Purn-Viram se pahle - 7 in Hindi Social Stories by Pragati Gupta books and stories PDF | पूर्ण-विराम से पहले....!!! - 7

पूर्ण-विराम से पहले....!!! - 7

पूर्ण-विराम से पहले....!!!

7.

खैर प्रखर ने जैसे ही अपनी बातें बताना शुरू की.....शिखा प्रखर की बातों को सुनने लगी..

“तुम दोनों को प्रीति के बारे में बताऊँगा तो मुझे भी बहुत अच्छा लगेगा|”..

जब हम लखनऊ से कानपुर लौट रहे थे तब प्रीति ने कराहते हुए मुझे बताया ......कि उसकी पीठ में बहुत तीव्र दर्द है| वो बैठ भी नहीं पा रही|.. एक दिन पहले भी उसके इसी पैटर्न का दर्द था.. तब उसने जो पैन किलर ली थी आराम आ गया था| जिस रोज हम निकालने वाले थे उसने फिर से पैन किलर ली थी क्यों कि उसको फिर से दर्द महसूस हो रहा था| पर जब दर्द बंद नहीं हुआ तब उसने मुझे बताया|

मैंने प्रीति कहा.. मुझे बताना तो चाहिए था प्रीति| लखनऊ में ही किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा लेते....कानपुर से बेहतर मेडिकल सुविधाएं तो लखनऊ में हैं| खैर हम लोग उसी समय लखनऊ की सीमा से बाहर निकले ही थे| तो मैंने ड्राइवर को गाड़ी लौटाने को बोल दिया|

बाद में उसने बताया मेरी अर्जन्ट मीटिंग्स की वजह से वो चुप रही....और फिर रात को मैं काफी देर से आया तब तक वो सो चुकी थी|..दर्द की वजह से वो दोस्तों से भी मिलने नहीं गई थी| जब दोस्तों ने आने का बोला उसने मना कर दिया क्यों कि उसे बैठने-उठने और लेटने में दिक्कत हो रही थी|

तब मैने उसको बोला..

सच में बुद्दू हो तुम प्रीति..कोई खुद के साथ इस तरह लापरवाही करता है क्या| मेरी कितनी भी अर्जन्ट मीटिंग होती.. मैं कैसे भी करके मैनेज करता|

फिर प्रखर ने समीर और शिखा की ओर देखकर कहा कि एक उम्र के बाद जीवन-साथी कुछ ज़्यादा ही प्रिय होने लगता है| शरीर की दिनों-दिन बढ़ती निशक्तता शायद एक दूसरे के साथ को जरूरत से ज़्यादा मूल्यवान बना देती है| उसी समय हम वापस लखनऊ पहुँच गए|

डॉक्टर को दिखाया| उन्होंने उसका चेकअप किया और कुछ जाँचे करवाने को कहा| हम दोनों ने वहाँ अपना स्टे आगे बढ़ा दिया|

फिर शुरू हुआ तरह-तरह की जाँचों के होने का सिलसिला| न जाने कितने एक्स-रे और खून की जाँचे हुई| सी.टी. स्कैन फिर पैट स्कैन..और जब डॉक्टर डाइअग्नोसिस पर पहुंचे तब उन्होंने मुझे अपने चैम्बर में बुलाया|

डॉक्टर ने बताया कि उनको प्रीति में बोन-कैंसर के लक्षण दिख रहे हैँ| पर जब तक वो किसी फाइनल डाइअग्नोसिस पर नहीं पहुँचते उन्होंने बोला वो रिपोर्ट नहीं देंगे|

हम दोनों करीब-करीब सात-आठ दिन लखनऊ में रहे| इस बीच में मुझे प्रीति को मेंटली तैयार करना था| प्रणय को बाहर नौकरी पर गए हुए अभी कुछ साल ही हुए थे| अभी तक तो हमने उसके साथ बहुत ज़्यादा साझा नहीं किया था| डॉक्टर की रिपोर्ट आने के बाद ही प्रणय को बताने का निर्णय प्रीति का ही था| पर ऐसा हुआ नहीं|

तब अनायास ही समीर ने प्रखर से पूछा.....

“प्रणय के फोन जब हर रोज ही आता था तो उसको जिज्ञासा नहीं हुई.. आप दोनों वापस कानपुर क्यों नहीं लौटे?.....उसने नहीं पूछा|”

समीर को प्रणय के मन की थाह भी महसूस करनी थी| आहत मन कदम-कदम पर अपनों के मन छूना चाहता है ताकि उसकी वेदना को कम कर सके| इसलिए समीर ने बीच में ही प्रखर से पूछा| तब प्रखर ने बताया कि...

प्रणय ही हम दोनों को फोन किया करता था.....क्यों कि हमको उसकी मीटिंग्स और उसके कमिट्मेंट्स का इंडिया में बैठकर पता नहीं चलता था| तो हमने उसको ही बोल रखा था तुम जब भी फ्री हो हमको फोन कर लेना| हालांकि वो हमसे बोला करता था..

“पापा ऐसा कुछ भी नहीं है.....आप दोनों कभी भी फोन करेंगे तो मैं ले लूँगा| अगर ज़्यादा बिजी हुआ तो समय निकाल कर आपको लगा लूँगा|’

पर समीर मुझे लगता था वो खुद करे| हरेक के काम की कुछ लिमिटैशनस होती है| शुरू के एक-दो साल जब वो गया ही था....हमको यही लगता था उसकी नई-नई नौकरी है जितना समर्पित होकर काम करेगा.....अच्छा गैन करेगा| प्रणय भी अपने काम के प्रति बहुत मेहनती व समर्पित है|

सच कहूँ तो हमको उस अंतराल में कभी भी ऐसी इमर्जेंन्सी नहीं हुई कि उसको फोन करने की जरूरत पड़ी हो|

उसको दोनों से ही अलग-अलग बात करके तसल्ली मिलती थी| अपनी माँ को वो सवेरे फोन किया करता था और मुझे रात को| मेरा सारा दिन ऑफिस में जो निकलता था| प्रणय को शक तब हुआ जब उसने प्रीति को फोन लगाया और उसका फोन मैंने उठाया| उस रोज प्रीति टेस्टिंग के लिए गई हुई थी|

मेरे फोन उठाने पर प्रणय ने पूछा..

“पापा! आप तो माँ का फोन नहीं लेते है.. आपके पास माँ का फोन कैसे है| पिछले दो-तीन बार से माँ का फोन आप ही ले रहे हैं| माँ ठीक तो हैं..कुछ भी बहुत सीरीअस है तो मुझे बताइए..”

उस दिन मैं प्रणय से प्रीति की अचानक तबीयत खराब हो जाने की बात को छिपा नहीं पाया शिखा| मैने प्रणय से कहा..

“प्रीति को काफी बैक पैन था बेटा| इसलिए हम लखनऊ में ही रुक गए थे|.. अभी टेस्ट चल रहे हैं जैसे ही रिपोर्ट्स आएंगी मैं खुद तुमको बताऊँगा| तुम माँ से डायरेक्टली बात मत करना| अभी थोड़ा डिस्टर्ब है वो|”

“क्या सस्पेक्ट कर रहे हैं डॉक्टर्स पापा|”

“कैंसर” प्रीति के काफ़ी सेकंडरीस डिवेलप हो गई हैं| डॉक्टर्स आगे और भी जाँचे करना चाहते हैं ताकि कैंसर के प्राइमेरी सोर्स का पता चल सके| उसी के हिसाब से लाइन ऑफ ट्रीट्मन्ट डॉक्टर्स की टीम तय करेगी|”

तब प्रणय ने मुझे कहा..

“मैं आना चाहता हूँ पापा| मैं नहीं चाहता आप अकेले परेशान हो| मैं माँ के पास रहूँगा तो उनको भी ठीक लगेगा| मैं अपने टिकेट्स तीन-चार दिन बाद जब भी मिलती है.....करवा रहा हूँ|”

उसकी बातों को सुनकर मैंने उसको कहा.....इंतजार करना चाहो तो रुक जाओ अभी| समीर जानते हो क्या बोला..

“पापा आप दोनों के बोलने से मुझे आपके हालचाल महसूस हो जाते हैं| आप अकेले सभी परेशानियों से कैसे जूझेंगे पापा| चैन तो मुझे यहाँ भी नहीं होगा| आप दोनों के पास रहूँगा तो मन में तसल्ली रहेगी|”

जानते हो समीर उस रोज मैंने प्रणय को पहली बार फोन पर रोते सुना| उसको रोता हुआ पाकर मैं भी खुद को रोने से नहीं रोक पाया| इतना बड़ा बेटा अगर माँ-बाप के आगे रोए तो किसका जी नहीं फटेगा| अपनी बात बोलते-बोलते प्रखर समीर और शिखा के सामने फिर से रोने लग गया| प्रखर ने जिस दर्द को खुद में समेट कर रखा था वो अब आंसुओं में बिखरने लगा था|

प्रखर को रोता हुआ पाकर शिखा भी फूट-फूट कर रोने लगी| प्रखर को चोट पहुंचे और शिखा चोटिल न हो ऐसा हो ही नहीं सकता था| प्रखर को रोता हुआ देख कर समीर के भी आँखों में नमी तैर गई| दर्द जाने-अनजाने में दुखती रगों को छू रहे थे| उन्होंने प्रखर के कंधे पर अपना हाथ रखकर उसे सांत्वना दी|

दरअसल प्रखर स्वभाव से जितना सख्त अनुशासन प्रिय अपनी नौकरी में था....वो उतना ही संवेदनशील भी था| यही वजह थी कि उसने अपने पूरे कार्यकाल में बहुत शांति से नौकरी की| उसने कार्य-काल में ऐसे काम हुए जिनकी अखबारों में भी खूब चर्चा हुई| उसकी छवि बहुत अच्छे ईमानदार आई.ए.एस. ऑफिसर की थी|

खैर आज प्रखर पहले से ही काफ़ी भावुक हो रहा था| तभी प्रीति की बीमारी से जुड़ी बातें बताते-बताते वो बार-बार खुद को संभाल रहा था| शिखा और समीर पूरी तरह उसकी बातों में खोए हुए थे|

मैंने जब प्रीति को प्रणय के आने के बारे में बताया| तो प्रीति उस समय कुछ भी नहीं बोली बस उसकी आँखें आंसुओं से भर आई| जब मैंने उसको पूछा....

“क्या हुआ.....परेशान हो प्रीति....बोली ‘कितना समय है मेरे पास| इतना तो मैं समझ चुकी हूँ मुझे कैंसर है....क्यों कि जो भी टेस्ट डॉक्टर ने मेरे करवाए हैं वो सब कैंसर में ही होते हैं| बस मुझे इतना बता दो मेरे पास लगभग कितना समय अब शेष है प्रखर|’

उसकी बातें सुनकर रोते हुए जब मैंने प्रीति को कसकर गले लगाया था..उसने मुझे कहा..

“इतने कमजोर मत पड़ो प्रखर| हर टफ से टफ स्थिति-परिस्थिति में तुमने बहुत हिम्मत से सामना किया है| कमजोर तो मैं पड़ती रही हूँ .. और तुमने मुझे संभाला है| मैं जाने से पहले तुमको कमजोर पड़ता हुआ नहीं देखना चाहती हूँ| तीन-चार दिन बाद प्रणय आ जाएगा| वो हम दोनों को बहुत प्यार करता है| आप उसके आदर्श हैं| मेरे जाने के बाद आपको उसका पूरी तरह ख्याल रखना होगा|”..

समीर!......मुझे उस एक ही क्षण में.....अपनी ज़िंदगी में प्रविष्ट होने वाला निर्वात बहुत गहरे तक महसूस हो गया था| उस दिन प्रीति जिस तरह मेरे गले लगी हुई थी....इस तरह के सारे एहसास मेरे जीवन से हमेशा-हमेशा के लिए विलुप्त होने वाले थे|

तभी अस्पताल के स्टाफ ने मुझे डॉक्टर के चैम्बर में पहुँचने को कहा| रास्ते में उसने बताया पैशन्ट प्रीति की बची हुई रिपोर्ट्स आ चुकी हैं|

मैं डॉक्टर के चैम्बर में पहुंचा| डॉक्टर ने मुझे बैठने को कहा और बताया....

प्रीति के कैंसर का प्राइमेरी सोर्स ब्रेस्ट था| शायद मरीज़ को पहले कोई दिक्कत महसूस नहीं होगी तभी उन्होंने कोई कम्प्लैन्ट नहीं की| कैंसर जब बोन्स में पहुँच गया और उनको तेज बैक-पैन हुआ| तभी आप लोग का अस्पताल आना हुआ| कई बार ऐसा होता है| बीमारी जब शरीर में काफ़ी फैल जाती है तब उसके सिमटम मरीज़ को महसूस होते हैं|

कैंसर के बोन्स में पहुँच जाने से प्रीति की बोन्स खोखली हो गई थी| डॉक्टर ने मुझे कहा कि अब प्रीति को किसी भी तरह की चोट नहीं लगनी चाहिए| अगर एक बार बोन टूट गई तो वो जुड़ेगी नहीं| कैंसर का नेचर बहुत एगगरेसीव है| बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं कर सकते| आपको भी खूब ध्यान रखना होगा|

प्रीति की मेडिसिनस डॉक्टर ने मुझे लिखकर दे दी थी| साथ ही भविष्य में कोई भी दिक्कत आए तो हम उनसे बेहिचक संपर्क कर सकते हैं बोलकर उन्होंने सांत्वना दी|

समीर उस रोज मैं डॉक्टर को थैंक्स बोलकर चैम्बर से निकल आया| पर प्रीति के रूम तक पहुँचने में मुझे महसूस हुआ कि मेरी सारी ताकत निचुड़ गई हो| मेरे हाथ-पाँव कमरे तक पहुँचने में मेरा साथ नहीं दे रहे थे| जितना मैं कमरे की ओर बढ़ रहा था उतना ही कहीं अंदर-अंदर टूटकर बिखर रहा था|

क्रमश..

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