Charlie Chaplin - Meri Aatmkatha - 10 in Hindi Biography by Suraj Prakash books and stories PDF | चार्ली चैप्लिन - मेरी आत्मकथा - 10

चार्ली चैप्लिन - मेरी आत्मकथा - 10

चार्ली चैप्लिन

मेरी आत्मकथा

अनुवाद सूरज प्रकाश

10

जोसफ कॉनराड ने इस बारे में अपने एक दोस्त को लिखा था कि ज़िंदगी ने उन्हें एक कोने में दुबके उस अंधे चूहे में बदल डाला था जिसे बस, दबोचा जाने वाला हो। ऐसी उपमा से हम लोगों की दयनीय ज़िंदगी को बयान किया जा सकता था। इसके बावजूद हम में से कुछ लोगों की किस्मत अच्छी रही और ऐसे भाग्यशाली लोगो में से मैं भी था।

मैंने बहुत धंधे किये। मैंने अखबार बेचे, प्रिंटर का काम किया, खिलौने बनाए, ग्लास ब्लोअर का काम किया, डॉक्टर के यहाँ काम किया लेकिन इन तरह-तरह के धंधों को करते हुए मैने सिडनी की तरह इस लक्ष्य से कभी भी निगाह नहीं हटायी कि मुझे अंतत: अभिनेता बनना है, इसलिए अलग-अलग कामों के बीच अपने जूते चमकाता, अपने कपड़ों पर ब्रश फेरता, साफ कॉलर लगाता और स्ट्रैंड के पास बेड फोर्ड स्ट्रीट में ब्लैक मोर थिएटर एजेन्सी में बीच-बीच में चक्कर काटता। मैं तब तक वहाँ चक्कर लगाता रहा जब तक मेरे कपड़ों की हालत ने मुझे वहाँ और जाने से बिलकुल ही रोक नहीं दिया।

जब मैं वहाँ पहली बार गया तो वहाँ पर शानदार कपड़े पहने हुए अभिनेता-अभिनेत्री घेरा बनाए खड़े थे और लम्बी-लम्बी हांक रहे थे।

मैं डर से काँपते हुए दरवाजे के पास, दूर के एक कोने में खड़ा हो गया। मैं हद दर्जे का शर्मीला लड़का था और अपने चिथड़े हो गये सूट और पंजों से फटे जूतों को छुपाने की भरसक कोशिश कर रहा था। अचानक ही भीतर से एक युवा क्लर्क लपकता हुआ बाहर आता, हाय तौबा मचाता और वहाँ जुटे अभिनेताओं को सम्बोधित करते हुए ज़ोर से चिल्लाता,"तुम, तुम, और तुम, तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है।" और ऑफिस गिरजाघर की तरह खाली हो जाता। एक मौके पर मैं अकेला ही वहां खड़ा रह गया था।

जब क्लर्क ने मुझे देखा तो अचानक रुक गया,"क्या चाहिए तुम्हें?"

मुझे लगा, मैं ओलिवर ट्विस्ट की तरह कुछ और मांग रहा होऊं,"क्या आपके पास बच्चों के लिए कोई भूमिका है?"

"क्या तुमने अपना नाम रजिस्टर करवा लिया है?" मैंने सिर हिलाया।

मेरी हैरानी का ठिकाना न रहा जब वह मुझे बगल वाले ऑफिस के भीतर ले गया,मेरा नाम, पता और दूसरे ब्यौरे दर्ज किये और मुझे बताया कि जब भी मेरे लायक कोई काम होगा मुझे खबर कर देगा।

मैं बहुत खुश, इस अहसास के साथ वापिस लौटा कि मैंने अपना कर्त्तव्य निभा दिया है। हालांकि मैं आभार भी मान रहा था कि इसका कोई नतीजा नहीं निकला।

और अब, सिडनी के लौटने के एक महीने के बाद मुझे एक पोस्ट कार्ड मिला। इस पर लिखा था,"क्या आप ब्लैकमोर एजेन्सी, बेडफोर्ड स्ट्रीट, स्ट्रैंड में आयेंगे?"

मैं अपने नये सूट में मिस्टर ब्लैकमोर के ही सामने ले जाया गया। वे मुस्कुरा रहे थे और बहुत प्यार से मिले। मैं यह मानकर चल रहा था कि वे सर्वशक्तिमान होंगे और बरीकी से जांच पड़ताल करेंगे लेकिन वे बहुत ही विनम्र थे और उन्होंने मुझे एक पर्ची दी कि मैं चार्ल्स फ्राहमॅन के कार्यालय में मिस्टर सी ई हैमिल्टन को जाकर दे दूं।

मिस्टर हैमिल्टन ने पर्ची पढ़ी और यह जानकर बहुत खुश और हैरान हुए कि मैं कितना छोटा-सा हूं। दरअसल मैंने अपनी उम्र के बारे में झूठ बोला था कि मैं चौदह बरस का हूं जब कि मेरी उम्र साढ़े बारह बरस की थी। उन्होंने समझाया कि मुझे शारलॉक होम्स में बिली, पेजबॉय की भूमिका करनी है और शरद ऋतु से शुरू होने वाले दौरे में चालीस सप्ताह तक काम करना है।

"इस बीच," मिस्टर हैमिल्टन ने आगे कहा,"एक नये नाटक, जिम, द रोमांस ऑफ अ कॉक्नी" में एक अच्छे लड़के की बहुत ही शानदार भूमिका है। इसे मिस्टर सेंट्सबरी ने लिखा है। ये वही शख्स हैं जो आगामी दौरे में शारलॉक होम्स में प्रमुख भूमिका निभाने जा रहे हैं। जिम नाटक `होम्स' के दौरे से पहले आजमाइश के तौर पर किंग्स्टन में खेला जायेगा। मेरा वेतन दो पाउंड दस शिलिंग प्रति सप्ताह रहेगा और मुझे शारलॉक होम्स के लिए भी इतना ही वेतन मिलेगा।

हालांकि यह राशि मेरे लिए छप्पर फाड़ लॉटरी खुलने जैसी थी फिर भी मैंने यह बात अपने चेहरे पर नहीं झलकने दी। मैंने निम्रता से कहा,"शर्तों के बारे में मैं अपने भाई से सलाह लेना चाहूंगा।"

मिस्टर हैमिल्टर हंसे और लगा कि वे बहुत खुश हुए हैं। इसके बाद उन्होंने सारे ऑफिस को इकट्ठा कर लिया और मेंरी तरफ इशारा करते हुए बोले,"ये हमारा बिली है। क्या ख्याल है इसके बारे में?"

हर कोई बहुत खुश हुआ और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया। क्या हो गया था? ऐसा लगा मानो पूरी दुनिया ही अचानक बदल गयी हो, दुनिया ने मुझे प्यार से अपने सीने से लगा लिया हो और मुझे अपना लिया हो। तब मिस्टर हैमिल्टन ने मुझे सेंट्सबरी के लिए एक पर्ची दी। उनके बारे में बताया कि वे लीसेस्टर स्क्वायर में ग्रीन रूम क्लब में मिलेंगे। और मैं वहाँ से वापिस लौटा, बादलों पर सवार।

ग्रीन रूम क्लब में भी वही बात हुई। मिस्टर सेंट्सबरी ने अपने स्टाफ सदस्यों को मुझे देखने के लिए बुलवाया। वहाँ पर उसी समय मुझे यह कहते हुए सामी की भूमिका थमा दी गई कि उनके नाटक में यह एक महत्त्वपूर्ण चरित्र है। मैं डर के मारे थोड़ा नर्वस था कि कहीं वे उसी समय मुझसे अपना पाठ पढ़ने के लिए न कह दें क्योंकि मैं बिल्कुल भी पढ़ना नहीं जानता था और मैं परेशानी में पड़ जाता। सौभाग्य से उन्होंने मुझे मेरे संवाद घर ले जाने के लिए दे दिए कि मैं फुरसत से उन्हें पढ़ूं क्योंकि वे अगले हफ्ते से पहले रिहर्सल शुरू करने वाले नहीं थे।

मैं खुशी के मारे पागल होता हुआ बस में घर पहुंचा और पूरी शिद्दत से यह महसूस करने लगा कि मेरे साथ क्या हो गया है। मैंने अचानक ही गरीबी की अपनी ज़िंदगी पीछे छोड़ दी थी और अपना बहुत पुराना सपना पूरा करने जा रहा था। ये सपना जिसके बारे में अक्सर मां ने बातें की थीं और उसे मैं पूरा करने जा रहा था। अब मैं अभिनेता होने जा रहा था। ये सब इतना अचानक और अप्रत्याशित रूप से होने जा रहा था। मैं अपनी भूमिका के पन्नों को सहलाता रहा। इस पर नया खाकी लिफाफा था। यह मेरी अब तक की ज़िंदगी का सबसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज था। बस की यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया कि मैंने एक बहुत बड़ा किला फतह कर लिया है। अब मैं झोपड़ पट्टी में रहने वाला नामालूम सा छोकरा नहीं था। अब मैं थिएटर का एक खास आदमी होने जा रहा था। मेरा मन किया कि मैं रो पडूं।

जब मैंने सिडनी को बताया कि क्या हो गया है तो उसकी आंखें भर आयीं। वह बिस्तर पर पालथी मारकर बैठ गया और खिड़की से बाहर देखने लगा। वह हिल रहा था। और तब अपना सिर हिलाते हुए उसने गहरी उदासी से कहा,"ये हमारी ज़िंदगी का निर्णायक मोड़ है। काश, आज हमारी माँ यह खुशी बांटने के लिए हमारे साथ होती।"

मैंने उत्साहपूर्वक कहा,"जरा सोचो तो, चालीस सप्ताह तक दो पाउंड और दस शिलिंग। मैंने तो मिस्टर हैमिल्टन से कह दिया है कि तुम्हीं मेरे कारोबारी मामले सम्भालते हो।" इसलिए मैं बेताबी से बोला,"हो सकता है, हमें कुछ ज्यादा भी मिल जाएं। खैर, हम हर वर्ष साठ पाउंड बचा सकते हैं।"

हमने अपने उत्साह के चलते यह गणना भी कर ली और तर्क भी गढ़ लिया कि इतनी बड़ी भूमिका के लिए दो पाउंड और दस शिलिंग की राशि बहुत कम है। सिडनी ने यहाँ तक सोच डाला कि वह जाकर पैसे बढ़वाने की बात करेगा। मैंने कहा कि कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन हैमिल्टन अड़ गये।

"वे अधिकतक दो पाउंड दस शिलिंग ही दे सकते हैं।" वे बोले। हम इसे पाकर ही खुश थे।

सिडनी ने मुझे मेरी भूमिका पढ़कर सुनाई और मुझे अपनी पंक्तियां याद करने में मेरी मदद की। यह काफी बड़ी भूमिका थी और लगभग पैंतीस पन्नों में लिखी हुई थी। इसे मैंने तीन दिन में ही मुंह ज़बानी याद कर लिया था।

`जिम' की रिहर्सलें डर्री लेन थिएटर की ऊपर वाली मंज़िल में हुईं। सिडनी ने मुझे इतने उत्साह के साथ ट्रेनिंग दी थी कि मुझे एक-एक शब्द याद हो गया था। बस, एक शब्द मुझे परेशान कर रहा था। लाइन कुछ इस तरह से थी, "आप अपने आप को समझते क्या हैं मिस्टर पियरपाँट मोरगन?" और मैं कह बैठता,"पुटरपिंट मोरगन।" मिस्टर सेंट्सबरी ने मुझे ये शब्द ज्यों के त्यों रखने दिये। ये शुरुआती रिहर्सलें आँखें खोलने वाली थीं। इन्होंने मेरे सामने तकनीकों की एक नयी दुनिया खोल कर रख दी। मुझे इस बात की कत्तई जानकारी नहीं थी कि स्टेज क्राफ्ट, टायमिंग, विराम, मुड़ने के लिए संकेत, बैठने के लिए संकेत जैसी कई बातें भी होती हैं। लेकिन ये सारी चीज़ें मुझे स्वाभाविक रूप से आ गयीं। बस, मेरी एक ही खामी को मिस्टर सेंट्सबरी ने ठीक किया - बोलते समय मैं सिर बहुत हिलाता था और सांस बहुत रोकता था।

कुछ दृश्यों की रिहर्सल कर लेने के बाद वे हैरान रह गये और मुझसे पूछने लगे कि क्या मैंने पहले कभी अभिनय किया है। कितना संतोषजनक था सेंट्सबरी साहब को और नाटक दूसरे अभिनेताओं को खुश करना! अलबत्ता, मैंने उनका उत्साह इस तरह से स्वीकार किया मानो यह मेरा स्वाभाविक जन्मसिद्ध अधिकार हो।

जिम को किंग्स्टन थिएटर में पहले हफ्ते में और फुलहाम थिएटर में दूसरे हफ्ते में आजमाइश के तौर पर के रूप में खेला जाना था। यह हैनरी ऑर्थर जोन्स के सिल्वर किंग पर आधारित एक मैलोड्रामा था। इसकी कहानी कुछ इस तरह से थी कि एक अभिजात्य व्यक्ति अनिद्रा रोग से पीड़ित है और एक दिन अपने आपको फल बेचने वाली एक युवा लड़की और अखबार बेचने वाले एक लड़के के साथ एक दुछत्ती में रहते हुए पाता है। लड़के सामी की भूमिका मैंने निभानी थी। नैतिक रूप से सब ठीक-ठाक था। लड़की दुछत्ती में एक अलमारी में सोती थी और ड्यूक, उसको हम यही कर पुकारते थे, खाट पर आराम से सोता था और मैं फर्श पर सोता था।

पहले अंक का दृश्य 7 ए डेवरयू कोर्ट, द टेंपल का था। यह एक अमीर वकील जेम्स सीटन गेटलॉक का चेंबर था। बरबाद ड्यूक अपने विरोधी वकील के पास जाता है और अपना भला करने वाली फूल बेचने वाली लड़की, जो बीमार है, की मदद करने के लिए हाथ फैलाता है। इस लड़की ने अनिद्रा के उसके रोग में उसकी मदद की थी।

नोक झोंक में विलेन ड्यूक से कहता है,"दफा हो जाओ। जाओ और भूखे मरो। तुम और तुम्हारी ये रखैल।"

ड्यूक हालांकि कमजोर और मरियल सा है, मेज से कागज़ काटने वाला चाकू उठा लेता है मानो वह विलेन पर हमला कर रहा हो, लेकिन इस तरह से चाकू मेज पर गिरा देता है जैसे उसे मिर्गी का दौरा पड़ा हो और वह विलेन के पैरों के पास बेहोश हो कर गिर जाता है। इस मोड़ पर आकर विलेन की भूतपूर्व पत्नी, जिससे कभी यह पस्त ड्यूक से प्रेम किया करता था, कमरे के भीतर आती है। वह भी यह कहते हुए पस्त ड्यूक के लिए हाथ जोड़ती है,"उसकी मेरे साथ नहीं बनी। वह अदालतों में भी कुछ नहीं कर पाया। कम से कम तुम तो उसकी मदद कर सकते हो।"

लेकिन विलेन मना कर देता है। दृश्य चरम उत्तेजना तक जा पहुंचता है। विलेन अपनी भूतपूर्व पत्नी पर निष्ठावान न रहने का आरोप लगाता है और उसे भी छोड़ देता है। सनक में आकर वह कागज़ काटने वाला चाकू उठा लेती है जो पस्त ड्यूक के हाथ से गिरा था और विलेन को मार देती है। विलेन अपनी आराम कुर्सी में गिर कर मर जाता है जबकि डÎूक अभी भी उसके पैरों के पास बेहोश पड़ा हुआ है। महिला दृश्य से गायब हो जाती है और ड्यूक को जब होश आता है तो वह अपने विरोधी को मरा हुआ पाता है। वह कहता है,"हे भगवान, ये मैने क्या कर डाला।"

और इस तरह से नाटक चलता रहता है। वह मृतक की जेबों की तलाशी लेता है और उसे एक पर्स मिलता है जिसमें कई पाउंड, हीरे की अंगूठी और आभूषण मिलते हैं। वह ये सारी चीज़ें अपनी जेब के हवाले करता है और जब वह खिड़की रास्ते बाहर निकल रहा है तो मुड़ कर कहता है,"गुड बाय गैटलॉक, आखिर तुमने मेरी मदद कर ही दी।" और परदा गिरता है।

दूसरा दृश्य उस दुछत्ती का था जहाँ ड्यूक रहता था। जब दृश्य खुलता है तो एक अकेला जासूस अलमारी के अंदर तांक-झाँक कर रहा है। मैं सीटी बजाते हुए आता हूँ और जासूस को देखकर रुक जाता हूँ।

और भी बहुत कुछ था मेरी भूमिका में और मेरा यकीन मानिये, दर्शकों को इसमें बहुत मज़ा आया। मेरा ख्याल है इसका कारण यह रहा होगा कि मैं अपनी उम्र से बहुत छोटा दिखता था। मैं जो भी लाइन बोलता, उस पर ठहाके लगते। सिर्फ मंच पर किए जाने वाले काम मुझे परेशान करते। स्टेज पर सचमुच की चाय बनाना। मैं हमेशा भ्रम में पड़ जाता कि पहले पॉट में गरम पानी डालना है या चाय की पत्ती। इसकी तुलना में स्टेज पर कुछ भी काम करने के बजाय लाइनें बोलना हमेशा आसान होता।

जिम नाटक सफल नहीं रहा था। समीक्षकों ने उस नाटक पर बहुत बेदर्दी से कलम चलायी। इसके बावजूद मेरा ज़िक्र अनुकूल ढंग से किया गया। एक समीक्षा जो मुझे हमारी ही कम्पनी के मिस्टर चार्ल्स रॉक ने दिखायी थी, बहुत ही अच्छी थी। वे एक पुराने एडाल्फी अभिनेता थे और उनका बहुत नाम था। और मैंने अपने अधिकतर दृश्य उनके साथ ही किये थे। "...नौजवान," उन्होंने गंभीरता से कहा था," जब तुम ये सब पढ़ो तो ये चीज़ें तुम्हारे दिमाग पर सवार नहीं हो जानी चाहिये।" और विनम्रता और सौम्यता पर मुझे भाषण पिलाने के बाद लंदन ट्रापिकल टाइम्स में से मुझे ये समीक्षा पढ़ कर सुनायी। मुझे समीक्षा का एक-एक शब्द याद है।

नाटक के बारे में हिकारत से लिखने के बाद अखबार ने लिखा: "लेकिन एक आशा जगाने वाली बात भी है। सामी की भूमिका, अखबार बेचने वाला छोकरा, लंदन की गलियों का एक स्मार्ट अरब, जिसने काफी हद तक का नाटक में हास्य की कमी पूरी की है। बेशक ये भूमिका घिसी-पिटी और पुराने ढब की है फिर भी, मास्टर चार्ली चैप्लिन ने सामी के रोल को काफी हद तक रोचक बना दिया है। एक शानदार और मेहनती बाल कलाकार, मैंने हालांकि इस बच्चे के बारे में पहले कभी पहले नहीं सुना है फिर भी हमें निकट भविष्य में इस बच्चे के बारे में बहुत कुछ बेहतर सुनने को मिलेगा, मुझे ऐसी उम्मीद है।" सिडनी ने इसकी एक दर्जन प्रतियां खरीद लीं।

`जिम' के दो सप्ताह तक चलने के बाद हमने शरलॉक होम्स का पूर्वाभ्यास शुरू किया। इस वक्त के दौरान सिडनी और मैं अभी भी पाउनॉल टैरेस पर ही रह रहे थे। इसका कारण यह था कि आर्थिक रूप में अभी भी हम अपने पैरा तले की ज़मीन के बारे में बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं थे।

पूर्वाभ्यास के दौरान सिडनी और मैं मां से मिलने के लिए केन हिल गये। पहले तो नर्सों ने हमें यही बताया कि हम मां से नहीं मिल पायेंगे क्योंकि मां की तबीयत ठीक नहीं है। फिर वे सिडनी को एक तरफ ले गयीं और उससे फुसफुसा कर बात करने लगीं, लेकिन मैंने सिडनी की बात सुन ली थी,"नहीं, मुझे नहीं लगता वह देख पायेगा।" तब वह मेरी तरफ मुड़ कर उदासी से बोला था,"तुम मां को पागलखाने में नहीं देखना चाहोगे?"

"नहीं नहीं, मैं ये बरदाश्त नहीं कर पाऊंगा।" मैंने तड़प कर कहा।

लेकिन सिडनी मां से मिला और मां ने उसे पहचान लिया और वह सचेत हो गयी। कुछ ही पलों के बाद नर्स ने आ कर मुझे बताया कि अब मां बेहतर है और क्या मैं उसे देखना चाहूंगा। तब हम दोनों पागलखाने वाले कमरे में गये और वहाँ जा कर बैठ गये। इससे पहले कि हम जाते, वह मुझे एक तरफ ले कर गयी और मेरे कान में फुसफुसायी,"हिम्मत मत हारना, नहीं तो वे लोग तुम्हें यहीं रख सकते हैं।" मां फिर से अपनी सेहत वापिस पाने से पहले पूरे अट्ठारह महीने केन हिल में रही। मैं जब दौरे पर था तो सिडनी नियमित रूप से जा कर उससे मिलता रहा।

मिस्टर एच ए सेंट्सबरी जो टूर पर होम्स का पार्ट कर रहे थे, स्ट्रैंड मैग्जीन में छपने वाले चित्रों की हू ब हू प्रतिकृति थे। उनका लम्बोतरा संवेदनशील चेहरा था, और माथे पर प्रेरणा देते से भाव थे। जितने भी कलाकार होम्स की भूमिका अदा किया करते थे, उनमें से सेंट्सबरी को बेहतरीन समझा जाता था। उन्हें विलियम गिलेट, मूल होम्स और नाटक के लेखक से भी अच्छा माना जाता था।

मेरे पहले टूर के दौरान मैनेजमेंट ने तय किया कि मैं मिस्टर और मिसेज ग्रीन के साथ रहूं। मिस्टर ग्रीन हमारी कम्पनी के बढ़ई थे और मिसेज ग्रीन वार्डरोब संभालती थीं। ये व्यवस्था बहुत शानदान नहीं कही जा सकती थी। ऊपर से मिस्टर और मिसेज ग्रीन कभी-कभार पीते-वीते थे। इसके अलावा, मै अक्सर उसी वक्त खाना नहीं खाता था जब वे खाया करते। जो वे खाया करते वह मैं नहीं खाता। मुझे यकीन है, मेरा ग्रीन दम्पत्ति के साथ रहना मेरे लिये उतना तकलीफदेह नहीं था, जितना उनके लिए था। इसलिए तीन हफ्ते तक एक साथ रहने के बाद हमने आपसी रज़ामंदी से अलग होने का फैसला कर लिया। और चूंकि मैं इतना छोटा था कि किसी और कलाकार के साथ नहीं रह सकता था, मैं अकेला ही रहने लगा। मैं अजनबी शहरों में अकेले रहता, पिछवाड़े के कमरों में अकेले रहता, और शाम के शो के वक्त से पहले शायद ही किसी साथी कलाकार से मिलता-जुलता। जब मैं अपने आप से बात करता तो मुझे सिर्फ अपनी ही आवाज़ सुनायी देती। अक्सर मैं सैलूनों में चला जाता जहाँ हमारी कम्पनी के साथी इकट्ठे होते। और उन्हें बिलियर्ड्स खेलते देखता। लेकिन मैं हमेशा पाता कि मेरी मौजूदगी से उनकी बातचीत में बाधा ही आ खड़ी होती है और वे इस बात को मुझे जतलाने में कोई शर्म भी महसूस न करते। इसलिए उनकी किसी ऐसी-वैसी बात पर मुस्कुरा भी दूँ तो उनकी भौंहे तन जाती थीं।

मैं अकेला होता चला गया। रविवारों की रात को उत्तरी शहरों में पहुंचना, अंधियारी मुख्य गली में से गुजरते हुए गिरजा घर की घंटियों की उदास टुनटुनाहट सुनना। ये सारी बातें मेरे अकेलेपन में कुछ भी न जोड़ पाती। सप्ताह के अंत की छुट्टियों के दिनों में मैं स्थानीय बाजार खंगालता, और अपनी खरीदी करता, राशन-पानी खरीदता, मांस खरीदता जिसे मकान मालकिन पका कर दे देती। कई बार मुझे खाने और रहने की सुविधा मिल जाती और मैं तब रसोई में बैठ कर परिवार के साथ ही खाता। मुझे वह व्यवस्था अच्छी लगती क्योंकि उत्तरी इंगलैंड के रसोईघर साफ-सुथरे और भरे पूरे होते, वहां पॉलिश किए हुए फायरग्रेट होते और नीली भट्टियाँ होतीं। मकान मालकिन का ब्रेड सेंकना, और ठंडे अंधियारे दिन में से निकल कर लंकाशायर रसोई की जलती आग की लाल लौ के दायरे में आना हमेशा अच्छा लगता। वहाँ बिना सिंकी डबलरोटियों के डिब्बे भट्टी के आस-पास पार बिखरे होते, तब परिवार के साथ चाय के लिए बैठना, भट्टी से अभी-अभी निकली गरमा-गरम डबलरोटी की सोंधी-सोंधी महक, उस पर लगाया गया ताज़ा मक्खन...मैं गंभीर महानता ओढ़े इनका आनंद उठाता।

मैं प्रदेशों में छह महीने तक रहा। इस बीच सिडनी को थियेटर में ही काम तलाशने में बहुत कम सफलता मिली थी इसलिए अब वह कलाकार बनने की अपनी महत्त्वाकांक्षा को त्याग कर स्ट्रैंड में कोल होल में एक बार में काम के लिए आवेदन करने पर मजबूर हो गया। एक सौ पचास आवेदकों में से यह नौकरी उसे मिली थी। लेकिन मानो एक तरह से यह उसका पहले की स्थिति से पतन था।

वह मुझे नियमित रूप से लिखा करता और मां के बारे में मुझे समाचार देता रहता। लेकिन मैं शायद ही उसके खतों के जवाब देता। इसका एक कारण था कि मुझसे वर्तनी की गलतियाँ बहुत होतीं। उसके एक खत ने तो मुझे इतनी गहराई से हुआ और इसकी वजह से मैं उसके और नजदीक आ गया। उसने मुझे उसके खतों का जवाब न देने के कारण फटकार लगायी और याद दिलाया था कि हम कैसे-कैसे दिन एक साथ देख कर यहाँ तक पहुँचे हैं और इस बात से हमें कम से कम एक दूसरों के और करीब होना चाहिए।

सिडनी ने लिखा,".. मां की बीमारी के बाद हम दोनों के पास एक दूसरे के अलावा और कौन बचे हैं। तुम नियमित रूप से लिखा करो और मुझे बताओ कि मेरा एक भाई भी है।"

उसका पत्र इतना अधिक भावपूर्ण था कि मैंने तुरंत ही उसका जवाब दे दिया। अब मैं सिडनी को दूसरे ही आलोक में देख रहा था। उसके पत्र ने भ्रातृत्व के प्यार का ऐसा अटूट बंधन बांधा जो मेरी पूरी ज़िंदगी मेरे साथ बना रहा।

मैं अकेले रहने का आदी हो चुका था। लेकिन मैं बातचीत करने से इतना विमुख होता चला गया कि जब कम्पनी का कोई साथी मुझसे मिलता तो मैं बहुत ज्यादा परेशानी में पड़ जाता। मैं अपने आपको फटाफट इस बात के लिए तैयार ही न कर पाता कि हाजिर जवाबी से, समझदारी से किसी बात का जवाब दे सकूं। लोग-बाग मुझे छोड़ कर चले जाते। मुझे पक्का यकीन है कि मेरी बुद्धि के प्रति घबड़ाकर चिंतातुर हो कर ही मुझसे विदा लेते। अब उदाहरण के लिए, मिस ग्रेटा हॉन को ही लें। वे हमारी प्रमुख अभिनेत्री थीं। खूबसूरत, आकर्षक और दयालुता की साक्षात प्रतिमा, लेकिन जब मैंने उन्हें सड़क पार कर अपनी तरफ आते देखता तो मैं तेजी से मुड़ कर या तो एक दुकान की खिड़की में देखने लगता या उससे मिलने से बचने के लिए किसी दूसरी ही गली में सरक जाता।

मैंने अपने-आप की परवाह करनी छोड़ दी और अपनी आदतों में लापरवाह होता चला गया। जब मैं कम्पनी के साथ यात्रा कर रहा होता तो रेलवे स्टेशन पहुंचने में मुझे हमेशा देर हो जाती। आखिरी पलों में पहुँचता और मेरी हालत अस्त-व्यस्त होती, मैंने कॉलर भी न लगाया होता, और मुझे हमेशा इस बात के लिए फटकार सुननी पड़ती।

मैंने अपने साथ के लिए एक खरगोश खरीद लिया और मैं जहाँ भी रहता, उसे छुपा कर अपने कमरे में ले जाता और मकान मालकिन को इस बात की हवा भी न लग पाती। ये एक छोटा-सा प्यारा-सा जीव था जो बेशक इधर-उधर मुंह नहीं मारता था। इसकी फर इतनी सफेद और साफ थी कि यह बात किसी की ध्यान में भी नहीं आती थी कि इसकी गंध कितनी तीखी हो सकती है। मैं इसे अपने बिस्तर के नीचे एक लकड़ी के पिंजरे में छुपा कर रखता। मकान मालकिन खुशी-खुशी मेरे कमरे में मेरा नाश्ता ले कर आती, तभी उसे इस महक का पता चलता, तब वह कमरे से परेशान और भ्रमित हो कर चली जाती, उसके कमरे से बाहर जाते ही मैं अपने खरगोश को आज़ाद कर देता और वह सारे कमरे में फुदकता फिरता।

बहुत पहले ही मैंने अपने खरगोश को इस बात की ट्रेनिंग दे दी थी कि ज्यों ही वह दरवाजे पर खटखट सुने, पलट कर अपनी पेटी में चला जाये। अगर मकान मालकिन को मेरे इस रहस्य का पता चल भी जाये तो मैं अपने खरगोश को ट्रिक करके दिखाने को कह कर उसका दिल जीत लेता और वह फिर हमें पूरा हफ़्ता रहने के लिए इजाजत दे देती।

लेकिन टोनीपेंडी, वेल्स में, मैंने अपनी ट्रिक दिखायी तो मकान मालकिन रहस्यमय ढंग से मुस्कुरायी लेकिन उसने कोई राय जाहिर नहीं की, लेकिन उस रात जब मैं थियेटर से लौटा तो मेरा प्रिय पालतू खरगोश जा चुका था। जब मैंने उसके बारे में पूछताछ की तो मकान मालकिन ने सिर्फ अपना सिर हिला दिया,"कहीं भाग-वाग गया होगा या उसे ज़रूर किसी ने चुरा लिया होगा।" उसने बड़ी चतुराई से अपने-आप ही समस्या को सुलझा लिया था।

टोनीपेंडी से हम ऐब्बी वेल के खदानों वाले शहर में पहुँचे जहाँ हमें तीन रातों के लिए रुकना था। और मैं इस बात के लिए शुक्रगुजार था कि हमें सिर्फ तीन दिन ही रुकना था क्योंकि ऐब्बीवेल एक सीलन-भरी जगह थी जो उन दिनों गंदा-सा शहर हुआ करता था, भयानक, एक जैसे मकानों की एक के बाद एक कतार, हर घर में चार छोटे कमरे थे जिनमें तेल की कुप्पियाँ जलतीं। कंपनी के ज्यादातर लोग एक छोटे-से होटल में ठहरे। सौभाग्य से मुझे एक खदानकर्मी के घर में सामने की तरफ वाला कमरा मिल गया। कमरा बेशक छोटा था लेकिन ये साफ और आरामदायक था। रात को जब मैं नाटक से वापिस लौटता तो कमरे में आग के पास ही मेरा खाना रख दिया जाता जहाँ वह गरम रहता।

मकान मालकिन लम्बी, खूबसूरत-सी औरत थी जिसके आस-पास त्रासदी का एक आवरण लिपटा हुआ था। वह सुबह मेरे कमरे में राश्ता ले कर आती और शायद ही कभी एक-आध शब्द बोलती। मै नोट किया कि उसकी रसोई का दरवाजा हमेशा ही बंद रहता। जब भी मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत होती, मुझे दरवाजा खटखटाना पड़ता और दरवाजा एकाध इंच ही खोला जाता।

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