Charlie Chaplin - Meri Aatmkatha - 33 in Hindi Biography by Suraj Prakash books and stories PDF | चार्ली चैप्लिन - मेरी आत्मकथा - 33

चार्ली चैप्लिन - मेरी आत्मकथा - 33

चार्ली चैप्लिन

मेरी आत्मकथा

अनुवाद सूरज प्रकाश

33

स्टूडियो स्टाफ के अलावा किसी ने भी फिल्म नहीं देखी थी। संपादन मशीन पर इसे कई कई बार चला कर देख लेने के बाद हमें कुछ भी ऐसा मज़ाकिया या रोचक नहीं लगा जिसकी हमने उम्मीद की थी। अब अपने आपको सिर्फ यही तसल्ली दे सकते थे कि हमारा पहला उत्साह बासी पड़ चुका है।

हमने फिल्म को अग्नि परीक्षा से गुज़ारने का फैसला किया और बिना किसी पूर्व घोषणा के एक स्थानीय थियेटर में इसके प्रदर्शन की व्यवस्था की। ये एक बहुत बड़ा थियेटर था और तीन चौथाई भरा हुआ था। हताशा में मैं बैठा रहा और फिल्म शुरू होने का इंतज़ार करता रहा। मुझे लगा कि दर्शक वर्ग मेरे प्रति सहानुभूति के कारण ही बैठा है कि मैं जो कुछ भी दिखाऊं, वे देख लेंगे। मुझे अपने आपके फैसले पर ही शक होने लगा कि दर्शक कॉमेडी में क्या पसंद करेंगे और किस बात पर प्रतिक्रिया देंगे। शायद मुझसे चूक हो गयी है। शायद पूरी की पूरी मेहनत पानी में मिट्टी में मिल जाये और दर्शक गण इसे हैरान परेशान हो कर देखें। तब बीमार कर देने वाला ख्याल मुझे आया कि कई बार कॉमेडियन अपनी कॉमेडी के ख्यालों को ले कर कितना गलत हो सकता है।

अचानक ही मेरा पेट उछल कर मेरे गले तक आ गया जब परदे पर स्लाइड आयी: चार्ली चैप्लिन अपनी ताज़ा तरीन फिल्म द किड में। दर्शकों में खुशी की एक लहर दौड़ी और छिटपुट तालियां बजीं। विरोधाभास ही कहिये, इस संकेत ने मुझे परेशानी में डाल दिया: हो सकता है कि वे बहुत ज्यादा की उम्मीदें लगाये बैठे हों और निराशा उनके हाथ लगे।

शुरुआती दृश्य स्पष्ट थे। धीमे और शांत। उन्होंने मुझे रहस्य के गर्त में धकेल दिया। एक मां अपने बच्चे को त्याग कर एक लिमोज़िन में छोड़ जाती है। कार चुरा ली जाती है और आखिरकार चोर बच्चे को कूड़ेदानी के पास छोड़ जाते हैं। तभी मैं आता हूं, ट्रैम्प। इस पर हँसी फूटी और देर तक चलती रही। उन्हें लतीफा नज़र आया। इसके बाद मुझसे कोई गलती नहीं हुई। मुझे बच्चा मिला और मैंने उसे अपना लिया। एक पुराने बोरे को काट पीट कर बनाये गये सोने के बिस्तर, हैम्माक को देख कर लोग हँसते हँसते लोट पोट हो गये और जब मैं चाय की केतली के मुंह पर कटा हुआ निप्पल गला कर उससे बच्चे को दूध पिलाता हूं तो दर्शन चीखने लगे और जब मैं एक पुरानी बेंत की कुर्सी की गद्दी के बीचों बीच छेद करके उसे चैम्बरपॉट पर रख कर बच्चे को उस पर लैट्रिन करने के लिए बिठाता हूं तो लोग पागलों की तरह हँसने लगे। सच तो ये था कि लोग पूरी फिल्म में हँसते ही रहे।

अब चूंकि फिल्म का प्रदर्शन हो चुका था, हमने ये मान लिया कि इसके संपादन का काम पूरा हो गया है। इसलिए हमने बोरिया बिस्तर बांधा और साल्ट लेक से पूरब की तरफ जाने के लिए चले। न्यू यार्क में मुझे रिट्ज में अपने कमरे में ही रहने पर मज़बूर होना पड़ा क्योंकि मुझे फर्स्ट नेशनल द्वारा रखे गये कानूनी नोटिस देने वाले आदमी तंग कर रहे थे। वे लोग मिल्ड्रेड के तलाक के मामले को फिल्म की कुर्की के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। लगातार तीन दिन तक वे लोग होटल की लॉबी में ही मंडराते रहे। बोरियत के मारे मेरा बुरा हाल था। इसलिए जब फ्रैंक हैरिस ने अपने घर पर मुझे खाने पर आमंत्रित किया तो मैं इस मौके के लिए इन्कार नहीं कर पाया। इस शाम अच्छी तरह से परदे में लिपटी एक औरत रिट्ज की लॉबी में से गुज़री और टैक्सी में बैठ गयी। मैं था उस औरत के भेस में। मैंने अपनी भाभी से कपड़े उधार मांगे थे जिन्हें मैंने अपने सूट के ऊपर पहन लिया था। फ्रैंक के घर पहुंचने से पहले ही मैंने टैक्सी में सारा ताम झाम उतार दिया।

फ्रैंक हैरीज़, जिनकी किताबें मैंने पढ़ी और सराही थीं, मेरे आदर्श थे। फ्रैंक हमेशा ही आर्थिक संकटों से जूझते रहते थे। हर बार एक आध हफ्ते को छोड़ कर उनकी पत्रिका पीअरसन मैगज़ीन बंद होने के कगार पर होती। एक बार जब उनकी अपील प्रकाशित हुई थी तो मैंने उन्हें कुछ राशि भेजी थी और आभार स्वरूप उन्होंने ऑस्कर वाइल्ड पर अपनी किताब के दो खंड भेजे थे। उस पुस्तक पर उन्होंने निम्नलिखित पंक्तियां लिखी थीं:

चार्ली चैप्लिन को

उन कुछ व्यक्तियों में से एक जिन्होंने बिना परिचय के भी मेरी सहायता की थी, एक ऐसे शख्स, हास्य में जिनकी दुर्लभ कलात्मकता की मैंने हमेशा सराहना की है, क्योंकि लोगों को हँसाने वाले व्यक्ति लोगों को रुलाने वाले व्यक्तियों से श्रेष्ठ होते हैं, फ्रैंक हैरीज़ अपनी स्वयं की प्रति भेजते हैं,

अगस्त 1919।

मैं केवल ऐसे लेखक की प्रशंसा करता हूं और मान देता हूं जो अपनी आंखों में आंसू भरे हुए, इन्सानों के बारे में सच बयान करता है - पास्कल।

उस रात मैं फ्रैंक से पहली बार मिला। वे छोटे कद के, थोड़े थुल थुल, गर्व से ऊपर उठे सिर वाले और अच्छे चेहरे मोहरे वाले शख्स थे। उनकी नुकीली मूंछें थीं और ये बात थोड़ा बेचैन करती थी। उनकी गहरी, गूंजती आवाज़ थी और वे इसे बहुत प्रभाव के साथ प्रयोग करते थे। उनकी उम्र सड़सठ बरस की थी। उनकी लाल बालों वाली बेहद खूबसूरत पत्नी थी। पत्नी उनके प्रति पूरी तरह से समर्पित थी।

फ्रैंक हालांकि समाजवादी थे, वे बिस्मार्क के बहुत बड़े प्रशंसक थे और कुछ हद तक समाजवादी नेता कार्ल लीबनेख्त को बहुत पसंद नहीं करते थे। वे जब जर्मन संसद में लीबनेख्ट का उत्तर देते हुए बिस्मार्क की नकल करते और उसमें जर्मन की प्रभावशाली हकलाहट ले आते तो नज़ारा देखने लायक होता। फ्रैंक बेहतरीन अभिनेता हो सकते थे। हम सुबह चार बजे तक बातें करते रहे और ज्यादातर बातें फ्रैंक ने ही कीं।

उस शाम मैंने सोचा कि हो सकता है कि इस वक्त भी सम्मन वाहक वहीं होटल के आस पास मंडरा रहे होंगे, मैंने दूसरे होटल में रहने का फैसला किया। लेकिन न्यू यार्क में सभी होटल भरे हुए थे। एक घंटे तक इधर उधर टैक्सी में भटकने के बाद लगभग चालीस बरस की उम्र के, खुरदरे चेहरे वाले टैक्सी ड्राइवर ने पीछे मुड़ कर मेरी तरफ देखा और कहा,"सुनिये, आपको इस वक्त तो कोई होटल मिलने से रहा। आपके लिए यही बेहतर होगा कि आप मेरे साथ मेरे घर चलें और सुबह होने तक वहीं सोयें।"

पहले तो मुझे खटका लगा, लेकिन जब उसने अपनी पत्नी और परिवार का जिक्र किया तो मैंने सोचा कि यही ठीक रहेगा, इसके अलावा, मैं वहां पर सम्मन वाहकों से भी सुरक्षित रहूंगा।

"ये तो आपकी बहुत मेहरबानी होगी," मैंने कहा और अपना परिचय दिया।

वह हैरान हुआ और हँसा,"मेरी बीवी तो ये सुन कर बेहोश ही हो जायेगी।"

हम भीड़ भरे इलाके में ब्रांक्स के कहीं आसपास ही पहुंचे। वहां पर लाल भूरे पत्थर की दीवारों वाले मकानों की कतारें थीं। हम उन घरों में से एक घर में गये जिसमें फर्नीचर तो नाम मात्र का था लेकिन घर एकदम साफ सुथरा था। वह मुझे पिछवाड़े की तरफ के एक कमरे में ले गया। वहां एक बड़ा सा बिस्तर बिछा हुआ था और उस पर बारह बरस का उसका बेटा सोया हुआ था।

"रुकिये एक मिनट," कहा उसने और उसने अपने बेटे को उठाया और बिस्तर पर एक तरफ सरका दिया। बच्चा उसी तरह गहरी नींद में सोता रहा। तब ड्राइवर मेरी तरफ मुड़ा, "आराम से लेट जाइये।"

मैं फिर से अपने फैसले पर सोचने वाला था लेकिन उसकी आवभगत इतनी छू लेने वाली थी कि मैं मना कर ही नहीं सका। उसने मुझे एक साफ सुथरी रात को पहनने वाली कमीज़ दी और मैं डरते डरते बिस्तर में सरक गया। मैं डर रहा था कि कहीं बच्चा मेरी वज़ह से जाग न जाये।

मैं एक पल के लिए भी नहीं सो सका। आखिरकार जब बच्चा जागा तो वह उठा, तैयार हुआ और मैंने अपनी अधमुंदी आंखों से देखा कि उसने मेरी तरफ उचटती सी निगाह डाली तथा बिना किसी और प्रतिक्रिया के चला गया। कुछ ही पल बाद वह आठेक बरस की उम्र की एक और लड़की के साथ कमरे में चुपके से आया। वह लड़की उसकी बहन रही होगी। मैं अभी भी सोने का नाटक कर रहा था और उन्हें अपनी ओर देखते हुए देख रहा था। उनकी आंखें हैरानी से फैल रही थीं। तब छोटी लड़की ने अपने मुंह पर हाथ रख लिया ताकि अपनी खिलखिलाहट को दबा सके। दोनों तब कमरे से बाहर चले गये।

अभी कुछ ही पल बीते थे कि गलियारे में थोड़ी ऊंचे स्वर में फुसफुसाहट की आवाज़ें आनी लगीं। इसके बाद टैक्सी ड्राइवर की दबी हुई आवाज़ आयी। उसने यह देखने के लिए हौले से दरवाजे में से झांका कि क्या मैं जग गया हूं। मैंने उसे आश्वस्त किया कि मैं जाग गया हूं।

"आपके लिए नहाने का सामान तैयार कर दिया है हमने," कहा उसने,"स्नानघर सीढ़ियों के दूसरे सिरे पर है।" वह मेरे लिए एक ड्रेसिंग गाउन, स्लीपर और तौलिया ले कर आया।

"आप नाश्ते में क्या लेना चाहेंगे?"

"कुछ भी," मैंने जैसे माफी मांगते हुए कहा।

"जो भी आप चाहें, बेकन और अंडे, टोस्ट और कॉफी?"

"एकदम शानदार रहेगा।"

काम करने की उनकी गति एकदम शानदार थी।

जैसे ही मैंने कपड़े पहने, उसकी पत्नी पहले वाले कमरे में गरमा गरमा नाश्ता ले कर हाज़िर हो गयी।

इस कमरे में बहुत ही कम फर्नीचर था। बीच में एक मेज, एक आराम कुर्सी और एक दीवान। आतिशदान के ऊपर परिवार के सदस्यों की फ्रेम में मढ़ी हुई कई तस्वीरें लगी हुई थीं। जिस वक्त मैं अकेले ही नाश्ता कर रहा था, मैं घर के बाहर बच्चों और बड़ों की बढ़ती हुई भीड़ की आवाज़ें सुन पा रहा था।

"लोगों को पता चलना शुरू हो गया है कि आप यहां पर हैं!" उसकी पत्नी कॉफी लाते हुए मुस्कुरायी। तभी टैक्सी ड्राइवर आया। वह बहुत उत्तेजित था,"देखिये," वह बोला,"घर के बाहर बहुत भीड़ जुट आयी है और हर पल ये बढ़ती जा रही है। अगर आप बच्चों को एक झलक अपने आपको देख लेने देंगे तो वे लोग चले जायेंगे, नहीं तो प्रेस को आपके बारे में पता चल जायेगा और तब आप गये काम से!"

"बेशक, आप सबको अंदर आने दे सकते हैं।" मैंने जवाब दिया।

और इस तरह से बच्चे अंदर आते, खींसें निपोरते, और मेज के पास लाइन लगा कर खड़े हो जाते। मैं अभी भी कॉफी के घूंट ले रहा था। बाहर टैक्सी ड्राइवर की आवाज़ सुनायी दे रही थी: "ठीक है, ठीक है, ज्यादा जोश में नहीं आने का। लाइन से, लाइन से आओ, एक बार में दो ही।"

एक युवती भीतर आयी। उसका चेहरा तनाव से कसा हुआ और गम्भीर था। वह मेरी तरफ खोजी निगाहों से देखने लगी। और फिर उसने दहाड़ें मार कर रोना शुरू कर दिया।

"नहीं, ये वो नहीं है। मैंने सोचा था कि ये वही होगा।" वह सुबकने लगी।

ऐसा लगता है कि उसकी किसी सखी ने उसे भेद भरे तरीके से बता दिया होगा,"तुम्हें क्या लगता है कि कौन आया हुआ है यहां? तुम्हें कभी विश्वास ही नहीं होगा।" तब उसे मेरे सामने लाया गया था और वह मुझे अपना खोया हुआ भाई मान रही थी जिसके बारे में बाद में बताया गया कि वह युद्ध में लापता हो गया है।

मैंने रिट्ज होटल में लौटने का फैसला कर लिया भले ही अदालत के कागज़ात मुझे थमा दिये जायें। अलबत्ता, मेरा सामना किसी भी सम्मन वाहक से नहीं हुआ। लेकिन कैलिफोर्निया से मेरे वकील से आया एक तार मेरी राह देख रहा था कि सब कुछ निपटा लिया गया है और मिल्ड्रेड ने तलाक के लिए अर्जी दे दी है।

अगले दिन टैक्सी ड्राइवर और उसकी पत्नी, खूब सज धज कर मुझसे मिलने के लिए आये। उसने बताया कि प्रेस उसे इस बात के लिए परेशान कर रही है कि वह रविवार के अखबारों के लिए उसके घर पर मेरे ठहरने के बारे में फीचर लिख कर दे। लेकिन उसने दृढ़तापूर्वक कहा,"जब तक आपकी अनुमति न हो, मैं उन्हें एक शब्द भी नहीं बताने वाला।"

"लिख डालो।" मैंने उसे हरी झंडी दे दी।

और अब फर्स्ट नेशनल के महानुभाव मेरे पास आये। अलंकार की भाषा में कहूं तो वे विनम्रता की मूर्तियां लग रहे थे। उनमें से एक, उपाध्यक्ष मिस्टर गोर्डन, जो कि पूर्वी इलाकों में थियेटरों के बहुत बड़े मालिक थे, ने कहा,"आप पन्द्रह लाख डॉलर अपनी फिल्म के लिए चाहते हैं और हमने फिल्म देखी तक नहीं है।" मैंने स्वीकार किया कि उनकी बात में दम है और इस तरह से फिल्म के प्रदर्शन की व्यवस्था की गयी।

ये एक उदास शाम थी। फर्स्ट नेशनल के पच्चीस वितरक प्रोजेक्शन रूम में लाइन बना कर इस तरह से आये मानो किसी की मय्यत में जा रहे हों। ये गरिमाविहीन आदमियों का जमावड़ा था जो शक से भरे हुए और सहानुभूति से शून्य थे।

तभी फिल्म शुरू हुई। शुरुआती टाइटल था:

"मुस्कान और शायद एक आंसू के साथ एक पिक्चर।"

"बुरी नहीं है," गोर्डन साहब ने अपनी महानता का प्रदर्शन करते हुए कहा।

साल्ट लेक सिटी में प्रिव्यू के बाद मुझमें थोड़ा-सा आत्मविश्वास आ गया था लेकिन यहां प्रदर्शन अभी आधा ही चला होगा कि मेरा विश्वास डगमगा चुका था। प्रिव्यू में तो ये हो रहा था कि वहां लोगों के चीखनें की आवाज़ें आ रही थीं और अब एकाध ही खी खी ही सुनायी पड़ रही थी। जब फिल्म पूरी हो गयी और रोशनियां जला दी गयीं तो एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। इसके बाद उन्होंने अंगड़ाइयां लेना, जम्हाइयां लेना और दूसरे मामलों पर बात करना शुरू कर दिया।

"आप डिनर के लिए क्या कर रहे हैं हैरी?"

"मैं अपनी बीवी को प्लाज़ा में ले जा रहा हूं और उसके बाद हम ज़िगफेड थियेटर में शो में जायेंगे।"

"मेरा ख्याल है ये तो बहुत ही बढ़िया कार्यक्रम है।"

"क्या आप भी हमारे साथ आना चाहते हैं?"

"नहीं, मैं आज रात ही न्यूयार्क से जा रहा हूं। मैं अपने बेटे के ग्रेजुएशन के लिए वापिस जाना चाहता हूं।"

इस सारी बतकही के दौरान मुझे ऐसा लग रहा था, मानों मैं तलवार की धार पर खड़ा हूं।

आखिरकार मैंने चुटकी ली,"तो सज्जनो, आप लोगों का क्या फैसला है?"

कोई सचेत हो कर हिलने-डुलने लगा तो बाकी दूसरे लोग ज़मीन की तरफ देखने लगे। मिस्टर गोर्डन, जो कि स्पष्ट ही उनके प्रवक्ता थे, हौले-हौले चहल कदमी करने लगे। वे अच्छी-खासी कद काठी के, गोल, उल्लुओं के से चेहरे वाले और मोटे कांच का चश्मा लगाने वाले शख्स थे, बोले, "बात ये है चार्ली, कि मुझे अपने साथियों के साथ ही चलना पड़ेगा।"

"हां, मैं जानता हूं," मैंने जल्दी से टोका,"लेकिन आप लोगों को फिल्म कैसी लगी?"

वे हिचकिचाये और फिर खींसे निपोरने लगे,"चार्ली, हम यहां इसे खरीदने के लिए आये हैं। ये कहने के लिए नहीं कि ये हमें कितनी पसंद है।" उनके इस जुमले से एकाध ज़ोर का ठहाका लगा।

"आपको ये पसंद आये, इसके लिए मैं आपसे ज्यादा पैसे नहीं लूंगा।"

वे हिचकिचाये,"सच कहूं तो मैं कुछ और ही उम्मीद कर रहा था।"

"आप क्या उम्मीद कर रहे थे?"

वे हौले से बोले, "बात ये है चार्ली, पंद्रह लाख डॉलर में . . मेरे ख्याल से ये उतनी ऊंची चीज्ा़ तो नहीं ही है।"

"तो आप क्या चाहते हैं कि लंदन ब्रिज को गिरते हुए दिखा दूं?"

"नहीं, लेकिन पंद्रह लाख डॉलर में ..." उनकी आवाज़ असाधारण रूप से उंŠची हो गयी।

"तो ठीक है सज्जनो, कीमत तो यही रहेगी, आप खरीदें या फिर छोड़ दें।" मैंने अधीर होते हुए कहा।

जे डी विलियम्स, अध्यक्ष महाशय सामने आये और बातचीत की बागडोर अपने हाथ में लेते हुए मुझे मक्खन लगाने लगे,"चार्ली, मेरे ख्याल से ये बहुत ही शानदार फिल्म है। इसमें मानवीयता है, ये अलग है -" मुझे "अलग" अच्छा लगा। -"जरा धैर्य धरो और हम इस मामले को भी सुलटा लेंगे।"

"अब सुलटाने को कुछ भी बाकी नहीं है," मैंने तीखेपन के साथ कहा,"मैं आप लोगों को एक सप्ताह का समय देता हूं और इस बीच आप लोग फैसला कर लें।" जिस तरह का व्यवहार उन्होंने मेरे साथ किया था, उसके बाद तो मेरे मन में उनके प्रति कोई सम्मान नहीं रह गया था। अलबत्ता, उन्होंने जल्दी ही फैसला कर लिया और मेरे वकील ने इस आशय का करार तैयार कर दिया कि जब वे अपने पंद्रह लाख डॉलर निकाल लेंगे तो मुझे लाभ में से पचास प्रतिशत मिलेंगे। फिल्म पांच बरस के लिए किराये के आधार पर रहने वाली थी और इसके बाद फिल्म मेरे पास वापिस लौट आने वाली थी जैसा कि मैं अपनी दूसरी फिल्मों के लिए किया करता था।

घरेलू और कारोबारी मसलों के बोझ से अपने-आपको हलका कर लेने के बाद मुझे ऐसा लगा मानो मैं हवा में तैर रहा होऊं। किसी संन्यासी की तरह मैं अज्ञातवास में रहा था और हफ्तों तक मैंने अपने होटल के कमरे की चारदीवारों के अलावा कुछ भी नहीं देखा था। टैक्सी ड्राइवर के साथ मेरे रोमांचकारी अनुभवों के बारे में आलेख पढ़ कर मेरे दोस्तों ने फोन करने शुरू कर दिये और अब एक मुक्त, बिना किसी बोझ के शानदार ज़िंदगी फिर से शुरू हुई।

न्यू यार्क की मेहमाननवाज़ी ने मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया। फ्रैंक क्राउनिनशील्ड, जो कि वोग और वैनिटी फेयर जैसी पत्रिकाओं के संपादक थे, ने मेरा परिचय न्यू यार्क की चमक-धमक से जगमगाती ज़िंदगी से कराया और कोंडे नास्ट, इन पत्रिकाओं के प्रकाशक ने मेरे सम्मान में अत्यंत भव्य पार्टियां दीं। वे मैडिसन एवेन्यू में एक बड़े से पैंट हाउस में रहते थे। ये वो इलाका था जहां कलाओं के और धन दौलत की दुनिया के धनाडÎ वर्ग के लोग जमा होते। उनकी बगल में ज़िगफेल्ड थियेटर की नाचने गाने वाली मंडलियों की लड़कियां होतीं और इन लड़कियों में कमनीय ऑलिव थॉमस और खूबसूरत डोलोरस जैसी नवयौवनाओं का शुमार रहता।

रिट्ज, जहां मैं रहता था, में मैं दिन भर उत्तेजनापूर्ण घटनाओं के झूले में झूलता रहता। सारा दिन फोन बजता रहता और हर तरह के न्यौते आते रहते। मैं अपना सप्ताहांत फलां जगह गुज़ारूं, फलां जगह घोड़ों का प्रदर्शन देखूं। ये सब ताम-झाम देहातीपन लगता था लेकिन मुझे अच्छा लगता था। न्यू यार्क रूमानी रहस्यों से भरा-पूरा शहर था। आधी रात की दावतों, लंच पार्टियों के लिए, डिनर के लिए हर पल बुलावे आते रहते। यहां तक कि सुबह के नाश्ते के लिए भी न्यौते तय रहते। न्यू यार्क सोसाइटी की सतह पर तैर लेने के बाद अब मेरी इच्छा होने लगी थी कि ग्रिनविच विलेज के बौद्धिक वर्ग के सम्पर्क में आया जाये।

सफलता की पायदानें चढ़ते हुए कई कॉमेडियन, जोकर और क्रूनर अपनी ज़िंदगी में एक ऐसी अवस्था में आते हैं जब उन्हें अपने दिमाग को और बेहतर बनाने की चाह महसूस होती है। वे बौद्धिक प्यास बुझाने के लिए छटपटाने लगते हैं। जहां उम्मीद भी नहीं कर सकते, वहां भी विद्यार्थी को गुरू के दर्शन हो जाते हैं। दर्जी, सिगार बनाने वाले, नूरा कुश्तियां लड़ने वाले, वेटर, ट्रक ड्राइवर।

मुझे याद है, ग्रिनविच विलेज में अपने एक दोस्त के यहां मैं उस हताशा की बात कर रहा था जब व्यक्ति के विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए सही शब्द तलाशने में दिक्कत महसूस होती है और बता रहा था कि साधारण शब्दकोष नाकाफी होता है।

मैंने कहा,"ऐसा कोई तरीका निश्चित ही अपनाया जा सकता है जिसमें आपके विचारों की खूबसूरत लगने वाली तालिकाएं बनायी जायें, अमूर्त शब्दों से ठोस शब्दों में और घटाने और जोड़ने की ऐसी प्रक्रियाएं हों कि आप अपने विचारों के लिए सही शब्द तक पहुंच जायें।"

"एक ऐसी ही किताब है," नीग्रो ट्रक डाइवर ने कहा, "जिसे रोजेट थेसारस कहते हैं।"

एलेक्जेंड्रिया होटल में एक ऐसा ही वेटर था जो, जब भी मुझे कोई डिश परोसता, अपने पुरखे कार्ल मार्क्स और विलियम ब्लेक के उद्धरण देने से न चूकता।

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