गुंजाइश दूर—दूर तक नहीं थी। मैंने विरोधियों की मैय्यू करके उन्हें जिताया। डंके की चोट पर जिताया। यह कहकर लोगों को चुनाव लड़वाया, उखड़ ले जिसको मेरा कुछ उखाड़ना हो। दत्ता...मेरे सामने क्या पालिटिक्स करेगा। ये सब मेरे सामने बच्चे हैं...बच्चे। इनकी औकात ही क्या है? मैं फूंक दूं तो हवा में उड़ जाएंगे। कहीं पता नहीं लगेगा। मध्य प्रदेश में एक आदिवासी नेता है, बर्रैया...उसके चुनाव का नारा मैंने ही दिया था। उनसे मैंने कहा, तुम जहां भी रैली करो, चुनावी सभा करो। बस एक ही बात कहो, सर पे कफन बांध के निकले बर्रैया...। और जानते हो, वह चालीस हजार मतों से चुनाव जीत गया।'

‘सर...आप मध्य प्रदेश में भी रहे हैं?' नमो नारायण ने सचमुच आश्चर्य व्यक्त किया था, या सिर्फ चमचई की थी। यह शिवाकांत नहीं समझ पाया।

‘चूतिये हो तुम...सर...मध्य प्रदेश में कई साल रहे हैं। वहां सर की ननिहाल है। सर को अपने नानी—नाना से काफी लगाव था। वे जब तक जिंदा रहे, उन्होंने सर को अपने पास ही रखा। वहीं सर की पढ़ाई—लिखाई हुई है। सर ने अपने करियर की शुरुआत वहीं से की थी। नाना—नानी के दिवंगत होने के बाद सर जी उत्तर प्रदेश लौट आए थे। अब भी सर का एक पांव मध्य प्रदेश में होता है, तो दूसरा उत्तर प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र में। सर वहां के काफी नामी पत्राकार और नेता रहे हैं। आदिवासी तो इन्हें पूजते हैं, पूजते

...जब भी सर मध्य प्रदेश में हों, तो देखो इनका जलवा...। आदिवासी नेता बिना इनके घर का चक्कर लगाए मानते ही नहीं हैं। किसी को चुनाव लड़ना हो, रैली आयोजित करनी हो, अपने विरोधी को निपटाना हो, तो सर के ही पास आते हैं लोग। एक बार तो ऐसा हुआ। एक बार मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्राी, जो अपने इलाके में कुंवर जी या दाऊ जी के नाम से मशहूर थे, की संपादक जी भिड़ंत हो गई। संपादक जी ने चैलेंज कर दिया। बहुत ज्यादा ऐंठो नहीं। मुख्यमंत्राी की कुर्सी जल्दी ही जाने वाली है। संयोग देखिए। तीन महीने बाद चुनाव हुए और दाऊ जी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया। मुख्यमंत्राी पद की शपथ भी ली, लेकिन अगले ही दिन मुख्यमंत्राी पद से हटना पड़ा। उन्हें पंजाब की लॉट साहबी संभालनी पड़ी।' निखिल ने इस बीच अपना पैग फिर से भर लिया था।

शराब को चुसकते हुए निखिल कह रह थे, ‘इतना ही नहीं। आज से दस—बारह साल पहले सर जी एक आदिवासी नेता की चुनावी रैली में गए। नेताओं को सुनने आए लोगों ने जब संपादक जी को देखा, तो कहने लगे, भइया...आप बोलो। आप जिसको कहेंगे हम उसी को वोट देंगे। वहां के लोग संपादक जी को भइया कहकर मान देते हैं। फिर संपादक जी बोले, खूब बोले। उपस्थित लोगों से कहा, यह उम्मीदवार आपके बीच का ही आदमी है। क्या इसे आप लोग आठ महीने का मौका नहीं दे सकते। अगर आपको आठ महीने के बाद लगे, यह ठीक आदमी नहीं है, बदल दीजिएगा। अगर जंचे, तो इसे आगे पांच साल के लिए चुन लीजिएगा। और आपको बता दें...वह नेता भाजपा—कांग्रेस जैसी

दिग्गज पार्टियों के उम्मीदवारों को हराकर फुटैंची टाइप की पार्टी गोंडवाना मुक्ति संग्राम वाहिनी के टिकट से जीत गया। जिसके समर्थन में भाई साहब प्रचार करने गए थे, वह आठ महीने ही विधायक रहा। इसके बाद वह कई बार चुनाव लड़ा, हारा और जीता, वह अलग कहानी है।'

‘भाई साहब! अगर चमचई का कोई प्रतिष्ठित पुरस्कार भारत सरकार दे, तो यकीनन आपको ही मिलेगा। कई बार आप बातों से क्रांतिकारी, प्रगतिशील और दबे—कुचले लोगों के प्रति सहानुभूति रखने वाले प्रतीत होते हैं। जब आपका यह आचरण देखता हूं, तो आप मुझे घोर प्रतिक्रियावादी और अवसरवादी नजर आते हैं। चमचई की भी हद होती है। किसी प्रदेश के मुख्यमंत्राी से चार पन्ने का जिला स्तरीय अखबार निकालने वाला टुटपुंजिया संपादक भिड़ जाए और मुख्यमंत्राी सिर्फ भविष्यवाणी सुनकर रह जाए। ऐसे दबंग तो नहीं नजर आते हैं संपादक जी?' शिवाकांत पर पता नहीं कौन सा खब्त सवार था कि वह पूरा मोर्चा ही खोल बैठा।

उसने कहा, ‘हर आदमी के दो चेहरे होते हैं। ऐसा माना जाता है। अब इसमें कितना सच है, कितना झूठ? मैं नहीं जानता। जो चेहरा सामने होता है, वह लोगों को लुभाता है। आदमी की पहचान उस छिपे चेहरे से ही होती है। कि अच्छा है, कि बुरा। कई बार लोग इतने बड़े अभिनेता होते हैं कि छिपा चेहरा भी सामने वाले चेहरे जैसा नजर आता है। कुछ लोग इतने सीधे होते हैं कि उनके दोनों चेहरे एक जैसे होते हैं। निखिल जी, आप जिस चेहरे को चिपकाए घूमते हैं, भीतर छिपा चेहरा ठीक उसके उलट है। बुरा मत मानिएगा, यह मेरी धारणा है। गलत भी हो सकती है। मैं तो कहता हूं, कि मैं गलत कह रहा हूं।'

वैसे चौरसिया जब भी तरन्नुम में होते अपने मध्य प्रदेश प्रवास की कहानियां साथियों को बड़ा रस ले—लेकर सुनाया करते हैं। सर्दियों में शिवाकांत ऑफिस के सामने टी स्टाल पर बैठा धूप सेंकने के साथ—साथ चाय की चुसकियां ले रहा था, तभी चौरसिया आ गए।

बातचीत होने लगी। पता नहीं, कब और कैसे मध्य प्रदेश का कोई प्रसंग आ गया। बस चौरसिया चालू हो गए। कहने लगे, ‘मैं किसी भी नेता का बैंड बजा सकता हूं। मेरे से कोई क्या पॉलिटिक्स करेगा। मेरे पास ऐसी आदिवासी औरतें हैं, जो पांच सौ रुपये की दिहाड़ी पर किसी के भी खिलाफ धरने पर बैठ सकती हैं। मुझे तो जिसे निबटाना होता है, मैं तो ऐसा ही करता हूं। मैं दत्ता को जब चाहूं, निबटा सकता हूं। उसकी हरकतों को देखकर गुस्सा भी आता है। अरे, नौकरी करने आए हो, नौकरी करो। किसने मना किया है। दूसरों की ‘जी' में बंबू तो मत करो। अच्छा बताओ, अगर अभी मैं छत्तीसगढ़ की दस आदिवासी महिलाओं को बुला लूं। वे यहां ब्लाउज फाड़कर कहें कि दत्ता ने मेरे साथ बदतमीजी की है। तो दत्ता निपट ही जाएंगे। कितना ही जोर लगा लें, कितनी देर लगेगी टंडीला उखड़ने में। मेरा क्या जाएगा...दस—पांच हजार रुपये ही खर्च होंगे न! उनकी तो फाइल ही निपट जाएगी।'

एक दिन सुकांत के साथ चौरसिया अपने चैंबर में बैठे थे। किसी काम से शिवाकांत उनके पास गया। चौरसिया ने बैठा लिया। उस समय निंदा रस का अज प्रवाह हो रहा था।

‘अच्छा बताओ...भला...मेरी और सुकेश कुमार की क्या तुलना है? मैं तो एक अलगै टाइप का संपादक हूं। मिनट भर नहीं लगता किसी की मैय्यू करने में। सटक मार लूं, तो मैं सीएमडी की मां—बहन कर सकता हूं। किसी की मां—बहन करने में कितना समय लगता है? और फिर ये फुटैंची टाइप के लोग कहां टिकते हैं, यार! एक दिन चैनल हेड सुकेश कुमार ऑफिस से निकलते समय मिल गया...चोट्टा। सुकेश जानते हो पूरी दिल्ली में क्या कहता फिरता है? मुझे ठग बताता है। कहता है, मैं पहले कंपनी के खिलाफ विभिन्न जगहों पर फर्जी मुकदमे दर्ज कराता हूं, पुलिस वालों और लोगों को कंपनी के खिलाफ शिकायत करने को कहता हूं। बाद में मामला सुलझाने के नाम पर सीएमडी और कंपनी से पैसा वसूल करता हूं। मैं तो कहता हूं मुझसे खुजाओ नहीं। मेरा मुंह खुल गया, तो सारे के सारे नंगे हो जाओगे। मिनट भर नहीं लगेगा। चैनल में कहां, क्या होता है? मुझे सब राई—रत्ती पता है। कहां, कितना रुपया डकारा गया है, इस डकार को पचाने के लिए पचनोल कितने का और कहां से खरीदा गया है, मुझे सब मालूम है। चैनल की कौन—सी लड़की किससे सेट है, यह मुझे नहीं मालूम है? मेरी आंखें बंद तो नहीं हैं।'

सुकांत ने तंबाकू मलते हुए कहा, ‘सर जी...मीडिया जगत में एक किस्सा काफी मशहूर हो चुका है। अपने चैनल हेड जब नई तकनीक की जानकारी लेने विदेश गए थे, तो उनके साथ दो लड़कियां भी गई थीं। वहां उन्होंने खूब रंगरेलियां मनाई थीं। सर जी

...यह तो वही कहावत हुई, सूप बोले तो बोले, छन्नी क्या बोले जिसमें बहत्तर छेद। पहले अपने गिरेबां में झांक लो, फिर दूसरों पर आरोप लगाओ।' सुकांत ने तंबाकू मलने के बाद दोनों हथेलियों के सहारे चूना झाड़ा तो उसकी गर्द नाक में जाने से शिवाकांत को छींक आ गई। चौरसिया तिलमिला उठे।

‘बात दरअसल यह है कि अभी तक इन भडुवे पत्राकारों का किसी मर्द से पाला नहीं पड़ा है। मेरे से ज्यादा चूं—चपड़ करके देखें। वो गति करूंगा कि कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे। चार आदिवसी महिलाओं को खड़ा कर दूंगा। वे चीख—चीखकर मीडिया और पुलिस से कहेंगी, सुकेश और दत्ता ने उनका यौन शोषण किया है, बदसलूकी की है। मेरे पास कई ऐसी रांड औरतें है, जो पैसा मिल जाने पर कुछ भी कर सकती हैं।' चौरसिया ने देखा, निखिल कुछ कहने को अकुला रहे हैं।

निखिल कुछ कहते इससे पहले ही चौरसिया फिर चालू हो गए। उन्होंने शिवाकांत को घूरते हुए कहा, ‘टुटपुंजिया तू किसे बोला? मुझे...मैंने बडे़—बड़े अखबारों में नौकरी तो नहीं की है, लेकिन रिपोर्टिंग जरूर की है। कई खबरें तो मेरी पहले पेज पर बाईलाइन छपी हैं। जानते हो, मेरी एक रिपोर्ट पर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को पत्रा लिखने को मजबूर होना पड़ गया था। उन्होंने रिपोर्ट की भूरि—भूरि प्रशंसा की थी। क्या यार...तुम कैसी बातें करते हो। सारा मूड खराब कर दिया। तुम जिनको भी बड़ा पत्राकार या संपादक समझते हो, वे मेरे लाइन में नहीं लगते। और मैं तो साफ कहता हूं, किसी को भला लगे या बुरा...जिसको नौकरी करनी हो करे, नहीं तो अपना रास्ता नापे। मैं किसी के घर पीले चावल लेकर न्यौता देने नहीं गया था कि आओ...नौकरी करो।'

‘सर...आपकी...इस बात से...सहमत नहीं हूं...' नमो नारायण ने नशे में लड़खड़ाती आवाज में विरोध जताया, ‘नौकरी आप भी करते हैं...नौकरी मैं भी करता हूं। तनख्वाह आप अपनी जेब से नहीं देते। आपको भी तनख्वाह सीएमडी भदौरिया देते हैं, कंपनी देती है, हम सबको भी वहीं से तनख्वाह मिलती है। पहली गलती तो हमारी यह है, हम आपके साथ दारू पीने बैठे। दूसरी गलती यह है, हम अब तक आपकी जायज—नाजायज बातें सुन रहे हैं। कोई भी संपादक अगर अपने कलीग के साथ बैठकर दारू पी रहा हो, तो उसका स्तर समझा जा सकता है।' लड़खड़ाता नमो नारायण उठ खड़ा हुआ, ‘मैं घर जा रहा हूं। हो सकता है, कल आप मुझे नौकरी न करने दें। लेकिन इतना याद रखिएगा। मैनेजमेंट किसी का सगा नहीं होता। आज आप जरा—सी बात पर नाराज होकर किसी तिकड़म से मुझे हटवा देंगे। कल आपके लिए भी कोई तैयार बैठा होगा। पिछले डेढ़ साल बेरोजगार रहने के बाद नौकरी मिली है। बच्चों के पेट को रोटी नसीब होने लगी है, लेकिन इतना भी बेगैरत नहीं हूं। आप हमें कुत्ता समझेंगे और हम चुपचाप सुनते रहेंगे। कुछ नहीं होगा, तो प्रतिरोध तो जरूर करेंगे। दत्ता जी की भी गलत बातें मैं स्वीकार नहीं करता। इससे पहले भी जिस अखबार में था, वहां भी नौकरी ज्यादा दिन इसलिए नहीं कर पाया क्योंकि मैं किसी का पेल्हर नहीं तौलता था। कुछ साथी मुझसे कहते हैं, कंफर्ट जोन में रहो। क्या दिक्कत है? लेकिन आप और दत्ता जी ने जिस तरह पृथ्वी एक्सप्रेस को रंडी का कोठा बना दिया है, वह मुझसे बर्दाश्त नहीं होता।' इतना कहकर अपना पैग अधूरा छोड़कर नमो नारायण उठ खड़ा हुआ।

नमो नारायण को उठता देखकर शिवाकांत ने कहा, ‘क्यों...नमो तुम कहां जाओगे? सेक्टर 18 ही तो। रुको...मैं तुम्हें सेक्टर 18 के चौराहे तक छोड़ देता हूं। मुझे भी उधर ही जाना है।'

‘तुम लोग अपने आप को समझते क्या हो? संपादक जी की सहृदयता का फायदा उठा रहे हो। चिटफंडियों का अखबार है, इसलिए तुम लोग साथ बैठने और दारू पीने का मौका पा रहे हो। सोचो, अगर तुम किसी बड़े मीडिया ग्रुप के अखबार में होते, तो क्या संपादक के साथ बैठकर दारू पीने का मौका पाते? उनके हमप्याला, हम निवाला हो सकते थे? उनको क्या इसी तरह जली कटी सुनाकर नौकरी कर सकते थे? इन दोनों बातों में से कोई भी बात नहीं होती।' निखिल ने अपने दायें हाथ को नचाते हुए कहा।

‘भाई साहब! आपसे कुछ भी छिपा नहीं है। आप भी जानते हैं, बड़े मीडिया हाउसों में क्या होता है? वहां वरिष्ठ पत्राकार भी अपने कलीग के साथ पीते—पिलाते हैं, लेकिन कुछ...सब नहीं। हां, वे इतने सर्व सुलभ भी नहीं होते कि कोई उप संपादक, ट्रेनी या पेजिनेटर अपने संपादक, समूह संपादक या राजनीतिक संपादक के साथ बैठकर दारू पिए, छिनरई की बातें करे। राजनीति वहां भी होती है। लेकिन उनका कोई मेयार होता है, कुछ हदें होती हैं। वहां भी हर आदमी अपने साथियों की वॉट लगाने की सोचता है। लेकिन ऐसा नहीं होता कि जूनियर रिपोर्टर या सब एडीटर अपने संपादक या किसी अन्य वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ साजिश रचे। गुटबाजी, लंपटई और एक—दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति वहां भी कम नहीं है। बड़े अखबार वाले कोई दूध के धुले नहीं हैं, लेकिन उनकी ‘गंदगी' का भी एक स्तर है। वे ऐसी कुत्ता घसीटी नहीं करते। वहां विरोधी खेमा ऑफिस या ऑफिस के बाहर एक दूसरे की मां—बहन नहीं करता। वे किसी का गला रेतते भी हैं, तो इतने प्यार से कि जिसका गला रेता जाता है, उसे आभास तो होता है, लेकिन वह खुलकर विरोध नहीं कर सकता।' नमो नारायण ने जूते पहनने के बाद दरवाजे से ही कहा, ‘जिस तरह पृथ्वी एक्सप्रेस में आप दोनों लोग कुत्ता घसीटी करते हैं, ऐसा तो कम से कम बड़े मीडिया हाउस में कतई नहीं होता। पत्राकारिता जगत में अब तक ऐसी कोई मिसाल नहीं देखने को मिली है कि किसी अखबार का संपादक, प्रधान संपादक अपने संस्थान के चपरासी के साथ बैठकर षड्यंत्रा रचे, एक दूसरे की जासूसी कराए। अफसोस है कि आप लोग ऐसा ही करते हैं। इससे ज्यादा नीचे गिर जाते हैं कई बार। आप लोग जितना समय एक दूसरे की खाट खड़ी करने में गंवाते हैं, उतना समय अखबार को सुधारने में देते, तो अखबार की दशा और दिशा कुछ दूसरी होती।'

शिवाकांत और नमो नारायण के जाने के बाद कमरे का माहौल बिगड़ गया। रवींद्र चौरसिया ने गिलास में बची शराब हलक में उतारी, तो मुंह कडुवा गया।

‘यह भी खूब रही। मेरे ही पैसे की दारू पिएंगे, मुझे ही जली—कटी भी सुनाएंगे। सालों को...आज से दारू नहीं पिलाउं+गा...। साले...बड़े बल्लम बन रहे हैं। कल इनके ‘जी' में बंबू करता हूं। मैं कल इनके ‘जी' में बिना छिला बंबू करता हूं। देखता हूं, कौन माई का लाल इन्हें बचा पाता है। हां निखिल...मैं दर मादर...आदमी हूं। मेरा मुंडा सरक जाए, तो अपने बाप को भी नहीं छोड़ता। अपने घर में था, पीने का मूड था, सो इनकी इतनी बकवास सुन ली। मैं नहीं सुनता किसी की...चाहे कोई कितना ही बड़ा तुर्रम खां क्यों न हो। कहो...तो मिलाउं+ फोन दत्ता को, सीएमडी भदौरिया को...इन लोगों को इनकी औकात बता दूं। अरे...ये क्या करते हैं, मैं सब जानता हूं। मैं जानता हूं, इनसे पैसा कैसे निकाला जाता है। चिटफंडियों की आदत मैं अच्छी तरह समझता हूं। ये वैसे तो आपको घंट भाव नहीं देंगे। कोई बात कहो, तो अपने बिल में घुस जाएंगे। आप लाख बड़े और तुर्रम खां पत्राकार हों, होते रहिए, आप इनकी मां—बहन करने की धमकी दें, धौंस जमाएं। अपने बिल से बाहर ही नहीं निकलेंगे। क्या कर लोगे? इन्हें मालूम है, पता नहीं कब...कोई इन्हें अंदर करा दे? यह बताओ, इतने महीने हो गए, साल पूरा होने वाला है...अपने एमडी, सीएमडी यहां आए हैं। आगरा से दिल्ली का कितने घंटे का रास्ता है? मुश्किल से तीन—चार घंटे का। कभी पूछने आए हैं, अखबार कैसा निकल रहा है? नहीं न... मैं जानता हूं, इन चिटफंडियों को बिल से बाहर निकालने की कला। सारे रास्ते बंद कर दो। फिर बिल में पानी भरना शुरू करो। देखो कैसे बिलबिलाकर बिल से बाहर आते हैं।' चौरसिया अपनी जगह पर ही पसर गए। शराब सिर पर चढ़कर बोलने लगी थी। आंखें मुंदी जा रही थीं, लेकिन वे अभी सोना नहीं चाहते थे। शिवाकांत और नमो नारायण की बातें उन्हें चुभ गई थीं। वे दत्ता के साथ—साथ इन दोनों को भी उनकी औकात बताने की सोच रहे थे।

‘मैं तो शिवाकांत जैसे रंडलों को देखना नहीं चाहता हूं। लगता है, दत्ता ने इन दोनों को कोई लालीपॉप दिया है। तभी ये इतना भौंक रहे हैं।'

निखिल ने बोतल उठाकर एक घूंट पानी पिया। फिर बोले, ‘अच्छा सर...मैं भी चलता हूं। बहुत देर हो गई। बीवी तो कब की सो गई होगी। कई बार तो पूरा मोहल्ला जाग जाता है, लेकिन वह नहीं उठती। कहो तो कहती है, तुम्हें क्या...? आधी रात को आए, खाया—पिया, हुचर—हुचर किया और सो गए। मुझे तो सुबह चार बजे उठकर पानी भरना पड़ता है। बच्चों को तैयार करना पड़ता है। उनके लिए नाश्ता कोई दूसरा तो तैयार करता नहीं है, फिर तुम्हें भी नाश्ता चाहिए। सारा दिन काम धंधे में ही बीत जाता है। एक मिनट की फुर्सत मिलती नहीं। ऐसे में दस बजे तक सो न जाउं+, तो क्या करूं?'

‘फोन कर दो...यहीं सो जाओ।'

‘नहीं सर...जाना पड़ेगा। सुबह बेटी के स्कूल भी जाना है। पैरेंट्‌स—टीचर्स मीटिंग जो है।'

निखिल के खड़ा होते ही कमल किशोर भी उठ गया। कमल किशोर तीन पैग के बाद पीना बंद कर चुका था। वह आज ही नोएडा आया था। उसे सुबह चार बजे की ट्रेन पकड़कर वापस भी जाना था।

प्रेस क्लब में पहुंचा, तो अमित वर्मा ने शिवाकांत को देखते ही हाक लगाई, ‘अरे गुरु

...इधर...।' इतना कहकर वह गाने लगा, ‘देख इधर यार ध्यान किधर है...जहां तेरी ये नजर है मेरी जां मुझे खबर है...।'

अमित वर्मा पिछले कई साल से दिल्ली में है। लखनऊ में अमित वर्मा से शिवाकांत की मुलाकात दैनिक प्रहरी में काम करने वाले आशीष गुप्ता ने कराई थी। तब शिवाकांत क्राइम बीट देखता था। अमित भी दैनिक ‘अविरल' में क्राइम रिपोर्टर था। बाद में वह लखनऊ छोड़कर भाग्य आजमाने दिल्ली आ गया। बात—बात पर हंसना, फिल्मी गीतों की पैरोड़ियां बनाना और लड़कियों के पीछे भागना, अमित का शगल रहा है। लड़कियां उसे गंभीरता से नहीं लेतीं या अमित लड़कियों को गंभीरता से नहीं लेता, यह आज तक शिवाकांत की समझ में नहीं आया था। अमित शाम को अक्सर प्रेस क्लब में ही पाया जाता है। प्रेस क्लब या उसके इर्द—गिर्द होने वाली पार्टियों में कुछ पत्राकार, नेता और ब्यूरोक्रेट्‌स तो पीने के बाद उसे ऐसी—ऐसी बातें बताते हैं कि उसका मुंह खुला का खुला रह जाता है। एक साल पहले उसके दिमाग में आया, वह प्रेस क्लब में होने वाली कानाफूसी को अगर चटपटे अंदाज में लिखे, तो पाठकों को मजा आएगा। यह विचार आते ही उसने अपने संपादक से बात की, तो वे झटपट मान गए। साल भर से वह अपने अखबार में ‘चंडूखाने की चहल—पहल' नाम से कॉलम लिख रहा है।

शिवाकांत ने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा, ‘तू नहीं सुधरेगा...साले...कभी तो सीरियस रहा कर। और बता...तेरी बसंती का क्या हाल है?'

‘भाग गई...अपने पुराने यार के साथ।' अमित ने मुंह बनाकर कहने के साथ वेटर को पास आने का इशारा किया।

‘तो तू रोया नहीं ...देवदास नहीं बना...पारो की याद में गली—गली नहीं भटका? तुझे तो अब तक रेगिस्तान की ओर निकल जाना चाहिए था। बेटा! जब तक शहीद नहीं होगा, तब तक तेरा नाम अमर नहीं होगा। अमर होना है, तो पहले मर।' शिवाकांत ने इधर उधर देखते हुए कहा।

‘मर जाता, तो आपको प्रेस क्लब में दारू कौन पिलाता? और फिर... रोने से वह लौट आती क्या? वह जमाना गया, जब लोग मजनूं हो जाया करते थे, देवदास, हीर, फरहाद हो जाते थे। अब तो ‘रात गई, बात गई' वाला फार्मूला ही हिट और फिट है, दोस्त।' कहते हुए अमित ने ठहाका लगाया। उसने शिवाकांत से पूछा, ‘क्या पियोगे गुरु...व्हिस्की या बियर?'

‘यार...मैं कभी कभार पीता हूं। लखनऊ में तुम्हारे साथ एक बार पी क्या ली, तुमने मुझे शराबी ही समझ लिया। यार कितनी बार बताउं+, मैं पियक्कड़ नहीं हूं। अभी कल ही संपादक के साथ पीने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।'

शिवाकांत ने वेटर से कहा, ‘जाओ...मेरे लिए एक गिलास पानी और खाने को कुछ पकौड़ियां, कटलेट्‌स वगैरह ले आओ। ...जो जहर यह पीना चाहे, वह ला दो।'

अमित ने दो पैग व्हिस्की मंगाई। वेटर के जाने के बाद बोला, ‘तो क्या चंडूखाने में रामचरित मानस का पाठ करने आए थे आधी रात को? और सुना...कैसी चल रही है तेरी नौकरी? सुना है, तेरे चैनल में कोई लफड़ा चल रहा है? कोई अलखराम झा चैनल हेड बनकर आ रहे हैं? वर्तमान चैनल हेड का क्या होगा?'

‘छोड़ न यह सब...मुझे तो अब इन बातों से ऊब होने लगी है। दिन—रात, चौबीस घंटे सिर्फ पॉलिटिक्स...खबरों के कंटेंट पर कोई बात ही नहीं करता। हर आदमी या तो सेटिंग करने में मशगूल है या फिर किसी का पत्ता काटने में। पार्टियों में भी इतनी राजनीति नहीं होती होगी, जितनी राजनीति अखबार के दफ्तरों में होने लगी है। बीस—बाइस साल से गांड घिस रहा हूं, अभी तक तीस—बत्तीस हजार से ऊपर नहीं पहुंचा हूं। कल के लौंडे आते ही चालीस—पचास मांगते हैं। पूछो, पत्राकारिता में क्यों आना चाहते हो? तो बोलेंगे, कहीं नौकरी नहीं मिली, तो सोचा, पत्राकारिता ही कर लूं। पत्राकारिता न हुई किसी गरीब की जोरू हो गई। जिसे देखो, वही मुंह उठाए चला आता है। मैं तो आजिज आ गया हूं यार...इन सबसे। किसी दिन सनक सवार हुई, तो सब कुछ छोड़—छाड़कर गांव लौट जाउं+गा। वहीं कोई परचून की दुकान खोलूंगा। कम से कम चैन की नींद तो सोउं+गा।'

शिवाकांत के भीतर का ज्वालामुखी रिसने लगा। उसके भीतर गर्म लावा था, धुआं था, राख थी, क्या था? उसे नहीं मालूम। बस उसे लगता था, कुछ है जो पिछले काफी दिनों से खदबदा रहा है। फूटने को आतुर हो रहा है। अगर यह आग फूटकर बाहर नहीं निकली, तो उसे जलाकर खाक कर देगी। वह झुलस रहा है उस आग में। उसके भीतर एक बेचैनी है, जो उसके दिमाग को शांत रहने ही नहीं देती। ऐसा क्यों है, यह उसकी समझ में नहीं आता। वह कई बार उस सूत्रा को पकड़ने की कोशिश कर चुका है। जब कुछ समझ में नहीं आता, तो वह वैसे ही चलने देता है, जैसा चल रहा होता है। ठीक नदी में बह रहे अवलंबहीन पत्ते की तरह, जिसका न कोई लक्ष्य होता है, न ठिकाना। लहर जिधर ले जाए, वही उसका लक्ष्य, वही गंतव्य। कुछ दिनों से उसे अपने बच्चों की याद भी बहुत आ रही थी।

तीन महीने पहले लखनऊ गया था। छठे दिन जब वह अपना सामान पैक करने लगा, तो अंकिता ने कहा था, ‘पापा! आप इतने दिन बाद क्यों आते हैं? सबके पापा तो रोज शाम को घर आ जाते हैं। आप क्यों नहीं आते?'

बेटे अभिनव ने रूठकर कहा था, ‘अंकिता...अब पापा गंदे हो गए हैं। हम उनसे नहीं बोलेंगे। ...कुट्टी...कुट्टी...कुट्टी।' इतना कहकर अभिनव दूसरे कमरे में चला गया था। फोन करने पर बेटा बात करने को ही तैयार नहीं होता। किसी तरह माधवी उसे समझा—बुझाकर बात कराती है। दस—ग्यारह महीने में बच्चे भी कुछ ज्यादा ही जिद्दी हो गए हैं। माधवी भी बेचारी करे, तो क्या? वह भी ज्यादा समय नहीं दे पाती। मां और बाप दोनों का फर्ज अदा करना, किसी औरत के लिए कितना कठिन होता है, इसका एहसास उसे है।

‘ओए...तू तो कहीं खो गया। चल उठा अपना पैग और बोल चियर्स।' दोनों ने जाम टकराए और पीने लगे।

‘यार...तूने कुछ बताया नहीं ...तेरे यहां क्या उठापटक चल रही है?'

‘क्या बताउं+ यार! मेरे संस्थान का तो हाल ही गजब है। चाहे चैनल हो...या अखबार...सब जगह जाल, जंजाल और घटिया राजनीति...बिल्कुल कूड़ेदान बना रखा है संस्थान को। जिसका पैसा लग रहा है, वह वहां आगरा में बैठा बांसुरी बजा रहा है। उस बांसुरी की तान पर यहां सब लोग नाच रहे हैं। चैनल में कई गुट हैं। सबके पास अपने सही और दूसरों के गलत होने के तर्क हैं। हमारे अखबार को ही लो, तीन—तीन गुट हैं। एक दत्ता का, एक चौरसिया का और एक ऐसे लोगों का जो किसी गुट में नहीं हैं। निर्गुट

...निर्गुट कहकर इन लोगों ने अपना एक अलग गुट बना लिया है। समझ में नहीं आता, ऐसी स्थिति में हंसूं या रोउं+। चैनल और अखबार को एकता कपूर का सीरियल बना दिया है लोगों ने। पता ही नहीं चलता कि कब कौन किससे खफा है? कब, किसकी किससे दोस्ती हो गई है।'

‘सुना है...चैनल को सुधारने के लिए कोई दूसरा आ रहा है?'

‘मुझे पता नहीं ...इन पचड़ों में पड़ने की कोई इच्छा भी नहीं है। जब तक कोई ‘जी' पर लात मारकर नौकरी से निकाल न दे, तब तक नौकरी बजाते जाओ। हां...सुनने में तो आ रहा है कि कोई झा आ रहे हैं। भगवान जाने...झा जी आकर क्या उखाड़ लेंगे। वे भी आएंगे, नौकरी बजाएंगे। कुछ दिन हाय—तौबा मचेगी और फिर चैनल अपने पुराने ढर्रे पर चलने लगेगा। कुछ बदलाव भी होगा, इसकी कोई संभावना दूर—दूर तक नजर नहीं आती। जब तक ऊपर से लेकर नीचे तक का सिस्टम बदला नहीं जाता।'

अमित ठहाका लगाकर हंसा, ‘यार मंडी हाउस पर कल पत्राकारों में बतकूचन हो रही थी। दत्ता और चौरसिया ने मिलकर काफी माल बनाया है? दत्ता और चौरसिया लोगों के सामने भले ही लड़ते हों, एक दूसरे को गालियां देते हों, नीचा दिखाने की कोशिश करते हों, ये सब सिर्फ नूराकुश्ती है। दिखावे का टंटा है। दोनों सुबह—शाम मोबाइल पर बतियाते हैं। कंपनी को चूना लगाकर कमाई गई रकम का आपस में बंटवारा करते हैं। फोन पर ही दोनों सब कुछ सेट कर लेते हैं। कुछ लोग ने यह बात तुम्हारे मैनेजमेंट को भी बता दी है।'

शिवाकांत ने झल्लाते हुए कहा, ‘बताते रहें मेरी बला से। यार! मैं तो आजिज आ गया हूं। मेरा काम करने का मन नहीं होता। जानते हो, कल संपादक चौरसिया के घर गया था। उनके बुलाने पर गया था। दारू पार्टी चल रही थी। लगे लंतरानी हांकने। मैं ऐसा कर सकता हूं, मैं वैसा कर सकता हूं। मैं मुख्यमंत्राी को डांट देता हूं, तो उनकी पैंट गीली हो जाती है। यार! सुनने की भी कोई हद होती है। मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ। मैंने नशे में कुछ उल्टा—सीधा बोल दिया। तब से जनाब उखड़े—उखड़े से हैं। उखड़े हैं, तो उखड़े रहें मेरी बला से।'

‘अरे हां...याद आया। तुम्हारे यहां कोई कुकांत या सुकांत अस्थाना है...उसका क्या लफड़ा है? सुना है किसी लड़की ने यौन शोषण का आरोप लगाया है?'

‘अबे यह बता! तू पत्राकार है या जासूस? सीआईडी सीरियल का दया तो नहीं है? तेरे पास ऐसी खबरें आती कहां से हैं?'

‘शिवाकांत! बता न यार...मामला क्या है?'

‘हां, किसी लड़की से अस्थाना का लफड़ा तो है। न्यूज रूम में एक दिन सुकांत अस्थाना के सामने ही बात हो रही थी। अस्थाना तो उस लड़की को चालू बताता है। भगवान जाने सच क्या है? लड़की ने मैनेजमेंट और दोनों महान संपादकों को चिट्ठी भेजी है। देखो...मैनेजमेंट क्या फैसला लेता है। वैसे चौरसिया मामले को हवा देने की फिराक में हैं...उनका वश चले, तो कुछ लोगों का पत्ता ही साफ करा दें।' शिवाकांत ने कुछ खोए—खोए से अंदाज में कहा।

‘पर यह बता...तू किसको अच्छा समझता है? पत्राकारिता के लिहाज से कौन बेहतर है? वैसे कुछ—कुछ दत्ता के बारे में भी सुना है, लेकिन ये तुम्हारे चौरसिया अब तक कौन—सा पहाड़ ढकेलते रहे हैं, नहीं मालूम। मीडिया जगत का कोई परिचित नाम भी नहीं है।'

‘छोड़ यार...मैं तो आया था, थोड़ी देर इस हल्ले—गुल्ले में बैठूंगा। कुछ खा—पीकर सो रहूंगा। तुम भी कहां की बात ले बैठे। अगर चाहते हो, चला जाउं+, तो ऐसा बोलो।'

‘नहीं यार...बता तो...दरअसल...कल शाम को मंडी हाउस में दत्ता जी मिले थे? वे सुकांत की बड़ी बुराई कर रहे थे? शायद वे उसे हटाने के चक्कर में हैं। आप तो वहीं काम करते हैं, असलियत क्या है? आपको मालूम ही होगा। मैं जानना यह चाहता हूं कि दोनों में ठन क्यों गई?'

‘जहां तक मैं समझता हूं, दोनों के स्वार्थ टकरा रहे हैं। सुनने में आया है, लड़की को दत्ता ने ही कंप्लेंट करने की सलाह दी थी। अस्थाना के पास उनकी कोई क्लिपिंग है? वह उसी के बल पर आए दिन पैसा बढ़ाने की मांग करता रहता है। सुनने में तो यह भी आया है...अस्थाना और कुछ अन्य लोगों को उन्होंने यह आश्वासन दिया था कि जल्दी ही वे पुराने स्टॉफ को भगा देंगे, तब तुम लोगों की तनख्वाह बढ़ा दी जाएगी। ऐसा नहीं हो पाया। अब ये लोग दत्ता के लिए भस्मासुर बन गए हैं। यह बताओ...तुम जानना क्यों चाहते हो यह सब? तुम्हें सिर्फ गॉसिप के लिए स्टोरी चाहिए या फिर कोई दूसरी बात है?'

अमित मुस्कुराया। उसने पैग उठाकर सिप किया और कहा, ‘बात दरअसल यह है, दत्ता जी ने मुझे पृथ्वी एक्सप्रेस में नौकरी ऑफर की है। मैं समझ—बूझकर वहां जाना चाहता हूं। पहले यह बताओ, अखबार की फाइनेंसियल पोजीशन क्या है? दत्ता या चौरसिया में से बेहतर कौन है? कहीं दत्ता के कहने पर ज्वाइन करना घाटे का सौदा तो नहीं साबित होगा? अब अगर ज्वाइन करना है, तो पूछताछ जरूरी हो जाता है न! मान लो, दो—चार हजार रुपये की खातिर जमी—जमाई नौकरी को लात मार दूं, बाद में पृथ्वी एक्सप्रेस से भी लतिया दिया जाउं+, तो अच्छा नहीं होगा न।'

‘सच पूछो, तो दोनों बेकार हैं। मेरी नजर में तो दोनों खचड़े हैं। किसी काम के नहीं। दोनों को सिर्फ कंधा चाहिए बंदूक चलाने के लिए। यही काम अन्य अखबारों में भी हो रहा है। मेरी सलाह मानो, तो जहां हो, वहीं रहो। वहां अगर कोई दिक्कत न हो, तो...। नहीं तो, एक नर्क से निकलकर दूसरे नर्क में फंसेगा। इससे ज्यादा कुछ नहीं होगा।' इतना कहकर शिवाकांत उठ खड़ा हुआ। उसने अमित से कहा, ‘मैं चलता हूं। तू बैठकर महफिल जमा...जब तक तीन—चार बोतल तेरे पेट में नहीं जाएगी, तू यहां से उठने वाला नहीं है।'

‘नहीं...अब पियूंगा नहीं। मुझे किसी का इंतजार है।'

‘कोई नई कबूतरी है क्या? तू साले सुधर जा...नहीं तो किसी दिन कोई तुझे गोली मार देगा या कोई जहर पिला देगा/देगी। अभी समय है सुधरने का। नहीं तो एक दिन पछताएगा। तुझे लखनऊ का पत्राकार परितोष याद है न! वह भी तुम्हारी तरह सबके फटे पायजामे में टांग अड़ाता घूमता था। लड़कियों के पीछे तो पागल था। लड़कियां भी उसके पीछे दीवानी बनी घूमती थीं। क्या हुआ? एक दिन किसी ने ठोक दिया दो गोली सीने में। राम नाम सत्य हो गया। किसी दिन तेरा भी यही हाल होने वाला है। बच्चू...सुधर जाओ, वरना किसी दिन तेरी आत्मा नर्क में मेरी बात पर विचार करती हुई अफसोस करेगी, शिवाकांत सही कहता था। अगर उसकी बात मान लेता तो...?'

अमित ने उसकी ओर देखकर दार्इं आंख दबाई और हाथ उठाकर बॉय किया।

पृथ्वी एक्सप्रेस के दफ्तर में काफी गहमागहमी थी। न्यूज रूम से लेकर बाहर चाय की दुकानों में बैठे पत्राकार कानाफूसी की मुद्रा में बातें कर रहे थे। पूछने पर कोई किसी से खुलकर नहीं बोलता था। सुबह सिटी रिपोर्टरों की मीटिंग के बाद बिहार में भाजपा और जदयू नेताओं की राजनीतिक उठापटक तेज होती देख संपादक रवींद्र चौरसिया ने एक विशेष पैकेज तैयार करने का निर्देश पटना संवाददाता शशिधर पांडेय, राजनीति संपादक निखिलेश निखिल और फीचर डेस्क के संजीव चौहान को दिया था। वे चाहते थे, संपादकीय पेज के बगल वाला पेज बिहार राजनीति पर केंद्रित हो। प्रधान संपादक शुभ्रांशु दत्ता तो उस समय मान गए थे। जैसे ही बिहार पैकेज की बात फाइनल करके चौरसिया, निखिल और संजीव चौहान बाहर आए, दत्ता ने पटना फोन लगाया। पटना के संवाददाता शशिधर पांडेय से उन्होंने कहा कि बिहार भाजपा और जदयू के बिगड़ते रिश्तों पर पैकेज देने से ज्यादा महत्वपूर्ण राज्य में हो रही हत्याएं हैं। पिछले दो—चार महीनों में कई पार्टियों के प्रमुख पदाधिकारियों की रंगदारी वसूलने के विवाद में हत्याएं हो चुकी हैं। पहले इस पर खोजपरक रिपोर्ट भेजो। अगर चौरसिया तुमसे भाजपा—जदयू रिश्तों पर मैटर भेजने को कहें, तो मना मत करना, लेकिन टाल जरूर देना। हां, अगले महीने इंक्रीमेंट होने वाले हैं, सोचता हूं, तुम्हें दो इंक्रीमेंट दे ही दूं। तुम हो ही इसके हकदार।

शाम को चार बजे जब चौरसिया ने भाजपा—जदयू रिश्तों पर पैकेज नहीं मिलने की बात शशिधर से कही, तो उसने झल्लाते हुए सब कुछ उगल दिया। उसने कहा कि पहले आप लोग वहीं यह तय कर लें कि कौन—सी स्टोरी पहले भेजनी है, कौन—सी बाद में। आपने सुबह कहा, भाजपा—जदयू पर स्टोरी भेजो। थोड़ी देर बात दत्ता जी ने फोन करके कहा, पहले रंगदारी को लेकर हो रही हत्याओं पर पैकेज भेजो। आप लोग वहीं तय करके फाइनली बता दें, मुझे कौन सी स्टोरी भेजनी है, मैं भेज दूंगा।

यह सुनते ही चौरसिया सुलग उठे। फोन रखकर वे सीधा दत्ता के पास पहुंचे और बहस पहले धीमे स्वर में, बाद में बहस ‘तू—तू, मैं—मैं' में बदली और फिर दोनों चीख—चीखकर एक दूसरे की बखिया उधेड़ने लगे। यह तमाशा पंद्रह मिनट तक चला। सारा स्टाफ किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रहा। बाद में कुछ लोगों ने दोनों को समझा—बुझाकर शांत कराया। तभी से दफ्तर का माहौल गर्म है। दत्ता और चौरसिया समर्थकों में खिंची अघोषित विभाजक रेखा किसी को भी दिखाई दे रही थी। लोग ठीक उसी तरह लामबंद हो रहे थे, जैसे दो दशक पहले तक, जब सोवियत गणराज्य का विघटन नहीं हुआ था, बाजार के बंटवारे को लेकर पूरी दुनिया अमेरिका और रूस समर्थक देशों में विभाजित होती जा रही थी। अस्सी के दशक में तो ऐसा लग रहा था कि तीसरा विश्व महायुद्ध बस सन्निकट है। रूस और अमेरिका विकसित और विकासशील देशों को अपने पाले में करने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की रणनीति अपना रहे थे। पृथ्वी एक्सप्रेस में जो लोग अभी तक दत्ता या चौरसिया पाले में जाने से बच गए थे, उन्हें समझा—बुझाकर अपने पाले में करने की कोशिश की जा रही थी। ना—नुकुर करने पर प्रकारांतर से देख लेने की धमकियां दी जा रही थीं। कुछ लोग ऐसे भी थे, जो इधर भी थे, उधर भी। इधर की खबरें उधर पहुंचा रहे थे, उधर की खबरें इधर। वास्तव में ये किसकी तरफ थे, शायद यह बात उन्हें खुद पता नहीं थी। वे बस मौके का फायदा उठाने की सोच रहे थे।

नमो नारायण ने शाम आठ बजे शिवाकांत से कहा, ‘भाई साहब...आकृति की खबर बॉटम में लूं या अनुराग भारती की?'

‘शाम की मीटिंग में तय क्या हुआ था?'

शिवाकांत थोड़ी देर से ऑफिस आया था। ‘महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध और निवारण' विषय पर एक एनजीओ द्वारा आयोजित सेमिनार में उसे बोलना था, इसलिए वह देर से आया था। कांस्टीट्यूशनल क्लब से निकलते—निकलते ही उसे देर हो गई थी। शाम की मीटिंग में वह नहीं रहेगा, इसकी सूचना उसने दत्ता और चौरसिया दोनों को दे दी थी।

‘भाई साहब...तय तो अनुराग भारती की स्टोरी हुई थी, लेकिन चौरसिया जी अभी आए थे। कह रहे थे, आकृति की स्टोरी बॉटम में लेना। अब मैं दुविधा में हूं, कौन—सी लूं और कौन—सी दूसरे पेजों के लिए दे दूं या रोक दूं?' नमो नारायण ने अपनी गुद्दी पर खुजाते हुए कहा।

‘दोनों की स्टोरियों में है क्या? किस मुद्दे पर हैं?'

‘आकृति की स्टोरी बांग्लादेशी घुसपैठियों से संबंधित है। वह पिछले कई दिन से इस स्टोरी में लगी हुई थी। उसने कुछ ऐसे बांग्लादेशियों से बात की है, जो कई साल पहले अवैध रूप से बॉर्डर पार कर भारत आ गए थे। विभिन्न जगहों पर रहते हुए अब दिल्ली में आ बसे हैं। अब तो उनके नाम राशन कार्ड हैं, वोटर आईडी कार्ड हैं, बैंक एकाउंट हैं। कहने का मतलब अब वे सरकारी कागजों की बदौलत भारत के नागरिक बन चुके हैं।'

‘और दूसरी स्टोरी...?'

‘उत्तर प्रदेश के एक बहुत बड़े खनन माफिया के बेटे की रंगीनियों पर स्टोरी है। दरअसल, आज खनन माफिया का बेटा गाजियाबाद के एक मॉल में किसी लड़की से छेड़छाड़ के आरोप में पकड़ा गया है। वैसे तो यह खबर प्रतिस्पर्धी अखबारों में भी छपेगी। लेकिन अनुराग का कहना है कि कुछ फैक्ट्‌स उसकी स्टोरी में ऐसे हैं, जो दूसरों के पास नहीं हैं। वे कल हमारा अखबार देखकर फॉलोअप करेंगे। न्यूज तो पहले पेज पर ही जा रही है, यह साइड स्टोरी मैं बॉटम में लेना चाह रहा हूं।' नमो नारायण ने दोनों खबरों का प्रिंट आउट मेज पर रखते हुए कहा।

‘तुम्हें क्या लगता है? किसकी स्टोरी बॉटम में जानी चाहिए?' शिवाकांत ने पूछा।

‘सर...मेरे हिसाब से अनुराग की स्टोरी बॉटम में जानी चाहिए। मामला भले ही खनन माफिया के बेटे का हो, लेकिन आकृति की स्टोरी के मुकाबले रीडेबुल ज्यादा है। कल के सभी अखबारों में यह खबर तानकर छापी जाएगी। और फिर सर...आकृति सिन्हा की स्टोरी कल भी जा सकती है। अपनी एक्सक्लूसिव स्टोरी है। इसे कभी छापा जा सकता है। कई बार ऐसा भी होता है, जब बॉटम स्टोरी नहीं होती। तब के लिए सुरक्षित रखी जा सकती है।'

‘जब इतना समझते हो, तो फिर क्यों परेशान हो? जाओ... अनुराग भारती की स्टोरी लगा दो।' शिवाकांत ने मुस्कुराते हुए कहा।

‘लेकिन अगर चौरसिया जी अड़ गए, तो? आज शाम चार बजे के आसपास जो हुआ है, उसके बारे में आप तो जानते ही होंगे। और फिर...उस दिन की घटना के बाद से चौरसिया साहब खार खाए हुए हैं। मुझे लगता है, वे मौके की तलाश में हैं।' नमो नारायण ने आशंका जाहिर की।

‘तो अखबार का भाग्य जाने, प्रधान संपादक और संपादक जी जानें। इसमें कोई क्या कर सकता है।' शिवाकांत ने कलम नचाते हुए कहा, ‘फिर तुम वही करना, जो तुम्हें उचित लगे। ऐसा न कर पाओ, तो अपने सीनियर का कहा कर लो।'

उस दिन के डाक एडीशन में नमो नारायण ने अनुराग भारती की स्टोरी बॉटम में लगाई। जैसे ही डाक एडीशन छपकर आया, चौरसिया तो नमो नारायण पर चढ़ दौड़े, ‘तुमसे कहा था, आकृति की स्टोरी लगाना। तुमने लगाई क्यों नहीं?'

नमो नारायण की तमाम दलीलों को दर किनार करते हुए चौरसिया ने उसे जली—कटी सुनाते रहे। उन्होंने यहां तक कहा कि मैं नहीं मानता मीटिंग—फींटिंग के फैसले को। मैं जो कुछ भी कहूं, उसे जो नहीं करेगा, मैं उससे निपट लूंगा। मैं कोई पागल हूं क्या? जो बकता रहता हूं।'

उन्होंने खुद कंप्यूटर के सामने बैठकर अनुराग की स्टोरी अगले एडीशन से अंदर के पेजों पर और आकृति की स्टोरी पहले पेज पर लगवाई। इसके चलते न आकृति की स्टोरी को बेहतर ट्रीटमेंट मिल सका, न अनुराग की स्टोरी को। चौरसिया के लौट जाने के बाद नमो नारायण अपनी व्यथा—कथा लेकर प्रधान संपादक दत्ता के पास गया। उन्होंने आश्वासन तो दिया, लेकिन किया कुछ नहीं। वे भी शायद चौरसिया से अब सीधी लड़ाई नहीं लड़ना चाहते थे। शाम को हुई भिड़ंत ही उनकी समझ से ज्यादा हो गई थी। दांव उलटा पड़ जाने से दत्ता भी मामले को रफा—दफा करने के मूड में थे। चौरसिया से बातचीत का उनका लहजा भी मधुर हो गया था। चौरसिया भी समझ गए कि यदि उन्होंने मामले को ज्यादा तूल दिया, तो नुकसान हो सकता है। लेकिन दोनों का अहम बीच—बीच में रह—रहकर फुंफकार छोड़ता, तो वे एक दूसरे को औकात बताने से भी नहीं चूकते। वैसे इस घटना से पहले भी, जब कहीं चौरसिया और दत्ता एक साथ होते, तो दोनों इस तरह घुल—मिलकर बतियाते कि लोग अचंभे में आ जाते। तब उनकी बातों से कतई नहीं लगता कि वे एक दूसरे के धुर विरोधी हैं।

अगले दिन सुबह रिपोर्टर्स की मीटिंग में आकृति और अनुराग दोनों ने आपत्ति जताई। संयोगवश उस दिन की मीटिंग में प्रधान संपादक शुभ्रांशु दत्ता नहीं आए थे। वे अखबार के ही काम से बरेली गए हुए थे।

सुबह साढ़े दस बजे होने वाली मीटिंग में नमो नारायण भी अक्सर शरीक होता था। सिटी ऑफिस उसके घर के पास ही था। वह सुबह उठकर चाय पीने और अखबार पढ़ने के बाद सिटी ऑफिस पहुंच जाता था। सिटी ऑफिस आने के पीछे छिपे कारण को कोई नहीं जानता था, सिवा एक के। वह थी आकृति सिन्हा। गोल मटोल चेहरा, पतली कमर, नुकीली नाक पर चमकता लौंग, विकसित यौवनांग और गोरे शरीर की मालकिन आकृति जब मुस्कुराती, तो नमो नारायण को लगता कि कहीं टेसू के फूल खिल गए हैं। वह उस पर मोहित था। आकृति भी नमो नारायण पर सौ जान से फिदा थी। पृथ्वी एक्सप्रेस में आने के बाद दोनों की शुरू हुई दोस्ती अब कुछ दूसरा ही कोलाज रचने लगी थी। मीटिंग खत्म होने के बाद एसाइमेंट लेकर आकृति सिटी ऑफिस से निकल जाती। उसके बाद नमो नारायण एक पल भी ऑफिस में नहीं ठहरता। जब वह अपने कमरे पर पहुंचता, तब तक आकृति आ चुकी होती थी, या फिर आने वाली होती। वह जान—बूझकर थोड़ी देर करती थी। कमरे में आने के बाद आकृति पहले तो उसे प्यार भरी नजरों से देखती और फिर दौड़कर गले लग जाती। इसके बाद घंटे—दो घंटे दोनों एक दूसरे की देह जीते, आवेग और वासना से लथपथ दो शरीर काम युद्धरत हो जाते। न आकृति को अपराध बोध होता, न नमो नारायण को कुछ भी अनैतिक लगता। हालांकि, वाराणसी में दो साल पहले व्याह कर लाई गई नमिता पति नमो नारायण के इंतजार में सास—ससुर और ननद की सेवा सुश्रुषा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती थी। दो—तीन महीने में हफ्ते—दस दिन के लिए पति का संसर्ग पाकर अपने को धन्य मान लेने वाली नमिता को पति की उच्छृंखलता और विवाहेत्तर संबंधों की भनक तक नहीं थी। नमो नारायण के विवाहित होने की बात आकृति जानती थी, लेकिन उस पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।

आकृति ने मीटिंग शुरू हो, इससे पहले ही संपादक चौरसिया से कहा, ‘सर...एक बात मेरी समझ में नहीं आई? अगर मेरी स्टोरी को डाक संस्करण के बाद ही देना था, तो बेहतर होता डाक संस्करण में भी लगा दिया जाता। कम से कम अनुराग की स्टोरी तो नहीं पिटती। पहले संस्करण में लगाकर बाद के संस्करण में अंदर देने का कोई तुक समझ में नहीं आया।'

‘यह सब तुम लोग दत्ता से पूछो। मैं तो दोनों स्टोरीज को एक—एक करके लगाने के पक्ष में था। पहले एडीशन में अनुराग की और बाद के एडीशनों में आकृति की स्टोरी लगवाकर दत्ता ने दोनों का सत्यानाश कर दिया। मैंने तो कहा था, आज आकृति की स्टोरी लगा दो। कल अनुराग की लगा देना, ताकि दोनों हाईलाइट हो सकें। नहीं ...दत्ता को अनुराग की स्टोरी ज्यादा महत्वपूर्ण लगी, तो मैंने भी जिद पकड़ ली। मैं तुमसे कम जिद्दी नहीं हूं? मुझे नीचा दिखाने का प्रयास करोगे, तो भुगतोगे।'

संपादक चौरसिया की बात सुनकर नमो नारायण अवाक रह गया। किस तरह गिरगिट की तरह रंग बदल रहे थे चौरसिया जी। एक तो उन्होंने ही जिद करके आकृति की स्टोरी लगवाई और अब ठीकरा दत्ता के सिर पर फोड़ा जा रहा है। वह भी तब, जब जवाब देने के लिए दत्ता मौजूद नहीं हैं। इतनी चिरकुटई पर वह क्षुब्ध हो गया। मन तो हुआ कि वह सबके सामने चौरसिया की कलई खोल दे। बता दे लोगों को कि सच्चाई क्या है? लेकिन फिर उसने चुप रहना ही उचित समझा। वैसे भी दारू पार्टी में मुंह खोलकर पछता रहा था। वह कोस रहा था उस घड़ी को, जब वह दारू पीने जाने की बात पर सहमत हुआ था। उसकी इच्छा भी नहीं थी, लेकिन जब निखिल और संपादक जी ने जोर दिया, तो वह मान गया था।

अनुराग भारती ने रोष भरे स्वर में कहा, ‘लेकिन इसमें हम दोनों का क्या दोष था? इतनी मेहनत करके हम दोनों ने स्टोरियां लिखी थीं। हमारी मेहनत तो बेकार हो गई। न तो मुझे संतोष मिला, न आकृति को। आप दोनों लोगों की लड़ाई में हमारी स्टोरियां पिट गर्इं।'

‘देखो...तुम अपनी बात करो। बहुत ज्यादा नेता बनने की कोशिश न करो। और अगर ज्यादा खुजाल हो, तो दत्ता से जाकर पूछो।' चौरसिया ने अनुराग भारती को डपट दिया। चौरसिया की बात पर अनुराग सिटपिटा गया। सिटपिटाया हुआ अनुराग इधर उधर देखने लगा। वहां मौजूद कुछ रिपोर्टरों को भी संपादक का यह रवैया नागवार गुजरा। कुछ रिपोर्टर तो उठकर बाहर चले गए। इससे मीटिंग का माहौल बदल गया। संपादक चौरसिया ने जल्दी—जल्दी महत्वपूर्ण खबरों के बारे में चर्चा की और चलते बने। सिटी इंचार्ज देवराज यादव ने सबके एसाइनमेंट तय किए और ऑफिस से बाहर निकल आया।

‘यार...यह क्या हो रहा है?' पूरी मीटिंग के दौरान चुप रहने वाले नमो नारायण के मुंह से बोल फूटे, ‘कल मीटिंग में सबने मिलकर फैसला लिया था, अनुराग भारती की स्टोरी आज जाएगी...और आकृति की कल। शाम आठ बजे जब मैं पहली डाक छोड़ने की तैयारी में था, तो चौरसिया जी आए और पूछा, कौन—कौन सी खबरें पहले पेज पर जा रही हैं। मैंने उन्हें बताया। हालांकि मीटिंग में वे भी थे। उन्हीं के सामने सारी चीजें तय हुई थीं। फिर भी उन्होंने पूछा, तो मैंने बताया। फिर कहने लगे, बॉटम पर अनुराग की स्टोरी क्यों ले रहे हो, आकृति की क्यों नहीं? मैंने कहा, जब मीटिंग में तय हो चुका है, तो मैं कैसे मना कर सकता हूं। कहने लगे, आकृति की स्टोरी लगाओ। मैंने शिवाकांत सर से बात की, तो उन्होंने कहा, जो उचित हो वही करो। आकृति...माफ करना...तुम्हारी स्टोरी आज भी जा सकती थी, लेकिन पता नहीं क्यों...चौरसिया सर ने तुम्हारी स्टोरी पर जोर दिया।'

‘असल में संपादक जी आकृति के कंधे पर बंदूक रखकर निशाना साधना चाहते हैं। वे चाहते हैं, जिस तरह सुकांत अस्थाना की फाइल निपटाई गई है, उसी तरह दत्ता की फाइल निपट जाती, तो अच्छा था। वे आकृति को आगे करके ऐसा ही प्रयास करना चाहते हैं।' दिल्ली नगर निगम बीट देखने वाले अश्विनी परिहार ने पान चबाते हुए कहा।

पृथ्वी एक्सप्रेस में अश्विनी को दत्ता का तरफदार माना जाता है। वह संपादक के हर काम में मीन—मेख निकालने की कोशिश में ही रहता है। संपादक से उसकी कई बार ‘तू—तू मैं—मैं' भी हो चुकी है।

‘हां यार! यह सुकांत वाला क्या मामला है? सुना है, सुकांत बर्खास्त कर दिया गया। किसी लड़की से उसका लफड़ा था।' परिवेश तिवारी ने मुस्कुराते हुए कहा।

‘सुकांत को तो निपटा दिया गया...हुआ क्या कि एक दिन संपादक जी कहीं किसी मित्रा के पास बैठे थे। उनके मित्रा का मित्रा सुमंत राठौर वहां आ गया। संपादक जी का परिचय जब उनके मित्रा ने अपने मित्रा से कराया, तो उसने कहा कि आपके यहां कोई अस्थाना काम करता है? संपादक जी ने कहा, हां... क्यों? तब उस मित्रा ने कहा, मेरे एक परिचित की लड़की को इस अस्थाना ने बरबाद कर दिया है। अब वह उस लड़की से शादी करने से इनकार कर रहा है।' अश्विनी वहां मौजूद लोगों को ऐसे बता रहा था, मानो जब संपादक जी सुमंत राठौर से मिल रहे थे, तो वह देख रहा था। या फिर संजय की तरह दूर बैठा इस मीटिंग को अपने दिव्य चक्षु से देख रहा था।

‘संपादक जी ने सुमंत से कहा, तुम उस लड़की को लेकर किसी दिन दफ्तर पहुंच जाओ। वहां अस्थाना की कंप्लेन करवा दो। वैसे एक बात बताउं+...अस्थाना पहले से शादी शुदा है, तीन बच्चों का बाप है। वह तो आपके परिचित की लड़की के शरीर से खेल रहा है। मेरी मानो, तो पुलिस में भी चले जाओ। बाकी अगर तुम उस लड़की से कंप्लेन करवा दो, तो मैं कुछ कर सकता हूं। उस लड़की ने मैनेजमेंट और दोनों संपादकीय प्रभारियों, मतलब प्रधान संपादक और संपादक, को मेल भेजकर लिखित शिकायत की। संपादक ने उस मेल को आगे फॉरवर्ड कर दिया। फोन पर भी अस्थाना की बड़ी बुराइयां कीं। प्रधान संपादक दत्ता बार—बार अस्थाना को आश्वासन देते रहे, ‘निश्चिंत रहो। तुम्हारा बाल भी बांका नहीं होगा। किसी लड़की के शिकायत कर देने से क्या होता है? अगर तुम गलत नहीं हो, तो उसे साबित करना मुश्किल हो जाएगा। दरअसल, दत्ता भी अस्थाना से आजिज आ चुके थे, उसकी जायज—नाजायज मांगों से। इस मामले में वह चुप रहे और चौरसिया ने अस्थाना की भट्ठी बुझा दी। कल ही उसे बर्खास्त गिया गया है। आरोप भी जानते हो क्या लगाया गया? अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बदतमीजी करने का। उस लड़की के यौन शोषण की बात ही गोल कर दी गई।'

‘अरे यार...बड़ा हरामी निकला सुकांत...उसका तो बैंड बजना ही चाहिए था।' आकृति सिन्हा ने कलम को पैड पर चलाते हुए कहा।

‘बैंड तो तुम्हारा भी बजना चाहिए...और इन नमो नारायण महाराज का भी...। तुम दोनों जो रंगरेलियां मनाते हो, उसकी जानकारी है मुझे। आकृति...तुममें थोड़ी—सी भी हया और नैतिकता बाकी है कि नहीं? दूसरों को तो हरामी बताती हो और खुद क्या हो? जानती हो, तुम जैसी लड़कियों को क्या कहा जाता है...रंडी...।' मुंहफट शिवांगी बनर्जी बोल पड़ी। हंसती हुई आकृति सिन्हा के हाथ से कलम छूट गई। उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया।

‘नमो महाराज के तो दोनों हाथों में लड्डू हैं। यहां भोगने को आकृति है, तो गांव में एक अदद बीवी...जो अपनी देह को सारी दुनिया से लुकाए—छिपाए इनके इंतजार में दिन काटती है।' शिवांगी बोलती जा रही थी।

पृथ्वी एक्सप्रेस में ‘मानव बम' कही जाने वाली शिवांगी बनर्जी बोलते समय भूल जाती है कि क्या कहना उचित है, क्या अनुचित? जो मुंह में आया, सामने वाले के सिर पर दे मारा। सामने वाले का सिर फूटेगा या दांत टूटेंगे, यह उसके भाग्य पर निर्भर है। अपनी आदतों के चलते उसकी साथियों से नहीं निभती। अकसर झगड़ा और ‘तू तू—मैं मैं' तो आम बात है। आमतौर पर लोग उससे बातचीत या उलझने से बचते हैं। शिवांगी ही अकसर सींग उठाए भिड़ने को तैयार रहती है। एक दिन जब उसे किसी नेता का इंटरव्यू लेने को भेजा जा रहा था, तो वह सिटी इंचार्ज देवराज यादव से बोली, ‘सर...मुझे लगता है, इस देश के सभी पॉलिटीशियन चूतिए हैं।'

‘क्यों? तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?'

‘सर...ये पॉलिटीशियन जब देखो, तब बेसिर—पैर की बातें करते रहते हैं। इनकी बात का न कोई तुक होता है, न ताल। ये सारे देश से अलग ही ढपली बजाते फिरते हैं। भगवान जाने...ये जीतकर जब सरकार में जाते हैं, तो सरकार कैसे चलाते हैं? लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ऐसे—ऐसे जमूरे चुनकर आ जाते हैं कि अफसोस होता है। कि हमने भी इन्हीं में से किसी जमूरे, जोकर या अपराधी को वोट दिया था। कि देश के सिर पर जमूरा थोपने के अपराधी हम भी हैं।' शिवांगी बनर्जी की बात सुनकर देवराज चुप रह गया था, लेकिन वहां मौजूद ज्यादातर लोग हंस पड़े थे। हालांकि देवराज यादव का मन हुआ कि कहे, तुम इन नेताओं से कम हो क्या? जो आए दिन बेहूदा बातें करके पंगा खड़ा करती रहती हो। उसने सोचा, शिवांगी से कुछ बोलने का मतलब है, वितंडा खड़ा करना। काली और दुर्गा को युद्ध के लिए ललकारना। वह ऐसे ही आए दिन कोई न कोई बयान जारी करती रहती है। कई बार तो वह अपने साथियों के निजी जीवन की बातों लेकर बैठ जाती और तब तक बखिया उधेड़ती रहती, जब तक सामने वाला चला नहीं जाता या उससे भिड़ नहीं जाता। लोग कहते हैं कि जब तक शिवांगी किसी से एक

बार भिड़ नहीं लेती, तब तक उसका खाना नहीं पचता है। जिस दिन उसकी किसी से भिड़ंत नहीं होती है, उस दिन उसके पेट में हवा के बगूले उठते रहते हैं, पेट घुड़घुड़ करता रहता है।

बम फूटते ही सिटी ऑफिस में सन्नाटा छा गया। अपमान और क्रोध से आकृति चीख पड़ी थी। नमो नारायण की मुट्ठियां भिंच गई। वह क्रोध के वशीभूत होकर टहलने लगा।

आकृति चीखी, ‘क्या बकती है कुतिया...तू होगी रंडी...मेरे पर लांक्षन लगाया, तो ठीक नहीं होगा। तेरा थोबड़ा फोड़ दूंगी। तू अपने आप को समझती क्या है छिनाल? मैं तेरी शिकायत प्रधान संपादक और संपादक से करूंगी। कुतिया कहीं की... खुद बहत्तर जगह मुंह मारती फिरती है और दूसरों पर आरोप लगाती है?'

आकृति के चीखते ही ऑफिस में बैठे बचे—खुचे लोग बाहर निकल गए। ऑफिस में शिवांगी, आकृति और नमो नारायण ही रह गए। शिवांगी ने खिलखिलाते हुए कहा, ‘देखो

...ज्यादा बनो मत। मैंने तुम्हारी और नमो महाराज की रासलीला देखी है। परसों, ऑफिस के बाद मैं नमो महाराज के बगल वाले घर में गई थी। वहां मेरी सहेली मधुरिमा रहती है। तभी मैंने तुम्हें नमो महाराज के घर जाते हुए देखा। मैं भी उत्सुकता में पीछे लग गई। तुम दोनों शायद जल्दबाजी में डोर लॉक करना भूल गए थे या फिर हमेशा ऐसा ही करते थे। मैंने दरवाजे की झिर्री से तुम दोनों की पूरी रासलीला देखी। वैसे एक बात कहूं...रासलीला थी बहुत मजेदार...।' यह कहते हुए उसने अपनी दायीं आंख दबा दी।

आकृति कुछ कहती, इससे पहले ही नमो नारायण ने उसके सामने की कुर्सी घसीट कर बैठते हुए कहा, ‘तुझमें कुछ शर्म—हया है कि नहीं? हमारी इज्जत का फालूदा बनाकर तुझे क्या मिला? कोई तुझे वीरता पुरस्कार मिलने वाला तो है नहीं? तू अपने आपको समझती क्या है? तू रानी लक्ष्मी बाई है? रानी दुर्गावती है? काली है, दुर्गा है? बोल तू क्या है? अगर मुझे गुस्सा आ गया न! तो मैं तेरी वह गति करूंगा कि तू सोचकर पछताएगी? तू मुझे जानती नहीं है?'

‘और कुतिया...तू ही कौन—सी दूध की धुली है? बिना शादी किए उस मुल्ले के साथ रहती है...क्या मैं नहीं जानती हूं?' आकृति ने आगे बढ़कर शिवांगी का हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने का प्रयास किया।

शिवांगी ने अपनी ओर बढ़े आकृति के हाथ को झटकते हुए कहा, ‘तेरी तरह छिपकर तो नहीं करती हूं। और कुतिया...तो तू है? रंडी...मैं तो खुले आम वसीम के साथ लिव इन रिलेशन में रहती हूं। तेरी तरह सती—सावित्राी होने का पाखंड तो नहीं करती। और तुम दोनों मेरे मुंह लगो ही नहीं, वरना कुछ और अध्याय खोलूंगी। अभी तो ऑफिस में ही कहा है, सारी दिल्ली को घूम—घूम कर तुम दोनों की रासलीला बताउं+गी...।'

शिवांगी बनर्जी के इतना कहते ही आकृति ने लपककर उसकी चोटी पकड़ी और जमीन पर गिरा दिया। दोनों एक दूसरे से गुत्थमगुत्था हो गर्इं। शोर सुनकर रिपोर्टर्स और अन्य लोग भीतर आए। लोगों ने दोनों को बड़ी मुश्किल से छुड़ाया। दोनों के मुंह से गालियों का अज प्रवाह हो रहा था। दोनों की गालियां सुनकर कई बार तो वहां मौजूद लोग असहज हो गए। नमो नारायण ने इस घटना के गंभीर रूप ग्रहण करते ही समझ लिया, उसकी तो नौकरी गई। अभी चंद रोज पहले ही सुकांत अस्थाना को बर्खास्त किया गया था। हालांकि सुकांत और उसके मामले में फर्क इतना था कि सुकांत की शिकायत लड़की ने मैनेजमेंट से की थी, लेकिन यहां तो मामला ही उलटा है। यह दो लड़कियों की आपसी मारपीट का मामला है। संपादक चौरसिया से उसकी भिड़ंत हो ही चुकी है। वह उनके राडार पर चढ़ा हुआ है। जिस दिन वह निशाने पर आया, उसका जाना तय है। वह जान गया था, प्रधान संपादक और संपादक अब इस घटना को अपने—अपने नफा—नुकसान की तुला पर पहले तौलेंगे। फिर अपना पक्ष निर्धारित करेंगे। जिसका पलड़ा भारी होगा, वह अपने विरोधी को निबटाने और उसकी छवि खराब करने का भरपूर प्रयास करेगा।

और हुआ भी यही। दोनों रिपोर्टर्स की मारपीट का मामला जैसे ही दत्ता और चौरसिया के पास पहुंचा, दोनों सक्रिय हो गए। एक ने शिवांगी को थाने में एफआईआर दर्ज कराने की सलाह दी, तो दूसरे ने मैनेजमेंट से लिखित शिकायत करने की। दिल्ली के मीडिया जगत में इन दोनों की मारपीट और अवैध संबंधों के किस्से चटखारे लेकर कहे—सुने जाने लगे। संपादक चौरसिया ने आकृति का पक्ष लिया, तो दत्ता खुलेआम शिवांगी बनर्जी के पक्ष में तलवार भांजने लगे। दोनों ने सीएमडी भदौरिया को फोन और मेल करके मामले की जानकारी अपने—अपने हिसाब से दी। आकृति को चुपचाप काम करने की सलाह देते हुए चौरसिया ने कहा, ‘तुम निश्चिंत रहो...गलती शिवांगी की है। वही नापी जाएगी। मेरी सीएमडी साहब से सुबह बात हुई थी। मैंने सारी हकीकत बयां कर दी है। बस...आजकल में ही शिवांगी का टर्मिनेशन लेटर आने वाला है। सीएमडी साहब मेरी बहुत इज्जत करते हैं। मैंने कंपनी का बहुत भला किया है। कभी एक पैसे भी बेजा खर्च नहीं किया। दत्ता ने तो कंपनी को करोड़ों का चूना लगाया है। खुद लूटा है और अपने चमचों को भी लूटने का मौका दिया है। सीएमडी साहब तो दत्ता से इतने खफा हैं कि वे उन्हें हटाने की सोच रहे हैं। बस, तुम देखती जाओ... शिवांगी और दत्ता का बैंड कैसे बजता है। बहुत दिनों से ये दोनों मेरे राडार पर चढ़े हुए थे। मौका नहीं मिल रहा था...अब बताउं+गा बच्चू को कि सियासत क्या होती है? और कैसे की जाती है?'

आकृति पुलकित होकर सिटी ऑफिस चली गई।

वहीं दूसरी ओर दत्ता ने अपनी केबिन में बुलाकर शिवांगी को पहले पुचकारा। फिर बोले, ‘इतने दिन हो गए तुम्हें काम करते हुए...कभी मुझसे मिलने नहीं आई। जब आर्इं, तो खबर के सिलसिले में या फिर दूसरे मुद्दे को लेकर। अरे...दोपहर में मैं तो खाली ही रहता हूं। कभी आओ...हम दोनों पिक्चर देखने चलते हैं। आजकल कई बढ़िया फिल्में मल्टीप्लेक्सों में चल रही हैं। वैसे भी हम दोनों बंगाली हैं, आपस में मिलकर रहना चाहिए। इस साले चौरसिया की औकात जल्दी ही बताउं+गा। तुमने पहले क्यों नहीं बताया, नमो नारायण और आकृति के आपस में सेक्सुअल रिलेशन हैं। यह नमो नारायण भी घुटा हुआ निकला...दो—दो से मजे मार रहा था। अच्छा यह बताओ...तुम्हारा वसीम से कैसे चक्कर चल गया? कोई बंगाली नहीं मिला था?'

दत्ता के सवाल पर शिवांगी शर्मा गई। उसने सिर झुकाते हुए कहा, ‘सर, वसीम मेरे साथ ही पढ़ता था। कब हम दोनों एक दूसरे के करीब आ गए, पता नहीं चला। और फिर एक दिन संबंध भी बन गए, तो हम दोनों साथ रहने लगे।'

शिवांगी की बात सुनकर दत्ता मुस्कुराए, मानो कोई शिकारी शिकार को नजदीक आते देखकर मुस्कुराया हो, ‘अब तो खूब मजा आता होगा?'

इतना कहकर दत्ता ‘हो...हो' करके हंस पड़े। हमेशा लड़ने पर उतारू, तेज—तर्रार शिवांगी बनर्जी उस पल शर्मा गई। उसने चप्पल से जमीन को रगड़ते हुए कहा, ‘क्या सर

...आप भी मजाक करने लगे। मेरी नौकरी तो नहीं जाएगी न! अगर मेरी नौकरी चली गई, तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। इन दिनों वसीम भी खाली है। उसके खर्चे भी मेरे ही पैसों के बल पर चल रहे हैं। तीन महीने हो गए, उसका अपने अधिकारी से झगड़ा हो गया था। अधिकारी ने उसे निकाल दिया था। वैसे कई कंपनियों में वह इंटरव्यू दे चुका है, लेकिन कहीं बात बन नहीं रही है।'

‘तुम चिंता मत करो...तुम्हारा कुछ नहीं होगा। अगर काली माता बलि ही मांग रही हैं, तो वह बलि दी जाएगी नमो नारायण और आकृति की। गलती तो इन्हीं लोगों की है। अय्याशी भी करेंगे और अगर कोई कह दे, तो उससे मारपीट भी। यह तो नहीं चलेगा

...मैंने भदौरिया साहब से आज ही बात की है... तुम्हारे आने से कुछ देर पहले ही। ऑफिस में बढ़ती अनुशासनहीनता से वे बड़े दुखी हैं। वे अपने को कोस रहे थे कि पता नहीं किस कुघड़ी में उन्होंने चौरसिया को भर्ती कर लिया था। शिवांगी...तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं। सीएमडी साहब पूरी तरह मेरी ग्रिप में हैं। मैंने तो सीएमडी साहब से कह दिया है, जब तक संस्थान में चौरसिया, नमो नारायण और आकृति जैसे लोग रहेंगे, यह गंदगी बार—बार संस्थान के मुंह पर फेंकी जाती रहेगी। मैंने तो निखिलेश निखिल को भी अपने टॉरगेट पर ले रखा है। किसी दिन इन सबको ऐसे हलाल करूंगा, जैसे कसाई बकरे को हलाल करता है।'

दत्ता थोड़ी देर के लिए रुके, ‘जानती हो...मैंने सीएमडी साहब को एक प्रपोजल भेजा है। चौरसिया को फाइनेंस कंपनी में ही किसी इलाके का एरिया मैनेजर बनाकर भेज दो। दो दिन में औकात सामने आ जाएगी। निखिल को असम भेजने का प्लॉन बना रहा हूं। मैंने कुछ ही दिन पहले नियुक्त किए गए ग्रुप एचआर हेड मृत्युंजय पाठक से बात की है। वे मेरी बात से सहमत भी हैं। बस किसी मौके की तलाश में हूं। जिस दिन निखिल मुझसे भिड़ा, समझ लो उसी दिन उसका बोरिया बिस्तर बंधवा दूंगा। या तो झक मारकर वहां जाएगा या फिर इस्तीफा देगा। और अगर भूल से निखिल वहां चला गया, तो तब भी उसकी नौकरी गई ही समझो। नौकरी से तो उसे हाथ वैसे ही धोना पड़ेगा। चाहे इस्तीफा दे या फिर टर्मिनेट हो।' दत्ता ने शिवांगी को समझाया कम, फुसलाया ज्यादा। दत्ता के आश्वासन पर शिवांगी खुश हो गई। वह पहले की ही तरह ऑफिस में चहकने और बहकने लगी। उसका चहकना—बहकना देखकर लोग समझ गए कि उसे दत्ता या चौरसिया में से किसी ने लालीपॉप थमाया है।

एक दिन सहायक संपादक प्रतुल गुप्ता ने ऑफिस पहुंचकर बम विस्फोट किया।

‘कल तो दत्ता जी ने चिड़िया को चुग्गा खिला दिया। खिलाया...खूब खिलाया...और प्यार से मुंह जोड़कर खिलाया।'

शिवाकांत से रहा नहीं गया। उसने मुस्कुराते हुए पूछ लिया, ‘हुआ क्या? दत्ता जी ने किस चिड़िया को चुग्गा खिला दिया और तुम देखते रहे। कहीं तुम्हें अफसोस तो नहीं हो रहा है। हाय...चुग्गा खिलाने वाले हम न हुए?'

शिवाकांत की बात सुनकर आस पास काम कर रहे लोग सिमट आए। आजकल पृथ्वी एक्सप्रेस अखबार और वी एक्सप्रेस चैनल के कर्मचारियों में गॉसिप्स कहने का चलन जोर पकड़ रहा था। हर किसी के पास कोई न कोई खबर होती थी। कभी अखबार में काम करने वाले लोगों के संदर्भ में, तो कभी चैनल वालों के संबंध में। लोग पता नहीं कहां—कहां से, कैसी—कैसी खबरें और गॉसिप्स लेकर चले आते थे। मजे की बात यह थी कि चपरासी से लेकर संपादक और प्रधान संपादक तक इन लंतरानियों को बड़े चाव से सुनते और भद्दे कमेंट करते हैं। कई बार तो लगता है, यह अखबार का दफ्तर न होकर किसी पनवाड़ी की दुकान हो, जहां लोग आकर पान—तंबाकू, गुटखे के साथ—साथ बातों को कूंचते हैं, थूकते हैं और चले जाते हैं। प्रतुल गुप्ता की बात को पहले तो शिवाकांत ने गंभीरता से नहीं लिया था। चूंकि वह अपना काम पूरा कर चुका था। उसके पास थोड़ा—सा समय था। सो, उसने भी चुहुल करने की सोची, ‘तुमने बताया नहीं, दत्ता जी ने किस चिड़िया को चुग्गा खिलाया?'

प्रतुल गुप्ता लोगों में उत्सुकता जगाकर इतराया, ‘अच्छा यह बताओ? कल कौन—कौन छुट्टी पर था?'

‘दत्ता जी...फीचर डेस्क का अभिमन्यु उपाध्याय...मैं खुद...इसके अलावा कोई हो, तो मुझे नहीं मालूम।' बिजनेस पेज के अनिरुद्ध आचार्य ने अनुमान लगाया।

प्रतुल गुप्ता ने कहा, ‘उं+...उं+...ह...नहीं...हो सकता है, ये लोग कल छुट्टी पर रहे हों। लेकिन इनमें चिड़िया कोई नहीं है। कुछ और अनुमान लगाइए। दौड़ाइए दिमाग के घोड़े। और खोज लाइए उस चिड़िया को जिसने कल चुग्गा चुना है।'

‘अरे यार! तुम्हीं बता दो...इतना नाटक क्यों कर रहे हो?' शिवाकांत ने झल्लाते हुए कहा।

‘शिवांगी बनर्जी...कल दत्ता जी के साथ—साथ छुट्टी पर थी। शिवांगी ने ही कल दत्ता का चुग्गा बड़े प्रेम और आदर के साथ ग्रहण किया है। आय—हाय...क्या प्रेम झलक रहा था दोनों की आंखों में...।'

स्पोट्‌र्स पेज देख रहे वलीउल्ला खां ने उत्सुकता प्रकट की, ‘कैसे? आप यह कैसे कह सकते हैं। चुग्गा चुनने वाली शिवांगी ही थी? कोई और नहीं ...?'

‘क्योंकि कल मैंने दोनों को गाजियाबाद के मोहन नगर स्थित एमएमएक्स सिनेमा हॉल में ‘चढ़ती जवानी' टाइप की फिल्म देखते और लिपटते—चिपटते देखा है। दोनों एक ही आइसक्रीम को चाट—चाट कर मजा ले रहे थे।'

प्रतुल गुप्ता ने ओठों पर जुबान फेरते हुए कहा, मानो उस आइसक्रीम का स्वाद वह अब ले रहा हो। उसकी इस भाव—भंगिमा पर उपस्थित लोग हंस पड़े। प्रतुल ने सीने पर हाथ मारते हुए कहा, ‘हाय...हाय...क्या रोमांटिक सीन था, यार...फिल्म से ज्यादा देर तक तो मैं इन दोनों की फिल्म देखता रहा। अगर सार्वजनिक स्थल न होता, तो दत्ता साहब न जाने क्या कर बैठते। सचमुच...मैं तो अपने को भाग्यशाली मानता हूं, जो इस घटना का इकलौता गवाह बना।'

‘ज्यादा उछलो मत! दत्ता साहब को पता चला, तो खाल खींच ली जाएगी। वैसे भी किसी के करैक्टर पर कीचड़ उछालना सही नहीं है।' न्यूज रूम में आते हुए निखिल ने कहा, ‘मुझे तुम सब का रंडापा पता है। तुम सब भी यही करते हो, लेकिन जब अपनी बारी आती है, तो ऐसे पाक—साफ बनने की कोशिश करते हो, जैसे कि मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर से अभी अभी आए हो। हालांकि अब तो वे भी पाक—साफ नहीं बचे। बड़ी गंद फैला रखी है, इन पंडितों, मौलवियों और पादरियों ने।'

‘सर जी...बात तो पूरी सुनने दीजिए...। कितना रोमांटिक सीन चल रहा था। आपने आकर बेड़ागर्क कर दिया...।' वली उल्ला खां से रहा नहीं गया।

‘हां, मुझे मालूम है। यह क्या बकवास करेगा। अभी थोड़ी देर पहले ही यह सारी राम कहानी ऑफिस के बाहर चाय की दुकान पर सुनकर आया हूं। यह जान लो, दत्ता जी को पता चला नहीं कि तुम्हारा बद्ध निश्चित है। तुम्हें बद्ध होने से कोई नहीं बचा सकता है।' निखिल ने बिहारी स्टाइल में ‘वध' का उच्चारण ‘बद्ध' किया। इसके साथ ही अपना दायां हाथ हवा में लहराते हुए कहा, ‘तुम सब लोगों के पास कोई काम नहीं है क्या?'

प्रतुल गुप्ता के पेट में मरोड़ उठ रही थी। वह मन ही मन निखिल को कोस रहा था। कितना अच्छा प्रकरण चल रहा था। पता नहीं कहां से आ टपके, निखिल जी। गहरी सांस लेकर उसने कहा, ‘सर जी...आप तो बाहर पूरी कहानी का मजा ले लिए, अब दूसरों की बारी आने पर टांग अड़ा रहे हैं। बताने तो दीजिए इन लोगों को दत्ता और शिवांगी की प्रेम कहानी। हां, तो मैं बता रहा था। दत्ता और शिवांगी दोनों जब मल्टीप्लेक्स पहुंचे, तो फिल्म शुरू होने वाली थी। मैं उनसे तीन कतार पीछे बैठा था। पहले दत्ता जी आए। उसके थोड़ी देर बाद शिवांगी आई। लगता है, फोन करके दत्ता जी ने सीट नंबर पहले से ही बता दिया था। फिल्म शुरू होने के दस—पंद्रह मिनट बाद ही रोमांस चालू हो गया।'

प्रतुल गुप्ता के इस शगूफे की चर्चा पूरे दिन दफ्तर में होती रही। संपादक ने तो इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की, लेकिन सारा ऑफिस चटखारे लेकर बातें करता रहा।

और फिर...एक दिन वह हुआ जिसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी। आगरा ऑफिस से शिवांगी, नमो नारायण और आकृति सिन्हा की बर्खास्तगी का पत्रा आया, तो पूरे ऑफिस में हड़कंप मच गया। दोनों को कदाचार और ऑफिस का माहौल बिगाड़ने के आरोप में निकाल दिया गया था। आकृति सिन्हा और नमो नारायण के हाथों से तोते उड़ गए। वह आंसू बहाती हुई रवींद्र चौरसिया के पास गई।

उसे देखते ही चौरसिया मुस्कुराए, ‘कोई बात नहीं ...पत्राकारिता में यह सब तो चलता रहता है। और फिर...तुमने पृथ्वी एक्सप्रेस के नाम अपनी जिंदगी का पट्टा तो नहीं लिख दिया है। यहां नहीं, तो कहीं कोई और नौकरी मिल जाएगी। चिंता मत करो...मैंने अपने कुछ पत्राकार मित्राों से कह दिया है। जल्दी ही तुम्हें नौकरी मिल जाएगी।'

‘लेकिन सर! आपने तो कहा था कुछ नहीं होगा...फिर यह क्या हुआ...? मेरी कोई गलती भी नहीं थी...फिर भी मेरा टर्मिनेशन!' आकृति सुबकती हुई बोली। तभी चैंबर में नमो नारायण ने प्रवेश किया। उसके भी हाथ में बर्खास्तगी का पत्रा था।

‘टर्मिनेशन तो शिवांगी का भी हुआ है। सिर्फ तुम दोनों का ही तो नहीं हुआ है। अभी अभी मेरे पास हेड ऑफिस से मेल भी आया है। उसमें आप दोनाें के साथ साथ उसका भी नाम लिखा हुआ है।'

नमो नारायण का लहजा तल्ख हो गया, ‘लेकिन सर...आपने तो आश्वासन दिया था कि कुछ नहीं होगा। मेरी सीएमडी सर से बात हुई है...सीईओ सर ने आश्वासन दिया है। क्या हुआ इन लोगों के आश्वासन और ढांढस का? अपनी नौकरी तो गई न...आप दोनों की आपसी खुन्नस में बलि तो अपनी चढ़ गई न। बेवकूफ थे हम जो आपके भरोसे बैठे रहे। वैसे भी मैं आपके टारगेट पर था। आज नहीं तो कल, आप किसी दूसरे बहाने मुझे निबटा देते।'

नमो नारायण की बात सुनते ही भड़क उठे चौरसिया, ‘देखो...मुझसे ज्यादा बकवास मत करो। ...अय्याशी करो तुम...और झगड़ा मोल लेने जाउं+ मैं। मैंने तो नहीं कहा था कि तुम दोनों अय्याशी करो। मेरे कहने पर तुमने शारीरिक संबंध तो बनाया नहीं था। शिवांगी से झगड़ा भी तो मुझसे पूछकर नहीं किया था। अब जो किया है, उसे तो तुम्हीं लोगों को भुगतना पड़ेगा। अब ऊपर बैठे लोगों ने मेरी नहीं सुनी, तो मैं क्या करूं? बड़े आए हैं

...मुझको धौंस पट्टी पढ़ाने। अकेले तुम्हीं पर गाज नहीं गिरी है। उस खेमे का भी तो एक विकेट गिरा है। हां, इस मायने में मैं घाटे में रहा। मेरी भी तो किरकिरी हुई है।'

चौरसिया को भड़कता देखकर आकृति सिन्हा उठ खड़ी हुई, ‘सर...मैं जा रही हूं। आप लोगों ने जिस तरह हम सबको बलि का बकरा बनाया है, वह ठीक नहीं है। अगर आप इसी तरह हर बात को नफा—नुकसान के तराजू पर तौलते रहे, तो एक दिन पाएंगे कि जीवन की इस राह में आप अकेले ही चलते जा रहे हैं। आपके पीछे कोई नहीं है। जब आपको किसी के सहारे की जरूरत होगी, आप चाहेंगे कि कोई आपके सुख—दुख का साथी बने, तो आप अकेले खड़े होंगे। विश्वास भी कोई चीज होती है। हमने आप पर विश्वास किया। आप उस विश्वास की रक्षा नहीं कर पाए। हम दोनों जा रहे हैं...नौकरी तो कहीं न कहीं मिल ही जाएगी। आपके यहां अट्ठारह हजार मिलते थे। कहीं पंद्रह हजार रुपये की मिलेगी या भाग्य अच्छा हुआ तो बीस हजार रुपये की भी मिल सकती है। लेकिन हम जब भी आपको याद करेंगे, मतलबपरस्त संपादक के रूप में ही याद करेंगे। आपमें और दत्ता में कोई मूलभूत अंतर नहीं है। दोनों स्वार्थी और दोनों मतलब परस्त हैं...।'

‘क्या बकती है? तू पागल हो गई है।' चौरसिया गुर्राए।

‘हां...मैं पागल ही तो थी, जब आपके फेवर में मैं सबसे पंगा लेती घूमती थी। आपकी मेल आईडी हैक कर सुकांत जब सीएमडी को गाली भरा पत्रा लिख रहा था, तो मैंने ही उसकी लानत—मलानत की थी। उससे झगड़ा भी किया था। मीडिया एचआर सुबोधिनी राय को प्रेम पत्रा लिख रहा था। अगर उस दिन मैंने आपको फोन करके सूचना नहीं दी होती, तो उसी दिन आपका काम लग गया था। उस दिन दत्ता और सुकांत मिलकर आपका बोरिया बिस्तर बांधने का पक्का इंतजाम कर चुके थे। आप सही कहते हैं, सर! मैं पागल ही थी, जो दत्ता से बैर मोल लेकर आपके पक्ष में खड़ी हुई थी। और फिर

...आपका बैकग्राउंड क्या है? आप दलाली करने वाले मामूली दल्ले ही तो थे?'

सांस लेने को रुकी आकृति ने दुपट्टे से अपना मुंह पोंछा और बोली, ‘आप अकसर बातचीत के दौरान कहते हैं, यहां की नौकरी चली गई, तो आप घर लौट जाएंगे। आपकी पत्नी लखनऊ सचिवालय में सीनियर क्लर्क हैं। सच कहूं...आपको पत्नी की कमाई खाने में आनंद आता है। आपको आदत सी हो गई है दूसरों की कमाई पर जिंदा रहने की। इतनी काबिलियत तो है नहीं कि खुद कमाकर परिवार को खिला सकें। जिंदगी भर दलाली की है। आपको पत्राकारिता की एबीसीडी मालूम होती, तो आज आपकी यह दुर्गति नहीं होती।' इतना कहकर आकृति झटके से उठी और चैंबर से बाहर निकल गई।

नमो नारायण और चौरसिया अवाक बैठे रहे। कुछ देर बाद नमो नारायण ने शांति भंग की, ‘सर...मैं भी जाता हूं। अभी एचआर को आईकार्ड वगैरह लौटाने हैं। कुछ फार्म वगैरह भरने हैं। फिलहाल कहीं नौकरी खोजूंगा। शिवांगी के चलते जो कालिख मेरे चेहरे पर पुती है, वह तो जिंदगी भर धुलने से रही। दिल्ली से दूर कहीं नौकरी खोजने की कोशिश करूंगा। देखता हूं क्या लिखा है मेरे भविष्य में?' इतना कहकर वह बिना अभिवादन किए बाहर निकल गया। चौरसिया उसे जाता हुआ देखते रहे।

ऑफिस के बाहर खुली चाय की दुकान पर शिवाकांत को यह सुनने को मिला कि शिवांगी प्रधान संपादक दत्ता को गालियां देती हुई उनके चैंबर से निकली थी। कुछ लोगों का तो यहां तक कहना था, शिवांगी और दत्ता में खूब ‘तू तू—मैं मैं' हुई। शिवांगी ने दत्ता पर अय्याशी, विश्वासघाती और न जाने क्या—क्या आरोप लगाए थे।

शिवांगी चैंबर से बाहर निकलते वक्त चिल्ला रही थी, ‘साले...बुड्‌ढ़े के मुंह में दांत नहीं, पेट में आंत नहीं ...चला है लड़कियों से इश्क फरमाने। हरामी...अगर इस बुढ़ापे में इश्क फरमाने का इतना ही शौक है, तो अपनी लड़की से इश्क फरमा। अभी मैं अपने कपड़े फाड़कर पुलिस में रिपोर्ट लिखाती हूं। हरामी दत्ता को अंदर न करवा दिया, तो मेरा नाम भी शिवानी बनर्जी नहीं। साला बड़ा संपादक बना घूमता है। साला...बेटी बेटी कहकर ब्लाउज में हाथ डालने की कोशिश में लगा रहता है।'

इसके बाद तो वह पूरे ऑफिस में घंटे भर तक घूम—घूमकर दत्ता और चौरसिया को गालियां देती रही। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह शिवांगी की गालियों और बातों का विरोध कर सके। जब वह दत्ता और चौरसिया को कोस—कोस कर थक गई, तो बाहर चली गई। ज्यादातर लोग शिवांगी और आकृति—नमो नारायण प्रकरण को लेकर बतियाते रहे। कुछ सच, कुछ झूठ का कारोबार सारे दिन गर्म रहा। कोई एक किस्सा सुनाता, तो दूसरा आंखों देखी बताने लगता।

शिवाकांत इन घटनाओं को लेकर ऐसे निर्लिप्त रहा, मानो वह ऑफिस में मौजूद ही नहीं हो। कई बार कुछ लोगों ने उसे उकसाने की भी कोशिश की। मामले में उसकी राय जानने की कोशिश की, लेकिन वह कुछ नहीं बोला, तो नहीं बोला। एकदम मुंह सी रखा था। संजीव चौहान के बहुत जोर देने पर उसने सिर्फ इतना कहा, ‘इस मामले में मेरा कुछ बोलना उचित नहीं है। मैं कुछ भी बोलूंगा, तो लोग बात का बतंगड़ बना देंगे। मैं ऐसा नहीं चाहता। वैसे ही मेरे खिलाफ बहुत कुछ रचा जा रहा है। मैं किसी को कोई मौका नहीं देना चाहता। कुछ लोगों के राड़ार पर मैं इन दिनों चढ़ा हुआ हूं। मैं नहीं चाहता कि उन्हें कोई मौका मिले।'

शिवांगी, आकृति और नमो नारायण के बर्खास्त किए जाने की खबर निखिल को शाम को मिली। वे अपने किसी व्यक्तिगत कार्य से दिल्ली गए हुए थे। उस दिन ऑफिस देर से पहुंचे थे।

उन्हें जैसे ही यह बात पता चली। भड़क उठे, ‘यह क्या रंडापा है? आखिर हो क्या रहा है इस ऑफिस में? इन छोरा—छोरियों को आखिर किस बात की सजा दी गई? चलो

...थोड़ी देर के लिए मान लिया। आकृति और नमो नारायण के बीच संबंध हैं। तो यह उनका मामला है। वे जानें। दोनों बालिग हैं...कोई ऑफिस में तो नहीं कर रहे थे यह सब? हां...आकृति और शिवांगी के बीच हुई मारपीट की घटना गंभीर थी। लेकिन इसकी इतनी बड़ी सजा तो नहीं दी जा सकती? सबको नौकरी से निकाल दोगे? चौधरी हो गए हो तुम? मैं तो अभी दत्ता और चौरसिया से पूछता हूं। मने कि...एक अजीब—सी तानाशाही है इन लोगों की। तुम्हारा चेहरा मुझे पसंद नहीं है, इसलिए टर्मिनेट कर दूंगा। तुम्हारी बात मुझे पसंद नहीं आती, इसलिए नौकरी छोड़ दो। अरे भाई! मान लिया, मेरा चेहरा तुम्हें पसंद नहीं है, तो क्या निकाल दोगे? अगर मैं काम नहीं करता, पालिटिक्स करता हूं, तो तुम निकाल दो। जायज बात है। हट...यह दफ्तर नहीं, अब रंडी की चूची हो गया है। जो आता है, चूसने लगता है। अब तो काम करने लायक माहौल ही नहीं रहा।' निखिल कुछ और कहते, तभी अपने कक्ष से चौरसिया निकल आए थे। दरअसल, वह ऑफिस का माहौल देखना, परखना चाह रहे थे।

चौरसिया को सामने देखकर निखिल उनके सामने जा खड़े हुए, ‘सर जी...यह क्या हो रहा है? मने कोई कायदा—कानून ही नहीं रह गया ऑफिस में। यह अखबार का दफ्तर है या किसी पंसारी की दुकान? जब मन हुआ भरती कर लिया, जब मन हुआ ‘जी' पर लात मारकर निकाल दिया?'

चौरसिया ने उनका हाथ पकड़ा और अपने चैंबर में ले गए। अपनी कुर्सी पर बैठते हुए बोले, ‘जो बात समझ में न आए, उस मामले में चुप ही रहा करो। बर्खास्त किया गया कौन? और तलवार तुम भांज रहे हो। कई बार तो तुम अपनी ही टीम को हिट विकेट करा देते हो। जानते हो...कुछ लोग तुम्हें पीठ पीछे हिट विकेट कहकर बुलाते हैं। कहते हैं, अगर तुम्हें किसी से लड़ना हो, तो खुद लड़ने के बजाय निखिल को भिड़ा दो। सामने वाले की ऐसी गति करेंगे कि वह जिंदगी भर उन्हें देखते ही भाग खड़ा होगा। हां, एक बात का खतरा जरूर है, वे डंडा घुमाते हुए अपने ही साथियों का सिर भी फोड़ सकते हैं। अरे यार! ...जो लोग गए, वे अपने गुट के थे नहीं? वे तो बस एक मोहरे थे, जो पिट गए, तो पिट गए। अब इन पिटे हुए मोहरों को लेकर सिर थोड़े फुड़वाना है। पिटे मोहरों से ज्यादा लगाव भी नहीं रखना चाहिए।'

‘हां...सर जी! वैसे भी उन लोगों ने कोई अच्छा काम तो किया नहीं था। उनका चला जाना ही ठीक था। शराबी, कबाबी और अय्याश लोगों को मैं देखना नहीं चाहता। साले...ऑफिस का माहौल गंदा करते हैं। ...एक बार मैंने एक संपादक को तो इसी अय्याशी के चलते पीट दिया था। तब मैं...।'

निखिल आगे कुछ आगे बोलते चौरसिया ने हाथ उठाकर रोकते हुए कहा, ‘तब तुम विचार संहिता में काम करते थे। संपादक थे आचार्य श्री...रहने दो। यह कहानी तुम कई बार सुना चुके हो। जाओ...बाहर देखो, क्या चल रहा है? लेकिन कोई गर्मागर्म भाषण या बयान मत देने लगना। तुम्हारी यही आदत खराब है। तुम बोलते पहले हो, विचारते बाद में हो।' इतना कहकर चौरसिया अखबार पढ़ने लगे।

दैनिक पृथ्वी एक्सप्रेस और चैनल वी एक्सप्रेस के ऑफिस एक दूसरे के अगल—बगल में ही हैं। दोनों का मूल संस्थान एक होने से दोनों संस्थानों के कर्मचारी आपस से मिलते रहते हैं। पृथ्वी एक्सप्रेस जैसा ही हाल चैनल वी एक्सप्रेस का भी कुछ दिनों से चल रहा है। चैनल में कई गुट सक्रिय हैं। सभी गुटों में एक दूसरे के खिलाफ साजिश, जासूसी और शगूफे छोड़ने की होड़ लगी हुई है। चैनल हेड सुदेश कुमार पांच महीने पहले बिहार के धुरंधर पत्राकार परमानंद बैठा को राजनीतिक संपादक बनाकर इस प्रत्याशा से चैनल में लाए थे कि वह चैनल की गिरती टीआरपी को सुधारने में मदद करेंगे। परमानंद बैठा के चैनल ज्वाइन करते ही विभिन्न पार्टियों के राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय नेता, केंद्रीय मंत्राी, विभिन्न राज्यों के मंत्राी चैनल को साक्षात्कार देने, किसी मुद्दे पर बाइट देने और चैनल की ओर से आयोजित होने वाली बहसों में भाग लेने लगे। कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा सहित सभी वामपंथी दलों और क्षेत्राीय पार्टियों के नेताओं के बीच चैनल की चर्चा भी होने लगी। परमानंद बैठा के ज्वाइन करने के बाद टीआरपी तीन से पांच पर पहुंच गई। चैनल हेड की वाहवाही होने लगी। चैनल हेड सीना तानकर दिल्ली के मीडिया जगत में घूमने लगे। चैनल के दफ्तर में आने वाले वीआईपीज का इंटरव्यू खुद चैनल हेड लेते थे। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि लाइव इंटरव्यू के दौरान अटपटे सवाल पूछने के चलते इंटरव्यू देने वाले की झिड़की खा जाते।

एकाध बार परमानंद ने चैनल हेड सुकेश कुमार से कहा, ‘भाई साहब! पिछले कुछ महीनों से जितने भी वीआईपीज चैनल के स्टूडियो में आ रहे हैं, वे मेरी बदौलत आ रहे हैं। इस बात का श्रेय आप ले रहे हैं। मुझे इस पर भी कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मुझे सिर्फ आधे घंटे का प्रोग्राम सप्ताह में एक बार करने दें। भाई...मैं पत्राकार हूं। इस तरह सीन से अलग नहीं रह सकता हूं।'

‘हां...देखता हूं, कोई प्रोग्राम शिड्यूल करता हूं। बस आप लगे रहिए। अच्छा कर रहे हैं।' सुदेश कुमार ने मधुर मुस्कान बिखेरते हुए कहा।

पॉलिटिकल एडीटर परमानंद बैठा और चैनल हेड सुदेश कुमार के बीच पहली खटपट तब हुई, जब सैलरी सबके एकाउंट में आई। सैलरी एमाउंट देखते ही परमानंद चैनल हेड के पास पहुंचे। मुस्कान के साथ चैनल हेड ने उनका स्वागत किया।

परमानंद ने अपना मोबाइल सुदेश कुमार के सामने पटकते हुए कहा, ‘आपने मेरी कितनी सैलरी लगाई है?'

‘पैंसठ हजार रुपये पर मंथ।'

‘आपसे बात कितने की हुई थी?'

‘इतनी ही सैलरी की बात हुई थी।'

‘झूठ बोलते हैं आप...बात पच्चासी हजार रुपये की हुई थी। उस पर मोबाइल, इंटरनेट, पेट्रोल, अखबार और मैग्जीन्स के बीस हजार रुपये अलग से बाउचर पेमेंट देने की बात हुई थी।' परमानंद बैठा तैश में आ गए।

‘बाउचर पेमेंट के लिए हेड ऑफिस को लिख दिया है। वहां से स्वीकृति मिलते ही आपको पेमेंट कर दिया जाएगा...परमानंद जी। आप खामख्वाह परेशान हो रहे हैं। आपका पैसा आपको मिल जाएगा। इस महीने नहीं, तो अगले महीने सही। जो आपको मिलना है, मिल जाएगा।'

मन मसोस कर परमानंद बैठा चैनल हेड के पास से लौट आए। वे पूर्ववत काम करते रहे, लेकिन अब वह उत्साह उनमें नहीं रहा। उन्हें एक महीने बाद जो ऑफर लेटर दिया गया, उस पर सुदेश कुमार के हस्ताक्षर थे। सैलरी एमाउंट भी पैंसठ हजार रुपये ही लिखी हुई थी। अन्य सुविधाएं देने की बात गोल कर दी गई थी। उन्होंने चैनल के दूसरे साथियों से बात की, तो उनके साथ ही प्रोड्यूसर की पोस्ट पर ज्वाइन करने वाली परमजीत कौर ने बताया, उसे हेड ऑफिस से ऑफर लेटर भेजा गया है। सैलरी भी उतनी ही है जितने की बात हुई थी। उन्होंने कुछ और लोगों से ऑफर लेटर के संबंध में दरियाफ्त किया, तो सबने परमजीत कौर की ही बात दुहरा दी। यह सुनते ही परमानंद भड़क गए। उन्होंने सबके सामने चैनल हेड सुदेश कुमार के खिलाफ ऊलजुलूल बातें कहनी शुरू कीं। उन्होंने सुदेश कुमार को चेतावनी दी, वह अब सुदेश कुमार को इस चैनल से निकलवा कर ही दम लेंगे।

एक दिन ऑफिस के बाहर चाय की दुकान पर निखिल खड़े सिगरेट फूंक रहे थे। संयोग से उसी समय शिवाकांत भी चाय की तलब लगने पर निकला था। शिवाकांत ने निखिल को चाय ऑफर की, तो उन्होंने बिना कुछ बोले स्वीकार कर लिया। दोनों ने अभी चाय पीनी शुरू ही की थी कि चैनल से निकलकर परमानंद बैठा आ गए। आते ही उन्होंने कहा, ‘अहा...निखिल जी...अकेले—अकेले चाय पिएंगे। यह तो भाई नहीं चलेगा।'

‘हां...हां...आप भी पीजिए चाय।' इतना कहकर उन्होंने चाय वाले से एक और चाय देने का इशारा किया।

‘और सुनाइए परमानंद जी...कैसा चल रहा है कामकाज?'

‘कामकाज का क्या है...सिस्टम है...चलता रहता है। एक बार सिस्टम बन गया, तो चाहे सुदेश जैसे चूतिये को चैनल हेड बना दो या फिर किसी बच्चे को...क्या फर्क पड़ता है। एक बात बताउं+, जिस तरह उसने मेरे साथ धोखा किया है, मैं उसे छोड़ूंगा नहीं। उसकी धज्जियां उड़ाकर रहूंगा। वह अभी मुझे जानता नहीं है। मेरी राजनीतिक गलियारे में कितनी पहुंच है, इसका उसे सिर्फ अंदाजा है। वह नहीं जानता कि मैं क्या कर सकता हूं।' परमानंद बैठा जब बोलने पर आते हैं, धारा प्रवाह बोलते हैं। बोलते समय उनके मुंह से थूक निकलने लगती है। कई बार तो लोगों को थोड़ा दूर हट जाना पड़ता है। इस बात को परमानंद भी समझते हैं। वह हर दो—तीन मिनट पर रुमाल निकालकर अपने होंठ पोंछ लेते हैं।

‘सुना है, आपकी सुदेश से झांय—झांय हुई है?' निखिल ने उड़ती हुई खबर की पुष्टि करनी चाही।

‘साला बेवकूफ है...उसकी तो ऐसी गत करूंगा कि किसी ने अपने दुश्मन की भी नहीं की होगी। उसे चैनल हेड तो नहीं रहने दूंगा। भले ही उसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े।' परमानंद बैठा ने चाय सिप करते हुए कहा, ‘उस बेवकूफ को मालूम नहीं है, वह किससे पंगा ले बैठा है। अब तक उसे कई पत्राकार मिले होंगे, लेकिन मेरे जैसा जड़ियल पत्राकार नहीं मिला होगा। देखो...किसी को भी उसकी औकात बताने के लिए क्या चाहिए? इनकमटैक्स डिपार्टमेंट का एक कमिश्नर, कोई भी एक केंद्रीय मंत्राी, किसी भी प्रदेश का एक आईजी और एकाध ब्यूरोक्रेट्‌स। बस...अगर आपका इतने लोगों से परिचय है, तो आप किसी को भी उसकी औकात बता सकते हैं।'

परमानंद की बात सुनकर निखिल ने स्वीकारात्मक तरीके से सिर हिलाया। शिवाकांत सुनकर भी बात को अनसुनी कर गया।

परमानंद ने कहा, ‘आप तो जानते हैं...वर्तमान सरकार में बीसियों मंत्राी मेरे मित्रा हैं। कांग्रेस, भाजपा और अन्य क्षेत्राीय पार्टियों में दर्जनों वरिष्ठ नेता मुझे पर्सनली जानते हैं। झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रिायों तक मेरी सीधी पहुंच है। मुझे इस चैनल हेड को औकात बताने में कितनी देर लगेगी! मैं तो बस इंतजार कर रहा हूं सीएमडी भदौरिया का। सुना है, अगले हफ्ते आने वाले हैं। मैं उनसे मिलकर बताउं+गा न! चैनल हेड और उनके चमचों ने कहां—कहां और कितना—कितना खाया है। जहां तीन करोड़ रुपये में पांच प्रदेशों में चैनल का प्रसारण हो सकता था, वहां बारह करोड़ रुपये खर्च किए गए। मेरे पास तो सबका प्रमाण है न। सब की नौकरी खा जाउं+गा।'

‘सब जगह रंडलों की जमात भरी हुई है। कैसी विडंबना है कि गधे पंजीरी खा रहे हैं। मैं चैनल और अखबार में तो कुछ लोगों को देखना ही नहीं चाहता। दे आर टोटली क्रिमिनल्स। उन्हें तो बीच चौराहे पर गोली मार देनी चाहिए।'

निखिल ने अपना चिर परिचित जुमला दोहराया। उनकी बातचीत में ‘रंडल', ‘दे आर टोटली क्रिमिनल्स' और ‘ऐसे लोगों को देखना नहीं चाहता' जैसे जुमले अकसर आते—जाते रहते हैं। कुछ लोग तो उन्हें देखते ही कहने लगते हैं, ‘आ गए रंडल नरेश। अब इनका प्रवचन सुनना पड़ेगा। गनीमत चाहते हो, तो सरक लो पतली गली से।' और लोग वाकई आधी चाय तक छोड़कर काम का बहाना करके निकल लेते हैं। चौरसिया और उनकी मंडली ने तो निखिल का नाम ही ‘हिट विकेट' रख छोड़ा है।

शिवाकांत ने पहली बार मुंह खोला, ‘भाई साहब! जब आप जानते थे, सुदेश कुमार फ्राड है, तो उसके कहने पर आपने ज्वाइन ही क्यों किया? ताज्जुब तो इस बात का है कि इस धोखाधड़ी के बाद भी आप उसकी भरपूर मदद कर रहे हैं। आपकी ऐसी क्या मजबूरी है?'

‘शिवाकांत जी...मेरी कोई मजबूरी नहीं थी। नौकरी तो करनी ही थी न...कहीं न कहीं। तो सोचा, चैनल वी एक्सप्रेस ही क्या बुरा है। लेकिन अब मैंने अपने हाथ खींच लिए हैं। सुदेश कुमार को खुली चुनौती दे रहा हूं। कोई भी वीआईपी बुलाकर दिखाएं। मैंने फोन करके सबको मना कर दिया है। कोई अब नहीं आने वाला इस चैनल में। कोई कुत्ता भी झांकने वाला नहीं है यहां अब। मैंने सूचना एवं प्रसारण मंत्राालय में चैनल के खिलाफ जारी हो चुकी दो नोटिसें रुकवा रखी हैं। परसों एक कार्यक्रम में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्राी मिली थीं। बहुत खफा थीं चैनल पर प्रसारित हो चुकी एक खबर से। वे तो नोटिस भिजवा रही थीं। मैंने ही उन्हें रोक दिया है। जिस दिन चाहूंगा सोनी जी से कह दूंगा। नोटिस आ जाएगी। फिर मैं देखता हूं, किसमें इतना बूता है? कौन मामला सुलझा पाता है? उस मामले में तो सुदेश कुमार और सीएमडी भदौरिया पक्का नप जाएंगे।' परमानंद बैठा ने चाय पीने के बाद कप डस्टबिन में डालते हुए अपने होंठ रुमाल से पोंछे।

‘भाई साहब! एक बात मेरी समझ में नहीं आती...। सुना है, सुदेश कुमार करोड़ों रुपये कंपनी का डकार चुका है। रोज तीन लाख रुपये बैंक एकाउंट से निकालने का अधिकार है। डिस्ट्रीब्यूशन में भी कई घोटाले की बात कही जा रही है। तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं होती है? इसके आगे पीछे घूमने वाले कुछ लोगों को तो मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं, जो किसी काम के नहीं हैं। इससे पहले भी जहां थे, वहां लड़कियों को फंसाकर उन्हें ब्लैकमेल करते थे।' शिवाकांत ने इधर—उधर देखते हुए कहा। उसे भय था, कहीं चैनल का कोई आदमी आसपास न हो। वह किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहता था।

‘यहां भी ये लोग यही कर रहे हैं। सुदेश कुमार की किसी लड़की के साथ आपत्तिजनक अवस्था की सीडी पराशर के पास है। सीएमडी की सीडी सुदेश कुमार के पास। पराशर की करतूतों के सुबूत आउटपुट हेड मनीष भल्ला के पास। यहां सब एक दूसरे से गुथे हुए हैं। यही वजह है, तमाम घपलों—घोटालों के बावजूद सुदेश कुमार बने हुए हैं, पराशर बना हुआ है, मनीष भल्ला बने हुए हैं। और भी बहुत नाम हैं...किसका—किसका नाम गिनाउं+। हालत तो इतनी खराब है कि यह एंकर इससे फंसी हुई है, तो वह एंकर उससे। सुना है, अगले हफ्ते सीएमडी दिल्ली आने वाले हैं। दिल्ली में किसी जगह पर उन्होंने कोई होटल खरीदा है। उसके उद्‌घाटन समारोह में। शायद चैनल दफ्तर में भी आएं। न भी यहां आए, तो मैं दिल्ली में ही उनको घेर कर पकड़ूंगा। सारी हकीकत बताउं+गा। देखता हूं क्या होता है?' परमानंद बैठा ने चाय वाले को पैसे दिए। शिवाकांत उन्हें मना करता रहा, लेकिन उन्होंने बाकी पैसे जेब में रख लिए।

शिवाकांत और निखिल ऑफिस में आ गए। अंदर एक अलग ही हंगामा मचा हुआ था। दत्ता उस दिन का अखबार हाथ में लिए दहाड़ रहे थे। नमो नारायण की बर्खास्तगी के बाद पहले पेज का काम देख रहे श्याम सुंदर पांडेय और देश—विदेश पेज के इंचार्ज प्रतिमान विश्वकर्मा सहमे से खडे़ किसी तारणहार की प्रतीक्षा में थे।

दत्ता ने श्याम सुंदर की ओर देखते हुए कहा, ‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई बिना मुझसे पूछे यह खबर छापने की? तुम्हारे भेजे में यह बात क्यों नहीं आती कि अगर कोई बात समझ में नहीं आ रही है, तो एक बार मुझसे पूछ लो। जानते हो...संजीव चौहान...या गीतिका तो जेल जाने से रहे...जेल तो जाउं+गा मैं...या फिर भदौरिया साहब। तुम लोगों का क्या है...अपना बोरिया बिस्तर उठाकर चलते बनोगे।'

शिवाकांत ने बीच में पड़ते हुए कहा, ‘किस खबर की बात कह रहे हैं, सर! खालिस्तानी आतंकवादियों के दिल्ली में सक्रिय होने और कुछ खास अधिकारियों से उनके कथित संबंधों की जो खबर अपने यहां छपी है, उसके बारे में?'

‘हां...उसी खबर की बात कर रहा हूं। और तुम...किस बात के न्यूज एडीटर हो? भाड़ झोंकते हो यहां बैठकर...? तुमने यह खबर क्यों नहीं रोकी? अगर इस मामले को केंद्र सरकार अपनी नोटिस में ले ले, तो है कोई सुबूत इसका तुम्हारे पास कि दिल्ली में खालिस्तानी आतंकवादियों का एक गुट सक्रिय है? और फिर...इस खबर में किसी अधिकारी की बाइट क्यों नहीं है? वैसे तो तुम हर छोटी से छोटी खबर पर भी बाइट मांगते हो...यह खबर किसी अधिकारी के वर्जन के बिना कैसे छप गई?' दत्ता की तोप का मुंह अब शिवाकांत की ओर घूम गया था, ‘तुमने भी तो यह खबर छपने से पहले देखी होगी? या फिर तुम्हारी जानकारी में आए बिना छप गई?'

दत्ता की बात पर शिवाकांत आहत हुआ। उसने भी रोष भरे स्वर में कहा, ‘जिस तरह आप प्रधान संपादक हैं, उसी तरह मैं भी न्यूज एडीटर हूं। आपका अपनी टीम पर ही नियंत्राण नहीं है और दोष मुझे दे रहे हैं? यह खबर छपने से पहले आप तक भी तो पहुंचनी चाहिए थी। ट्रैक पर आपने भी तो देखी होगी? तब आप क्यों चुप रहे? बाकी यह खबर कैसे छपी...यह तो यही लोग बताएंगे।'

‘सर! यह खबर जनरल डेस्क को रात साढ़े ग्यारह बजे को—आर्डिनेशन डेस्क ने ट्रांसफर की थी। मैंने को—आर्डिनेशन डेस्क से इस बारे में पूछा था। बताया गया कि यह खबर फरीदाबाद डेटलाइन से आई है। रिपोर्टर हरीश रावत का कहना था कि खबर पक्की है। कुछ डाक्यूमेंट्‌स भी उसके पास हैं। सर...पेज छूटने में बस दस मिनट रह गए थे। किसी तरह इस खबर के लिए जगह बनाई गई थी। मैंने यह खबर लगाकर पेज छोड़ दिया था। आपसे पूछने का ख्याल ही नहीं रहा, सर! यह मुझसे बड़ी चूक हुई।' पहले पेज के इंचार्ज श्याम सुंदर पांडेय ने सफाई दी।

‘और तुम क्या कहते हो, विश्वकर्मा महाराज!...' दत्ता का लहजा अब व्यंग्यात्मक हो चला था।

गुस्से की जगह अब चुहुल लेती जा रही थी। उनके लहजे से शिवाकांत समझ गया कि अब वे प्रतिमान विश्वकर्मा और श्याम सुंदर को बातों ही बातों में सबके सामने जलील करेंगे। दरअसल, पिछले कुछ दिनों से शिवाकांत यह महसूस कर रहा था कि दत्ता अब अपने सहकर्मियों के साथ कुछ ज्यादा ही रूखा व्यवहार करने लगे हैं। वे कुछ कुंठित नजर आने लगे हैं। शिवाकांत ने वहां से हट लेने में ही भलाई समझी।

‘भाई साहब...कल जिलों से आई सूची में इस खबर का कोई उल्लेख नहीं था। रात ग्यारह बजे के आसपास यह खबर फरीदाबाद डेस्क को मिली थी। मोहनीश ने यह खबर को—आर्डिनेशन डेस्क जब दी थी, तो मैंने मोहनीश से पूछा था, यह खबर सूची में क्यों नहीं थी? मोहनीश ने फरीदाबाद कार्यालय में फोन करके यह बात पूछी थी। पूछने पर रिपोर्टर हरीश रावत ने कहा था कि यह खबर अभी—अभी पुष्ट हुई है, इसलिए भेज रहा हूं। अगर आज नहीं छपी, तो कल दूसरे अखबार इसे ले उड़ेंगे। भाई साहब...इस खबर का प्रिंट लेकर आपके चैंबर में गया था, तब तक आप शायद घर जा चुके थे।' प्रतिमान विश्वकर्मा ने इस लहजे में कहा, मानो वह अभी रो देगा, ‘चूंकि खबर को हरीश ने एक्सक्लूसिव बताया था, इसलिए वर्जन और अन्य बातों की ओर मेरा ध्यान ही नहीं गया।'

‘ध्यान ही नहीं गया...कह देने से अपराध क्षमा हो जाएंगे? कल जब अखबार को नोटिस मिलेगा, तो कौन जिम्मेदार होगा? बोलो...तुम्हारा वह हरीश रावत या तुम? तुम सब किसी बिल में घुस जाओगे। झेलना तो मुझे पड़ेगा।'

दत्ता ने अपनी सीट पर बैठे शिवाकांत को आवाज देते हुए कहा, ‘तुम कहां भाग गए, शिवाकांत? तुमसे तो अभी पूछताछ करनी बाकी ही है।'

उन्होंने प्रतिमान विश्वकर्मा से कहा, ‘फिलहाल...तो तुम दोनों इसके लिए माफीनामा लिखकर लाओ। जी तो कर रहा है, कम से कम एक सप्ताह के लिए तुम दोनों को फोर्स लीव पर भेज दूं। फिर भी...चलो देखता हूं...क्या कर सकता हूं।'

शिवाकांत आकर दत्ता के सामने खड़ा हो गया। उसने सामान्य लहजे में कहा, ‘हां जी... कहिए, आपको मुझसे कुछ कहना है?'

‘यार...कम से कम तुम्हें यह खबर तो देखनी चाहिए थी? तुमसे यह गलती कैसे हो गई? चौरसिया ने फंसाने के लिए तो नहीं लगवा दी यह खबर? सुना है, चौरसिया कुछ मंत्रिायों और अधिकारियों के दफ्तर के चक्कर लगा रहा है। उन अधिकारियों ने अपने विरोधी गुट को निबटाने को यह खबर प्लांट करवाई हो? जहां तक मुझे मालूम है, पंजाब कैडर से प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी की बिहार कैडर से आए एक अधिकारी से दो—तीन महीने पहले ‘तू—तू, मैं—मैं' हुई थी। उस मामूली झगड़े ने पंजाब और बिहार कैडर मूल के अधिकारियों को लामबंद कर दिया। अब बिहार और यूपी कैडर मूल के अधिकारी पंजाब कैडर से आने वाले अधिकारियों को बदनाम करने की फिराक में हैं। यह बात मुझे अच्छी तरह पता है, चौरसिया बिहार कैडर मूल के अधिकारियों के संपर्क में है। उसी ने हरीश रावत के माध्यम से यह खबर प्लांट करवाई है।' दत्ता ने मानो खुलासा किया। शिवाकांत निर्विकार भाव से उनकी बात सुनता रहा।

‘जानते हो...सुबह यह खबर पढ़ते ही मैं समझ गया था। इस खबर के पीछे क्या खेल है? चौरसिया समझता है, मैं इस मामले में चुप रहूंगा? सीएमडी को चौरसिया की करतूत बताउं+गा। परसों वे नोएडा आने वाले भी हैं। दिल्ली में खरीदे गए होटल के उद्‌घाटन समारोह में उनसे मुलाकात होगी ही। शायद वे यहां भी आएं, सारा कच्चा चिट्ठा खोलता हूं चौरसिया की। वह क्या समझता है। ऐसी बेहूदा हरकतें करता रहेगा और मैं चुप रहूंगा। अखबार को मैंने अपने खून पसीने से सींचा है। उसे बरबाद तो होने नहीं दूंगा।'

शिवाकांत का धैर्य चुक गया।

‘सर...आप यह सब मुझे क्यों बता रहे हैं? आपको जो करना है, कीजिए। उन्हें जो करना हो, वे करें। मुझे बीच में घसीटने से क्या फायदा है? मैं तो न इस पाले में हूं, न उस पाले में? फिर भी बीच में पिस मैं ही रहा हूं। आप दोनों लोग मुझे बख्श दें। शांति से नौकरी करने दें, तो करूं...नहीं तो नौकरी छोड़—छाड़कर चला जाउं+। मैं तो बहुत आजिज आ गया हूं ऐसी पत्राकारिता से। लखनऊ जाकर कोई परचून की दुकान खोल लूंगा, ज्यादा सुखी रहूंगा।'

शिवाकांत की बात सुनते ही दत्ता अवाक रह गए। उन्हें ऐसी प्रतिक्रिया की आशा नहीं थी। उन्हें लगा, शिवाकांत के अंदर ही अंदर कुछ पक रहा है। कुछ ऐसा है, जो उनको और शिवाकांत को विस्फोटक स्थिति में ला सकता है। वे शिवाकांत के पर कतरने की फिराक में तो थे, लेकिन अपना नुकसान करके नहीं। फिलहाल उन्होंने अपमान का घूंट पीकर हट जाने में ही भलाई समझी।

‘अच्छा चलो अपना काम करो' कहकर दत्ता आगे बढ़ गए। शिवाकांत खड़ा उन्हें जाता हुआ तब तक देखता रहा, जब तक वे अपने चैंबर में नहीं चले गए। वह खिन्न मन से आकर अपनी सीट पर बैठ गया। उसकी सीट की बगल में ही बैठे प्रतुल गुप्ता ने उसे खिन्न देखा, तो शिवाकांत के पास आकर बैठ गया।

मामले की टोह लेने की नीयत से प्रतुल गुप्ता ने कहा, ‘क्या हुआ, भाई साहब! बहुत खफा दिख रहे हो। क्या पट्टी पढ़ा रहा था...बंगाली?'

‘देखो...तुम जाकर अपना काम करो। दूसरों के मामले में ज्यादा टांग मत अड़ाओ। कभी—कभी टांग टूट जाया करती है। अगर ज्यादा ही मामले को जानने की इच्छा है, तो जाकर दत्ता जी से पूछ लो।' शिवाकांत ने अपने दायें हाथ की पांचों अंगुलियों को चटकाते हुए कहा और कंप्यूटर ऑन करने लगा।

‘तो इतना भाव क्यों खा रहे हैं? ...पूंछ दबाई दत्ता ने और काटने को दौड़ रहे हो मुझे। मैंने तो सिर्फ हाल—चाल ही पूछा था? कोई गाली तो नहीं दी थी?' प्रतुल गुप्ता भी ऐंठ गया। वह शिवाकांत के सामने पड़ी कुर्सी को खींच कर बैठ चुका था, लेकिन अपनी बात कहने का बाद उठा और अपनी सीट की ओर बढ़ चला।

गुप्ता की बात सुनकर शिवाकांत के तन बदन में आग लग गई। उसने पलटकर जवाब देते हुए कहा, ‘काटता होगा तू...तू होगा चौरसिया या दत्ता का कुत्ता। लेकिन मैं कुत्ता नहीं हूं...न दत्ता का...न चौरसिया का। जब से इस संस्थान में आए हो, तब से कभी इनकी पत्ता चाटी कर रहे हो, तो कभी उनकी। क्या मैं नहीं जानता, तू ऑफिस में चौरसिया से सटा रहता है। सुबह दत्ता के घर की सब्जी लाता है, शाम को चौरसिया की दारू। तेरे जैसा दोगला चरित्रा न मेरा है, न मैं बर्दाश्त करता हूं। सुन...गुप्ता...आज के बाद अगर तू मेरे मुंह लगा, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। भड़वा कहीं का...।'

‘देखो...शिवाकांत... तुम हद से ज्यादा बढ़ रहे हो। अपनी जुबान को लगाम दो, वरना अभी वही होगा, जो आकृति और शिवांगी के बीच हुआ था। हमारे बीच होने वाली मारपीट का तमाशा लोग देखेंगे और नतीजा हम दोनों की बर्खास्तगी। मैं यहां कोई तमाशा नहीं खड़ा करना चाहता, वरना आपको मुंह तोड़ जवाब देना मुझे भी आता है। आप सीनियर हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप हर किसी का अपमान करते रहेंगे?'

अपनी सीट पर जाते प्रतुल गुप्ता ने पलटकर शिवाकांत से कहा। वह क्रोध में कांप रहा था। यदि उसे बर्खास्तगी का डर नहीं होता, तो वह अब तक शिवाकांत पर हाथ उठा चुका होता। उसके चुप रहने का कारण यह भी था कि छह महीने पहले उसने किडनी का ऑपरेशन कराया था। किडनी में स्टोन था। डॉक्टर ने भारी चीजें उठाने और ज्यादा दौड़ भाग करने से मना किया था। अपनी बात कहने के बाद प्रतुल गुप्ता सीधे पृथ्वी एक्सप्रेस के संपादक रवींद्र चौरसिया के पास पहुंचा।

उसे देखते ही चौरसिया मुस्कुराए।

‘आओ...आओ...मैं अभी तुम्हें ही बुलाने वाला था। एक खुशखबरी सुनाउं+...परसों सीएमडी साहब पृथ्वी एक्सप्रेस के प्रधान संपादक शुभ्रांशु दत्ता को गुड बाई कहने वाले हैं। अभी थोड़ी देर पहले ही उनसे बात हुई है न...! वे अखबार के गिरते स्तर और प्रसार को लेकर काफी दुखी और चिंतित हैं। मैंने तो सीएमडी साहब से कह दिया। संपादकीय वे देखते हैं, सरकुलेशन में उन्होंने अपने चमचों को भर्ती कर रखा है। अब अगर अखबार का स्तर और सरकुलेशन गिर रहा है, तो इसके लिए वे ही जिम्मेदार हुए न! सरकुलेशन मैनेजर सुदीप गांगुली की भी शायद छुट्टी हो जाए। तुम देखते रहो, मैंने ऐसा पेंच भिड़ाया है कि दत्ता और उनके सारे प्यादे एक ही चाल में मात खा जाएंगे।' चौरसिया ने गुप्ता को बैठने का इशारा किया।

‘सर...दत्ता का कुछ हो या न हो, लेकिन उससे पहले इस शिवाकांत का कुछ कीजिए। आजकल कुछ ज्यादा ही भौंकने लगा है। अभी थोड़ी देर पहले दत्ता, श्याम सुंदर पांडेय, प्रतिमान विश्वकर्मा और शिवाकांत पता नहीं क्या बतिया रहे थे। लगे होंगे साले किसी साजिश में। मैंने मजाक में ही पूछ लिया, क्या बातें हो रही थीं? बस...भड़क गया साला शिवाकांत...। लगा उलुलजुलूल बकने। मुझसे बात की तो मुंह तोड़ दूंगा, मेरा चौरसिया कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। जाओ, चौरसिया से जो कहना हो, कह दो...देखूं मेरा क्या उखाड़ लेते हैं। अब भला बताइए, सर! जूनियर स्टाफ के सामने आपको खुलेआम गालियां दी जाएं, तो क्या मैं बर्दाश्त कर लूंगा। सर...मैंने भी खूब गालियां सुनाई। कुछ लोगों ने आकर बीच—बचाव कर दिया, वरना साले की हड्डी पसली तोड़ ही देता। भले ही आप मुझे टर्मिनेट कर देते।'

गुप्ता लगातार बोलता जा रहा था। चौरसिया मुंह में रखे पान को चबा—चबाकर पान और गुप्ता की बातों का रस लेते जा रहे थे। उन्होंने गुप्ता को अपनी पूरी बात कह लेने का भरपूर मौका दिया।

‘तोड़ देना था न हाथ—पैर। मैं तो हूं ही...देखूं कौन साला बीच में आता। अरे यार! संपादक मैं हूं...संपादकीय में किसकी मर्जी चलेगी? संपादक की न...आरएनआई में किसका नाम दर्ज है? मेरा न...सरकारी रिकॉर्ड में जिसका नाम दर्ज है, सरकार भी उसी की सुनेगी। प्रधान संपादक—वंपादक किसी लाइन में नहीं लगते। एक फूंक मारूंगा, तो ऐसे उड़ जाएंगे, जैसे कभी थे ही नहीं। अरे यार...तुम भी कैसी बात करते हो। उसे औकात बतानी थी न। बतानी थी न उसको औकात।' चौरसिया ने पान की पीक डस्टबिन में थूक दी। चौरसिया की बात सुनकर प्रतुल गुप्ता ने राहत की सांस ली।

‘लेकिन साहब! इसका कुछ बंदोबस्त कीजिए...यह साला जब तक रहेगा, छुट्टा सांड की तरह कभी इधर सींग मारेगा, कभी उधर। मेरा सुझाव है सर जी, इसका कहीं दूसरी जगह ट्रांसफर करवा दो। साला...न्यूज एडीटर न हुआ, आंख में पड़ा हुआ तिनका हो गया। न निकल रहा है, न आंख खुलने दे रहा है। यह चला गया, तो समझिए सर...एक कांटा निकल गया पांव में गड़ा हुआ।'

‘अरे यार! ये लोग चिल्लर—फुटकर टाइप के लोग हैं...दत्ता को निपटने दो। ये ऐसे ही बेमौत मर जाएंगे। इन्हें मारकर अपना हाथ गंदा करना है। बस...जहां दो साल इंतजार किया, वहीं दो दिन और इंतजार करो। परसों तक सारा कचरा साफ हो जाएगा। परसों आ रहे हैं न सीएमडी भदौरिया साहब।' संपादक चौरसिया ने टीवी पर आ रही खबरों पर नजर गड़ाते हुए कहा।

तभी केबिन का दरवाजा खोलकर दत्ता ने प्रवेश किया। उन्हें देखते ही प्रतुल और चौरसिया खड़े हो गए।

‘अरे सर! आपने क्यों कष्ट किया? आप मुझे बुला लेते। ...वैसे भी मैं अभी थोड़ी देर बाद आपसे मिलने वाला था। कुछ व्यक्तिगत बात करनी थीं।' चौरसिया ने दत्ता को बैठने का इशारा किया।

‘कोई बात नहीं चौरसिया जी। आप आएं या मैं आउं+, बात बराबर है। हां, आपसे कुछ बातों पर विचार विमर्श करने आया हूं। आप तो जानते ही हैं, परसों सीएमडी साहब दिल्ली आ रहे हैं। इसी बारे में आपसे कुछ मुद्दों पर राय लेनी थी।' इतना कहकर वे प्रतुल गुप्ता की ओर मुडे़, ‘प्रतुल...तुम्हारा काम शुरू हुआ या नहीं? इधर दो—तीन दिनों से अखबार टाइम पर नहीं छूट रहा है। कई सेंटरों से तो पेपर वापस आ रहे हैं, लेट पहुंचने की वजह से। हॉकर अखबार उठाने से ही मना कर रहे हैं। वे कहते हैं, समय पर अखबार आएगा, तो उठाएंगे। एक अखबार के चलते दूसरे अखबारों को विलंब से बांटने वाले नहीं हैं वे। तुम ऐसा करो, अपना काम पूरा करने के बाद पहले पेज या को—आर्डिनेशन के साथियों की मदद किया करो। उनके पास काम ज्यादा होने से पहला और देश—विदेश का पेज लेट हो रहा है।'

‘बस...सर, एक व्यक्तिगत मामले में सर से सलाह लेने आया था। निकल ही रहा था कि आप आ गए। मैं अपना काम निपटाकर दूसरे साथियों की मदद करता हूं। सर

...मेरा एक सुझाव है, अगर आप मानें तो कहूं। अगर दूसरे डेस्क के साथी शिवाकांत जी से मदद मांग लिया करें, तो बेहतर होगा। वे वैसे भी खाली रहते हैं। बस...ट्रैक पर खबरें देखना और इंटरकाम पर लोगों को निर्देश देना, यही तो काम है उनके पास। यदि वे लोगों की कुछ मदद कर दिया करें, तो सभी पेज समय पर ही छूटेंगे।' इतना कहकर प्रतुल गुप्ता चैंबर से बाहर निकल गया।

उसने जाते—जाते एक जाल फेंका। वह पूरी तरह आश्वस्त था, इस जाल में मछली फंसेगी ही फंसेगी। उसे पूरी उम्मीद थी कि शिवाकांत से खार खाए बैठे दत्ता और चौरसिया मौका पाते ही उसे प्रताड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ने वाले हैं। प्रतुल गुप्ता की यही खूबी थी। वह अपने विरोधियों को इतनी सफाई से निपटाता है कि विरोधियों को तनिक भी आभास नहीं होने पाता कि उसका गला कब रेत दिया गया है। वह जिससे भी मिलता, मीठी—मीठी बातें करके उसका मन मोह लेता। दिल में कपट छुरी रखने के बाद भी वह किसी को एहसास नहीं होने देता। बस आज...पता नहीं किस मूड में था कि वह शिवाकांत से भिड़ गया। उसकी जगह कोई दूसरा होता, तो शिवाकांत से हाथापाई तय थी। लेकिन जिस तरह प्रतुल गुप्ता ने अपने आपको नियंत्राण में रखा, यह सिर्फ उसके ही वश की बात थी।

‘तुम अपनी सीट पर जाओ...मैं देखता हूं इस मामले को।' दत्ता ने प्रतुल को एक तरह से जाने का निर्देश दिया।

गुप्ता के जाने के बाद दत्ता ने चौरसिया की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘सर, बात यह है, परसों सीएमडी के आने पर मैं चाहता हूं कि कोई ऐसी—वैसी बात न हो, जिससे लगे, हम दोनों के बीच कोई मतभेद है। वैसे भी हमारे बीच कोई मतभेद जैसी चीज है ही नहीं। यह तो खामख्वाह लोगों ने मेरे और आपके बीच पैदा कर दी है। चौरसिया जी, आप यकीन मानिए, मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूं। हम लोगों को लगभग दो साल एक साथ काम करते हुए हो गया है, लेकिन आपको क्या कोई ऐसी घटना याद है, जब हम दोनों किसी मुद्दे पर आमने—सामने आ हुए हों?'

दत्ता के आने का कारण समझ में आते ही चौरसिया फैल गए। उन्होंने भी कूटनीतिक पासा फेंकते हुए कहा, ‘सर...मतभेद या मनभेद जैसी तो बात ही नहीं है। हम दोनों रोज मिलते हैं, आपस में खबरों पर डिस्कस करते हैं। देखने वालों की आंखें

क्या फूट गई हैं? वे यह नहीं देख सकते, हम किस तरह आपसी सामंजस्य बिठाकर

काम कर रहे हैं? दत्ता जी...कहने वालों को कहने दीजिए। उनके कहने से क्या होता है? वे अपने मुंह की खाएंगे। जब हमारे आपके बीच कुछ है ही नहीं, तो वे क्या कर लेंगे? आप निश्चिंत रहें।'

‘अच्छा यह शिवाकांत वाला क्या मामला है! अभी थोड़ी देर पहले मुझे मालूम हुआ। शिवाकांत की प्रतुल गुप्ता से झांय—झपट हुई है। चौरसिया जी! शिवाकांत की बद्‌तमीजियां हद से ज्यादा बढ़ती जा रही हैं। कई बार वह ऐसा उटपटांग जवाब देता है जिसे सुनकर मन होता है, अभी ऑफिस से निकाल बाहर करूं। फिर आपका ख्याल आ जाता है। आपका मुंह लगा है, इसलिए अपना अपमान बर्दाश्त कर लेता हूं।' दत्ता ने वही जाल चौरसिया पर फेंका, जिसे थोड़ी देर पहले प्रतुल फेंक कर गया था।

‘देखिए दत्ता जी, जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। किसी की करनी का मैं या आप जिम्मेदार तो हो नहीं सकते। अगर उसने ठान ही लिया है कि टर्मिनेट होना है, तो उसे कोई नहीं बचा सकता है, न मैं...न आप, न ब्रह्मा।'

इतना कहकर चौरसिया फिस्स से हंस पड़े, ‘आप कुछ सीएमडी सर के आने के प्रोग्राम के बारे में बात कर रहे थे। वह तो परसों आ रहे हैं। उसमें हम लोग क्या कर सकते हैं! मेरा ख्याल है, उनका आधा समय तो कंपनी के लीडरों, एजेंटों, सहभागियों से बातचीत करने में ही निकल जाएगा। बाकी बचा समय वी एक्सप्रेस चैनल के हेड सुदेश कुमार के हिस्से में जाएगा। पिछली बार भी जब सीएमडी सर आए थे, तो उनके इर्द—गिर्द चैनल वाले ही घूमते रहे। हम लोगों को कहां ज्यादा समय दिया था। चलते समय बस बीस मिनट के लिए हम दोनों ही बुलाए गए थे। समय की कमी का रोना रोकर सीएमडी सर यह आश्वासन देकर चले गए थे, अगली बार आउं+गा, तो सिर्फ आप लोगों से मिलूंगा। सर जी! मुझे नहीं लगता, इस बार भी हम लोगों को ज्यादा समय मिल पाएगा? हां, चलेंगे हम सब। देखते हैं, क्या होता है वहां।'

‘चौरसिया जी...आपकी बात बिल्कुल सही है। फिर भी कुछ तैयारियां तो हम लोगों को करनी ही पड़ेंगी। ऐसा करते हैं, कुछ बुके मंगवा लेते हैं सीएमडी और एमडी के स्वागत के लिए। अपने स्टाफ की कुछ सुंदर लड़कियों को उनके स्वागत की जिम्मेदारी दे देते हैं। सीएमडी सर लड़कियों को देखकर शायद खुश हो जाएं।' इतना कहकर दत्ता बड़ी फूहड़ हंसी हंसे, ‘चौरसिया जी, पेजिनेशन डिपार्टमेंट में एकाध लड़कियां हैं, जो खूबसूरत होने के साथ—साथ ओपेन माइंडेड हैं। अगर उनके हाथ से सीएमडी, एमडी और सीईओ सर को बुके दिलवाया जाए, तो मेरा ख्याल है, ठीक रहेगा। सुदेश कुमार ने चैनल की लड़कियों की ड्यूटी उनके स्वागत में लगाई है। उनके यहां तो लड़कियों की भरमार है। एंकर से लेकर सफाई कर्मचारी तक सभी सुंदर लड़कियों को बुलाकर समझा दिया गया है। संकेत—संकेत में सब कुछ बता भी दिया गया है।'

कनाट प्लेस के पास स्थित होटल ‘पशमीना' दुल्हन की तरह सजा हुआ था। उद्‌घाटन समारोह में आमंत्रिात लगभग सभी लोग आ चुके थे। न्यूज चैनल वी एक्सप्रेस की रात पाली और दैनिक समाचार पृथ्वी एक्सप्रेस के आवश्यक स्टाफ को छोड़कर लगभग सभी कर्मचारी होटल पशमीना पहुंच चुके थे। शिवाकांत की बाइक पर ही निखिल निखिलेश उद्‌घाटन समारोह में आए थे। पृथ्वी फाइनांस ग्रुप के कुछ खास—खास कर्मचारी, लीडर्स भी शाम छह बजे से ही आने लगे थे। सीएमडी के निकट समझे जाने वाले लीडर्स, चैनल हेड सुदेश कुमार, दैनिक पृथ्वी एक्सप्रेस के प्रधान संपादक शुभ्रांशु दत्ता और संपादक रवींद्र चौरसिया होटल के प्रवेश द्वार पर ही खड़े सीएमडी भदौरिया और एमडी नवीन सिन्हा का इंतजार कर रहे थे। शिवाकांत और निखिल ने प्रवेशद्वार के दायीं ओर खड़े होकर इंतजार करने में ही भलाई समझी। होटल के समारोह हॉल में सभी आगंतुकों के बैठने की व्यवस्था की गई थी। स्टाफ को छोड़कर सभी आगंतुकों को हॉल में बिठाया जा रहा था। सीएमडी के आने का समय जैसे—जैसे नजदीक आता जा रहा था, द्वार पर उपस्थित लोगों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। शिवाकांत ने निखिल की बांह पकड़ी और भीड़ से खींचकर अलग

ले गया।

शिवाकांत ने कहा, ‘भाई साहब! एक बात बताइए। सीएमडी सर ने यह होटल कितने में खरीदा है?'

निखिल ने गुटखे की पीक सबकी निगाह बचाकर पास रखे गमले में थूकते हुए कहा, ‘सुनने में आया है कि पैंतीस करोड़ में खरीदा गया है यह होटल। बाकी भगवान जाने। इन लोगों का जाल—जंजाल कहां समझ में आता है?'

‘क्या आपको लगता है, इसकी कीमत पैंतीस करोड़ रुपये होगी?' शिवाकांत ने अगला सवाल पूछा।

‘जहां तक मेरा अंदाजा है, इस होटल की वर्तमान कीमत मुश्किल से बीस—बाइस करोड़ रुपये होगी।'

‘फिर पैंतीस करोड़ में क्यों खरीदा गया होटल? क्या अपने सीएमडी को यह दिखाई नहीं देता? इतने नासमझ या बेवकूफ तो नहीं दिखते हैं सीएमडी सर...फिर वे होटल को पैंतीस करोड़ में खरीदने को कैसे तैयार हो गए? यह बात मेरी समझ में नहीं आती है। आखिर उन्होंने कुछ तो सोचा होगा यह होटल खरीदने से पहले? क्या अब तक कंपनी ने जितनी भी प्रॉपर्टी खरीदी है, ऐसे ही खरीदी है? कम कीमत की प्रॉपर्टी दोगुनी—तिगुनी कीमत में?' शिवाकांत ने जिज्ञासा जाहिर की, ‘आपको पता है, निखिल सर! कंपनी ने लखनऊ में एक शॉपिंग मॉल खोला है। बनी बनाई बिल्डिंग खरीदकर। उस बिल्डिंग की कीमत बमुश्किल चार या पांच करोड़ रुपये होगी। उसे लखनऊ के जोनल मैनेजर शक्ति सिंह ने नौ करोड़ रुपये में खरीदवाया है। उस शॉपिंग मॉल में सामान भरने पर भी लगभग चार से पांच करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। शॉपिंग मॉल के मैनेजर से लेकर चपरासी तक का वेतन और अन्य खर्चों को मिलाकर लगभग बाइस से पच्चीस लाख रुपये महीने खर्च होते हैं। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा, उस मॉल की रोज की बिक्री पंद्रह से बीस हजार रुपये ही होती है।'

शिवाकांत की बात सुनकर निखिल ने नाक से सिर्फ ‘हूंऊ...' की आवाज निकाली। शिवाकांत बोलता गया, ‘अब भाई साहब! बताइए...मॉल से महीने में मिलते हैं तकरीबन पांच से छह लाख रुपये और खर्च होते हैं बीस से बाइस लाख रुपये। यह कैसा व्यापार है? आखिर ऐसे बेहूदा और अव्यावहारिक सुझाव सीएमडी को कौन देता है? अब इसी होटल को लीजिए। आप क्या समझते हैं, इस होटल से करोड़—दो करोड़ रुपये महीने की कमाई हो सकेगी? स्टाफ, मेंटिनेंस, बिजली और सरकारी टैक्स आदि दे—दिवाकर चालीस—पैंतालिस लाख रुपये महीने खर्च ही हो जाएंगे। अब अगर महीने में सत्तर—अस्सी लाख रुपये आ भी गए, तो फायदा क्या हुआ?'

निखिल ने फिर लोगों की निगाह बचाकर गमले में थूक दिया।

‘मैं एक बात बताउं+, सब चोट्टे हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक सब करप्ट हैं। तुम क्या समझते हो...सस्ते होटल और शॉपिंग मॉल्स महंगे दामों में खरीदने के पीछे सीएमडी, एमडी, रीजनल या जोनल मैनेजरों की बेवकूफी है? नहीं ...सीएमडी से लेकर नीचे तक सबको हिस्सा मिलता है इस खरीदारी के ऐवज में।'

‘भाई जी! एक बात फिर भी मेरी समझ में नहीं आई। इस घपले—घोटाले में भला एमडी, सीएमडी क्यों शामिल होने लगे? इस पूरी कंपनी के मालिक तो वही लोग हैं। वे अपनी ही कंपनी में घोटाला करेंगे? सस्ती चीजों को महंगे दामों में खरीदना दिखाएंगे, यह मेरी समझ से परे है।' शिवाकांत ने आश्चर्य व्यक्त किया।

‘इस बात को ऐसे समझो। बड़ी महीन बात है। पूरी कंपनी के संस्थापक या मालिक जो भी कहिए, सीएमडी भदौरिया साहब हैं। हालांकि उन्होंने अपने को भी एक कर्मचारी घोषित कर रखा है। बाकायदा कंपनी से तनख्वाह लेते हैं। इसी होटल का उदाहरण लो। इस होटल की वास्तविक कीमत बीस से बाइस करोड़ रुपये है। सीएमडी ने किसी को लगा दिया और उसने बार्गेनिंग करके इसकी कीमत अट्ठारह—उन्नीस करोड़ रुपये फिक्स करवा दी। सीएमडी ने कंपनी के बहीखाते में इसकी कीमत पैंतीस करोड़ रुपये दर्ज दिखाई। सोलह—सत्राह करोड़ रुपये जो भी बचे। उसे आपस में बांट लिया। खानापूर्ति भी हो गई और जेब भी गरम हो गई।' निखिल ने शिवाकांत को समझाने का प्रयास किया।

‘फिर भी बात मेरी समझ में नहीं आई, भाई साहब। आखिर उन्हें क्या गरज पड़ी है, यह घोटाला करने की? भले ही वे तनख्वाह लेते हैं, लेकिन हैं तो मालिक ही न! आप कुछ भी कहें, अपनी ही अमानत में खयानत करने की यह मिसाल कम से कम मेरी समझ से परे है।' शिवाकांत ने गमले में लगे पौधे की पत्ती तोड़कर दांतों के बीच दबा दी। अटपटा स्वाद महसूस होते ही दीवार पर थूक दिया।

‘यार...तुम्हें समझा पाना बड़ा मुश्किल है। यह तो तुम अच्छी तरह जानते हो कि पृथ्वी फाइनांस ग्रुप एक चिटफंड कंपनी है। पैसा किसका है, पब्लिक का। अभी तो कंपनी जनता से रकम उगाहती जा रही है, लोगों को बड़े—बड़े और सुनहरे ख्वाब दिखाए जा रहे हैं। दस—पांच साल बाद जनता से उगाहा गया पैसा जनता को वापस भी करना है कि नहीं? मान लो, आज जनता से चालीस करोड़ महीने विभिन्न स्कीमों के तहत उगाहे जा रहे हैं। इसी चालीस करोड़ में से बारह—पंद्रह करोड़ रुपये तो स्टाफ का वेतन, ऑफिस खर्च, एजेंटों का कमीशन निकल जाता है। बाकी बचे लगभग पच्चीस करोड़ रुपये...इसमें से एकाध करोड़ रुपये रीजनल, जोनल मैनेजर मार जाते हैं, लीडर्स डकार जाते हैं। बाकी बचे तेइस—चौबीस करोड़ रुपये। यही एक्चुअल में कंपनी के खाते में जमा होता है। इसी पैसे से कंपनी जमीन खरीदती है, होटल्स या शॉपिंग माल्स खरीदती है। इस पैसे को वसूलते समय एजेंटों ने लोगों को पांच—सात साल में दोगुना—तिगुना करने का आश्वासन दिया होगा। पांच—सात साल बाद सोचो क्या स्थिति होगी। कंपनी ने चालीस करोड़ रुपये वसूले। नियत समय पर उसे लौटाने होंगे अस्सी करोड़ रुपये। कंपनी के खाते में गए सिर्फ तेइस—चौबीस करोड़...अब कंपनी देनदारी वाला पैसा लाएगी कहां से? इन होटलों, माल्स या जमीनों से तो कमाई होने से रही?' जैसे—जैसे निखिल अपनी बात को आगे बढ़ाते जा रहे थे, शिवाकांत के सामने चिटफंड कंपनियों की काली दुनिया उजागर होती जा रही थी। वह मुंह बाए सिर्फ निखिल का चेहरा देखता जा रहा था।

‘इसका सीधा और सस्ता—सा उपाय है। एक दिन बोरिया बिस्तर समेटकर रफू चक्कर हो जाओ। कंपनी के सिपहसालार रफू चक्कर होंगे, तो जितनी भी चल—अचल संपत्ति है, उसे तो सरकार जब्त ही कर लेगी। अगर कंपनी के कर्ताधर्ता पुलिस की गिरफ्त में आने से बच गए, तो उनके हाथ लगेगा वही पैसा जो उनके, बीवी—बच्चों या रिश्तेदारों के खातों में जमा होगा। सस्ती चीजों को महंगे दामों में खरीदने का खेल उस दिन के संकट से निपटने के लिए खेला जा रहा है। कंपनी के खाते में जमा पैसा चोर दरवाजे से सीएमडी, एमडी और लीडर्स के व्यक्तिगत खातों में जमा हो रहा है।' इतना कहकर निखिल ने शिवाकांत से कहा, ‘आओ देखते हैं। शायद सीएमडी साहब आ गए हों।'

दोनों मुख्य द्वार पर पहुंचे, तो गहमागहमी कुछ ज्यादा थी। निखिल ने वहां खड़े एक आदमी से पूछा, तो पता चला कि सीएमडी अपने काफिले के साथ बस पहुंचने ही वाले हैं। चैनल हेड सुदेश कुमार उस व्यक्ति को खोज रहे थे जिसे बुके और फूल—मालाओं को उचित समय पर पेश करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। सुदेश कुमार चैनल की लड़कियों को दोनों तरफ पंक्तिबद्ध होकर हाथों में थाल और बुके लेकर पहले ही खड़ा कर चुके थे। उन्हें निर्देश था, जैसे ही सीएमडी वगैरह आएं, उन पर फूल बरसाए जाएं। उनके मस्तक पर रोली तिलक लगाया जाए। उन्हें सम्मान के साथ बुके पेश किए जाएं। इस काम में कहीं कोई गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए।

आगंतुकों के इंतजार में खड़े निखिल और शिवाकांत को कोफ्त हो रही थी। वे सोच रहे थे, इससे अच्छा था वे दफ्तर में रहकर अखबार निकालने में सहयोग करते। लेकिन चौरसिया और दत्ता का आदेश था कि फंक्शन में उनका रहना जरूरी था। लगभग आधे घंटे बाद शोर मचा, ‘ सीएमडी साहब आ गए... सीएमडी साहब आ गए...।' शोर सुनकर उन दोनों ने संतोष की सांस ली। उन दोनों ने देखा, सीएमडी भदौरिया ने गाड़ी से उतरने के बाद बड़ी शान से होटल को पलभर निहारा और आगे बढ़ चले। सुदेश कुमार, दत्ता, चौरसिया के साथ फाइनांस कंपनी के अधिकारी गण उनके स्वागत में लपके। सीएमडी सबसे हाथ मिलाते जा रहे थे। पास पहुंचने पर दोनों तरफ पंक्तिबद्ध खड़ी लड़कियां पुष्प बरसाती जा रही थीं। आगे बढ़कर तिलक लगा रही थीं, बुके प्रदान कर रही थीं। सीएमडी के साथ उनका बीस वर्षीय पुत्रा कार्तिकेय सिंह भदौरिया भी आया था। वह मुंह बाये कतार में खड़ी लड़कियों को घूरता जा रहा था। उसकी आंखों में आश्चर्य था? वासना थी? कौतूहल था? ...यह शिवाकांत नहीं समझ पाया। वह कार्तिकेय का लड़कियों को घूरना देखता रहा। यह स्थिति शायद कंपनी के एरिया मैनेजर मोम्मद तारिक सिद्दीकी ने भांप ली। उसने कार्तिकेय के पास खड़ी लड़की को इशारा किया, तो वह कार्तिकेय के पास गई, ‘सर

...गुड इवनिंग।'

कार्तिकेय ने झट से नजरें फेर लीं, ‘गुड इवनिंग।'

कार्तिकेय ने अपने पिता को इनाग्रेशन रिबन काटते देखा, तो वह उनके पास जाकर खड़ा हो गया। सीएमडी के रिबन काटते ही तालियां बज उठीं। हर कोई चाहता था, सीएमडी उसे तालियां बजाते देखें, पल भर को ही सही। कुछ लोग तो देर तक तालियां पीटते रहे। जब उन्हें लगा कि आसपास उपस्थित लोगों के चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट तैर रही है, तो उन्होंने हाथ नीचे कर लिये।

होटल के अंदर बनाये गए मंच पर सीएमडी, सीएमडी पुत्रा, चैनल हेड सुदेश कुमार, पृथ्वी एक्सप्रेस के प्रधान संपादक शुभ्रांशु दत्ता, दिल्ली के जोनल मैनेजर ऋषिकांत यादव सहित कुछ अन्य लोगों ने आमंत्रिात किए जाने पर स्थान ग्रहण कर लिया। मंच के सामने विशेष अतिथियों और प्रमुख अधिकारियों के बैठने की व्यवस्था थी। मजबूरन संपादक चौरसिया ने विशेष अतिथियों वाली कुर्सी पर कब्जा जमाया। हालांकि मंच पर न बुलाए जाने से वे काफी आहत थे। उन्हें लग रहा था, दत्ता और सुदेश ने जानबूझकर उन्हें अपमानित करने के लिए ही ऐसा किया है। वे मन मसोस कर रह गए। वे यह बात अच्छी तरह से समझते थे, प्रतिक्रिया व्यक्त करने का यह उचित समय नहीं है। मन ही मन उचित समय पर वे ब्याज सहित लौटाने का भी निश्चय कर चुके थे।

कार्यक्रम शुरू हुआ, तो काफी देर तक चला। सबने सीएमडी, एमडी की तारीफ के पुल बांधे। उन्हें मैनेजमेंट में माहिर, कृपालु, दयावान और न जाने किन—किन उपाधियों से विभूषित करके दूसरों से बाजी मारने की कोशिश की गई। स्वस्ति वाचन के दौरान सीएमडी भदौरिया के चेहरे पर मुस्कान आ जाती या उसकी ओर देख लेते, तो भाषण देने वाला मुदित हो जाता। दूसरों के चेहरे बुझ जाते। कुछ लोग तो सिर्फ यही देखते रहते कि किसकी बात पर सीएमडी ने तालियां बजार्इं, किसकी ओर देखा या उस दौरान उनकी भाव भंगिमा कैसी रही। इसके पीछे एक मनोविज्ञान काम कर रहा था। उस व्यक्ति के प्रति वैसा ही व्यवहार करने, लल्लो—चप्पो करने या उपेक्षा करने का। शिवाकांत लल्लो—चप्पो और प्रशंसा में कसीदे काढ़ने की इस होड़ को देखकर चकित और व्यथित था।

सबसे बाद में बोलने की बारी आई सीएमडी की। उन्होंने पहले अपने संघर्ष की गाथा सुनाई। साथियों के सहयोग की प्रशंसा की और फिर कंपनी की संक्षिप्त प्रगति रिपोर्ट पेश की। संघर्ष के दिनों के कुछ संस्मरण भी उन्होंने लोगों की मांग पर सुनाए। कुछ लोगों की हथेलियां ताली पीटते—पीटते लाल हो गर्इं, लेकिन जब तक सीएमडी बोलते रहे, वे अपने साधना कर्म में लगे रहे। अपने संबोधन के बाद भदौरिया जैसे ही मंच से उतरे, उनके सामने परमानंद बैठा जा खड़े हुए। भदौरिया ने अपनी चिरपरिचित मुस्कान बिखेरते हुए उनका हालचाल पूछा, तो उन्होंने अलग से कुछ समय देने की गुजारिश की।

सीएमडी भदौरिया ने इधर—उधर देखा और बोले, ‘कोई खास बात है?'

‘हां सर...बहुत खास है...संस्थान के संदर्भ में...अगर आप दस मिनट दे सकें, तो मेहरबानी होगी।'

भदौरिया ने अपनी निगाह फिर चारों ओर दौड़ाई। पास खड़े शिवाकांत से उनकी निगाह मिली, तो उसने सीएमडी का अभिवादन किया। सीएमडी ने उसे पास आने का इशारा किया। वह लपक कर भदौरिया के पास गया और खड़ा हो गया। हॉल में लोगों के हंसने, बातचीत करने की आवाज के चलते परमानंद की बात सुनने में उन्हें परेशानी हो रही थी। उन्होंने दार्इं ओर खाली जगह पर आने का इशारा किया और उस ओर बढ़ चले। किंकर्तव्यविमूढ़—सा शिवाकांत पहले तो खड़ा रहा और फिर वह भी परमानंद के साथ चल पड़ा।

सुविधाजनक स्थान पर पहुंचने के बाद भदौरिया ने कहा, ‘हां...अब बताइए, क्या बात है?'

परमानंद बैठा ने न्यूज चैनल वी एक्सप्रेस में हो रही अनियमिताओं के बारे में संक्षिप्त रूप से बताया। उन्हें यह भी बताया कि किस तरह उनके साथ धोखाधड़ी की जा रही है। उन्हें जितनी तनख्वाह और सुविधाएं देने की बात कही गई थी, उसका आधा हिस्सा भी नहीं दिया जा रहा है। परमानंद ने दावा किया कि किस तरह उन्होंने राजनीतिक क्षेत्रा में चैनल को लोकप्रिय बनाया है। बातचीत के दौरान तैश में आकर परमानंद यह भी कह गए, अगर जितना वेतन तय किया गया था, उतना नहीं दिया गया, तो वे चैनल को बंद करा देंगे। सुदेश कुमार को उन्होंने मीडिया जगत का सबसे बड़ा नटवर लाल बताते हुए कहा कि अगर उनके साथ न्याय नहीं हुआ, तो वे नौकरशाही में अपनी पकड़ का उपयोग करते हुए सुदेश कुमार को जेल भिजवा देंगे। जब वह यह बात कह रहे थे, तो भदौरिया की भृकुटि तन रही थी। उन्हें चैनल हेड सुदेश कुमार के खिलाफ कही जा रही बातें पसंद नहीं आ रही थीं। लेकिन परमानंद बैठा थे कि रौ में अपनी बात कहते जा रहे थे। शिवाकांत कभी परमानंद बैठा को देखता, तो कभी भदौरिया को। वह जानता था, इस समय पृथ्वी एक्सप्रेस के सभी कर्मचारियों की नजरें उस पर ही टिकी हुई होंगी। उसे अपनी पीठ पर दत्ता और चौरसिया की चुभती नजरों का एहसास भी हो रहा था। एक बार तो सुदेश कुमार यह कहते हुए निकट आ गए, सर, आप कुछ खाएंगे?

भदौरिया ने खाने से मना करते हुए कहा, ‘आप लोग बाकी व्यवस्था देखिए। मैं जरा इनसे बात करके आता हूं।'

मजबूरन सुदेश कुमार को वहां से हटना पड़ा। वे चले तो गए, लेकिन जाते—जाते उन्होंने शिवाकांत को ऐसे देखा, मानो उसने भदौरिया को बंधक बना रखा हो और वह उन्हें छुड़ाने आया हो। परमानंद की बात सुनने के बाद भदौरिया यह कहते हुए आगे बढ़ गए कि तुम्हारी बातों पर आगरा पहुंचकर गौर करूंगा। फिलहाल, चैनल को अपना सहयोग देना जारी रखो। भदौरिया के जाते ही शिवाकांत ने चैन की सांस ली।

शिवाकांत होटल के बाहर ऐसे भागा, जिस तरह जाल में फंसा हिरन आजाद होने पर भागता है। बाहर चैनल का एक रिपोर्टर सिगरेट फूंकता मिल गया। उसने पूछा, ‘क्यों भाई साहब! कार्यक्रम खत्म हो गया?'

‘हां...लगभग खत्म ही समझो। लोग खा पी रहे हैं। इसके बाद तो कुछ रह ही नहीं जाता है।' यह कहकर शिवाकांत ने दो—तीन बार गहरी सांस ली। फेफड़े में ताजी हवा जाने पर राहत महसूस हुई। उसी समय अपने पूरे काफिले के साथ सीएमडी भदौरिया बाहर आए। शिवाकांत मुख्य द्वार से थोड़ा परे हट गया। सीएमडी के जाते ही सारे लोग एक—एक कर चले गए। फुटपाथ पर लगे एक पेड़ के तने का सहारा लेकर वह खड़ा रहा।

काफी देर बाद चैनल के आउटपुट में काम करने वाले जावेद सिद्दीकी की नजर उस पर पड़ी, तो वह पास आकर बोला, ‘क्यों बॉस...घर नहीं जाना है? सारे लोग चले गए। अगर कोई साधन न हो, तो मैं आपको पास के टैक्सी स्टैंड तक छोड़ सकता हूं। गाड़ी है मेरे पास।'

‘नहीं बॉस, मैं चला जाउं+गा। मेरे पास मोटरसाइकिल है।' कहकर शिवाकांत ने गाड़ी उठाई और घर चला आया।

रात के दो बजे थे। लाख कोशिश करने के बावजूद शिवाकांत को नींद नहीं आ रही थी। जैसे ही वह आंखें बंद करता, माधवी और बच्चों की तस्वीरें दिमाग में तैरने लगती थीं। आज बच्चे बुरी तरह याद आ रहे थे। बच्चों का रूठना, बात—बात पर पीठ पर लदना, उनकी प्यारी—प्यारी बातें, उसे सब कुछ याद आ रही थीं। पिछली बार जिस दिन उसे वापस आना था, उससे पूर्व की रात बाहों में सिमटी जा रही माधवी उदास थी। शिवाकांत को महसूस हुआ, उसकी आंखें नम हैं। गला रुंधा हुआ है। बोलने से भी बच रही थी माधवी।

शिवाकांत ने प्यार से दुलराया, तो माधवी ने कहा था, ‘आप किसी तरह यहीं आ जाइए। अब मैं थक गई हूं, भागते—भागते। कोई दुख हो, सुख हो, तो कहूं किससे? कोई तो चाहिए जिससे अपने मन की बात कहकर हलका हो लिया जाए। यहां तो खुद की ही बाहें हैं, टेकने को अपना ही घुटना है। जब आप साथ रहते थे, तब आपकी जरूरत उतनी महसूस नहीं होती थी। अब तो आप हर पल याद आते हैं। आपका झगड़ना, मेरा रूठना। मेरे रूठने पर आपका चुप रह जाना या फिर बच्चों के माध्यम से मुझे मनाना याद आता है, तो मन बेचैन हो जाता है। अब तो बच्चे भी बुझे—बुझे से रहते हैं। कल पड़ोस में रहने वाली बबिता अपने पापा के साथ बाजार जा रही थी, तो काफी देर तक अभिनव और अंकिता मायूस होकर उनको देखते रहे। अंकिता कह रही थी, आने दो पापा को। मैं भी ऐसे ही पापा का हाथ पकड़कर बाजार जाउं+गी।'

शिवाकांत का अंतरमन व्याकुल हो गया था। उसे उस रात भी काफी देर तक नींद नहीं आई थी। पिछले दो—ढाई साल से वह महीने में कुछ ही दिन बीवी—बच्चों का सान्निध्य पा रहा है। कब तक चलेगा ऐसे? कहीं कुछ पाने की होड़ में वह कुछ ऐसा तो नहीं गंवा रहा है, जिसकी भरपाई शायद जीवन भर न हो पाए? उसको हासिल भी क्या हो रहा है? कल जब वह जीवन का हिसाब लगाने बैठेगा, तो उसके बहीखाते में नफा कम और नुकसान ज्यादा दर्ज होगा। कई बार तो उसके मन में आया भी, चलो...छोड़ो यार! ऐसी कमाई से क्या फायदा, जब बीवी—बच्चों का साथ न हो। उनसे मिलने को मन तरस जाए, ऐसा वनवास नहीं चाहिए उसे। यह वनवास नहीं तो और क्या है? वह सोचने लगा।

दो सप्ताह पहले बुखार होने पर शिवाकांत डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने ब्लड प्रेशर नापने के बाद कहा, ‘आप सतर्क हो जाइए मिस्टर त्रिापाठी। आपका बीपी एलार्मिंग प्वाइंट पर पहुंच चुका है। आपने इधर टेंशन लिया नहीं, कि उधर आपका दिल राम—राम कहकर छुट्टी पर चला जाएगा।'

डॉक्टर की बात सुनकर उसने मन ही मन कहा, ‘लो यही कसर बाकी रह गई थी। वह भी पूरी हो गई।'

तनाव! तनाव में आज कौन नहीं है। अभी कुछ दिन पहले ही एक सर्वे रिपोर्ट आई थी। देश में उच्च रक्तचाप वाले मरीजों की संख्या बढ़ रही है। आखिर बढ़े भी क्यों न! बच्चों को ज्यादा से ज्यादा मार्क्स लाने की चिंता, पढ़—लिखकर नौकरी खोजने की चिंता, नौकरी मिल जाए, तो उसे बचाने की चिंता। चिंता तो सर्वव्यापी हो रही है। बेटी या बहन बड़ी हो रही हो, तो चिंता ही चिंता। घर से निकली है किसी काम से, तो उसकी इज्जत—आबरू की चिंता। फिर शादी—ब्याह, दहेज ...चिंताओं की एक लंबी शृंखला है यहां तो। एक चिंता हटती नहीं कि दूसरी घेर लेती है। दूसरी से निजात मिली नहीं कि तीसरी दरवाजे पर खड़ी पहली और दूसरी के निकलने का इंतजार करती रहती है। कि ये निकलें, मैं घुसूं।

आज लेटा वह यही सोचता रहा। वह क्यों आया था पत्राकारिता में? क्या सोचकर आया था कि लिखेगा और लिखते ही क्रांति हो जाएगी? सारे लोग सद्‌चरित्रा, ईमानदार हो जाएंगे? व्यवस्था की गाड़ी पटरी पर तीव्र गति से दौड़ने लगेगी? कुछ भी तो नहीं हुआ। न क्रांति हुई, न भ्रष्टाचार कम हुआ। पत्राकारिता का स्तर पहले की अपेक्षा और गर्त में चला गया। वह इसके लिए जिम्मेदार भी नहीं है। पूरी व्यवस्था के बनने या बिगड़ने के लिए एक व्यक्ति दोषी भी तो नहीं हो सकता। उसे फिल्म ‘क्रांति' का एक डायलाग अकसर याद आ जाता है। अंग्रेजों के बंदी बने शत्राुघ्न सिन्हा पानी के जहाज का चप्पू चलाते—चलाते बेजार होकर पूछते हैं, ‘यह क्रांति कब होगी भाई? कब होगी?' कुछ ऐसा ही बेजार वह भी था। पत्राकारिता में आने से पहले वह कसमसाता था, पत्राकार पूरी व्यवस्था का कान पकड़कर उमेठते हुए यह कहते क्यों नहीं कि ठीक से चल, नहीं तो लगाउं+गा एक थप्पड़। तब वह समझता था, पत्राकारों की लेखनी में दम होता है। इतना कि वह चाहें, तो पूरी व्यवस्था बदल दें। पूरा समाज बदल दें। यहां तक कि जब चाहें सरकार बदल दें। उसे याद है, जब अपने मोहल्ले के दादाओं की सुनी—सुनाई करतूतों को कापी के पन्नों पर लिखकर वह स्थानीय अखबार के दफ्तर में दे आया करता था, तो अखबार में काम करने वाले लोग उसका लिखा पढ़कर पहले तो मुस्कुराते, फिर रख लेते थे। अखबार के दफ्तर से लौटकर वह अपने मित्राों को उत्साहित होकर बताता था, अखबार में फलां दादा के खिलाफ लिखकर दे आया हूं। देखना कल इधर अखबार में छपा कि उधर फलां दादा जेल की हवा खा रहा होगा। कितना मासूम विश्वास था अखबार और पत्राकारों के प्रति। कई दिनों तक अखबार देखने के बाद जब उसका दिया मैटर नहीं छपता, तो वह निराश हो जाता। उसका भ्रम टूटने लगता। तब वह मन ही मन दोहराता। एक दिन जब मैं पत्राकार बनूंगा, तो देश के हर दादाओं और गुंडों के बारे में लिख—लिखकर उनको मजा चखाउं+गा। चैन से तब तक नहीं बैठूंगा, जब तक यह देश दादा और गुंडाविहीन नहीं हो जाएगा।

पत्राकारिता के शुरुआती दिनों में उसे पुराने पत्राकार बताया करते थे कि छठे और सातवें दशक...यहां तक कि आठवें दशक तक पत्राकारों को पैसा तो कम मिलता था, लेकिन समाज में उनकी काफी हनक और ठसक थी। घर में भले ही फाकाकशी की नौबत हो, लेकिन पत्राकार साहब की नैतिकता और अपने पाठकों के प्रति प्रतिबद्धता उनके जमीर को जिलाए रखती थी। तब ‘पत्राकारिता मिशन है' का मूल मंत्रा संजीवनी बनकर उनकी नशों में दौड़ता था। यह सुन—सुनकर वह एक अजीब से नशे में रहता किसी अफीमची की तरह। पत्राकार होने और समाज बदलने की शक्ति रखने वाला कलमकार होने का नशा। धीरे—धीरे यह नशा उतरता गया। उसे समझ में आने लगा, नैतिकता और प्रतिबद्धता की जिस जमीन पर वह खड़ा है, वह अंदर से काफी खोखली है। लालच और पैसे का एक धक्का उस जमीन में इतना बड़ा गड्ढा पैदा कर सकता है, जिसको भरते उसकी पूरी उम्र निकल जाएगी, तब भी वह नहीं भरेगा। आर्थिक उदारीकरण का दौर क्या चला? पत्राकार ही नहीं, हर क्षेत्रा के लोग सभी मामलों में उदार होते गए। नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मामलों में पत्राकार तो उदार हुए ही, वे भी उदार हो गए जिन पर इस व्यवस्था को चुस्त—दुरुस्त रखने की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी थी। किसी ने खबरचियों के सामने शराब, लड़की, रुपया—पैसा पेश किया, तो वे अति उदार हो गए। विरोध किसी बात का नहीं रहा। पत्राकारों ने ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर' वाला ढर्रा अख्तियार कर लिया। अब वे विद्वानों के साथ थे, तो लुटेरों के साथ भी। घटतौली करने वाले बनियों से पत्राकारों की यारी हुई, तो मजदूरों का निर्मम रक्त शोषण करने वालों पूंजीपतियों के वे हमप्याला—हमनिवाला हो गए। गरीब की झुग्गी—झोपड़ी उजाड़कर बिल्डर बन बैठे लोगों ने जब अखबार निकालने शुरू किए, तो वे उनके चाकर बनने की होड़ में शामिल हो गए। पेट जो पालना था उन्हें। कल तक कलम और नैतिकता की दुहाई देकर हर अवसर को ठोकर मारने वाले पत्राकार बिल्डरों, सेठ—साहूकारों, माफियाओं के अखबार में नौकरी दिलाने की सिफारिश कराते घूमने लगे।

इसके बावजूद पता नहीं क्यों, शिवाकांत के मन में यह विश्वास दृढ़ था कि एक दिन परिस्थितियां सकारात्मक रूप से बदलेंगी। पत्राकारिता की भी और समाज की भी। नई सुबह होगी। नया सूरज उगेगा। तब हालात ऐसे नहीं रहेंगे। यह कब होगा? कैसे होगा? कौन करेगा? आगे कौन आएगा? इन सवालों का जवाब शिवाकांत के पास फिलहाल नहीं था। पर एक विश्वास जरूर था। कई बार ये सवाल उसे मथते थे? समाज की हालत देखकर उसका मन करता था, वह मुट्ठियां तान कर कहे, बस अब बहुत हो चुका। अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बर्दाश्त करने की भी कोई सीमा होती है। फिर वह सोचता, जिस तरह आज वह व्यथित है। कल देश और समाज का हर युवा व्यथित होगा। फिर उठ खड़ा क्यों नहीं होता वह युवा, इन प्रतिकूल हवाओं के खिलाफ? इन मानव विरोधी शक्तियों के खिलाफ? वह भी तो कहां उठ खड़ा होता है? उसका अंतरमन जब यह सवाल पूछता, तो वह चुप हो जाता। जब परिवर्तन का वह इतना आकांक्षी है, तो खुद क्यों नहीं करता बगावत? क्यों मुंह देखता है किसी के उठ खड़े होने का? वह भी तो इन परिस्थितियों से ऐसे समझौते कर चुका है। जब उसे मुट्ठियां तान कर विरोध में खड़ा होना चाहिए, तो वह बगल से निकल जाना चाहता है। तो क्या यह समझा जाए कि वह समझौतावादी, मतलब परस्त हो गया है? वह चाहता था कि चीखकर वह अंतरमन के इस आरोप को नकार दे। लेकिन ऐसा आज तक कब कर पाया है?

अभी रिपोर्टरों और डेस्क वालों के आने का समय नहीं हुआ था। शिवाकांत ने अपना कंप्यूटर खोला और विभिन्न जिलों से आई संभावित खबरों की सूची देखने लगा। एकाध खबरों को छोड़कर उसे सभी संभावित खबरें रुटीन की ही लगीं। उसने अपने दोनों हाथों के पंजों को आपस में मिलाकर अंगुलियां चटकार्इं। फिर सीट की पुश्त से पीठ टिकाकर कल होटल में हुई सीएमडी से मुलाकात की बाबत सोचने लगा। परमानंद बैठा की बातें याद आ गर्इं। वह कितनी निर्भयता और गंभीरता से सुदेश कुमार पर आरोप लगा रहे थे? सीएमडी भदौरिया की बार—बार तनती भृकुटि बता रही थी, चैनल में चल रहे घालमेल में वे भी शरीक हैं। निखिलेश निखिल ने जब से सस्ती चीजों को महंगे में खरीदने का जो तर्क संगत कारण बताया है, वह जानकर दंग है। लोग पैसा कमाने के कैसे—कैसे तरीके खोज लेते हैं।

अभी वह इससे आगे कुछ सोचता कि चपरासी हारुन अली ने आकर कहा, ‘सर

...गैस चैंबर नंबर दो से आपका बुलावा है। जाइए, भुगत लीजिए...सजा।'

हारुन ने हालांकि ‘सजा' शब्द का उच्चारण काफी धीमे किया था, लेकिन शिवाकांत ने सुन लिया। हारुन की बात पर उसे गुस्सा नहीं आया। चेहरे पर फीकी, किंतु क्षीण मुस्कान उभरी, ‘क्या तुरंत बुलाया है? कौन—कौन है उनके पास?'

चेहरे पर उभरी मुस्कान ने हारुन को बल प्रदान किया, ‘सर...‘तुम सब चोट्टे हो' सर बैठे हैं और संपादक जी हैं।'

हारुन की बात पर वह हंसी नहीं रोक सका। पिछले कुछ महीनों से शुभ्रांशु दत्ता की केबिन को ‘गैस चैंबर नंबर वन' और रवींद्र चौरसिया की केबिन को ‘गैस चैंबर नंबर टू' कहा जाने लगा है। दत्ता या चौरसिया किसी कर्मचारी से यह कहते हैं कि जरा...फलां को भेज देना। वह साथी जाकर बुलाए गए व्यक्ति से कहता है, ‘गैस चैंबर एक या दो से बुलावा आया है। जाओ, जाकर अपनी सजा भुगत लो।'

अब यह अक्सर होने लगा है कि दत्ता या चौरसिया अखबार के मुलाजिमों को काम से कम और हौंकने के लिए ज्यादा अपने चैंबर में बुलाने लगे हैं। कई बार तो लोगों के साथ यह भी हुआ कि वे इधर दत्ता की डांट खाकर निकले ही थे कि उधर चौरसिया का बुलावा आ गया। पहले दत्ता ने हौंका, फिर चौरसिया ने। इससे आहत लोग अब तो बदजुबानी पर उतर आए। अखबार का दफ्तर कुटिल राजनीति का अखाड़ा बनकर रह गया। अखबार में जाने वाली गलतियों पर न तो दत्ता की नजर है, न चौरसिया की। टुच्ची राजनीति और एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ में अखबार और कर्मचारियों का करियर चौपट हो रहा है, इसकी फिक्र किसी को नहीं है। प्रबंधन ने तो जैसे अखबार की ओर से आंख ही मूंद रखी है। चौरसिया के पास शिवाकांत पहुंचा, तो निखिलेश कुछ कह रहे थे और चौरसिया ठहाका लगाकर हंस रहे थे।

शिवाकांत को देखते ही चौरसिया ने कहा, ‘आओ...आओ...शिवाकांत! तुम तो गूलर के फूल हो गए। ‘गूलर का फूल' हो जाने का मुहावरा समझते हो?'

अभिवादन करने के बाद शिवाकांत ने कहा, ‘हां, क्यों नहीं। इतनी समझ तो रखता ही हूं। आपने मुझे बुलाया था?'

‘हां...बस यों ही। खाली बैठा था, तो सोचा, कुछ देर तुमसे ही गुफ्तगू कर लिया जाए।' चौरसिया एक बार फिर हंसे, ‘और क्या हालचाल है? आज समय से काफी पहले आ गए?'

‘नहीं...मैं तो रोज लगभग इसी समय आता हूं। पहले आकर संभावित खबरों की सूची वगैरह देख लेने से थोड़ा सहूलियत रहती है। किसी से कुछ कहना हो, तो वह भी समय पर हो जाता है।' शिवाकांत ने बिना लाग—लपेट के अपनी बात कही। चौरसिया के इशारा करने पर उसने सामने पड़ी कुर्सी खींची और बैठ गया।

निखिलेश ने पहली बार वार्तालाप में हस्तक्षेप किया, ‘कल सीएमडी से आपकी वार्ता काफी देर चली। ...कुछ छोड़ा या सब कुछ बता डाला? मेरी शिकायत तो की ही होगी, यह तो पक्का है।'

निखिलेश की बात सुनकर उसे तमाचा—सा लगा, ‘आप भी कैसी बात करते हैं, भाई साहब! मैं तो सिर्फ खड़ा था। परमानंद जी ही बोलते रहे। मुझे कुछ कहना होगा, तो डंके की चोट पर कहूंगा। आप सबके सामने कहूंगा। मैं पहले भी आपसे और दत्ता जी से कह चुका हूं, मुझे इन पचड़ों में नहीं पड़ना है। जो आप कर रहे हैं, वह अपनी समझ से अच्छा ही कर रहे होंगे। जो दत्ता जी कर रहे हैं, वे अपनी समझ से अखबार के हित में कर रहे होंगे। बीच में मैं कहां से आ जाता हूं।'

शिवाकांत समझ नहीं पा रहा था कि सीएमडी के पास खड़ा होना क्या उसका इतना बड़ा गुनाह है कि हर कोई उसको बुलाकर कैफियत तलब करे? कुछ देर पहले अकाउंट और सरकुलेशन वाले भी उससे ‘क्या—क्या बात हुई' पूछ चुके हैं। उनके पूछने को वह हंसकर टाल भी चुका था। लेकिन निखिलेश या चौरसिया के पूछने का मतलब है कि कहीं कुछ पक रहा है और उसे इसकी खबर नहीं है। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि सीएमडी से तो उससे पहले और बाद में भी बहुत सारे लोग मिले थे। उनमें ज्यादातर लोग चैनल के थे और कुछ अखबार के। कुछ ने अपनी बातें भी रखी थीं, लेकिन कोई उन लोगों से क्यों नहीं पूछता? सारे लोग उससे ही कैफियत क्यों मांग रहे हैं?

‘क्या बातें हो रही थीं? तुम भी तो परमानंद की बात पर सिर हिलाकर उनका समर्थन कर रहे थे...' चौरसिया का लहजा व्यंग्यात्मक था, ‘मेरे बारे में तो खूब विष वमन किया होगा? मौका जो हाथ लग गया था?'

शिवाकांत मन ही मन झुंझला उठा, ‘आपके बारे में ऐसी बातें क्यों करूंगा? आपसे मेरी कोई दुश्मनी है? और फिर...मेरी तो कोई बात ही नहीं हुई थी। मैं निखिलेश जी को हॉल में खड़ा खोज रहा था कि मेरी निगाह भदौरिया साहब की ओर उठ गई। संयोग से उसी समय वे मेरी ओर देख रहे थे। उन्होंने मुझे पास आने का इशारा किया, तो मैं उनके पास चला गया। ऐसा करके मैंने कोई गलती की क्या सर?' शिवाकांत ने जैसे सफाई दी हो।

‘तो क्या समझते हो, तुम्हारी शिकायत से मेरा कुछ बनने—बिगड़ने वाला है?' चौरसिया ने डस्टबिन आगे खिसकाकर मानो शिवाकांत के अस्तित्व पर ही थूक दिया हो।

‘सर...यह आप मेरे साथ नाइंसाफी कर रहे हैं। जब मैं आपसे कह रहा हूं, मैंने सीएमडी से कोई बात नहीं की। तो आप मानते क्यों नहीं? परमानंद जी ही चैनल के बारे में बातें करते रहे। उन्हें जो कहना था, उन्होंने कहा। अब इसमें मेरी कोई गलती हो तो बताइए?'

‘सुबह सीएमडी का फोन आया था संपादक जी के पास। वे तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे। परमानंद की नौकरी तो समझो गई ही। तुम्हारी भी खतरे में है। तुमने गलती यह की कि गलत आदमी का साथ दिया।' निखिलेश ने लहजे को सामान्य रखने की कोशिश की।

उबल पड़ा शिवाकांत, ‘आप कई बार बिन पेंदी के लोटा लगते हैं। अभी कल तक सुदेश विरोधी पहाड़ा रट रहे थे। उसको चोट्टा, क्रिमिनल, भ्रष्ट और पापी बताते जुबान नहीं थक रही थी। आज आपको सुदेश योग्य और काबिल पत्राकार लग रहा है। उसका विरोध आपसे सहन नहीं हो रहा है। कोई टांका भिड़ा लिया है क्या, सर जी?' शिवाकांत के सोचने—समझने की क्षमता खत्म होती जा रही थी। वह सोच नहीं पा रहा था कि उसे कहना क्या है? और कह क्या रहा है? अपनी सीट से आते समय उसने तय किया था, बातचीत के दौरान संयत रहेगा। कोई ऐसी—वैसी बात नहीं कहेगा, जिससे कोई विवाद खड़ा होता हो। वह जानता है, दत्ता और चौरसिया के राडार पर इन दिनों वह चढ़ा हुआ है। ऐसे समय में उसका चुप रहना ही उचित है। कुछ दिनों बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन अब वह क्या करे? कड़वी बात तो उसके मुंह से निकल ही गई।

निखिलेश ने बात लपक ली, ‘मैं क्या हूं, क्या नहीं ...यह तुम तय करने वाले कौन होते हो? तुम तो एकदम बेहूदे आदमी हो! मैं बिन पेंदी का लोटा हूं और तुम क्या हो? तुम्हारी हैसियत क्या है? तुम्हें अपने सीनियर से बात करने का शऊर नहीं है। यह तो सीधा—सीधा अनुशासन का मामला है। इस पर तुम्हारे खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। जिसके दम पर तुम उछल रहे हो, वह भी तुम्हारी नौकरी बचा नहीं पाएगा। इतना जान लो शिवाकांत!'

‘शिवाकांत! तुम होश में हो? तुम अपने सीनियर से बद्‌तमीजी नहीं कर सकते। मैं चाहूं, तो अभी तुम्हें संस्थान से बाहर निकाल सकता हूं। इतना पॉवर है मेरी कलम में। निखिलेश! तुम लिखित शिकायत भेजो इसके खिलाफ...मैं अभी बाहर का रास्ता दिखाता हूं। देखता हूं, दत्ता क्या बना—बिगाड़ लेते हैं।'

‘अरे सर...छोड़िए...इनके जैसों की औकात मैं जानता हूं। इनके बूते कुछ होता, तो अब तक ये जो चाहते, कर चुके होते। ये छोटी सोच के लोग इससे ज्यादा कह भी क्या सकते हैं?'

निखिलेश की बात सुनकर शिवाकांत के तन—बदन में आग लग गई। उसका मन हुआ कि वह पलट कर जवाब दे। परंतु उसने सधे शब्दों में सिर्फ इतना कहा, ‘पहले अपनी औकात देखिए। फिर दूसरों की औकात आंकिएगा। जिंदगी भर कंटेंट कंटेंट रटते रहे और हासिल कुछ नहीं कर पाए। इसका फ्रस्टेशन आप दूसरों पर निकालते रहते हैं। आप जिन संपादकों और पत्राकारों को रंडल बताते हैं, वे कभी आपके साथी थे। आपके साथ या आप उनके साथ काम कर चुके हैं। वे अपनी प्रतिभा, लगन और थोड़ी बहुत चमचागिरी की बदौलत पत्राकारिता के शीर्ष पर बैठे हैं और आप चिटफंड कंपनी के अखबार में नाक रगड़ रहे हैं। आपको उनकी यह उपलब्धि पच नहीं रही है। तभी तो आप सबको चोट्टा और रंडल बताते फिरते हैं। आप कभी ठंडे दिल और दिमाग से अपना आकलन कीजिएगा, तो सारी असलियत उजागर हो जाएगी।'

‘बेहतर यही है कि अब तुम कुछ बोलो ही नहीं ...। सीएमडी से मिल लिया है, तो तुर्रम खां नहीं हो गए हो। समझे। अगर नौकरी करना चाहते हो, तो वही करो, जो तुम्हारा काम है। दूसरे मामलों में पड़ो ही नहीं।' रवींद्र चौरसिया ने उसे समझाते हुए कहा।

‘यह क्या बोलेगा...इसकी क्या हैसियत है? कल का लौंडा मुझको ज्ञान बताएगा। तुम जैसे लौंडे—लपाड़ियों को पत्राकारिता सिखाता हूं...समझे। और एक बात फिर दोहराता हूं। इस पूरी दिल्ली में कंटेंट के माहिर दस लोग ही हैं। उनमें एक नाम मेरा भी है, समझे। तुम जैसे लोग पूरी जिंदगी खपा देते हैं। कंटेंट की समझ विकसित नहीं कर पाते। तुम्हारी इतनी औकात नहीं है कि तुम मुझे फ्रस्टेट बताओ।'

निखिलेश की बात का वह जवाब देता, इससे पहले हारुन ने चैंबर का दरवाजा खोलकर शिवाकांत से कहा, ‘शिवाकांत सर...आपको दत्ता साहब बुला रहे हैं।'

‘जाओ...तुम्हारे पिता जी का बुलावा आ गया? कर दो मेरी शिकायत...उखाड़ लें जो मेरा उखाड़ना हो।' निखिलेश के शब्द मुंह से निकले ही थे कि शिवाकांत तमतमाकर उठ खड़ा हुआ।

‘बाप होंगे आपके। आपके बच्चों के...मेरा तो एक ही बाप है और वह बाराबंकी में है। आप लोग ही बताइए, पत्राकारिता के जीवन में आपके कितने बाप रहे हैं...? खबरदार! आज के बाद मुझसे जो ऐसी बातें की, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। मैं यहां नौकरी करने आया हूं। अपनी मान—मर्यादा गिरवी रखकर काम नहीं कर पाउं+गा। संपादक जी...आपको अगर मेरे किसी काम से कोई आपत्ति हो, मैं काम न करता होउं+, तो आपको कहने का अधिकार है। ऐसी अमर्यादित बातें बर्दाश्त नहीं करूंगा। आपको अगर मेरे रहने से दिक्कत हो रही है, तो साफ कहिए। अभी इस्तीफा देकर चला जाउं+गा। टुच्चों वाली हरकतें बंद कीजिए। एक बात और बता दूं आपको। आपने अपने इर्द—गिर्द जो मंडली खड़ी की है, वही एक दिन आपको ले डूबेगी। आप लोगों ने इसे अखबार का दफ्तर नहीं, रंडी का कोठा बना दिया है।'

क्रोधातिरेक में शिवाकांत का शरीर कांपने लगा। उसे लगा, अब इन लोगों ने कुछ ज्यादा चूं—चपड़ की तो वह हाथ छोड़ बैठेगा। वह झटके से कुर्सी से उठा।

उसके खड़ा होते ही दांत पीसते हुए चौरसिया ने कहा, ‘तुम्हारी बद्‌तमीजी काफी दिनों से देख—सुन रहा हूं। बहुत बर्दाश्त किया है तुम्हें। अब पानी सिर से ऊपर जा रहा है। तुम अपनी नौकरी गई ही समझो। आज ही सीएमडी सर से बात करता हूं। देखता हूं, तुम नौकरी कैसे करते हो। चिटफंड कंपनी का अखबार है, तो क्या कोई मेरे सिर पर मूतेगा। मैंने भी तुम जैसे एनई—फेनी बहुत देखे हैं।'

‘आपसे जो करते बने, कर लीजिए' कहकर शिवाकांत बाहर निकल गया। पता नहीं क्यों, उसे लगने लगा था, कोई साजिश रची जा रही थी पिछले कुछ दिनों से। जिस तरह उसके अंदर का लावा बाहर आया है, उससे नौकरी तो गई। उसने जाने—अनजाने चौरसिया को प्लेट में सजाकर नौकरी दे दी है। कि चाहे रखो या खा जाओ। गुस्से में तमतमाया शिवाकांत पहुंचा दत्ता के पास, तो वहां भी उनसे भिड़ंत हो गई। शिवाकांत जब दत्ता के पास पहुंचा, तो वे अपना ही अखबार उलट—पलट रहे थे। शिवाकांत के अभिवादन करने पर उन्होंने बैठने का इशारा किया। सामने पड़ी कुर्सी पर शिवाकांत बैठ गया। शिवाकांत के चेहरे पर छाए तनाव को भांपते ही दत्ता के भीतर छिपा बैठा क्रूर पुरुष जाग उठा। उन्होंने निचले होंठ पर जुबान फेरी, मानो किसी फणिधर ने जीभ लपलपाई हो। उन्होंने पूछा, ‘आते ही सबसे पहले चौरसिया के पास हाजिरी देते हो क्या? अटेंडेंश रजिस्टर पर सिग्नेचर नहीं करते क्या?'

‘आप भी उनके पास हाजिरी बजाने जाते हैं क्या?' शिवाकांत ने जैसे दत्ता के सिर पर लट्ठ दे मारा। वह पता नहीं क्यों आज अपनी नौकरी से खेलने लगा था। उसके जवाब से दत्ता तिलमिला गए।

‘ज्यादा स्मार्ट बनने की कोशिश मत करो। जो पूछा गया है, उसका या तो उत्तर दो या फिर चुप रहो। मैं क्यों जाउं+गा उसके पास हाजिरी बजाने। वह संपादक है, तो मैं प्रधान संपादक हूं। इस पूरे दफ्तर में मेरा ही सिक्का चलता है। मैं जो चाहूं, वह कर सकता हूं। चौरसिया को मुझसे पूछना पड़ेगा। वह अपनी मर्जी का मालिक नहीं है। मेरा सब—आर्डिनेट है।'

‘आपने सवाल ही ऐसा पूछा था। आप जब सीमा का अतिक्रमण करेंगे, तो दूसरे भी ऐसा करने को मजबूर होंगे।'

शिवाकांत के चेहरे पर नजर डालते हुए दत्ता ने कहा, ‘अच्छा छोड़ो...यह बताओ। क्या बातें हो रही थीं? साजिश तो नहीं रच रहे थे तुम लोग मेरे खिलाफ?'

‘देखिए...आप लोग मुझे इस कुत्ता घसीटी से दूर ही रखिए। ऑफिस के माहौल को देखते हुए मुझे अपनी नौकरी ज्यादा दिन तक सुरक्षित नहीं लग रही है। अभी चौरसिया जी से भी नौकरी से निकाले जाने की धमकी सुनकर आया हूं।'

‘जिसकी सीएमडी तक सीधी पहुंच हो, उसकी नौकरी कौन ले सकता है? तुम तो इस कंपनी के दामाद बन गए हो। जो चाहो करो, मन चाहे तो न करो। तुम्हें कुछ कहकर कौन अपनी मां—बहन करवाना चाहेगा।' दत्ता ने ताना मारा। बातचीत के दौरान दत्ता दांतों के बीच मूंछ दबाकर कुतरने से बाज नहीं आ रहे थे।

दत्ता की बात सुनकर पहले से ही भन्नाया शिवाकांत आपा खो बैठा। उसने दत्ता से ठंडे लहजे में कहा, ‘...भडुवों की तरह क्यों बतियाते हैं आप। साफ बात कहिए, आप क्या चाहते हैं? मेरा इस्तीफा...? हिम्मत है, तो निकाल दें आप लोग। मैं भी देखता हूं। जिसे देखो वही, साला सियासत करता फिर रहा है। उधर वो चौरसिया और निखिलेश गांड में बंबू किए हुए हैं और इधर आप। ...मैं नौकरी छोड़कर जा रहा हूं। तुम सब यही चाहते थे न!' शिवाकांत यह कहकर बिना दुआ—सलाम किए दत्ता के चैंबर से बाहर आया।

सीट पर आकर उसने कागज पर तीन लाइनों का इस्तीफा लिखा और हारुन को बुलाकर उसे दत्ता को दे आने का निर्देश दिया। उसने मेज पर रखे कागज—पत्तर के साथ—साथ ड्राअर से अपनी पुस्तकें समेटी और ऑफिस से निकल आया। उसे ऑफिस से जाता देख, चौरसिया लपकते हुए दत्ता के पास पहुंचे, ‘अरे सर! यह शिवाकांत कहां चला गया?'

‘तैश में आकर नौकरी छोड़ गया है। हारुन अभी उसका इस्तीफा देकर गया है। मैंने उसे मनाने की बहुत कोशिश की। मैंने पूछा, तो उसने पहले कुछ बताया ही नहीं। बाद में जब मैंने उसे समझा—बुझाकर सामान्य किया, तो पता चला, आपने और निखिलेश ने उसकी बेइज्जती की है? कुछ उल्टा—सीधा कहा है?' दत्ता ने अपना पाप भी चौरसिया के सिर पर बड़ी सफाई से ट्रांसफर कर दिया।

‘मेरी तो उससे ऐसी कोई बात ही नहीं हुई, सर। वह पिछले कुछ दिनों से परेशान दिख रहा था। सो, मैंने हारुन को भेजकर बुलाया था, ताकि उसकी समस्या का अगर संभव हो, तो कोई हल निकाला जा सके। बेचारा अपनी बीवी को लेकर काफी परेशान था। निखिलेश से पूछिए। अपनी बीवी को गंदी—गंदी गालियां दे रहा था। उसका कहीं कोई चक्कर है जिसकी भनक शिवाकांत को शायद लग गई है। उसने मुझसे कहा कि वह अब नौकरी नहीं करेगा। लखनऊ जाकर कोई छोटी—मोटी नौकरी खोज कर बच्चों की परवरिश करेगा, उन्हें अच्छा इंसान बनाने की कोशिश करेगा, ताकि वे समाज में सम्मान से जी सकें।' चौरसिया ने सारा पाप पीड़ित के ही सिर पर लादकर एक नई मिसाल पेश की।

चौरसिया की बात सुनकर दत्ता कुटिलता से मुस्कुराए। मन ही मन बोले, ‘साला

...है बहुत हरामी। किस खूबसूरती से अपना किया धरा भी शिवाकांत के सिर पर न केवल लाद रहा है, बल्कि उसका और उसकी पत्नी का चरित्रा हनन कर रहा है। यह ऊपर से सीधा दिखता है, लेकिन है बहुत चालाक। सियार और लोमड़ी को भी मात देने वाला। गिरगिट की तरह इतनी तेजी से रंग बदलता है। दो जीभ वाले सांप से भी ज्यादा खतरनाक। चौकन्ना इतना कि मेरे जैसा शातिर आदमी भी दंग रह जाता है। अगर मेरी जगह कोई मामूली आदमी होता, तो कब से इसकी शातिर चाल में मकड़ी के जाले में फंसे कीड़े की तरह छटपटा रहा होता।'

अपनी बात कहकर चौरसिया ने दत्ता की ओर ऐसे देखा, मानो वे शिवाकांत के जाने से बहुत दुखी हों। हालांकि, अपनी ओर आ रहे दत्ता के बाणों का मुंह मोड़कर वह मन ही मन दत्ता की खिसियाहट का आनंद ले रहे थे।

‘लो बच्चू...तुम्हारे आग्नेयास्त्रा को मेरे वरुणास्त्रा ने प्रभावहीन कर दिया कि नहीं। चले थे मुझ पर प्रहार करने।' चौरसिया ने मन ही मन सोचा।

‘सर...एक बात कहूं। यह आपस की बात है। अगर सचमुच शिवाकांत पृथ्वी एक्सप्रेस छोड़कर चला गया है, तो समझिए, हम लोगों की नौकरी बच गई। उद्‌घाटन समारोह में उसने सीएमडी सर से पता नहीं क्या कुछ कहा होगा? किस—किस की पोल खोली होगी? पता नहीं, कौन—कौन से काले—सफेद चिट्ठे उजागर किए होंगे। उसके जाने को इस तरह समझें कि सिर पर आई एक बला टल गई। उसका जाना, हम सबके हित में है। वैसे भी भारतीय दर्शन में यह बात बार—बार कही गई है कि अगर किसी एक व्यक्ति की बलि देकर सौ आदमियों की जान बचाई जा सकती हो, तो उस व्यक्ति की बलि देना, पुण्य का काम है।' इस बार संपादक चौरसिया ने नया फलसफा पेश किया। उन्होंने अपने गलत और अलोकतांत्रिाक रवैये को दर्शन की आड़ लेकर बड़ी बेहयाई से जायज ठहरा दिया।

‘दत्ता सर...आज सुबह—सुबह जब सीएमडी सर का फोन आया, तो मैं समझ गया कि शिवाकांत ने जो कैक्टस बोया है, वह आज पुष्पित—पल्लवित होने वाला है। सीएमडी सर की आवाज में जो तल्खी और कटुता थी, उसको मैंने महसूस किया। वे खबरों, विज्ञापनों, सरकुलेशन आदि के बारे में शायद पहली बार दरियाफ्त कर रहे थे। किसी ने मेरे बारे में वहां गलत रिपोर्टिंग की है, वे काफी नाराज से लग रहे थे। मुझे पक्का विश्वास है कि उद्‌घाटन समारोह में इसी ने आग लगाई है।' चौरसिया ने भड़ास निकाली।

‘चौरसिया जी...सच पूछिए, तो सीएमडी सर से शिवाकांत की तो कोई बात ही नहीं हुई थी। मैं तो उत्सुकता में उन लोगों के आसपास ही घूम रहा था। मैंने साफ देखा, परमानंद और सीएमडी सर ही बातचीत कर रहे थे। शिवाकांत तो बस सिर हिलाकर कभी परमानंद की और कभी सीएमडी सर की बात का समर्थन कर रहा था। इस मामले में वह निर्दोष है। मुझे लगता है, हम लोगों में कोई काली भेड़ है, जो यहां की छोटी से छोटी बात वहां पहुंचा रहा है। मेरे सहित कुछ लोगों का शक निखिल पर है। वह है भी छुट्टा सांड की तरह। वह लोगों के बीच अनाप—शनाप बोलता रहता है। कई बार मैंने उसे आपकी भी बुराई करते सुना है। वह आपको दल्ला, जातिवादी और न जाने क्या—क्या कहता रहता है।' दत्ता ने बातचीत के दौरान एक नया टारगेट खोज निकाला। निखिलेश पहले भी उनके टारगेट पर थे। दत्ता किसी न किसी तरह बड़ी शिद्दत से निखिलेश के पर कतरने की फिराक में थे।

‘अरे...नहीं...सर! आप भी कैसी बात करते हैं। इस संस्थान में निखिलेश जैसा पत्राकार...मैं पत्राकार कह रहा हूं, लाइजनर या ब्रोकर नहीं ...कोई नहीं है। खांटी पत्राकार के जो गुण और चरित्रा होते हैं, वह निखिलेश में सौ फीसदी पाया जाता है। निखिलेश

...थोड़ा बोलता ज्यादा है, बोलते समय यह भूल जाता है कि उन्हें कौन—सी बात कहनी चाहिए, कौन—सी नहीं। जो उनके मन में होता है, वही जुबान पर। पर योग्य आदमी हैं निखिलेश...इसलिए वे लोग उन्हें पचा नहीं पा रहे हैं, जो पत्राकारिता की एबीसीडी नहीं जानते हैं। अयोग्य अधिकारियों और सहकर्मियों के निशाने पर हमेशा योग्य लोग रहते हैं, यह तो आप मानते ही होंगे। ठीक निखिलेश का भी मामला ऐसा ही है।' चौरसिया ने निखिलेश का बचाव किया।

‘सीएमडी सर का फोन मेरे पास भी आया था। वे आपकी बहुत तारीफ कर रहे थे। मुझसे कह रहे थे, अखबार के प्रचार—प्रसार के मामले में आपने जितनी मेहनत की है, उतनी आज के दौर में शायद ही कोई संपादक करता हो। आपने उन दायित्वों को बड़ी जिम्मेदारी के साथ निभाया है, जो संपादक के हैं ही नहीं।' दत्ता के प्रशंसा करने पर चौरसिया सतर्क हो गए। वे समझ गए, कोई नया फंदा तैयार हो रहा है उनके गले के लिए। दत्ता की प्रशंसा का मतलब ही है कोई नया पंगा। वह किसी जाल में फंसाने की जुगाड़ में हैं।

‘सर जी...तारीफ तो वे आपकी भी कम नहीं करते हैं। जब भी बात होती है, उनके मुंह से आपकी ही तारीफ निकलती है। पता नहीं कौन—सा मंत्रा फूंका है आपने।' चौरसिया भी कम नहीं थे। अपनी समझ से उन्होंने नहले पर दहला जड़ा।

‘चौरसिया जी...एक बात आपसे यह कहनी है। शिवाकांत के मामले में हम दोनों चुप ही रहें, तो बेहतर है। अगर आप मेरी जांघ उघारेंगे, तो आपकी भी जांघ नंगी हुए बिना रहेगी नहीं। इज्जत या नौकरी दोनों की जाएगी। बेहतर यही है कि कम से कम इस मामले में हम दोनों एक ही बात कहें। अगर हेड क्वार्टर से कोई पूछताछ होती है, तो हमें यही कहना है कि वह खुद ही छोड़कर चला गया है। उसकी कुछ निजी समस्याएं थीं। उसके चलते उसने लखनऊ ट्रांसफर करने का अनुरोध किया था। जब ऐसा नहीं हुआ, तो वह नौकरी छोड़कर चला गया। सुना है, उसे कोई लक्ष्मीकांत मिश्र इस संस्थान में लाए थे। उनको विश्वकर्मा ने साइड कर दिया था। आज भी उनकी सीएमडी साहब पर अच्छी खासी पकड़ है। हो सकता है, लक्ष्मीकांत जी इसके मामले में हस्तक्षेप करें। सीएमडी से शिकायत करें।'

दत्ता ने समझौते का प्रस्ताव रखा, तो चौरसिया ने राहत की सांस ली। उन्हें भी डर था, यदि शिवाकांत के मामले को तूल देते हैं, तो फंस वे भी सकते हैं। वैसे भी सीएमडी उसे व्यक्तिगत रूप से जानते हैं। लक्ष्मीकांत मिश्र अब भी संस्था से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। वे उसकी पैरवी भी कर सकते हैं।

‘सर...मैं आपसे बाहर तो नहीं हूं। आप हुकुम तो कीजिए। मैं उसे करने को तैयार हूं।'

‘देखता हूं। एकाध दिन में अगर कोई बखेड़ा खड़ा नहीं होता है, तो समझो, मामला सुलट गया। शिवाकांत का ‘रामनाम सत्य है' हुआ समझो।' कहकर दत्ता हंस पड़े। उस हंसी में चौरसिया भी बराबर के भागीदार हुए।

मूसलाधार बारिश के बावजूद उमस बरकरार थी। बिजली न आने से घुप्प अंधेरा था। इस्तीफा देने के बाद काफी देर तक शिवाकांत नोएडा की सड़कों पर भटकता रहा। थक जाने पर बाइक एक पार्क के बाहरी साइड में खड़ी करके बेंच पर बैठ गया। उसे ताज्जुब हो रहा था कि जिस भाषा का उपयोग उसने आजीवन नहीं किया, जिस तरह की उदडंता उसने दत्ता और चौरसिया के सामने दिखाई, वह क्या थी? अपने वरिष्ठों ही नहीं, कनिष्ठ साथियों से बड़े प्यार और सलीके से पेश आने वाला शिवाकांत आज क्यों ऐसा व्यवहार कर गया, जिसकी उम्मीद किसी को भी नहीं थी। क्या था यह? नौकरी छोड़ने पर वह आज उतारू क्यों हो गया? क्या यह सीने में चिंगारी—चिंगारी जमा करके ज्वालामुखी का रूप लेने वाला आक्रोश था। कहीं ऐसा तो नहीं, उसका यह आक्रोश किसी घट में बूंद—बूंद टपकने वाले जल की तरह संचित होता रहा। और जब लबालब भर गया, तो वह छलक उठा। फिर उसके मन ने कहा, कुंठा, आक्रोश, गुस्सा, तिरस्कार...सब कुछ अपनी जगह है, लेकिन उसे ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। उसे आवेश में इस्तीफा भी नहीं देना चाहिए था। वे लोग तो यही चाहते थे। वे लोग कौन? दत्ता जी...? चौरसिया जी...? या दोनों...? शायद दोनों, क्योंकि जिस तरह उन्होंने व्यवहार किया, उसे लगता है, दोनों ने योजना बनाकर उत्तेजित किया, ताकि उसे गिरफ्त में लिया जा सके। ताकि उसे इस्तीफा देने पर मजबूर किया जा सके। ताकि वह लोगों से भिड़े, लोगों से बहस करे और अनुशासन की आड़ में शिकार किया जा सके। उसने कई लोगों से सुना था, चौरसिया उसकी जगह अपने किसी चंपू को न्यूज एडीटर बनाकर लाना चाहते हैं। दत्ता भी सीनियर न्यूज एडीटर पद क्रिएट कर अपने किसी पत्ता चाटू को बिठाना चाहते हैं। कल जब सुकांत अस्थाना का फोन आया था, तो वह भी घुमा फिराकर यही बात कह रहा था। तब शिवाकांत की समझ में यह बात नहीं आई थी। उसने समझा, निकाले जाने से सुकांत लंबी—लंबी फेंक रहा है। शिवाकांत और सुकांत की आपस में कई बार भिड़ंत भी हो चुकी थी। सो, उसने समझा, सुकांत उसे भड़काकर दत्ता या चौरसिया के मुकाबले में खड़ा करना चाहता है। अब जब तीर कमान से निकल चुका है, तो उसे लग रहा है, सुकांत सही कह रहा था।

बात भी यही थी। शिवाकांत का परमानंद बैठा के साथ सीएमडी से मिलना, पृथ्वी एक्सप्रेस के दो धुरंधरों को इतना नागवार गुजरा कि वे अपनी सारी दुश्मनी भुलाकर शिवाकांत के खिलाफ एक साथ खड़े हो गए।

होटल के उद्‌घाटन के बाद एक ही गाड़ी में लौटते समय चौरसिया ने दत्ता से कहा था, ‘यह साला...पंडितवा अपने को बहुत होशियार समझता है। अगर इसे निपटाया नहीं गया, तो अखबार में एक गलत संदेश जाएगा। फिर हर कोई सीएमडी तक पहुंचने की कोशिश करेगा। हर आदमी अपनी शिकायत लेकर हर दूसरे दिन उनके पास डटा रहेगा। हमारा तो कोई वजूद ही नहीं रह जाएगा।'

दत्ता ने चौरसिया की बात का न केवल समर्थन किया, बल्कि कुछ करने की एक तरह से अपील भी की। दोनों ने तय किया कि अगर उसे चिढ़ाया जाए। कुछ ऐसा कहा जाए कि वह उत्तेजित हो जाए, तो बात बन सकती है। वह एक भावुक किस्म का पत्राकार है। वे दोनों यह बात जानते थे, शिवाकांत पत्राकारिता को मिशन टाइप समझने वालों में से है। कई बार समाज विरोधी घटनाओं पर वह रिएक्ट भी करता था। उससे पता चलता था कि वह इन घटनाओं को लेकर अंदर ही अंदर चोटिल हो जाता था। कई बार तो वह बच्चियों से बलात्कार करने वालों को खुलेआम भद्दी—भद्दी गालियां देने लगता था। वह भूल जाता था, उसके आसपास कोई सीनियर, लड़की या महिला खड़ी है। वह कई बार पृथ्वी एक्सप्रेस के सहयोगियों को बता चुका था। इसी दिल्ली में कोई तीन साल पहले सात—आठ वर्षीय बच्ची सोनिया से बलात्कार किया था कुछ लड़कों ने। उस खबर को लेकर दिल्ली में काफी बवाल भी हुआ था। उसके एक दोस्त की पत्नी पुलिसिया लाठी चार्ज में मारी गई थी। कई बार तो उस घटना के बारे में बताते—बताते वह रो पड़ता था। जिस दिन वह इस घटना का जिक्र करता है, उस रात बेचैन रहता है। अगर उसके सेंटीमेंट्‌स को हवा दे दी जाए, तो बात बन सकती है।

‘ऐसा करते हैं। कल उसे बुलाकर पहले मैं हौंकता हूं। फिर आप कुछ जद्द—बद्द बोलिएगा। हो सकता है, उससे पिंड छूट जाए।' चौरसिया के सुझाव देने पर हंस पड़े थे दत्ता।

और हुआ भी वही। शातिर शिकारियों के जाल में आखिरकार शिवाकांत फंस ही गया। पार्क में बैठे—बैठे जब उसकी तबीयत ऊब गई, तो वह घर चला आया। पार्क में ही बैठे—बैठे शाम के सात बज गए थे। उसकी कुछ खाने की इच्छा नहीं हो रही थी। वह कपड़े उतार कर बिस्तर पर लेट गया। उसकी मनःस्थिति उन रेलयात्रिायों जैसी हो गई, जिसका स्टेशन आने वाला होता है, तो वह रेलयात्राी बेचैन हो जाता है। इस्तीफा देने के बाद से ही उसका मन दिल्ली से उचट गया। माधवी और बच्चों की याद पहले भी कई दिनों से आ रही थी। इस्तीफा देने के बाद उसका मन हो रहा था, वह हवा होता, तो अभी उड़कर बच्चों के पास पहुंच जाता। हवा की बात पर उसे याद आया, कमरे में बहुत गर्मी है। अरे...उसने तो बेख्याली में न ट्यूब लाइट जलाई, न ही पंखा चालू किया। उसने पंखा चालू किया और बत्ती भी जलाई। बेड के सिरहाने रखे टेबिल पर माधवी और बच्चों की तस्वीर को उसने निहारा और फिर उठा सीने से रगड़कर जमी धूल साफ की। गहरी सांस लेते हुए उसने तस्वीर को पहले की तरह रख दिया। तभी लाइट चली गई। उसने उठकर कैंडिल जलाई और एक कटोरी में उसे खड़ा कर दिया।

बाहर बिजली गरज रही थी। कुछ देर तक तो वह बिस्तर पर बैठा रहा, फिर उसने आगे बढ़कर खिड़की खोल दी। खिड़की खुलते ही हवा का आया झोंका कैंडिल को बुझा गया। उसने सोचा, चलो अच्छा हुआ। अंधेरे का अपना एक अलग ही सौंदर्य है। पहली बार उसे महसूस हो रहा था, अंधेरा हमेशा कष्टदायक नहीं होता। कई बार जब हम उजाले से ऊब जाते हैं, तो अंधेरा अच्छा लगने लगता है। अंधेरा सब कुछ अपने में समाहित कर लेता है, अच्छा भी, बुरा भी। अंधेरा नहीं जाता किसी से बताने कि देखो! हमने यह अच्छी...यह बुरी बात अपने में छिपा ली है। जो भी उसकी शरण में जाता है, सबका स्वागत। लेकिन उजाला...? उजाला तो चीख—चीखकर सारी दुनिया को बताता है, दिखाता है। कुछ भी छिपाकर नहीं रखता अपने पास। उजाला तो अच्छी चीज भी है, बुरी चीज भी। उजाला लुभाकर आकर्षित करता है। अंधेरा डराकर अपनी ओर आने से रोकने की कोशिश करता है। बाहर रह—रह कर बिजली गरज रही थी। एक बिजली उसके भीतर मचल रही थी। वह सोचने लगा, हर बार वही क्यों देता है इस्तीफा? वह क्यों इंतजार नहीं करता कि अखबार का मैनेजमेंट उसे निकाल दे। पिछले सत्राह—अट्ठारह साल की पत्राकारिता में हर बार वही पीछे हटा है। उसी ने इस्तीफा दिया है। आगे बढ़कर मैनेजमेंट कोई उसके खिलाफ कदम उठाए, इससे पहले ही वह मैदान छोड़कर भाग खड़ा होता है। वह कायर तो नहीं? आखिर वह अंत तक लड़ता क्यों नहीं? उसे गुरु गोविंद सिंह अच्छे लगते हैं। उनका कहा ‘सूरा सोहि सराहिये, जो लरै धनी के हेत' भी अच्छा लगता है। फिर वह लड़ता क्यों नहीं? उसे लगा, बाहर गरज रहीं बिजलियां चीख—चीख कर कह रही हैं, कायर हो...कायर हो...तुम लड़ना ही नहीं जानते? तुम्हारे भीतर समाज में बदलाव लाने की आकांक्षा तो है, लेकिन न कूबत है, न धैर्य। तुम भोथरे हो चुके हथियारों पर धार तो बड़ी उत्कंठा से रखते हो, लेकिन जब लड़ने का वक्त आता है, तो हथियार रख देते हो। भाग खड़े होते हो। इस संसार में कोई भी कार्य सिर्फ मनोगत नहीं हो सकता। ‘उद्यमेन हि सिद्धंति कार्याणि' ऐसे ही मजाक में नहीं कहा गया है। इसके पीछे पूरा एक दर्शन है। मानव जाति ने सदियों पहले जब इस बात को समझ लिया था, तो तू अब तक इतनी मामूली सी बात क्यों नहीं समझ पाता? उसका मन हुआ, कान बंद कर ले। लेकिन...मन में उठ रही आवाज को वह कैसे अनसुना कर सकता था?

मोबाइल फोन बजा, तो वह चौंका। अंधेरे में हाथ आगे बढ़ाकर धीरे—धीरे पांव

रखता हुआ बिस्तर तक आया और मोबाइल फोन उठा लिया, ‘हेल्लो...कौन...? हां, बोलो विशाखा...?'

उधर से आवाज आई, ‘सर...यह मैं क्या सुन रही हूं? आपने इस्तीफा दे दिया है?'

‘हां...तुमने जो सुना...सही सुना है? मैं छोड़ आया दैनिक पृथ्वी एक्सप्रेस। क्या करता दो साल से जीना हराम कर रखा था। तुम तो जानती हो, मैं सहन बहुत करता हूं। लेकिन उसकी भी कोई सीमा होगी कि नहीं। गधे की तरह काम भी करूं और धौंस भी सुनूं। यह मुझसे नहीं होगा।'

‘हां...सर। दत्ता जी और चौरसिया जी पता नहीं क्यों लड़ते रहते हैं? पता नहीं, किसने किसकी भौंस खोल ली है? यह कुत्ता घसीटी...रोज की चिखचिख अच्छी नहीं लगती। अगर इनसे बात कर लो, तो वो नाराज। उनसे बात कर लो, तो इनका मुंह फूल जाता है। हम तो चक्की के दो पाटों में फंसे गेहूं हो गए। न इधर ठिकाना है, न उधर।' विशाखा की आवाज आई।

‘सब साले...एक ही थाली के बैगन हैं। न ऊधो कम हैं, न माधो।' शिवाकांत के दिलोदिमाग पर छाया तनाव कम होने लगा था। उसका स्वर भी सामान्य होने लगा। विशाखा को अभी पृथ्वी एक्सप्रेस में आए कुछ ही महीने हुए हैं। पत्राकारिता में भी आए बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ है विशाखा को। तीन साल पहले भोपाल से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘प्रतिज्ञा' के ऑफिस में अपनी कविता देने गई थी। कविता तो स्वीकृत हुई ही, संपादक अरिहंत परिचय उसके सौंदर्य और लेखन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे अपने अखबार में ट्रेनी सब एडीटर बना दिया। दैनिक प्रतिज्ञा के ऑफिस से जब विशाखा निकली, तो वह आसमान में उड़ रही थी। उसे लग रहा था, चांद—तारे अब उसकी मुट्ठी में हैं। वह मुक्त आकाश में स्वच्छंद फिर सकती है। वह जब चाहेगी, अपने आंचल में इन चांद—सितारों को भर लेगी। यह उसकी कमसिन उम्र का प्रभाव था या अखबार में नौकरी पाने की उत्तेजना, कुछ कहा नहीं जा सकता। उसने तो सोचा भी नहीं था कि वह पत्राकार बनेगी। उसकी मां तो अकसर उसके पापा को कोंचती रहती हैं, लड़की जवान हो गई है। आपको उसके लिए लड़का खोजने की फुरसत ही नहीं है।

भोपाल के एक महाविद्यालय में अर्थशास्त्रा के प्रोफेसर सुजीत सिंह हंसकर कहते, ‘मेरी बेटी है...उसके लिए लड़कों की कोई कमी है क्या? कहो...तो कल ही लड़कों की लाइन लगा दूं।'

पिता की बात सुनकर विशाखा शर्मा जाती। काम के बहाने उठकर वहां से चल देती। उसके शर्मा जाने पर पापा ठहाका लगाकर हंस पड़ते। मां अपने पति पर नाराज होती हुई भी मुस्कुरा पड़ती, ‘आपको समझा पाना तो बहुत मुश्किल है। हमारे यहां लड़कियां क्या इतनी उम्र तक अविवाहित रहती हैं? आपको तो कोई फिक्र ही नहीं है। मैं तो लड़की की चिंता में घुली जाती हूं। इसके साथ खेलने—कूदने वाली लड़कियां तो कई बच्चों की मां बन चुकी हैं। अपनी घर—गृहस्थी संभाल रही हैं। इसके साथ खेलती थी, सुशीला। दो एक साल ही तो बड़ी थी। अगले महीने शकुंतला के बेटे की शादी होने जा रही है। वह पूत—पतोह वाली हो गई। और यह अभी तक कुंवारी बैठी है।'

सुजीत सिंह अपनी पत्नी कामाख्या की बात सुनकर गंभीर हो जाते। कहते, ‘देखो...तुम्हारे साथ जो बीती, तुम उसे अपनी बेटी के साथ दोहराना चाहोगी? जब हमारी शादी हुई थी, तब पंद्रह का मैं था, बारह साल की तुम। तुम्हें न पहनने का शऊर था, न ओढ़ने का। ससुराल में भी तुम गुड़िया—गुड्डे खेलती थीं। चौदह साल की उम्र में जब तुम मां बनी थीं, तो तुम्हें कितनी परेशानी हुई थी, भूल गर्इं। मैं भी तब इतना सयाना नहीं था। तुम्हारा साथ पाकर तो जैसे मैं सब कुछ भूल जाता था। विशाखा हुई थी, तो तुम्हारी जान जाते—जाते बची थी। मैं चाहता हूं कि मेरी बेटी हो सके, तो इस मामले में खुद ही फैसला करे। अगर उसे कोई दिक्कत हो, तो हम उसकी खुलेदिल से मदद करने को तैयार हैं। और फिर अभी उसकी उम्र ही क्या है? इक्कीस की हुई है। मुक्त हवा में सांस लेने दो उसे। बाद में तो उसे वही सब कुछ करना है, जो तुम चाहती हो।

अरिहंत परिचय इससे पहले भी कई लड़कियों को ट्रेनी सब एडीटर बनाकर उनका दैहिक शोषण कर चुके थे। उनके जाल में फंसी चिड़िया फड़फड़ा तो सकती थी, लेकिन छूटना नामुमकिन था। वे विशाखा के मामले में मात खा गए। बात—बेबात पर विशाखा को बुलाकर केबिन में बिठा लेते। बात—बात में विशाखा के सौंदर्य की प्रशंसा करना, तो मानो अरिहंत परिचय की आदत हो गई थी। कहते, विशाखा! तुम बहुत खूबसूरत हो। एकदम सारिका लगती हो...अरे वही सारिका...फिल्मों वाली। पीटीआई की एकाध लोकल अच्छी खबरों की बाईलाइन चेंज कर लगा देते। अगले दिन जब वह देखती, तो उसे आश्चर्य होता। जो खबर उसने लिखी ही नहीं, वह उसके नाम से कैसे छप गई। आठ पन्ने के दैनिक प्रतिज्ञा में स्टाफ बहुत कम था। दो पेजिनेटर और पांच एडीटोरियल स्टाफ मिलकर पूरा अखबार निकालता था। भोपाल में कई जगहों पर अरिहंत परिचय ने बड़े—बडे़ होडिर्ंग्स जरूर लगवा दिए थे। एक साल पहले तो उसने राजधानी में ढेर सारे फ्लैक्स भी लगवाए थे। डीएवीपी मान्यता मिलने से पहले तक तो जिले के कुछ बाजारों में अखबार दिख भी जाता था, लेकिन जब से सरकारी विज्ञापन मिलने लगा, वह सिलसिला भी खत्म हो गया। दैनिक प्रतिज्ञा के प्रथम पृष्ठ पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता था, इंदौर, भोपाल, दिल्ली, मुंबई और रायपुर से एक साथ प्रकाशित। विशाखा पहले समझी कि यह बहुत बड़ा ग्रुप है। इतनी जगह से अखबार प्रकाशित होता है। उसे अखबार और मालिक की असलियत तो बहुत बात में पता चली। दैनिक प्रतिज्ञा का छोटा—सा स्टाफ रोज पेज तैयार करता। सरकार से जारी हुए विज्ञापन लगाता और पांच सौ कापियां सस्ते दामों पर छपवा ली जातीं। पेज पर खबरें वही रहती, लेकिन भोपाल, इंदौर, रायपुर आदि की प्रिंट लाइन बदलकर भोपाल में ही छपवाया जाता था। खबरों के लिए इकलौती पीटीआई की सर्विस थी। पीटीआई की एकाध अच्छीं खबरें अरिहंत परिचय के नाम से भी छप जाती थीं। जब से विशाखा ने ज्वाइन किया था, उसकी भी बाईलाइन बड़ी उदारता से छपने लगी। कविताओं के नाम पर विशाखा की तुकबंदियां छपती, तो वह रोमांचित हो जाती। अरिहंत परिचय उसका उत्साह बढ़ाते। कभी उसके लिए नाश्ता मंगवाते, तो कभी उसे अपनी केबिन में बिठाकर घर से लाए गए लंच को शेयर करने की जिद करते। विशाखा इस बात पर ध्यान नहीं देती। उसे क्या पता था कि एक ऐसा खेल खेला जा रहा है, जो उसके जीवन में भूचाल ला देगा।

एक दिन अरिहंत परिचय ने गिलास एक होने पर पहले विशाखा को पानी पिलाया, फिर उसी जूठे गिलास में खुद पी लिया। विशाखा जब तक उन्हें जूठे गिलास में पानी पीने से रोकती, वे एक घूंट पी चुके थे।

अरिहंत ने हंसते हुए कहा, ‘अरे! क्या हुआ? मैं जिसको अपना समझता हूं, उसका जूठा खाने—पीने से परहेज नहीं करता।'

फिर तो यह रोज की बात होती चली गई। और फिर एक दिन वह हुआ, जो होना तो नहीं चाहिए था, मगर हुआ। सारा काम खत्म होने पर अरिहंत ने विशाखा से कहा, ‘तुम अभी जाना नहीं। मुझे तुमसे एक काम है। एक काम से जा रहा हूं। अभी थोड़ी देर में आता हूं।'

सारा स्टाफ चला गया था। करीब एक घंटे बाद अरिहंत लौटे, तो उनके हाथ में शराब की बोतल थी और आवाज में लड़खड़ाहट। साहस जुटाने के लिए शायद पहले से ही पीकर आए थे। आते ही उन्होंने विशाखा से बोतल में पानी भर लाने को कहा। कुर्सी के बगल में रखे ड्राअर से दो गिलास निकाले और पैग बनाए। विशाखा ने पानी लाकर दिया, तो उन्होंने शराब में पानी मिलाया। विशाखा की ओर गिलास बढ़ाते हुए उससे पीने को कहा। विशाखा ने पीने से इंकार किया और घर जाने की इजाजत मांगी। वे उसे थोड़ी देर रुकने और शराब पीने का आग्रह करते रहे। इस पर भी जब वह नहीं मानी, तो झपट पड़े। अपनी इज्जत दांव पर लगती देख विशाखा जोर से चिल्लाई। पैरों की चप्पल हाथ में ले ली। नशे में वह बार—बार उसकी बांह पकड़कर अपने शरीर से चिपटाने और पास के सोफे पर लिटाने की कोशिश करते। वह उनको अपने ऊपर से ठेल देती। इसी बीच विशाखा के हाथ में शराब की बोतल आ गई, तो उसने पहले उसे पकड़कर तौला और फिर उनके कंधे पर दे मारा। उनके कंधे से लगकर बोतल फिसली और दीवार से टकराई। बोतल नीचे गिर कर टूट गई। टूटी बोतल हाथ में लिए विशाखा चंडी की तरह गरजने लगी। तभी उसकी चीख सुनकर उधर से गुजर रहा गार्ड भीतर आ गया। उसे देख विशाखा का साहस दो गुना हो गया।

वह चीखी, ‘भइया...बचाओ...इस राक्षस से।'

गार्ड के आते ही अरिहंत परिचय शिथिल हो गए। अपनी सीट पर बैठकर हांफने लगे। घृणा से अरिहंत के चेहरे पर थूकती हुई विशाखा ने कहा, ‘हरामी...घर जाकर अपनी बहन—बेटी को दबोच...ज्यादा मजा आएगा। कुत्ता कहीं का!'

बाहर आकर वह फूट—फूट कर रोई। घर पहुंची, तो कुहराम मच गया। पिता उसी समय लोहे की राड से अरिहंत का सिर फोड़ देने पर आमादा थे। मां रोती जाती, पति को समझाती जाती, ‘रहने दो, भगवान ने इज्जत बचा ली यही क्या कम है? बखेड़ा खड़ा करने से फायदा भी तो नहीं है। बेटी की बदनामी होगी सो अलग। देखना एक दिन उस हरामी के कोढ़ फूटेंगे।' कोमल हृदय मां अरिहंत के परिजनों को भी गाली देने या कोसने से बच रही थीं।

विशाखा ने तय कर लिया, वह अब किसी अखबार में नौकरी नहीं करेगी। लेकिन ऐसा हुआ कहां? उसे नौकरी अखबार में ही करनी पड़ी। दैनिक प्रतिज्ञा छोड़ने के दो महीने बाद उसके पिता अजित सिंह की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। मां—बेटी टूटकर रह गर्इं। मामा दिल्ली के एक अखबार में स्थानीय संपादक थे। उन्होंने उसे अखबार में नौकरी दिला दी। साल भर नौकरी करती रही। इस बीच वह अपनी मां को भी दिल्ली ले आई। पहले तो वह अपने मामा के घर पर रहती थी, लेकिन बाद में उसने मामा के ही मोहल्ले में किराये पर मकान ले लिया। मामी—मामा ने बहुत दबाव डाला साथ रहने के लिए, मामा ने अपनी बहन से भी कहा, लेकिन मां—बेटी अलग रहने के फैसले पर अटल रहीं। संयोग से एक साल बाद मामा पीतांबर सिंह ने दूसरा अखबार ज्वाइन कर लिया, तो उनके कार्यकाल में भर्ती किए गए लोग एक—एक कर किसी न किसी बहाने निकाले जाने लगे। विशाखा इस बात को समझ गई। उसे लोग निकालते इससे पहले ही वह इस्तीफा देकर पृथ्वी एक्सप्रेस में आ गई।

‘भाई साहब...पत्राकारिता में मेरा पहला ही अनुभव इतना कड़वा रहा कि अब मैं क्या बताउं+। बाहर से यह जितना गंभीर, पवित्रा, ग्लैमरस दिखता है, उतना है नहीं। आप मेरे बड़े भाई की तरह हैं। माफी चाहती हूं यह कहने के लिए कि आज की पत्राकारिता किसी सजी—धजी कालगर्ल की तरह है। बाहर से मनमोहक कालगर्ल की तरह, लेकिन चेहरे से मेकअप खुरच कर देखिए। इतनी भद्दी दिखती है कि पूछिए मत।' विशाखा के स्वर में कटुता थी पत्राकारिता के लिए।

‘वह तो कहिए कि पेट पालने की मजबूरी है। मेरे मामा राष्ट्रीय स्तर के एक हिंदी दैनिक में स्थानीय संपादक थे, तो उन्होंने संकट के समय सहारा दिया। अपने अखबार में नौकरी दिला दी। गार्जियन की तरह अपने घर पर रखा। जब अपने सगे ही काम नहीं आते, तो उनसे उम्मीद भी नहीं थी। उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया। मेरे ताऊ और उनका परिवार पिता जी की मृत्यु के बाद पूछने भी नहीं आया कि हम लोग जिंदा भी हैं या मर गए।'

‘हां विशाखा...पत्राकारिता में सीधा—सादा का मतलब होता है गधा। शोषण भी ऐसे ही लोगों का होता है, जो सीधे—सादे हैं। उनसे काम तो भरपूर लिया जाता है, लेकिन अच्छा मेहनताना कामचोरों, मस्काबाजों और आगे पीछे घूमने वालों को मिलता है। मैं तो बाज आया ऐसे प्रोफेशन से। खैर...देखता हूं। आगे क्या होता है? तुम्हारा नंबर मेरे पास सेव है, मैं तुम्हारा हालचाल लेता रहूंगा।'

‘ठीक है भाई साहब! देखिए कब मुलाकात होती है? वैसे अभी कुछ दिन रहेंगे न दिल्ली में? या चले जाएंगे?'

‘कुछ तय नहीं है विशाखा। हो सकता है, कल ही चला जाउं+। सामान हफ्ते—दो हफ्ते बाद ले जाउं+गा। ऐसा भी हो सकता है कि सारा सामान किसी दोस्त के घर में रख दूं और कमरा खाली कर दूं। विशाखा सोचता हूं, अपना सारा सामान तुम्हारे घर में रख दूं। तुम्हारा घर भी बड़ा है।' कहकर हंसा था शिवाकांत।

‘हां...हां...क्यों नहीं, भाई साहब! आपकी जब मर्जी हो, तब अपना सामान रख जाइए, स्वागत है!' विशाखा हंस पड़ी थी, ‘अच्छा सर...नमस्कार। चिंता मत कीजिएगा। नौकरी आपको कहीं न कहीं मिल ही जाएगी। भाभीजी को नमस्कार और बच्चों को प्यार कहिएगा।'

शिवाकांत ने मोबाइल फिर बेड पर फेंक दिया। बाहर हवा में तेजी आ गई थी। उसने खिड़की से बाहर देखा। पूरा इलाका घुप्प अंधेरे में डूबा हुआ था। उसे लगा, इलाके का ट्रांसफार्मर फुंक गया है। बिजली अब रात भर आने से रही।

थोड़ी देर बाद वह बिस्तर पर आ लेटा, तो याद आ गए लक्ष्मीकांत मिश्र। चिटफंड कंपनियां का यही चरित्रा होता है! एक से वायदा करते हैं, फुसलाते हैं और दूसरे को लालीपॉप पकड़ा देते हैं। कितनी मेहनत की थी बेचारे लक्ष्मीकांत जी ने। अखबार का टाइटिल दिलाने से लेकर प्रिंटिंग मशीन खरीदवाने तक, दिन रात एक कर दिया था। वे सीएमडी से पद या पैसा भी तो मांगने नहीं गए थे। चूंकि बेरोजगार थे, तो नौकरी चाहिए थी। बच्चों को पालने—पोसने का एक जरिया चाहिए था। समूह संपादक बनाने की बात खुद सीएमडी भदौरिया ने कही थी दस—बीस लोगों के बीच। सीएमडी के मन में उस समय चोर नहीं था। लेकिन लक्ष्मीकांत के आडे़ आ गई जाति। जातीय समीकरण फिट हुआ एसपी सिंह का। जातीय फैक्टर हर जगह खोटे सिक्के की तरह काम आता है। वोट देना है, तो सबसे पहले देखा जाता है, अपनी जाति का कौन—कौन मैदान में है। भले ही अपनी जाति वाला दुत्कारता फिरे, लेकिन अपनी जाति वाला जिंदाबाद, बाकी सब मुर्दाबाद। जातीयता का नशा एक बार चढ़ा, तो जीवन भर उतरता ही नहीं है। लक्ष्मीकांत की प्रतिभा और अनुभव के मामले में एसपी सिंह, रवींद्र चौरसिया और दत्ता कहीं नहीं ठहरते। अपने पत्राकारिता के जीवन में कई ऐसी खबरें ब्रेक की हैं कि लोग आज भी उन खबरों को याद करते हैं। चूंकि एसपी सिंह सीएमडी की जाति के निकल आए, इसलिए स्थानीय संपादक बनाए गए। विश्वकर्मा ने दिन—रात मक्खनबाजी की, जूठी कप—प्लेट उठाई, लड़कियां पहुंचाई, तो सीईओ बना दिया गया। विश्वकर्मा और एसपी सिंह के हित आपस में टकराये, तो दोनों में बढ़े मनमुटाव के परिणामस्वरूप रवींद्र चौरसिया और शुभ्रांशु दत्ता का पदार्पण हुआ। ‘मेहनत करे मुर्गा, अंडा खाय फकीर' वाली कहावत की तरह मेहनत की लक्ष्मीकांत ने, जब खाने—कमाने का मौका आया, तो दूसरे पहलवान आ गए। यही एसपी सिंह हैं, जो आज कई महीने से अवैतनिक अवकाश पर चल रहे हैं। डमी छपनी शुरू हुई थी, तो विश्वकर्मा को सुझाव दिया था, प्रिंट लाइन में लक्ष्मीकांत का नाम जाने का कोई मतलब नहीं है। उन दिनों यह लगभग तय था कि प्रिंट लाइन में समूह संपादक लक्ष्मीकांत मिश्र और स्थानीय संपादक एसपी सिंह का नाम जाएगा। पांच—सात दिन डमी में लक्ष्मीकांत का नाम समूह संपादक के तौर पर छापा भी गया था। विश्वकर्मा और एसपी सिंह ने सीएमडी भदौरिया को पता नहीं कौन—सी घुट्टी पिलाई।

एक दिन एसपी सिंह ने शिवाकांत को सुनाते हुए कहा था, ‘अरे सुनो...प्रिंट लाइन से लक्ष्मीकांत का नाम हटा दो, उसकी जगह सीएमडी साहब का नाम डाल दो।'

एसपी को विश्वकर्मा लाए। फिर एसपी सिंह अपना समझकर दत्ता को लाए, लेकिन आज पृथ्वी एक्सप्रेस में सत्ता न विश्वकर्मा के हाथ में है, न एसपी सिंह के। दोनों धीरे—धीरे हाशिये पर ढकेल दिए गए। जिसने उन्हें पैदा किया, सत्ता और अधिकार दिलाया, वे लोग पहले अपने उपकारकर्ताओं की ही जड़ काटने में लग गए। दत्ता की लल्लो चप्पो करने वाले एसपी सिंह आज कैंसरग्रस्त बिस्तर पर पड़े हैं, लेकिन उन्हें देखने जाने वाला कोई नहीं है। तीन दिन पहले जब शिवाकांत उन्हें देखने गया, तो वे डबडबाई आंखों से बड़ी देर तक उसे देखते रहे। फिर क्षीण स्वर में बोले थे, ‘मुझसे अपराध हो गया था? गलती मेरी ही थी। मैं विश्वकर्मा के बहकावे में आ गया था? मुझे पंडित जी का साथ देना चाहिए था। क्या मेरी एक बार उनसे बात हो सकती है? डॉक्टर कहते हैं कि मेरा कैंसर लास्ट स्टेज में पहुंच चुका है। सिर्फ दस फीसदी चांस है। मौत तो एक दिन आनी ही थी, लेकिन इतनी जल्दी आएगी, इसका आभास नहीं था। बस...एक बार उनसे बात करा दो। मैं माफी मांगना चाहता हूं।'

शिवाकांत द्रवित हो गया था।

‘भाई साहब...अभी कल ही लक्ष्मीकांत जी से बात हुई थी। उनके मन में आपके प्रति कोई मैल नहीं है। मुझसे कह रहे थे, ‘एसपी सिंह जी अच्छे आदमी हैं। दिल्ली आया, तो एसपी सिंह से जरूर मिलूंगा।'

‘एक बार वे मुझे माफ कर दें, तो शायद मेरी मौत आसान हो जाए। मुझे अंदर से पता नहीं क्यों महसूस हो रहा है कि अब ज्यादा दिन का खेल नहीं है। जिस पैसे के लिए मैंने लक्ष्मीकांत जी जैसे सहृदय, स्वाभिमानी और योग्य व्यक्ति का दिल दुखाया, वह पैसा और रुतबा काम नहीं आया। तीन महीने में बाइस—पच्चीस लाख रुपये फूंक चुका हूं। गले का कैंसर अब जानलेवा हो चुका है। डॉक्टर आपरेशन करने से पीछे हट रहे हैं। कहते हैं, अब कोई फायदा नहीं है। जितने दिन गुजर जाएं, समझो गुजर गए। हालांकि कोई मुझसे कुछ कहता नहीं है, लेकिन घरवालों के चेहरे पर मैं मौत की आहट देख रहा हूं। डॉक्टर ने तो बोलने से भी मना किया है।'

शिवाकांत ने मोबाइल निकालकर लक्ष्मीकांत से बात की। एसपी सिंह की हालत के बारे में बताया। फिर एसपी सिंह की ओर मोबाइल फोन बढ़ा दिया, ‘पंडित जी...' इतना कहकर एसपी सिंह फूट—फूटकर रोने लगे। उधर से लक्ष्मीकांत उन्हें सांत्वना देते रहे। उनके प्रति मन में किसी किस्म की नाराजगी या कडुवाहट नहीं होने की बात लक्ष्मीकांत कहते रहे। कान में मोबाइल फोन लगाए एसपी सिंह रोते रहे। उनके मुंह से आगे कोई शब्द नहीं निकला। शिवाकांत जब उनका हाथ थपथपा कर कमरे से बाहर निकला, तो बड़ी देर तक एसपी सिंह की निगाहें दरवाजे की ओर लगी रहीं। बाहर उनका भाई राजीव मिला, तो वह शिवाकांत को देखते ही फफक पड़ा, ‘डॉक्टर कहते हैं, नहीं बचेंगे, भइया!' इतना कहकर सुबकने लगा।

शिवकांत रुंधे गले से सिर्फ इतना ही कह पाया, ‘धैर्य रखो...सब ठीक हो जाएगा।' वैसे उसने राजीव से पूछना चाहा कि कोई आता है ऑफिस से मिलने? लेकिन उसे यह पूछना व्यावहारिक नहीं लगा। वह जानता था, ऑफिस में सबको पता है, लेकिन कोई चर्चा नहीं करना चाहता। कुछ लोग अप्रिय प्रसंग छिड़ने के भय से चर्चा नहीं करना चाहते हैं, तो कुछ लोग मुंह बिचकाकर इधर—उधर हो लेते हैं। यह दुनिया कितनी बेरहम है? इतनी जल्दी भूल जाती है रिश्तों को। अवधी में एक बहुत पुरानी कहावत है, ‘आंख ओट, तो जग ओट।' जो आंख से ओझल हुआ, समझो वह इस संसार से ओझल हो गया। कल तक जो विश्वकर्मा और एसपी सिंह एक ही थाली में खाते थे, एक जैसा ही सोचते थे। जिस दत्ता को लाने के लिए एसपी सिंह ने जमीन—आसमान एक कर दिया। उन्हीं लोगों ने उनसे आंखें फेर लीं। संबंधों का क्षरण इतनी तेजी से होता है, यह शिवाकांत कई बार महसूस कर चुका है। बचपन से लेकर अब तक वह पढ़ता—सुनता आया था, ‘सर्वे गुणाः कांचनमाश्रयंति।' लेकिन कंचन के लिए कोई अपने भाई को भूल जाएगा, अपने माता—पिता को भूल जाएगा, दोस्त, हितैषियों को भूल जाएगा, इसकी कल्पना उसने नहीं की थी। आज एसपी सिंह या विश्वकर्मा के हाथ क्या लगा? मात्रा कुछ लाख रुपये...दत्ता या चौरसिया अपने जीवन के इस पड़ाव पर क्या हासिल कर लेंगे? सिर्फ पैसा...लेकिन जो लोग इनकी घृणित राजनीति के शिकार हुए हैं। उन लोगों की आहें, बद्दुआएं भी इस पैसे में चक्रवृद्धि ब्याज की तरह जुड़ेंगी ही। इनसे तो वे नहीं बच सकते हैं? पिछले दो साल में वह तो साक्षी रहा है कि किस तरह दत्ता और चौरसिया ने डेस्क से लेकर फील्ड तक करीब एक दर्जन लोगों को निबटाया। उनमें से ज्यादातर लोग तो वे थे, जो ऊधो के साथ थे, न माधो के। वे तो अपने बाल—बच्चों का पेट पालने के लिए सिर्फ नौकरी कर रहे थे। उन्हें दत्ता या चौरसिया के अहम की लड़ाई से क्या लेना था। इन दोनों ने अपनी कुटिल चालों से इन बेकसूरों को निशाना बनाया। अपने पाले में करने के लिए नीचता की हद तक उतरे। इस पर भी जब मनोवांक्षित परिणाम हासिल नहीं हुआ, तो आरोप लगाकर बाहर का रास्ता दिखा दिया।

शिवाकांत अपने ही मन में सवाल पूछता है, ‘अच्छा इस दुनिया में कमीनों का प्रतिशत कितना होगा? दस...बीस...पच्चीस...पचास...इससे ज्यादा भी मान लें, तो सत्तर फीसदी...। तीस फीसदी लोग अब भी मानवीय संवेदना, मानवीय सरोकार, रिश्ते—नातों, प्यार को प्रमुखता तो देते ही होंगे। उनके लिए तो भाई हर हाल में भाई ही होता होगा। मां—बाप, भाई—बहन, यार—दोस्तों के सुख—दुख उनके अपने सुख—दुख होते होंगे। अगर महात्मा बुद्ध ने यह कहा, सदा सत्य बोलो। इसका यही मतलब है न कि उनके समय में असत्य इतना ज्यादा बोला जाता था, कि सत्य की गरिमा ही समाप्त हो चली थी। इसका एक मतलब यह भी है कि उस समाज में कुछ लोग ऐसे भी थे, जो सत्य की गरिमा को बचाए हुए थे। तो क्या पत्राकारिता की इस गंदगी को साफ करने के लिए कोई बुद्ध आएगा? कोई भगत सिंह पैदा होगा, जो पत्राकारिता के नाम पर समाज को दिग्भ्रमित करने वालों, अपने ही साथियों का जीना दुश्वार करने वालों और समाज के सामने एक गलत मिसाल पेश करने वालों के बहरे कान खोलने के लिए बम विस्फोट कर उन्हें जगाएगा? समाज में भले ही कितने गलत लोग हों, पत्राकारिता भले ही आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हो, लोकतंत्रा का चौथा खंभा कही जाने वाली पत्राकारिता भले ही नेताओं, पुलिस और तस्करों की रखैल बनकर रह गई हो। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इसकी शुचिता को अक्ष्क्षुण रखने में जी जान से लगे हुए हैं। पत्राकारिता के गंदे तालाब में ऐसी भी कुछ मछलियां हैं, जो इस तालाब की गंदगी को साफ करने लगी हुई हैं। उसने कहीं सुना था, एक ऐसी भी मछली होती है, जो सिर्फ गंदगी खाकर ही जिंदा रहती है। लोग ऐसी मछलियों को एक्वेरियम में रखते हैं, ताकि उसमें जमा होने वाली काई और गंदगी को ये मछलियां खाकर साफ करती रहें। ऐसी मछलियां स्वभाव से आक्रामक भी नहीं होतीं। सभी किस्म की मछलियों के साथ रहकर अपने काम में अनवरत लगी रहती हैं। पत्राकारिता में भी कुछ लोग ऐसे ही हैं। आज भले ही गंदगी फैलाने वाली मछलियों की बहुलता हो, लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा, जब इस गंदगी को लेकर लोग सजग होंगे। अपने बीच में अराजक तत्वों को निकाल बाहर करेंगे। पत्राकारिता तब तक नहीं मर सकती है, जब तक सच जिंदा है। सच पहले भी जिंदा था, सच अभी जिंदा है, आगे भी जिंदा रहेगा। लेकिन वह दिन कब आएगा? यह नहीं कहा जा सकता है।'

यह सब सोचते—सोचते शिवाकांत की आंख कब लग गई, उसे पता ही नहीं चला। सुबह वह काफी देर तक सोता रहा। उस दिन शिवाकांत ने सिर्फ एक ही काम किया अपने सामान की पैकिंग। दोपहर में एक मजदूर को बुलाकर सामान आटो में लदवाया। सारा सामान लेकर वह अपने मित्रा रघुनाथ वर्मा के घर पहुंचा। रघुनाथ ने उस दिन छुट्टी ले रखी थी। वहीं उसने दोपहर का भोजन भी किया। वह काफी देर तक उत्सव के साथ खेलता रहा। शालिनी की मौत के बाद उत्सव काफी समझदार हो गया था। अब वह ठीक समय पर उठता, पढ़ाई करता, स्कूल जाता। काम में वह अपने पालक पिता की मदद करता। हालांकि, रघुनाथ ने घर की साफ—सफाई के लिए नौकरानी रख ली थी। शालिनी की मौत से टूट चुके रघुनाथ ने एक समझदारी का काम किया था। उसने अपनी एक विधवा ‘मानी' बुआ को दिल्ली बुला लिया था। वे रघुनाथ की गैर मौजूदगी में उत्सव की देखभाल करती थीं। उत्सव उन्हें ‘दादी' कहता था। दोनों में अच्छी दोस्ती भी हो गई थी। वे उत्सव को बहुत प्यार करती थीं।

मालिनी जब विधवा हुई थीं, तो उनकी उम्र तीस साल थी। पति एक दिन खेत में पानी लगाने गया, तो लौटी थी उसकी लाश। लोग कहते थे कि चुल्लू भर पानी में डूब गया। आसपास खेत पर काम करने वाले दूसरे किसानों का बयान था कि खेत में जब धान बोने लायक पानी भर गया, तो उसने पूरे खेत को जोत दिया। खेत को समतल करने के लिए पाटा चला रहे थे, तो वे बैलों के भड़कने पर मुंह के बल गीली मिट्टी में जा गिरे। ढेर सारी मिट्टी मुंह और नाक में भर गई। जब तक उसके मुंह और नाक से मिट्टी निकाली जाती, प्राण पखेरू उड़ चुके थे। विधवा होने के बाद उन्होंने अपनी इकलौती संतान बबुनी यानी बबिता को पाला पोसा, उसकी शादी कराई। वह अपनी ससुराल में सुखी है। जिठानी—देवरानी मालिनी को बड़ा मान—सम्मान देती थीं। वह साल—छह महीने में एकाध बार मायके भी हो आती थीं। रघुनाथ जब छोटा था, तो वह अपनी मालिनी बुआ को ‘मानी बुआ' कहता था। बाद में उसके चचेरे भाई—बहन भी उन्हें मानी बुआ ही कहकर पुकारने लगे। शालिनी की मौत के बाद जब उसने अपनी मानी बुआ के सामने उत्सव के पालन—पोषण की समस्या रखी, तो वे भारी मन से यहां आने को तैयार हुर्इं, लेकिन कुछ ही दिनों में उत्सव ने उनका मन मोह लिया। अब वह उत्सव की दादी और कभी—कभी ‘मानी दादी हो गई थीं।' बुआ को शालिनी और रघुनाथ की प्रेम कहानी भी पता थी, लेकिन वह उत्सव के सामने कभी जिक्र नहीं करती थीं। वैसे तो उत्सव अपनी मां को लगभग भूल चुका था, लेकिन कई बार जब उसे मां की याद आती, तो वह रो पड़ता। उत्सव रोता, तो मानी दादी भी उसे सीने से लगाकर बिलख उठती हैं। रघुनाथ भी शालिनी के जाने के बाद गुमसुम रहने लगा था, लेकिन वह उत्सव के प्रति लापरवाह नहीं था।

शिवाकांत घर पहुंचा, तो अभिनव और अंकिता स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे। घर के बाहर आटो रुकने की आवाज सुनकर अभिनव ने बाहर झांका। वह वहीं से जोर से चिल्लाया, ‘मम्मी...देखो, पापा आ गए। मम्मी...पापा आ गए।' वह हाथ में स्कूल की टाई लिए दौड़ता हुआ बाहर निकला आया। बाहर आकर उसने शिवाकांत के पैर छुए। शिवाकांत के लिए यह नई बात थी। इससे पहले घर आने पर अभिनव आकर सीधा उसकी टांगों से लिपट जाया करता था। वह उठाकर उसके गाल चूम लेता था। उसने इस बात पर पहले ध्यान ही नहीं दिया था। या यों कहिए कि उसने इसकी जरूरत ही नहीं समझी थी। आज अभिनव का झुककर पैर छूना, उसे पता नहीं क्यों अच्छा लगा। एक नई तरह की अनुभूति हुई, जिसको शब्दों में व्यक्त कर पाना उसके लिए संभव नहीं था। उसने पलभर सोचा, माधवी ने सिखाया होगा। पापा आएं, तो उनके पैर छू लिया करो। माधवी...उसे तो पहले किसी का पैर छूना बड़ा नागवार गुजरता था। वह कहती थी, पैर छूने की यह परंपरा जरूर किसी गुलाम मानसिकता वाले ने शुरू की होगी। कितना अजीब लगता है, एक इंसान दूसरे इंसान का पैर छूकर उसके उच्च होने का सार्वजनिक प्रदर्शन करे। हाथ जोड़कर नमस्ते या प्रणाम कहने में समानता का बोध होता है। उसने पैर छूकर सीधे हो रहे अभिनव को अपने से सटा लिया। आटो वाले को पर्स निकाल कर पैसे दिए। अपना सामान उठाया और घर की ओर चल पड़ा।

अभिनव के चिल्लाने पर अंकिता और माधवी बाहर निकल आए। अभिनव ने लपक कर थर्मस और एक हलका थैला थाम लिया। अभिनव को सामान उठाता देख अंकिता भी दौड़ी आई और ब्रीफकेस उठा लिया। बाकी सामान उठाकर शिवाकांत आगे बढ़ा। पास जाने पर उसने अपने दायें हाथ का सामान माधवी को थमाया और उसे दायीं बांह के घेरे में लेकर अंदर आ गया। स्कूल जाने की तैयारी करते दोनों बच्चे पापा के पास सिमट आए। कोई सिर पर चढ़ रहा था, तो कोई उसकी गोद में। अंकिता ने कहा, ‘पापा...आपने ‘हर हर महादेव' में महादेव और जालंधर का युद्ध देखा था। जानते हैं, मेरी एक सहेली है ऋषिता। वह बता रही थी कि अगले एपीसोड में जालंधर मारा जाएगा। पापा कितना अच्छा सीरियल है न!'

‘नहीं बेटी...जब यह सीरियल आता है, तब मैं ऑफिस में होता हूं। तुम तो जानती हो, ऑफिस में यह सब नहीं देखा जा सकता है। ऑफिस में अगर सीरियल देखा जाए तो पुलिस पकड़ ले जाती है।' शिवाकांत ने अंकिता का सिर सहलाते हुए कहा।

तभी गोद में बैठा अभिनव उसकी जेब से पेन निकालकर अपनी हथेली पर गोदने लगा। माधवी ने किचन में जाते हुए कहा, ‘आप अचानक कैसे आ गए? परसों आपसे बात हुई थी, तो आपने ऐसा कुछ कहा ही नहीं था। फिर यह अचानक...सब ठीक तो है न!'

नजर बचाने को कमरे में लगी मोनालिसा की पेंटिंग को देखते हुए शिवाकांत ने कहा, ‘हां...सब ठीक है। ऐसा करता हूं, पहले मैं फ्रेश हो लेता हूं। इन बच्चों को स्कूल जाना होगा। माधवी...ऐसा करो। फ्रेश होकर चाय पी लेता हूं। फिर सो जाता हूं। मेरा खाना फ्रिज में रख देना, मैं दोपहर में खा लूंगा। तुम्हें भी तो कॉलेज जाना होगा?'

‘मम्मी...आज स्कूल जाने का मन नहीं है। वैसे भी आज स्कूल में पढ़ाई नहीं होगी। दो मैडम आज छुट्टी पर हैं।' अभिनव पापा को देखते ही स्कूल न जाने के लिए मचल गया।

‘नहीं...बेटा...स्कूल जाओ। आज वैसे भी हॉफ डे है। जल्दी छुट्टी हो जाएगी। फिर घर आकर पापा से खूब ढेर सारी बातें करना।' माधवी ने उसे टाई पहनाते हुए कहा।

मम्मी का बात सुनकर अंकिता का मुंह लटक गया। वह भी मम्मी से स्कूल न जाने की बात कहने वाली थी, लेकिन अभिनव की बात नकार दिए जाने से उसके उत्साह पर ठंडा पानी पड़ गया था।

शिवाकांत ने उठकर कमीज के बटन खोलते हुए कहा, ‘तुम दोनों स्कूल जाओ

...आज वैसे भी साढ़े ग्यारह बजे तक तुम दोनों स्कूल से लौट आओगे। फिर हम लोग खूब खेलेंगे। शाम को हम सब हजरतगंज चलेंगे। खरीदारी करेंगे, लीला में फिल्म देखेंगे और बाहर ही खाना खाकर आएंगे। हजरतगंज में अंकिता को मनपसंद आइसक्रीम भी खिलाएंगे।'

बच्चों को किसी तरह मनाकर माधवी ने स्कूल भेजा। शिवाकांत दैनिक कार्यों में लग गया। नहा धोकर जब वह बाहर आया, तो देखा कि माधवी किचन में नाश्ता तैयार कर रही है। उसने किचन में जाकर बड़े प्यार से माधवी को बाहों में जकड़ लिया।

माधवी ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘बड़ा प्यार आ रहा है...'

‘हूं' कहते हुए शिवाकांत ने पत्नी को मुक्त कर दिया। कुर्सी पर बैठकर उसे नाश्ता बनाता देखता रहा। वह सोच रहा था कि उसे कैसे बताए, एक बार फिर बेरोजगार हो गया है। अब तक तो उसका यही रिकार्ड रहा है कि हर साल—दो साल बाद वह नई नौकरी खोजने को मजबूर हो जाता है। कई बार तो उसकी गलती होती है, तो कई बार वह दूसरों के लिए भिड़ जाता है। नतीजा, उसका इस्तीफा। जिसके लिए वह अपने अधिकारियों से झगड़े—झंझट मोल लेता है, बाद में वह पाता कि वही उसके विरोध में खड़ा हुआ है। ऐसी स्थिति में उसका दिल रो उठता, लेकिन वह भी क्या करे। आदत से मजबूर।

तब तक माधवी ने मेज पर नाश्ता लगा दिया। उसके भी मन में उथल—पुथल चल रही थी। शिवाकांत ने महसूस किया कि हर बार की तरह आज उसका उत्साह और खुशी पहले की तरह छलक नहीं रही है। जरूर कोई बात है, जिसको लेकर उसके मन में कशमकश चल रही है। वह बताना भी चाहती है, लेकिन बता नहीं पा रही है। चाय रखने के बाद सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ रही माधवी की कमर को अपने दोनों बाहों में समेटते हुए अपनी ओर खींचा। नाभि के पास चुंबन जड़ दिया। उसके इस प्यार पर माधवी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। शिवाकांत ने उसे कुर्सी पर खींचकर बैठने का इशारा किया, तो वह उसकी कुर्सी पर सटाकर बैठ गई।

‘और...कैसा चल रहा है? मजे में तो रही तुम?'

‘पति के बिना कोई स्त्राी कैसे मजे में रह सकती है? जीवन का आनंद तो दोनों के एक साथ रहने में है। सुख हो या दुख, एक साथ भोगने का नाम ही जीवन है। पिछले तीन—साढ़े तीन साल से हम यही जीवन तो नहीं जी पा रहे हैं।'

‘हां...यह दुख तो हम दोनों को है।' पराठे के टुकड़े को अचार के साथ मुंह में रखते हुए शिवाकांत ने कहा, ‘शायद यही जीवन की रीति है। जब कोई वस्तु अप्राप्य रहती है, तो उसे प्राप्त करने की आकांक्षा प्रबल हो उठती है। जब वह वस्तु प्राप्त हो जाती है, तो व्यक्ति के समक्ष नई वस्तु आ जाती है। वह उसके प्रति लालायित हो जाता है। जब हम लोग साथ थे, ऐंठे टाइप के मियां—बीवी थे। जैसे ही तुमसे दूर हुआ, तो तुम्हारा महत्व समझ में आने लगा। भले ही मुझे भाव नहीं देती थी, लेकिन दैहिक जरूरतें तो पूरी हो जाती थीं। मन में कहीं अतृप्ति का भाव तो नहीं होता था। दिल्ली में यह अतृप्ति ही विकल कर देती थी।' शिवाकांत ने कहने के बाद चाय सुड़की।

माधवी ने अपना प्याला मेज पर रखते हुए कहा, ‘आप बिना बताए...आ गए? सब खैरियत तो है न!'

‘हां...वैसे तो सब खैरियत है, लेकिन पृथ्वी एक्सप्रेस की नौकरी छोड़ आया हूं।'

‘क्या...? यह आपने क्या किया? जानते हैं...मेरी भी नौकरी अब नहीं रही। एडहाक बेसिस पर नौकरी थी...कॉलेज मैनेजमेंट ने उसे आगे बढ़ाने से मना कर दिया है। एक हफ्ते पहले ही तो हुआ है यह सब कुछ। आपका फोन आने पर मैंने यह सोचकर नहीं बताया, आप बेकार में परेशान होंगे। जब आप आएंगे, तो सब कुछ बता दूंगी। अगले साल नया सेशन शुरू होने पर बच्चों को लेकर आपके साथ ही दिल्ली में रहूंगी। वहीं कोई छोटी—मोटी नौकरी खोज लूंगी।' शिवाकांत की बात सुनकर सिसक उठी माधवी।

माधवी की बात सुनकर शिवाकांत पहले सन्न रह गया। फिर उसने शांत स्वर में कहा, ‘कोई बात नहीं, माधवी! नौकरी का क्या है? एक छूटेगी, तो दूसरी मिलेगी। दूसरी छूटेगी, तो तीसरी मिल जाएगी। नौकरी छूट जाने के बाद हम दोनों आत्महत्या तो नहीं करने जा रहे हैं। अब हम दोनों एक साथ नए सिरे से संघर्ष करेंगे। नहीं कुछ होगा, तो परचून की दुकान खोलेंगे। दोनों मिलकर उसे चलाएंगे। मैं दुकानदार और तुम मेरी दुकानदारिन।' इतना कहकर शिवाकांत ने उसे आलिंगनबद्ध कर लिया। माधवी सिसकने लगी।

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