Charlie Chaplin - Meri Aatmkatha - 49 in Hindi Biography by Suraj Prakash books and stories PDF | चार्ली चैप्लिन - मेरी आत्मकथा - 49

चार्ली चैप्लिन - मेरी आत्मकथा - 49

चार्ली चैप्लिन

मेरी आत्मकथा

अनुवाद सूरज प्रकाश

49

वेल्स की मामूली शुरुआत ने, उनके काम पर नज़रिये पर नहीं बल्कि मेरी ही तरह उनके व्यक्तिगत संवेदनाशीलता पर बहुत अधिक ज़ोर देने के रूप में असर छोड़ा था। मुझे याद है, एक बार उन्होंने एक गलत जगह पर एच अक्षर देख लिया था और वे इतना अधिक झेंपे कि पूछो नहीं। इतनी छोटी सी चीज़ के लिए इतने महान व्यक्ति का झेंपना। मुझे याद है वे अपने एक चाचा की बात बता रहे थे जो एक पदवीधारी अंग्रेज के यहां माली हुआ करते थे। उनके चाचा की अभिलाषा थी कि वेल्स भी उनकी तरह घरेलू नौकरी पकड़ लें। एच जी वेल्स ने व्यंग्य से कहा,"भगवान की दया ही रही वरना मैं सहायक रसोइया बन गया होता।"

वेल्स जानना चाहते थे कि मैं समाजवाद में दिलचस्पी कैसे लेने लगा। ये तब तक नहीं हुआ था तब तक मैं युनाइटेड स्टेट्स नहीं आया था और अप्टन सिन्क्लेयर से नहीं मिला था। मैंने उन्हें बताया। हम लंच के लिए पेसाडेना में गाड़ी चलाते हुए उनके घर की तरफ जा रहे थे। तभी अप्टन के बेहद नरम आवाज में पूछा कि क्या मैं लाभ वाली प्रणाली में विश्वास करता हूं। मैंने जवाब दिया कि इस सवाल का जवाब देने के लिए तो मुझे एकाउन्टेंट की ज़रूरत पड़ेगी। हालांकि ये ऐसा सवाल था जिससे कोई नुक्सान नहीं होता लेकिन मैंने महसूस किया कि ये मामले की जड़ तक उतर गया है और उसी पल में मैं इसमें दिलचस्पी लेने लगा और राजनीति को इतिहास की तरह नहीं बल्कि एक आर्थिक समस्या के रूप में देखने लगा।

वेल्स ने मुझसे पूछा, जैसा कि मुझे लगा कि मुझे इंद्रियों से परे का आभास कैसे हो जाता है। मैंने उन्हें एक घटना के बारे में बताया जोकि सिर्फ़ संयोग मात्र नहीं हो सकती थी। टेनिस खिलाड़ी हेनरी क्रोसेट, एक अन्य मित्र और मैं बियारिट्ज होटल में एक कॉकटेल बार में गये। वहां पर बालरूम की दीवार पर जूए के तीन चक्के लगे थे और प्रत्येक पर एक ने दस तक की संख्याएं बनी हुई थीं। मैंने ड्रामाई ढंग से आधे मजाक में घोषणा की कि मुझमें पराभौतिक शक्तियां हैं और मैं तीनों चक्के घुमा दूंगा और कि पहला चक्का नौ पर रुकेगा, दूसरा चार पर और तीसरा सात पर। और लीजिये, पहला चक्का नौ पर रुका, दूसरा चार पर और तीसरा सात पर। ऐसा लाखों करोड़ों में एक बार ही होता है।

वेल्स ने कहा कि ये विशुद्ध संयोग भी तो हो सकता है। "लेकिन जब संयोग ही बाद में दोबारा होने लगे तो परखने की ज़रूरत होती है।" कहा मैंने और उन्हें एक और किस्से के बारे में बताया जो मेरे बचपन में हुआ था मैं केम्बरवैल रोड पर एक राशन की दुकान के आगे से गुज़र जा रहा था और मैंने उस दुकान पर शटर गिरे हुए देखे। ये अनहोनी सी बात थी। किसी चीज़ ने मुझे प्रेरित किया कि मैं खिड़की की सिल पर चढ़ कर शटर के बीच की झिर्री में से देखूं। भीतर अंधेरा और सुनसान था लेकिन राशन का सारा सामान मौजूद था। फर्श के बीचों बीच एक बड़ा सा पैकिंग केस रख हुआ था। मैं खिड़की की सिल से कूदा और किसी अन्त: प्रेरणा से अपने रास्ते चल दिया। उसके तुरंत बाद, एक हत्या के मामले का पता चला। एडगर एडवर्ड्स भला और बूढ़ा आदमी, जिसकी उम्र लगभग पैंसठ बरस की थी, ने इसी तरह से राशन की पांच दुकानें हथिया लीं। वह तौलने वाले बट्टे से दुकानों के मालिकों को मार डालता था और इस तरह से दुकान पर कब्जा कर लेता था। कैम्बरवैल की राशन की उस दुकान में, उस पैकिंग केस में उसके अंतिम तीन शिकारों, मिस्टर और मिसेज डर्बी और उनकी बच्ची की लाशें थीं।

लेकिन वेल्स मेरी बातें मानने के लिए तैयार ही नहीं थे। उन्होंने कहा कि हरेक की जिंदगी में अमूमन ऐसा होता ही रहता है कि कई संयोग घटते रहते हैं और इससे कुछ सिद्ध नहीं होता। हमारी चर्चा वहीं पर खत्म हो गयी थी लेकिन मुझे लगा, मैंने उन्हें अपने एक और अनुभव के बारे में बताया होता। उस वक्त मैं छोटा सा लड़का था और लंदन ब्रिज रोड पर मैं एक सैलून पर रुका और एक गिलास पानी माँगा। एक सज्जन पुरुष ने, जिसकी गहरी मूंछें थीं, मुझे पानी दिया। किसी वजह से मैं वह पानी नहीं पी पाया। मैंने पानी पीने का नाटक किया जैसे ही उस व्यक्ति ने एक ग्राहक की तरफ चेहरा मोड़ा, मैंने गिलास नीचे रखा और वहां से फूट लिया। दो सप्ताह बाद लंदन ब्रिज रोड पर क्राउन पब्लिक हाउस के मालिक जार्ज चैपमैन पर अपनी पांच पत्नियों की कुचले के सत का जहर दे कर मारने का इल्ज़ाम लगा।

जिस दिन उसने मुझे पानी का गिलास दिया था, उसकी नवीनतम शिकार सैलून के ऊपर वाले कमरे में मर रही थी। चैपमैन और एडवर्ड दोनों को फांसी पर लटका दिया गया था।

इस गूढ़ प्रसंग के अनुकूल एक और किस्सा है। बेवरली हिल्स पर जब मैंने अपना घर बनवाया था, उससे एक बरस पहले मुझे एक गुमनाम खत मिला था जिसमें बताया गया था कि पत्र लेखक सूक्ष्मदर्शी है और उसने सपने में एक पहाड़ी पर बना हुआ एक घर देखा है जिसका लॉन सामने की तरफ है और आगे की तरफ वाला हिस्सा नाव के सिरे की तरह निकला हुआ है। इस घर में चालीस खिड़कियां हैं और ऊंची छत वाला बड़ा सा संगीत कक्ष है। इस घर की ज़मीन पवित्र भूमि है जिस पर प्राचीन काल में रेड इंडियन जनजातियां दो हज़ार वर्ष पूर्ण मानव बलियां दिया करती थीं। इस घर में भूतों का डेरा है और इसे बिल्कुल भी अंधेरे में न छोड़ा जाये। पत्र में इस बात का जिक्र था कि जब तक मैं घर में बिल्कुल अकेला नहीं रहता और घर में रौशनी बनी रहती है, घर को कोई खतरा नहीं रहेगा।

उस समय मैंने ये खत किसी झक्की द्वारा लिखा गया मान कर एक तरफ रख दिया था। उसकी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया था और उसे अजीब सा और मज़ेदार मानकर एक तरफ रख दिया था। लेकिन दो बरस बाद अपनी डेस्क पर कुछ कागज तलाशते हुए वह खत फिर मेरे हाथ लग गया और मैंने इसे एक बार फिर पढ़ा। हैरानी की बात थी कि घर के और लॉन के ब्यौरे बिल्कुल सही थे। मैंने खिड़कियां नहीं गिनी थीं और ये सोचा था कि गिनूंगा लेकिन मेरी हैरानी की सीमा न नही जब मैंने देखा कि पूरी चालीस खिड़कियां थी।

हालांकि मैं भूत प्रेतों में विश्वास नहीं करता, मैंने प्रयोग करने का फैसला किया। बुधवार के दिन रात के वक्त स्टाफ की छुट्टी होती थी और घर खाली था, इसलिए मैंने बाहर खाना खाया, डिनर के तुरंत बाद मैं घर वापिस लौटा और संगीत कक्ष में चला गया। ये कमरा लम्बा और संकरा था, चर्च की किसी गलियारे की तरह और इसकी छत गॉथिक शैली की थी। पर्दे खींच लेने के बाद मैंने सारे घर की बत्तियां बंद कर दीं। तब मैं टटोलता हुआ अपनी आराम कुर्सी तक आया, वहां लगभग दस मिनट तक चुपचाप बैठा रहा। गहरे अंधेरे से मेरी इन्द्रियां जागृत हो गयीं और मैं अपनी आंखों के सामने तैरती हुई आकृति विहीन छायाओं की कल्पना करने लगा; लेकिन मैंने तर्क लगाया कि ये परदों के बीच की बारीक झिर्री में से चांदनी आ रही थी और ये क्रिस्टल डिकैंटर पर परावर्तित हो रही थी। मैंने परदों को और अच्छी तरह खींच लिया और तैरती हुई आकृतियां गायब हो गयीं। इसके बाद, मैं एक बार फिर अंधेरे में इंतजार करने लगा - पांच मिनट तो ज़रूर ही बीत गये होंगे। चूंकि कुछ भी नहीं हुआ इसलिए मैंने ज़ोर ज़ोर से बोलना शुरू कर दिया,"अगर जो आत्माएंं हैं जो सामने आ कर दर्शन दें।" मैं कुछ पल तक इंतज़ार करता रहा फिर भी कुछ नहीं हुआ। मैंने फिर कहना जारी रखा,"क्या संवाद स्थापित करने का कोई तरीका है? शायद किसी संकेत के जरिये, ठक ठक या, अगर ऐसा न हो सके, तो शायद मेरे मन के जरिये, जिससे हो सकता है, मैं कुछ लिखने के लिए प्रेरित हो जाऊं; या शायद ठंडी हवा का झोंका आपकी मौजूदगी का संकेत दे सके।"

तब मैं और पांच मिनट के लिए बैठा रहा। लेकिन न तो कोई संकेत ही मिला और न ही किसी तरह का आदेश ही आया। आखिर मैंने इसे गया गुज़रा मामला मान कर छोड़ दिया और बत्ती जला दी। तब मैं बैठक वाले कमरे में चला गया। पर्दे अभी हटाये नहीं गये थे, और चांदनी में पिआनो की छवि का आभास हो रहा था। मैं बैठ गया और कुंजी पटल पर उंगलियां दौड़ाने लगा। ऐसा करते हुए मैं ऐसी स्वर तंत्री पर अटका जिसने मुझे बांध लिया। मैंने इसे कई बार दोहराया, तब तक पूरा कमरा उससे कम्पित नहीं होने लगा। मैं ये क्यों कर रहा था? शायद यही बुलावा था। मैं एक ही स्वर तंत्री दोहराता रहा। अचानक ही रोशनी का एक सफेद हाथ मेरी छाती से लिपट गया: मैं बंदूक की गोली की तरह पिआनो से कूदा और खड़ा हो गया। मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से ड्रम की तरह धड़क रहा था।

जब मुझे होश आया, मैंने स्थिति को समझने की कोशिश की। पिआनो खिड़की के पास वाली आराम करने की जगह पर रखा हुआ था। तब मैंने जाना कि जिसे मैं रहस्यमय शक्ति की पट्टी समझ रहा था, पहाड़ी की ढलान से उतरती हुई किसी गाड़ी की पास आती हुई लाइट थी। अपने आपको सन्तुष्ट करने के लिए मैं पिआनो पर बैठा और उसी कुंजी को कई बार बजाया। बैठक के दूर वाले सिरे पर एक अंधियारा गलियारा था और उसके पार डाइनिंग रूम का दरवाजा था। मैंने अपनी आंख की कोर से देखा कि दरवाजा खुला और डाइनिंग रूम में से कुछ आया और अंधियारे गलियारे में से गुज़रा। ये डरावना, बौना सा दिखने वाला जानवर था जिसकी आंखों के चारों तरफ जोकरों जैसे सफेद घेरे थे। वह संगीत कक्ष की तरफ बत्तख जैसी चाल चलता हुआ चला जा रहा था। मैं अपना सिर घुमा पाता इससे पहले ही वह गायब हो गया था। भयभीत सा, मैं उठ खड़ा हुआ और उसका पीछा करने की कोशिश की, लेकिन वह गायब हो चुका था। यह विश्वास करते हुए मैंने खुद अपनी बेहद नर्वस हालत में कोई दृष्टिभ्रम पैदा कर लिया होगा जिससे भ्रम हो गया हो। मैं फिर से पिआनो बजाने बैठ गया, लेकिन फिर कुछ भी नहीं हुआ, इसलिए मैंने सो जाने का फैसला किया।

मैंने कपड़े बदले, पायजामा पहना और बाथरूम में गया। जब मैंने बत्ती जलायी तो बाथरूम में एक अजगर पसरा हुआ था और मेरी तरफ देख रहा था। मैं बाथरूम से एक तरह से छलांग लगाते हुए बाहर आया। यही धोखेबाज था! मैंने इन्हीं महाशय को अपनी आंख की कोर से देखा था। तब नीचे वाली मंजिल पर ये आकार में कुछ ज्यादा ही बड़ा प्रतीत हुआ था।

सवेरे, रसोइये में उस हैरान परेशान पाणी को एक पिंजरे में बंद किया और अंतत: हमने उसे पालतू बना लिया। लेकिन एक दिन वह गायब हो गया और हमने उसे फिर कभी नही देखा।

लंदन से मेरे चलने से पहले यार्क के ड्यूक और डचेस ने मुझे लंच पर आमंत्रित किया, ये बेहद अनौपचारिक लंच था और वहां पर सिर्फ ड्यूक, डचेज, डचेज के पिता और माता, उनके भाई और तेरह बरस का एक किशोर युवक ही थे। सर फिलिप ससून बाद में आये, और उनकी और मेरी ये ड्यूटी लगा दी गयी कि हम डचेस के छोटे भाई को एटन छोड़ते चलें। वह नन्हां सा शांत लड़का था जो, जिस वक्त दो प्रीफेक्ट हमें अपन स्कूल दिखा रहे थे, तो वह पीछे पीछे चला आ रहा था। बाद में प्रीफेक्ट और कई लोगों ने हमें चाय पर आमंत्रित किया।

हम मिठाई की दुकान में पहुंचे। ये कैंडी बेचने वाली और छ: पैनी की चाय बेचने वाली एक साधारण सी जगह थी। तब वह ईटन के सैकड़ों लड़कों के साथ बाहर ही रहा। हम चारों सीढ़ियां के ऊपर वाले एक कमरे में एक छोटी सी मेज पर बैठे। सब कुछ बहुत ही शानदार चल रहा था कि तभी मुझसे पूछा गया कि क्या मैं चाय का दूसरा कप लेना पसन्द करूंगा और मैंने अनजाने में कह दिया, "हां।" इससे वहां पर आर्थिक संकट पैदा हो गया क्योंकि हमारे मेजबान के पास पैसे कम पड़ गये थे और उसे कई दूसरे लड़कों के आगे कटोरा घुमाना पड़ा।

फिलिप फुसफसाये, "मुझे डर है कि हमने उन्हें दो पेंस के अतिरिक्त संकट में डाल दिया है और हालत ये है कि हम उनके लिए कुछ भी नहीं कर सकते।"

अलबत्ता, उन्होंने आपस में ही इंतजाम कर लिया और चाय की एक और केतली का आर्डर दिया। ये चाय हमें हड़बड़ी में पीनी पड़ी क्योंकि इस बीच स्कूल की घंटी बज गयी थी और उन्हें एक मिनट के भीतर स्कूल के गेट पर पहुंचना था। वहां अच्छी खासी भगदड़ मच गयी। भीतर, हैडमास्टर ने हमारा स्वागत किया और वह हॉल दिखाया जहां शैली और कई दूसरी महान विभूतियों ने अपने नाम अंकित कर रखे थे। आखिरकार, हैडमास्टर ने फिर से हमें दो प्रीफेक्टों के हवाले कर दिया जो हमें पवित्रतम गृभ गृह में ले गये। वह कमरा जिसमें कभी शैली रहे थे, लेकिन हमारा नन्हां फरिश्ता दोस्त बाहर ही रहा।

हमारे युवा मेज़बान ने बेहद उखड़े तरीके से उससे कहा "तुम क्या चाहते हो?"

"ओह, वह हमारे साथ है," फिलिप ने टोका, और बताया कि हम उसे लंदन के वापिस लाये हैं।

"तब ठीक है।" हमारे मेज़बान ने बेचैनी से कहा,"भीतर आ जाओ।"

फिलिप फुसफुसाये,"वे उसे भीतर आने दे कर बहुत बड़ी रियायत पर रहे हैं; इससे इस तरह की पवित्रभूमि पर अनधिकार प्रवेश से किसी और बच्चे का कैरियर बरबाद हो जायेगा।"

ये तो बाद में जब मैं लेडी एस्टर के साथ एटन गया तो मुझे वहां के सादगी भरे अनुशासन का पता चला। जिस वक्त हम बहुत कम रौशनी वाले गलियारे से गुजरे तो वहां भयंकर सर्दी थी और बहुत अंधेरा था। हम टटोलते हुए आगे बढ़े। गलियारे में हर कमरे के दरवाजे के बाद दीवार पर पैर धोने के बरतन लटक रहे थे। आखिर हमने सही दरवाजा तलाश लिया और खटखटाया।

उनके लड़के, पीले चेहरे वाले नन्हें से बच्चे ने दरवाजा खोला। भीतर, उसके दो साथी छोटे के फायर प्लेस में मुठ्ठी भर कोयले डाल कर सिकुड़े बैठे अपने हाथ सेंक रहे थे। माहौल निश्चित ही डरावना था।

लेडी एस्टर ने कहा,"मैं देखना चाहती हूं कि क्या तुम्हें मैं वीक एन्ड के लिए ले जा सकती हूं!" हम थोड़ी देर तक बात करते रहे, तभी अचानक दरवाजे पर ठक ठक हुई और इससे पहले कि हम 'भीतर आइये' कह पाते, दरवाजे का हत्था घूमा और हाउस मास्टर भीतर आये। वे खूबसूरत, लाल बाल और सुगठित देह वाले, लगभग चालीस बरस के शख्स थे। `गुड ईवनिंग,' उन्होंने रूखेपन से लेडी एस्टर से कहा और मेरी तरफ देखकर सिर हिलाया। इसके बाद उन्होंने छोटे से आतिशदान पर अपनी कुहनी टिकायी और अपना पाइप पीना शुरू कर दिया। लेडी एस्टर का आना स्पष्ट ही गलत वक्त पर था इसलिए उन्होंने सफाई देनी शुरू कर दी,"मैं यह देखने आयी हूं कि मैं अपने बेटे को वीक एंंड के लिए वापिस ले जा सकती हूं?"

"मुझे खेद है आप नहीं ले जा सकतीं," दो टूक जवाब मिला।

"ओह, जाने भी दीजिये," लेडी एस्टर ने अपनी खनकती हुई आवाज़ में कहा, "इतने हठी मत बनिये।"

"मैं हठी नहीं हूं, मैं सिर्फ एक तथ्य बयान कर रहा हूं।"

"लेकिन वह कितना पीला नज़र आ रहा है?"

"वाहियात!! उसके साथ कुछ भी गड़बड़ नहीं है।" वे लड़के के बिस्तर से उठीं, जिस पर हम बैठे हुए थे, और हाउस मास्टर के पास गयीं, "ओह, छोड़िये भी!"

उन्होंने नज़ाकत के साथ कहा और हेडमास्टर को अपने खास अंदाज में हल्का सा धक्का दिया। मैंने उन्हें लॉयड जॉर्ज और दूसरे लोगों को, जिन्हें भी वे उकसाना चाहती थीं, इस तरह का धक्का देते हुए देखा था।

"लेडी एस्टर," हेडमास्टर ने कहा,"आपको लोगों को धक्का देकर उनका संतुलन बिगाड़ने का बहुत खराब आदत है। मैं चाहता हूं कि आप ऐसा करना छोड़ दें।"

ऐसे पलों में लेडी एस्टर की सारी शेखी ने उनका साथ छोड़ दिया।

पता नहीं, बातचीत कैसे राजनीति की तरफ मुड़ गयी। हाउस मास्टर ने बात को बीच में ही काट दिया और अपना संक्षिप्त सा जुमला कह दिया,"अंग्रेजी राजनीति के साथ मुसीबत ये है कि इसमें औरतें बहुत अधिक दखल देती हैं और इसके साथ ही मैं आपको गुड नाइट कहूंगा, लेडी एस्टर।" तब उन्होंने हम दोनों की तरफ हौले से सिर हिलाया और चले गये।

"कितना खड़ूस आदमी है," लेडी एस्टर ने कहा। लेकिन बच्चे ने हैड मास्टर की तरफ से जवाब दिया,"ओह नहीं मां, वे सचमुच बहुत अच्छे हैं।"

मैं उस व्यक्ति की सिर्फ़ प्रशंसा ही कर सका। महिला विरोधी अपनी भावनाओं के बावजूद उसके चरित्र में ईमानदारी और खरापन है - उसमें हास्यबोध नहीं था लेकिन ईमानदारी थी।

मैं चूंकि सिडनी से कई बरसों से नहीं मिला था, मैं लंदन से ये सोच कर चला कि उसके साथ थोड़ा सा वक्त नाइस में बिताऊंगा। सिडनी हमेशा कहा करता था कि जब वह 250,000 डॉलर बचा लेगा तो वह रिटायर हो जायेगा। मैं यहां पर ये बात जोड़ दूं कि उसने इस तय राशि से बहुत ज्यादा बचा लिये थे। एक काइयां कारोबारी आदमी होने के अलावा वह बहुत ही शानदार कॉमेडियन था और उसने कई सफल फिल्में बनायी थीं : सबमेरीन, पाइलट, द बैटर ओल, मैन इन द' बॉक्स और फार्चून। और अब चूंकि सिडनी रिटायर हो चुका था, जैसा कि उसने कहा था, वह रिटायर हो कर नाइस में रह रहा था।

जब नाइस में रहने वाले फ्रैंक जे. गॉल्ड को पता चला कि मैं अपने भाई से मिलने के लिए आ रहा हूं तो मुझे उन्होंने जुआं-लेस-पिन्स में अपने मेहमान के रूप में आने का न्योता दिया जिसे मैंने स्वीकार कर लिया।

नाइस में जाने से पहले मैं दो दिन के लिए पेरिस में रुका और फॉलिस बरजेरे में गया क्योंकि मूल अष्टम लंका शायर बाल मंडली के एल्फ्रेड जैक्सन वहां पर काम कर रहे थे। वे मूल ट्रुप के पुत्रों में से एक थे। जब मैं एलफ्रेड से मिला तो उन्होंने बताया कि जैक्सन परिवार बहुत समृद्ध हो गया है और उनके लिए नृत्य करने वाली लड़कियों के आठ दल हैं और कि उनके पिता अभी भी जीवित हैं। अगर मैं फालिज बरजेरे जाऊं, जहां पर वे पूर्वाभ्यास कर रहे हैं तो मैं उनके पिता से मिल सकता हूं।

हालांकि मिस्टर जैक्सन अस्सी की उम्र पार कर चुके थे, वे अभी भी हट्टे कट्टे और चुस्त दुरुस्त लग रहे थे। हम हैरान होते हुए अपने पुराने दिन याद करते रहे और बार बार कहते रहे,"किसने सोचा था, ऐसा होगा?"

"तुम्हें पता है, चार्ली," वे बोले," छोटे से बच्चे के रूप में जो तुम्हारी उत्कृष्ट याद बाकी है, वो है तुम्हारी विनम्रता।"

अगर आप ये मुगालता पाले रहते हैं कि आप जनता की निगाहों में बहुत दिन तक सितारे बने रहेंगे तो आप गलती पर हैं। चांदनी चार दिन की ही रहती है और फिर अंधेरा आता ही है। इसलिए मेरे इस स्वागत के बाद सारी चीजें अचानक ही शांत हो गयीं। पहला झटका प्रेस से मिला। मेरी तारीफों के पुल बांधने के बाद उन्होंने एकदम विपरीत रुख अपना लिया। मेरा ख्याल है, इससे पढ़ने वालों को मज़ा ही आया होगा।

लंदन और पेरिस की उत्तेजना अपने निशान छोड़ रही थी। मैं थका हुआ था और अब आराम चाहता था।

जुआं-लेस-पिन्स में मैं जब आराम कर रहा था तो मुझसे कहा गया कि मैं लंदन में पैलेडियम में एक कमांड पर्मार्मेंस में अपना चेहरा दिखाऊं। इसके बजाये, मैंने दो सौ पाउंड का चेक भेज दिया। इससे तो हंगामा उठ खड़ा हुआ। मैंने राजा को ठेस पहुंचायी थी और राज आदेश की अवमानना की थी। मुझे पैलेडियम के प्रबंधक की ओर से जो नोट मिला उसे मैंने राजसी आदेश नहीं माना। इसके अलावा, मैं एक पल के नोटिस पर प्रदर्शन करने के लिए तैयार नहीं था।

अगला हमला कुछ सप्ताह बाद आया। मैं एक टेनिस कोर्ट में अपने पार्टनर का इंतज़ार कर रहा था कि तभी एक नौजवान के मेरे एक दोस्त के दोस्त के रूप में अपना परिचय दिया। हालचाल पूछ लेने के बाद हमारी बातचीत आपसी राय की तरफ मुड़ गयी। वह बातचीत में बहुत माहिर और सहानुभूतिपूर्ण रवैये वाला नौजवान था। मुझमें एक कमज़ोरी है कि मैं लोगों को अचानक ही पसन्द करने लगता हूं, वो भी खास तब जब वे अच्छे श्रोता हों। मैं कई विषयों पर बात करने लगा। दुनिया भर में चल रहे हालात पर मैंने आपसी हताशा जतलायी और उसे बताया कि यूरोप में जो हालात चल रहे हैं वे एक और युद्ध की ओर ले जा रहे हैं।

"ठीक है, भई, मुझे वे अगले युद्ध में नहीं पायेंगे", मेरे दोस्त ने कहा।

"मैं आपको दोष नहीं देता," मैंने जवाब दिया,"मेरे मन में उनके लिए कोई सम्मान नहीं है जो हमें मुसीबतों में फंसाते है; मैं यह बताया जाना पसन्द नहीं करता कि किसको मारूं और किसके लिए मृत्यु को गले लगाया जाये और ये सब देशभक्ति के नाम पर!!"

हम बहुत अच्छे माहौल में विदा हुए। मेरा ख्याल है मैंने अगली शाम को उसके साथ खाना खाने का भी तय कर लिया था, लेकिन वह आया नहीं। और लीजिये! किसी दोस्त के साथ बात करने के बजाये, मैंने पाया कि मैं एक न्यूज रिपोर्टर से बात कर रहा था और अगले दिन अखबारों में पहले पेज पर पूरे पन्ने की खबर थी:

"चार्ली चैप्लिन देशभक्त नहीं।" वगैरह।

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