Dream to real journey - 3 in Hindi Science-Fiction by jagGu Parjapati ️ books and stories PDF | कल्पना से वास्तविकता तक। - 3

कल्पना से वास्तविकता तक। - 3

कल्पना से वास्तविकता तक:--3

नोट:-- 1.आप सब इस भाग को समझने के लिए पिछले वाले भाग अवश्य पढ़ लें।
2.इस भाग में प्रयोग लाई गई एक भाषा पूर्णतः काल्पनिक और हमारे द्वारा स्वरचित है किसी भी देश ,राज्य ,या कस्बे की भाषा से मिलना सिर्फ एक संयोग मात्र होगा।
3.यह कहानी किसी भी वैज्ञानिक तथ्य की पुष्टि नहीं करती हैं। दिए गए तथ्य बस कल्पना मात्र हैं।🙏
धन्यवाद!!

अब आगे......

कल्कि जब बेहोशी से जागती है ,तब वो पहले तो चारों तरफ़ देख कर हैरान हो जाती है,लेकिन तभी उसे नेत्रा और यूवी का ख्याल आता है ,वो अपने आस पास देखती है तब वो दोनो उसको पास ही बेहोश पड़ी हुईं दिखती हैं।वो उन दोनों के चेहरे को हाथ से हलका सा थपका कर उठाने की कोशिश करती हैं,और कुछ ही देर में वो भी अपनी आंखें धीरे धीरे खोलती हुई होश में अा जाती हैं। जब वो चारों तरफ़ देखती है तो उनकी हैरानी सातवें आसमान पर होती है। क्यूंकि ऐसा नजारा उन्होंने आज से पहले कहीं नहीं देखा था ।
नेत्रा:" ओह माय गॉड ,क्या जो हम देख रहे हैं ये सच है?"
यूवी:" पिंच मी कल्कि ,कहीं हम सपना तो नहीं देख रहे ।"
कल्कि:" देखने में तो लग रहा है लेकिन है नहीं।"

उन सबका इतना आश्चर्य चकित होता गलत नहीं था। वहां का नजारा ही कुछ ऐसा था। आसमान में एक नहीं बल्कि छोटे छोटे बहुत सारे सूरज थे, जो एक जगह ठहरे हुए तो थे नहीं बल्कि उनको देख कर ऐसे लग रहा था जैसे हर सूरज दूसरे सूरज को पकड़ने में लगा हो,वो सब मिलकर भी धरती के एक सूरज से उत्पन्न होने वाली गर्मी से कम ऊर्जा उत्पन्न कर रहे थे । आसमान का रंग इतनी जल्दी अपना रंग बदल रहा था कि रंग बदलने में गिरगिट को भी पीछे छोड़ दे।और वहां के पेड़ भी कुछ अलग ही रंग बिखेर रहे थे ,कुछ की टहनियां हवा में थी तो कुछ की जड़े, और हवा का एक झोंका आया नहीं वो पेड़ अपनी काया पलट कर लेते थे।मिट्टी का रंग धूमिल होने की बजाय सुनहरा लग रहा था जैसे किसी ने पूरी धरती पर सोने की परत चढ़ा दी हो ,जो सूर्य के प्रकाश से चमक उठी हो। पूरे वातावरण में एक अजीब सी खुशबू फैली हुई थी ,जो वहां के मौसम को ताजा और ठंडा बना रही थी। खुशबू भी ऐसी की कोई भी धरती वासी उसके मद में खुद को मदहोश होने से रोक ना पाए ,जैसे दुनिया के जितने भी खुशबूदार फूल हैं उन सबने अपनी महक वहां के वातावरण को दान कर दी हो। और आश्चर्य तो इस बात का था कि दूर दूर तक हजार तो क्या एक फूल का पौधा भी नहीं दिख रहा था।
यूवी:" ये सब सच है ,मतलब हम सही थे,हम किसी दूसरी दुनियां में है। "
यूवी का चेहरा खुशी से इतना खिल उठा था,मानो उसने ही ये दुनिया बनाई हो ,और आंखो कि चमक तथा,चेहरे पर आत्मविश्वास इतना जैसे किसी हारती हुई बाजी की अंतिम चाल उसने चली हो और वो बाजी जीत गई हो।
कल्कि:" हां यार,मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा ,लेकिन एक बात समझ नहीं आई,की जब हमने वहां सब जगह अच्छे से देख लिया था,तो अचानक से वो दरवाज़ा वहां कैसे अा सकता है?"
नेत्रा:" हां मैं भी यही सोच रही हूं,कुछ तो ऐसा हुआ होगा जो हमारी नज़रों से वहां छूट गया।"
यूवी:" तुम दोनों वो सब छोड़ो और यहां देखो ना,सब कुछ कितना अलग है ,जब वहां जाएंगे तब वहां की देख लेंगे।"
कल्कि:" अरे वाह यूवी तू तो बहुत होशियार है मैं तो तुझे ऐसे ही कम आंकती हूं। हम वहां जाने के बाद देख लेंगे सब हेना??
लेकिन वहां जाएगी कैसे वापिस ,ये भी बता दे ??बोल तो ऐसे रही है जैसे आने जाने का रास्ता अच्छे से पता हो । हुं"
यूवी को व्यंग्य के लहज़े में ,उसके कंधे पर हलका सा मारते हुए कल्कि कहती है।
यूवी:" हां यार ये तो मैंने सोचा ही नहीं हम वापिस कैसे जाएंगे ।"
कल्कि:" अब अा गया दिमाग ठिकाने पर।"
कल्कि:" नेत्रा एक बात बता?"
नेत्रा:" हां पूछ " नेत्रा अब भी चारों तरफ़ के नजारे को देखने में मशगूल थी।
कल्कि:" परलल यूनिवर्स के अकॉर्डिंग तो ये जगह भी हूबहू हमारी धरती जैसी होनी चाहिए थी। लेकिन ये तो धरती से बहुत अलग है।"
नेत्रा:" हां तुम सही कह रही हो ,किताबों में हमने भी यही पढ़ा है,लेकिन वो सब किताबें केवल आनुमनित्त तथ्यों पर आधारित होती है ,जरूरी नहीं जो भी उनमें लिखा है हमें दूसरी दुनिया ऐसी ही मिले ,क्यूंकि किसी ने भी ये दुनिया देखी नहीं होगी,बस एक अनुमान लगाया गया है।हमारी पृथ्वी पर हमने जो भी देखा है ,उसको देखकर ऐसे लगता है कि हम सबको बनाने वाली वो अनंत शक्ति समानता में बहुत विश्वास रखती होगी ,अब देखो ना हमारी आंखें या हाथ ही देख लो दोनो ही एक दूसरे से बहुत हद कर मिलती है ,हालांकि इनमें सूक्ष्म रूप में तो बहुत अंतर है लेकिन देखने में लगभग एक जैसी ही हैं।ऐसे ही हर प्रजाति का DNA भी देखने में मूलभूत तरीके से एक जैसा ही लगता है । यहां तक अगर हम समस्त जहां में किसी भी वस्तु की बात करें तो वो परमाणुओं से मिलकर ही तो बनी हुई है, जो खुद उस से भी छोटे आकार के इलेक्ट्रॉन्स ,प्रोटॉन्स से मिलकर बना हुआ है , और इलेक्ट्रॉन्स, प्रोटॉन्स वस्तु दर वस्तु बदलते नहीं है बस उनका जुड़ने का तरीका बदल जाता है। इन सबको ध्यान में रखकर ही ये माना गया होगा की हमारी दुनिया से मिलती हुई हूबहू एक और दुनिया होनी चाहिए। लेकिन ऐसा हो ये जरूरी तो नहीं है ना ?"
कल्कि:" हां ,ये तो है किसी ने देखा तो नहीं है ।लेकिन अगर ये हमारी धरती के इतने समीप है तो किसी भी स्पेस सेंटर द्वारा जो उपग्रह स्पेस में छोड़े गए हैं उनके द्वारा कभी कोई हलचल होने की वजह से कोई भी तरंगीय संकेत सेंटर तक क्यूं नहीं भेजा गया, जबकि उपग्रह में प्रयोग होने वाले सेंसर्स तो हलकी सी आहट को भी महसूस कर सकते हैं?"
नेत्रा:" हम ये दावे से तो नहीं बता सकते है ना कि ये धरती के कितनी पास है ,क्यूंकि हम खुद नहीं जानते की हम यहां तक पहुंचे कैसे?"
कल्कि:" ये बात भी सही है , अभी कुछ नहीं कह सकते इस दुनिया के बारें में ,अब यहां आना हमारे लिए अच्छा है या बुरा ये तो वक़्त ही बताएगा।"
यूवी:" पता नहीं गला सूखा सूखा सा लग रहा है।"
नेत्रा:" ये ले।" बैग से एक काले रंग की छोटी से अपनी की बोतल यूवी की ओर बढ़ाते हुए बोलती है।
यूवी पानी पीना शुरू कर देती है।
कल्कि:" मुझे भी देना यूवी यार पानी।"
यूवी थोड़ा सा पानी पीने के बाद बोतल कल्कि को दे देती है,कल्कि थोड़ा सा पानी ही पिती है और पानी ख़तम हो जाता है।
कल्कि:" ये तो ख़तम हो गया ,मैंने तो थोड़ा सा ही पिया था।" बॉटल को उल्टा करके हिलाती हुई कहती है।
नेत्रा:" अरे कोई बात नहीं,ये बॉटल ही छोटी है इसमें कम ही पानी आता है ,यहां से थोड़ा आगे चलते हैं, आस पास पानी मिल ही जाएगा ,वहां से भर लेंगे इसको।"
ये कहते हुए, बॉटल को कल्कि के हाथ से लेकर बैग में वापिस रख लेती है। और तीनों ही वहां से आगे चलने लग जाती हैं।वो वहां से आगे एक रास्ते पर चलती जा रहीं थी ,रास्ता भी हमारी धरती पर बने उन कच्चे रास्तों की याद दिलाता था जिसपर लोगों कि आवाजाही से वहां की मिट्टी जम जाती थी।बस यहां मिट्टी की जगह वो सुनहरी परत थी ,जो जम चुकी थी जिसको देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता था कि यह रास्ता अक्सर प्रयोग में लाया जाता होगा ।उनको वहां से चलते चलते काफी समय हो जाता है लेकिन वहां आसपास देखने लायक पेड़ ही दिख रहे थे,पानी या पानी जैसा कुछ भी वहां नहीं था। यूवी चलते चलते रुक कर वहां खड़े एक पेड़ को गौर से देखने लग जाती है।
नेत्रा:" क्या हुआ यूवी ? तू ठीक तो है ना ??"
यूवी:" अरे हां, मैं तो एकदम ठीक हूं,लेकिन ये पेड़ .."
पेड़ की तरफ इशारा करती है,नेत्रा भी उस पेड़ को देखने लग जाती है।
नेत्रा:" क्या हुआ इस पेड़ को ??"
यूवी:" नहीं इसको कुछ नहीं हुआ ,लेकिन इस पेड़ के बारे में मैंने पढ़ा हुआ है और देखा भी हुआ है ।"
कल्कि:" ओह तो हमारी यश्वी मैडम ने इस दुनिया के पेड़ों के बारे में भी पढ़ लिया क्या बात है .."
यूवी:" कल्कि,यार मैं मज़ाक नहीं कर रही हूं,यह बिल्कुल क्रोकोडाइल बार्क ट्री जैसा लग रहा है ,जो भारत के साउथ एशिया के जंगल में आसानी से मिल जाता है।"
कल्कि:" तो क्या हुआ,लगभग सारे पेड़ देखने में एक जैसे ही लगते हैं।"
यूवी:" हां वो तो है,लेकिन अगर ये वही पेड़ हुआ तो इसकी इसकी एक खासियत होती है,इसके तने में कई लीटर पानी अपने आप जमा हो जाता है ,और इसके तने की मोटाई के अनुसार इसमें पानी की मात्रा कम या ज्यादा होती है।"
नेत्रा:" लेकिन इसमें तो कहीं से पानी का कोई निशान भी नहीं दिख रहा।"
यूवी उस पेड़ के पास चली जाती है।
नेत्रा:" यूवी संभलकर हमें किसी भी वस्तु की यहां छूने से पहले सोचना चाहिए क्यूंकि हमारी एक लापरवाही हमारे लिए खतरा बन सकती हैं।"
यूवी:"मुझे पता है नेत्रा,लेकिन इस पेड़ के बारे में मैं बहुत हद तक जानती हूं यार, ये निशान देख रही हो ,अगर इसपर हम किसी भारी वस्तु से चोट करें तो इसमें से पानी का फुव्वारा फुट जाएगा।"
पेड़ के तने पर बने एक गोलाकार निशान कि तरफ इशारा करते हुए यूवी बताती है।
नेत्रा:" हो सकता है ये भी ,तभी इतनी संख्या में यहां एक जैसे पेड़ लगे हुए हैं।"
यूवी:" हां शायद,लेकिन हमें इसपर चोट करने के लिए कुछ भारी और नुकीला चाहिए ।"
अपने चारों तरफ नजरें घुमाकर कुछ ऐसा ही ढूंढने का प्रयास करने लगती हैं। "
कल्कि:" अरे बैग में चाकू है, उस से कोशिश करते हैं।"
नेत्रा:" हां ,कल्कि सही बोल रही है।"
यूवी कल्कि से चाकू लेकर उस पेड़ के तने को खुरेदना शुरू कर देती है।बहुत देर तक उस तने पर वार करने से भी कोई ऐसा कोई खास असर उन सब को दिख नहीं रहा था।तीनों ही बारी बारी से अपनी पूरी जान से उस पर वार करने की वजह से थक गई थीं,और उनकी प्यास पहले से ज्यादा तीव्र होकर उनका गला सूखा रही थी।वो हार मानकर उस पेड़ के पास ही बैठ जाती हैं। तभी कहीं दूर से एक अस्त्र उस पेड़ पर ठीक उसी जगह अंदर तक उसको चीरता चला गया।यह अस्त्र किसी गहरे काले रंग का,सीधा और लंबा सा जिसका एक सिरा बहुत नुकीला था ,देखने में एक पुरातन समय में धरती पर प्रयोग में लाए जाने वाले भाले जैसा लग रहा था । उसके एक वार से ही उस पेड़ की छाल से पानी की बरसात शुरू हो जाती हैं। वो तीनों हैरानी से उसी ओर देखना शुरू कर देती हैं जिस तरफ से उनको वो अस्त्र आता हुआ लगा था। सबकी आंखें डर और अचंभित होनी की वजह से अपने मूल आकार से बड़ी हो जाती हैं। पसीना माथें की लकीरों से गुजरता हुआ दिख रहा था। वहां कोई कुछ हद तक मनुष्य जैसा ही दिखने वाला जीव खड़ा था,लेकिन उसकी त्वचा का रंग थोड़ा अलग था ,जैसे किसी ने नीले रंग में सफेद और लाल रंग बराबर मात्रा में मिलाकर बने रंग उस से ही उसके शरीर को रंग दिया हो।आंखें दूर से ऐसे चमक रही थी जैसे नीले रंग का कोई हीरा सूरज की रोशनी में इस तरह रख दिया हो कि वो चारों ओर अपने ही रंग में रंगी रोशनी बिखरा दे। बालों का रंग भी तव्चा के रंग से मिलता हुआ ही प्रतीत हो रहा था बस वो थोड़ा और गहरा था। बाल पूरे सलीके से किसी गोल सी वस्तु का सहारा लेकर कानों के पीछे गोल आकृति बना रहे थे। शरीर पर कपड़े नाम मात्र ,लेकिन जितने थे वो भी सादे तो नहीं थे ,क्यूंकि उनका कोई आकार स्पष्ट रूप से दिख नहीं रहा था ,ऐसा लग रहा था जैसे किसी गैस को बहुत कम तापमान पर कठोर बना शरीर पर लपेट लिया हो जो परिस्थिति के अनुसार खुद को ढाल सकने में सक्षम हो। धीरे धीरे वो जीव उनकी तरफ आने लगा ,तीनों की जुबान हलक में ही कहीं चिपक कर रह गई थी,उसको अपनी तरफ आता देखकर, वो डरी हुई सी एक दूसरे का हाथ पकड़ कर पेड के पास ही सिकुड़ कर बैठ गई थी।
" आंगन माना गुत्तु । "
( इस शब्द का अर्थ है " नमस्कार")
उसने उनके पास आकर बोला ,वो भी अचरज के भाव से उन तीनों को हर कोण से देख रहा था जैसे उनको पहचानने की कोशिश में लगा हो ।वो तीनों बहुत ज्यादा डर गई थी ,पेड़ के बिल्कुल करीब होने के बावजूद भी वो और पीछे जाने की कोशिश कर रहीं थी,जैसे उनके पीछे बढ़ने से पेड़ अपनी जगह से हिल जाएगा। वो भी शायद स्थिति को भांप गया था इसलिए ,अपने कदम थोड़ा सा पीछे हटाकर वो फिर से बोलना शुरू करता है।
"मास्तू दयेरे बल्ला नीरू गुरती लाजमी कायतू दिल्ल्ले।"
उसकी नीली आंखें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो कुछ बताने की कोशिश कर रहा हो।
कल्कि:" ये क्या बोल रहा है ।"
यूवी:" पता नहीं , शायद कुछ समझाना चाहता है,लेकिन ये कौनसी भाषा बोल रहा है ? कुछ समझ ही नहीं अा रहा है।"
डरी हुई सी दोनो एक दूसरे से धीरे धीरे बात कर रही थी। नेत्रा जो कहीं ओर ही खोई हुई थी ,फिर वो बोलना शुरू करती है।
नेत्रा:" ये कह रहा है कि , इनको लगा कि हमें पानी चाहिए इसलिए हमारी मदद कर दी इन्होंने।"
कल्कि और यूवी ठगी हुई से नजरों से नेत्रा की तरफ देखती है।
यूवी:" लेकिन तुझे कैसे पता कि ये क्या बोल रहा है?? आई मीन तुझे ये भाषा कैसे समझ अा रही है।"
कल्कि:" हां ,वहीं तो ,जब हम नहीं समझे तो तू कैसे समझ पा रही है ,तूने ये भाषा कहां सुनी ,और कौनसी भाषा है ये ?? "
दोनों एक साथ ही सवालों की बौछार कर देती है नेत्रा पर,नेत्रा किसी अलग ही सोच में डूबी हुई सी उस जीव को देख रही थी ,उनकी बातें सुनकर वो वास्तव में लौटती है और तब बोलती है।
नेत्रा:" मुझे खुद नहीं पता कि मैं इनकी बात समझ कैसे पा रही हूं, जबकि मैंने भी ये भाषा पहली बार ही सुनी है।बस जब इन्होंने बोला तब मेरा दिमाग इसको आसानी से समझ पा रहा था मुझे तो ऐसे लगा जैसे ये हिंदी है बोल रहे है।"
कल्कि:" ऐसा कैसे हो सकता है लेकिन??"
किसी को भी समझ नहीं आ रहा था कि नेत्रा उसकी बात इतनी आसानी से कैसे समझ पा रही थी।खुद नेत्रा का भी दिमाग बार बार इस बात को घुमा पलट कर देख रहा था कि शायद उसे याद अा जाए कि ये भाषा उसने कहां सुनी,समझी या पढ़ी है। वो जीव भी अब तक वहीं दूर खड़ा हुआ शायद, उन तीनों को समझने की कोशिश कर रहा था। तीनों को कहीं खोया हुआ देख कर वो फिर से बोलता है।
"तास्तू बीसा ???"
तीनों का ध्यान फिर से उसकी तरफ़ जाता है ,कल्कि नेत्रा की तरफ इस तरह देखती है मानो पूछ रही हो कि बताओ ये अब क्या कह रहे हैं?
नेत्रा:" ये पूछ रहे हैं कि हम कौन हैं??"
कल्कि:" तो तू जवाब दे ना इनको , हमें थोड़ी आती है ये लैंग्वेज।"
नेत्रा:" तुम समझ नहीं रही हो कल्कि,मुझे भी ये लैंग्वेज नहीं आती है तो मैं कैसे बताऊंगी ।"
यूवी:" यार कैसी बाते कर रही है जब तू समझ सकती है तो बोल भी तो सकती है,एक बार कोशिश तो कर ।"
नेत्रा:" ओके"
नेत्रा फिर उसको देखते हुए बोलती है।
नेत्रा:" देखिए हम नेत्रा है,ये मेरी दोस्त कल्कि और यश्वी है,हमें खुद नहीं पता हम यहां कैसे पहुंचे।..."
यूवी:" ए पागल ,तू हिंदी ही बोल रही है उसको हिंदी थोड़ी समझ आयेगी।इनकी भाषा बोल ना ।"
नेत्रा:" जब मुझे आती ही नहीं तो कैसे बोलूं मैं??"
"मा ग्रमिल " ( मतलब ' मेरा नाम ग्रमिल हैं।)
तभी वो जीव अपने चेहरे पर हल्की मुस्कान के भाव फैला कर बोलता है।
नेत्रा उसकी तरफ हैरानी से देखती है।
नेत्रा:"आप मेरी बात समझ पा रहे हैं।"
ग्रमिल:" बिरी "( हां)
नेत्रा:" इसने हां बोला ,मतलब ये मेरी बात समझ पा रहा है।"
नेत्रा यूवी से कहती है।
यूवी:"लेकिन नेत्रा तो हिंदी बोल रही है, मतलब आपको हिंदी आती है??"
थोड़ा सा ग्रमिल के पास आते हुए कहती है। लेकिन ग्रमिल थोड़ा डर जाता है और एकटक यूवी को देखता है ,जैसे समझने कि कोशिश कर रहा हो कि यूवी क्या बोल रही है,लेकिन समझ ना पा रहा हो।
नेत्रा:" ग्रमिल क्या तुम यूवी की बात समझ पा रहे हो??"
ग्रमिल:" निरी "( मतलब ' नहीं ')
नेत्रा:" यूवी इसको तेरी बात समझ नहीं आ रही है।"
यूवी:" कमाल है नेत्रा, तू भी हिंदी बोल रही है और मैं भी ।लेकिन फिर भी ये तेरी बात समझ पा रहा है और मेरी नहीं । तू भी इसकी लैंग्वेज समझ पा रही है लेकिन हम नहीं ,जबकि तुझे इसकी लैंग्वेज आती भी नहीं है।"
नेत्रा:" यही बात तो मैं भी नहीं समझ पा रही हूं यार ।" थोड़ा सा सोचते हुए कहती है।
कल्कि:" वो सब बाद में समझना ,अब पहले इनसे पूछ की यहां ओर पानी कहां मिलेगा ?"
नेत्रा ग्रमिल से पूछती है तब वो बताता है कि यहां इन्हीं पेड़ों से ही पानी मिलता है इसके अलावा यहां कहीं भी पानी नहीं मिलता है । ग्रमिल उन सबको उसके साथ ,वहां चलने को कहता है जहां वो खुद अपने परिवार के साथ रहता है। वो सब भी ये सोच कर हां कर देती हैं कि यहां वैसे भी वो किसी भी जगह या व्यक्ति को नहीं जानती है,और ग्रमिल के अबतक के व्यवहार से उनको पता चला कि यह उन्हें कोई नुक्सान नहीं पहुंचाएगा तो उसके साथ चलने में ही समझदारी है।
वो उन सब को साथ में लेकर उसी रास्ते से आगे बढ़ने लगता है।
कल्कि:" नेत्रा ,तूने एक बात पर गौर किया , कि ग्रमिल के माथे पर और तेरे माथे पर बना निशान बिल्कुल एक जैसा ही है।"
यूवी:" हां और,देख इसने भी हाथ में जो कंगन पहना हुआ है देखने में तेरे कंगन जैसा ही लग रहा है अगर रंग को ना देखा जाए तब,ये सब चल क्या रहा है ,तेरा कुंभ मेले में बिछड़ा कोई भाई वाई तो नहीं है ना ये।"
नेत्रा:" हे बेवकूफ़ ,कुछ भी बोलती है यार यूवी तू ।" मज़ाक में बात टालने कि कोशिश करते हुए कहती है।
लेकिन नेत्रा उन दोनों की बातें सुनकर ग्रमिल के माथे के निशान कि तरफ ध्यान देती है जिसमें से थोड़ी थोड़ी रोशनी उसके माथे पर बिखर रही थी। फिर उसका ध्यान उसके कंगन पर जाता है ,वो सच में उसके कंगन के जैसा ही लग रहा था। नेत्रा को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, एक साथ इतनी अजीब बातें उसके साथ घटित हो गई थी, कि ना चाहते हुए भी उसका दिमाग इन्हीं बातों में उलझ कर रह गया था।अजीब सी भाषा वो समझ रही थी, ग्रमिल सिर्फ उसके द्वारा बोली गई बात समझ रहा था। और अब तो वो निशान और कंगन ...
यही सब बातें सोच सोच कर उसका दिमाग घूम गया था। ख्यालों में ही खोई खोई सी वो भी सबकी तरह ग्रमिल के साथ साथ तो चल रही थी,लेकिन दिमाग उनके साथ नहीं था। नेत्रा मन में सोच रही थी कि उसके साथ ही ऐसा क्यूं हो रहा है......????

to be continue.......
नेत्रा के साथ ही ऐसा क्यूं हो रहा है ये तो आप सबको अब अगले भाग में ही पता चलेगा।😋😇
आपको ये भाग कैसा लगा हमें समीक्षा करके जरुर बताएं, आपकी समीक्षाओं का इंतजार रहेगा।☺️🥰

jagGu parjapati ✍️✍️


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