Charlie Chaplin - Meri Aatmkatha - 58 in Hindi Biography by Suraj Prakash books and stories PDF | चार्ली चैप्लिन - मेरी आत्मकथा - 58

चार्ली चैप्लिन - मेरी आत्मकथा - 58

चार्ली चैप्लिन

मेरी आत्मकथा

अनुवाद सूरज प्रकाश

58

फिफ्थ एवेन्यू के आस पास चुस्त युवा नाज़ियों को महोगनी के छोटे-छोटे मंचों पर खड़े होकर जनता के छोटे-छोटे समूहों के सामने भाषण देते सुनना बहुत अजीब लगता। एक भाषण यूं चल रहा था: 'हिटलर का दर्शन गहन हैं और इस औद्योगिक युग, जिसमें बिचौलिये या यहूदी के लिए बिल्कुल भी जगह नहीं है, की समस्याओं का सुविचारित अध्ययन है।'

एक महिला ने टोका,'ये किस किस्म की बात हो रही है?' वह हैरान हुई,'ये अमेरिका है। आप समझते क्या हैं कि आप कहां हैं?'

वह चमचे सरीखा नौजवान, जो सुदर्शन था, बेशरमी से गुस्कुराया। 'मैं युनाइटेड स्टेट्स में हूं और संयोग से मैं अमेरिकी नागरिक हूं।' उसने सहजता से कहा।

'ये बात है,' वह महिला बोली,'मैं एक अमेरिकी नागरिक हूं और यहूदी हूं और अगर मैं पुरुष होती तो तुम्हें धूल चटा देती।'

एक या दो लोगों ने महिला की धमकी का समर्थन किया लेकिन ज्यादातर लोग भावशून्य होकर मौन खड़े रहे। पास ही खड़े एक पुलिस वाले ने महिला को शांत किया। मैं हैरान होकर वहां से लौटा। मैं अपने कानों पर विश्वास ही नहीं कर पा रहा था।

एक या दो दिन के बाद की बात है, मैं देहात वाले घर में था और एक पीले, खून की कमी की वज़ह से कमज़ोर-से दिखने वाले फ्रांसीसी युवक काउंट चैम्बरुन, जो पियरे लावाल की पुत्री का पति था, ने लंच से पहले मुझे लगातार कोंचना शुरू किया। उसने न्यू यार्क में पहली ही रात द ग्रेट डिक्टेटर देखी थी। उसने उदारता से कहा, 'बेशक, आपके नज़रिये को गम्भीरता से नहीं लिया गया है।'

'कुछ भी कहो, ये कामेडी ही तो है।' मैंने कहा।

नाज़ी यातना शिविरों में जो जघन्य कत्ले आम हो रहे थे और जो अत्याचार ढाये जा रहे थे, अगर मुझे उनके बारे में पता होता तो मैं इतना विनम्र न होता। वहां पर पचास के करीब मेहमान जमा थे और हरेक मेज़ पर चार लोग बैठे थे। वह हमारी मेज़ पर चला आया और मुझे राजनैतिक बहस में घसीटने की कोशिश करने लगा। लेकिन मैंने उससे कह दिया कि मैं राजनीति की तुलना में अच्छा भोजन ज्यादा पसन्द करता हूं। उसकी बातचीत इस तरह की थी कि मैंने मज़बूरन अपना गिलास उठाया और कहा,'लगता है मैं बहुत अधिक मिनरल वाटर पीने लगा हूं।' अभी मैंने ये शब्द कहे ही थे कि किसी दूसरी मेज पर झड़प शुरू हो गयी और दो महिलाओं में तू तू मैं मैं शुरू हो गयी। ये झगड़ा इतना भीषण हो गया कि लगता था, एक-दूसरे के बाल खींचे जायेंगे। एक महिला दूसरी पर चिल्ला रही थी,'मैं इस तरह की बकवास सुनने की आदी नहीं हूं। तुम बेगैरत नाज़ी हो।'

न्यू यार्क के एक युवा राजकुमार ने मुझसे विनम्रता से पूछा कि मैं इतना अधिक नाज़ी विरोधी क्यों हूं? मैंने कहा, क्योंकि वे जनता के ही विरोधी हैं। 'बेशक' वह बोला, और उसे लगा कि उसने कोई नयी खोज कर ली है। पूछा मुझसे,'क्या आप यहूदी हैं? नहीं क्या?'

'नाज़ी विरोधी होने के लिए किसी का यहूदी होना ज़रूरी नहीं है।' मैंने जवाब दिया,'सबसे बड़ी और महत्‍वपूर्ण बात तो यही है कि आदमी सामान्य सभ्य आदमी बना रहे।' और ये विषय वहीं खत्म हो गया था।

एक या दो दिन के बाद की बात है, मुझे वाशिंगटन में हॉल आफ द डॉटर्स ऑफ द अमेरिकन रिवोल्यूशन में हाज़िर होना था और रेडियो पर द ग्रेट डिक्टेटर के अंतिम भाषण का पाठ करना था। इससे पहले, मुझे राष्ट्रपति रूज़वेल्ट से मिलने के लिए बुलाया गया था। उनके अनुरोध पर मैंने ये फिल्म व्हाइट हाउस भिजवा दी थी। जब मुझे उनके निजी अध्ययन कक्ष में ले जाया गया तो उन्होंने ये कहते हुए मेरा स्वागत किया,'बैठो, चार्ली, आपकी फिल्म की वज़ह से अर्जेन्टीना में बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो गयी है।' फिल्म के बारे में बस, उनकी यही टिप्पणी थी। बाद में मेरे एक मित्र ने पूरी बात का निचोड़ बताते हुए कहा था,'आपका व्हाइट हाउस में स्वागत तो किया गया लेकिन गले से नहीं लगाया गया।'

मैं राष्ट्रपति के साथ लगभग चालीस मिनट तक बैठा था। इस दौरान उन्होंने मुझे कई बार ड्राई मार्टिनी के जाम पेश किये जिन्हें मैं शर्म के मारे भीतर उतरता रहा। जब विदा होने का वक्त आया तो मैं एक तरह से व्हाइट हाउस से लुढ़कता हुआ बाहर आया - तब मुझे अचानक याद आया कि मुझे तो दस बजे रेडियो पर बोलना था। ये राष्ट्रीय प्रसारण था जिसका मतलब होता लगभग छ: करोड़ लोगों से बात करना। ठण्डे पानी के नीचे खड़े हो कर कई बार सिर धोने और तेज़ ब्लैक कॉफी पीने के बाद ही मैं कमोबेश होश में आ पाया था।

अमेरिका अभी तक युद्ध में नहीं कूदा था इसलिए उस रात हाल में बहुत सारे नाज़ी थे। अभी मैंने अपना भाषण शुरू ही किया था कि नाज़ियों ने खांसना खखारना शुरू कर दिया। ये आवाज़ें स्वाभाविक रूप से खांसने से बहुत ऊंची थीं। इस बात ने मुझे नर्वस कर दिया और नतीजा ये हुआ कि मेरा मुंह सूख गया। मेरी जीभ मेरे तालु से चिपकने लगी और मेरे लिए शब्द बोलना मुश्किल हो गया। भाषण छ: मिनट लम्बा था। भाषण बीच में रोक कर मैंने कहा कि जब तक मुझे एक गिलास पानी नहीं मिलेगा, मैं आगे नहीं बोल पाऊंगा। बेशक, हॉल में एक बूंद भी पानी नहीं था और यहां पर मैं छ: करोड़ लोगों को रोके हुए था। दो मिनट के अंतराल के बाद मुझे कागज़ के एक छोटे से लिफाफे में पानी दिया गया। तभी मैं अपना भाषण पूरा कर पाया था।


*****

अब ये अपरिहार्य हो गया था कि पॉलेट और मैं अलग हो जायें। हम दोनों ही इस बात को द ग्रेट डिक्टेटर के शुरू होने से बहुत पहले से जानते थे और अब फिल्म पूरी हो जाने के बाद हमारे सामने ये सवाल मुंह बाये खड़ा था कि कोई फैसला लें। पॉलेट यह संदेश छोड़ कर गयी कि वह पैरामाउंट में एक और फिल्म में काम करने के लिए कैलिफोर्निया वापिस जा रही है। इसलिए मैं कुछ अरसे तक रुका रहा और न्यू यार्क के आस-पास ही भटकता फिरा। फ्रैंक, मेरे बटलर ने फोन पर बताया कि जब वह बेवरली हिल्स वापिस आयी तो वह वहां पर ठहरी नहीं, अलबत्ता उसने अपना सामान समेटा और चली गयी। जब मैं बेवरली हिल्स अपने घर लौटा तो वह तलाक लेने के लिए मैक्सिको जा चुकी थी। घर अब बहुत उदास हो गया था। ज़िंदगी का ये मोड़ वाकई तकलीफ देने वाला था क्योंकि किसी की ज़िंदगी से आठ बरस के संग-साथ को काट कर अलग कर पाना मुश्किल काम था।

हालांकि द ग्रेट डिक्टेटर अमेरिकी जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हो रही थी, इस बात में कोई शक नहीं था कि इसने भीतर ही भीतर विरोध के स्वर भी खड़े किये थे। इस तरह का पहला संकेत प्रेस से उस वक्त आया जब मैं बेवरली हिल्स वापिस आया। बीस से भी ज्यादा लोगों की धमकाती भीड़ हमारे कांच से घिरे पोर्च में आ जुटी और आ कर चुपचाप बैठ गयी। मैंने उन्हें शराब पिलानी चाही तो उन्होंने मना कर दिया - प्रेस के सदस्यों द्वारा इस तरह का व्यवहार करना असामान्य बात थी।

'आपके दिमाग में क्या है, चार्ली?' उनमें से एक ने पूछा। वह स्पष्टत: ही उन सबकी तरफ से बात कर रहा था।

'द डिक्टेटर के लिए थोड़ा-बहुत प्रचार!' मैंने मज़ाक में कहा।

मैंने उन्हें राष्ट्रपति के साथ अपने साक्षात्कार के बारे में बताया और इस बात का उल्लेख किया कि अमेरिकी दूतावास को अर्जेन्टीना में इस फिल्म की वज़ह से तकलीफ़ हो रही है। मुझे लगा कि मैंने उन्हें एक मज़ेदार किस्सा सुनाया है, लेकिन फिर भी वे मौन ही बने रहे। थोड़ी देर के अंतराल के बाद मैंने हँसी मज़ाक में कहा,'लगता है ये बात कुछ हजम नहीं हुई, क्या ख्याल है?'

'नहीं, बात तो नहीं जमी,' प्रवक्ता ने कहा। 'आपका जन सम्पर्क बहुत अच्छा नहीं है। आप प्रेस की परवाह न करते हुए चले गये थे और हमें ये बात अच्छी नहीं लगी।'

हालांकि मैं स्थानीय प्रेस के साथ कभी भी इतना लोकप्रिय नहीं था, उसकी बात से मुझे थोड़ा मज़ा आया। सच तो ये था कि मैं प्रेस से बिन मिले ही हॉलीवुड से चला गया था क्योंकि मैं यह मान कर चल रहा था कि जो मेरे बहुत अच्छे दोस्त नहीं हैं, हो सकता है वे लोग `द ग्रेट डिक्टेटर को न्यू यार्क में देखे जाने का मौका दिये जाने से पहले ही उसकी चिंदी-चिंदी कर डालें। फिल्म में मेरे 2,000,000 डॉलर दांव पर लगे हुए थे और मैं कोई भी जोखिम लेना गवारा नहीं कर सकता था। मैंने उन्हें बताया कि चूंकि ये नाज़ी विरोधी फिल्म है, इसलिए इसके दुश्मन भी शक्तिशाली हैं, यहां कि वे लोग अमेरिका में भी हैं और फिल्म को एक मौका दिये जाने के लिए मैंने अंतिम क्षणों में ही जनता के लिए इसे प्रस्तुत करने से पहले इसका रिव्यू करने का फैसला लिया था।

लेकिन मेरी कही कोई भी बात उनके अड़ियल रुख को डिगा नहीं सकी। माहौल बदला और प्रेस में कई खुराफाती चीज़ें नज़र आने लगीं। शुरू-शुरू में छोटे-छोटे हमले, मेरे कमीनेपन के किस्से, फिर पॉलेट और मेरे बारे में भद्दी अफवाहें। लेकिन उल्टे प्रचार के बावजूद द ग्रेट डिक्टेटर इंगलैंड और अमेरिका, दोनों ही जगह धूम मचाती रही, कीर्तिमान भंग करती रही।

हालांकि अमेरिका अभी तक युद्ध में नहीं उतरा था, रूज़वेल्ट ने हिल्टर के साथ शीत युद्ध छेड़ा हुआ था। इस बात ने राष्ट्रपति को अच्छी -खासी परेशानी में डाल रखा था क्योंकि नाज़ियों ने अमेरिकी संस्थाओं और संगठनों में भीतर तक पैठ बनायी हुई थी; चाहे ये संगठन इस बात को जानते थे या नहीं; उन्हें नाज़ियों के हथियारों की तरह इस्तेमाल में लाया जा रहा था।

तभी अचानक और ड्रामाई खबर आयी कि जापान ने पर्ल हार्बर पर हमला कर दिया है। इसकी भीषणता ने अमेरिका को सन्न कर दिया। लेकिन अमेरिका ने तत्काल ही युद्ध के लिए कमर कस ली और देखते ही देखते अमेरिकी सैनिकों की कई डिवीज़न समुद्र पर जा चुकी थीं। इसी वक्त में, रूसी सैनिक हिटलरी सेना को मास्को के बाहर रोके हुए थे और मांग कर रहे थे कि जल्दी ही दूसरा फ्रंट खोला जाये। रूज़वेल्ट ने इसकी सिफ़ारिश की थी; और हालांकि नाज़ियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग अब भूमिगत हो चुके थे, उनका फैलता गया ज़हर अभी भी फिज़ां में घुला हुआ था। हमें अपने रूसी मित्रों से अलग करने की हर संभव कोशिश की जा रही थी। उस वक्त इस तरह का ज़हरीला प्रचार-प्रसार हो रहा था: 'पहले दोनों को आपस में लड़ मरने दो, फिर हम मौके के हिसाब से फैसला करेंगेl'

दूसरे फ्रंट को रोकने के लिए हर तरह की तरकीब इस्तेमाल की जा रही थी। आने वाले दिन चिंता से भरे थे। हर दिन हमें रूस में मरने वालों की दिल दहला देने वाली खबरें मिलतीं। दिन हफ्तों में बदलते गये और हफ्ते कई-कई महीनों में बदल गये, लेकिन हालात अभी भी वही थे। नाज़ी मास्को के बाहर डेरा डाले हुए थे।

मेरा ख्याल है, इसी वक्त के दौरान मेरी मुसीबतें शुरू हुईं। मुझे सैन फ्रांसिस्को में रूसी युद्ध राहत के लिए अमेरिकी समिति के प्रमुख की ओर से एक टेलीफोन संदेश मिला। उन्होंने पूछा कि क्या मैं रूस में भूतपर्व अमेरिकी राजदूत मिस्टर जोसेफ ई डेविस की जगह ले सकूंगा? वे बोलने वाले थे लेकिन अंतिम क्षणों में उन्हें गले की तकलीफ हो गयी है। हालांकि मेरे पास कुछ ही घंटे का समय था, मैंने न्यौता स्वीकार कर लिया। बैठक अगले दिन होने वाली थी, इसलिए मैंने शाम की गाड़ी पकड़ी जिसने मुझे अगले दिन सुबह आठ बजे सैन फ्रांसिस्को पहुंचा दिया।

समिति ने मेरे लिए `एक सामाजिक यात्रा दौरा' तैयार किया था। लंच फलां जगह लेना है और डिनर दूसरी जगह - इसकी वज़ह से मुझे भाषण के बारे में सोचने का बहुत थोड़ा-सा ही वक्त मिल पाया। अलबत्ता, मैंने डिनर के वक्त दो गिलास शैम्पेन के अपने हलक के नीचे उतारे तो कुछ बात बनी।

उस हॉल की दस हज़ार लोगों की क्षमता थी और वह खचाखच भरा हुआ था। मंच पर विराजमान थे अमेरिकी जल सेना अध्यक्ष और थल सेना अध्यक्ष, तथा सैन फ्रांसिस्को के मेयर रोस्सी। उनके भाषण बंधे-बंधे से तथा टाल मटोल वाली भाषा में थे। मेयर ने कहा,'इस तथ्य को स्वीकार करना ही होगा कि रूसी हमारे मित्र हैं।' वे इस बात के प्रति सतर्क थे कि कहीं वे रूसी एमर्जेंसी का कुछ ज्यादा ही बखान न कर दें, या उनकी बहादुरी की कुछ ज्यादा ही तारीफ़ न कर दें या इस तथ्य का उल्लेख न कर दें कि वे नाज़ियों की लगभग दो सौ डिवीज़नों को रोके रखने के लिए लड़ और मर रहे थे। उस शाम मैंने महसूस किया कि नज़रिया तो यही था कि हमारे मित्र राष्ट्र हमदम तो हैं लेकिन अजीब हैं।

समिति के प्रमुख ने मुझसे आग्रह किया था कि मैं, हो सके तो एक घंटे तक बोलूं। इस बात ने मुझे भयभीत कर दिया। अधिकतम चार मिनट तक बोलने की मेरी सीमा थी। लेकिन इस तरह की कमज़ोर दलीलें सुन कर मेरा गुस्सा भड़क उठा था। मैंने अपने डिनर के निमंत्रण पत्र के पीछे चार विषयों की टिप्पणियां लिखीं। मैं घबराहट और डर की हालत में मंच के पीछे वाले हिस्से में दायें बायें हो रहा था। मैं मित्रों के आगे बढ़ने का इंतज़ार कर रहा था। तभी मैंने सुना कि मेरा परिचय दिया जा रहा था।

मैं काली टाई और डिनर जैकेट पहने हुए था। थोड़ी सी तालियां बजीं जिससे मुझे अपने आपको संभालने के लिए थोड़ा-सा वक्त मिल गया। जब शोर थमा तो मैंने एक ही शब्द कहा,'कॉमेरड्स!' और पूरे हॉल में हँसी वे जैसे फटाखे फूटे। जब हँसी थमी तो मैंने ज़ोर देकर कहा,'और मैं सचमुच कॉमरेड ही कहना चाहता हूं।' नये सिरे से हँसी की फुहारें, फिर तालियां। मैंने अपनी बात जारी रखी,'मैं ये मान कर चल रहा हूं कि आज रात यहां पर बहुत सारे रूसी हैं, और जिस तरह से आपके देशवासी ठीक इस पल में लड़ रहे हैं और मर रहे हैं, आपको कॉमरेड कह कर पुकारना अपने आप में आदर और विशेषाधिकार है।' तालियां बजाते हुए कई लोग खड़े हो गये।

'दोनों को खून बहाने दो' के बारे में सोचते हुए अब मेरे भीतर जोत जल चुकी थी। मैं इस जुमले के बारे में अपनी नाराज़गी दर्शाना चाहता था, लेकिन किसी भीतरी प्रेरणा ने मुझे ऐसा करने से रोका। इसके बजाये मैंने कहा,'मैं कम्यूनिस्ट नहीं हूं, मैं एक इन्सान हूं और मेरा ख्याल है, मैं मानवों की, इन्सानों की प्रतिक्रिया के बारे में जानता हूं। कम्यूनिस्ट किसी और व्यक्ति से ज़रा-सा भी अलग नहीं होते; चाहे वे अपना एक हाथ खो बैठें, या अपनी टांग खो बैठें; उन्हें भी उतनी ही तकलीफ़ भोगनी पड़ती है जितनी हमें भोगनी पड़ती है, वे भी वैसे ही मरते हैं जैसे हम मरते हैं और कम्यूनिस्ट मां भी किसी दूसरी मां की ही तरह होती है। जब उसे यह दु:खद समाचार मिलता है कि उसका बेटा अब कभी लौट कर नहीं आयेगा तो वह भी उसी तरह से रोती है जिस तरह से कोई और मां रोती है। मुझे ये सब जानने के लिए मेरा कम्यूनिस्ट होना ज़रूरी नहीं है। ये सब जानने के लिए मेरा इन्सान होना ही काफी है, और ठीक इन्हीं पलों में रूसी माताएंं बहुत रो रही हैं और उनके बहुत से बेटे मर रहे हैं...।'

मैं चालीस मिनट तक बोलता रहा। मुझे नहीं मालूम था कि अगले शब्द कौन से होंगे। मैंने उन्हें हँसाया और रूज़वेल्ट के बारे में किस्से सुना कर खुश किया। मैंने उन्हें पहले विश्व युद्ध में युद्ध संबंधी अपने भाषण के बारे में बता कर हँसाया - मैं गलती पर नहीं था।

मैंने अपनी बात जारी रखी,'और अब ये युद्ध - 'मैं यहां पर रूसी युद्ध राहत की ओर से आया हूं।' मैं रुका और फिर मैंने अपने शब्द दोहराये,'रूसी युद्ध राहत।' धन से मदद हो सकती है लेकिन उन्हें धन से भी अधिक कुछ चाहिए। मुझे बताया गया है कि आयरलैण्ड के उत्तर में मित्र राष्ट्रों के बीस लाख सैनिक जान की बाजी लगाये बैठे हैं जबकि रूसी अकेले के दम पर नाज़ियों की दोनों डिवीज़नों को रोके हुए हैं।' मौन बहुत अधिक घना हो गया। 'रूसी,' मैंने ज़ोर देकर कहा,'हमारे मित्र हैं। वे केवल अपनी जीवन शैली के लिए ही नहीं लड़ रहे हैं, वे हमारी जीवन शैली के लिए भी लड़ रहे हैं और अगर मैं अमेरीकियों को जानता हूं तो वे अपनी खुद की लड़ाई लड़ना पसन्द करते हैं। स्तालिन चाहते हैं, रूज़वेल्ट ने इसका आह्वान किया है, इसलिए आइए, हम सब इसकी मांग करें - अब हम दूसरा मोर्चा खोलें।'

इसे सुन कर जो पागल कर देने वाला शोर-शराबा हुआ, पूरे सात मिनट तक चलता रहा। यह विचार श्रोताओं के दिल में और दिमाग में था। उन्होंने मुझे आगे बात ही नहीं करने दी। वे लगातार ज़मीन पर पैर पटकते और तालियां बजाते रहे। जिस वक्त वे ज़मीन पर पैर पटक रहे थे, चिल्ला रहे थे, और हवा में अपने हैट उछाल रहे थे, मैं ये सोच-सोच कर हैरान होने लगा कि मैंने कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं कह दिया है या कहीं बहुत आगे तो नहीं बढ़ गया हूं। तब मैं अपने आपसे इस बात पर गुस्सा होने लगा कि मैंने उन हज़ारों लोगों के, जो लड़ रहे थे और मर रहे थे, के मुंह पर भयभीत कर देने वाले इतने घिनौने विचार प्रकट ही कैसे कर दिये, और आखिर में जब श्रोता शांत हुए तो मैंने कहा,'आप जिस तरह से इस चीज़ के बारे में सोचते हैं, क्या आप में से हरेक व्यक्ति राष्ट्रपति को इस आशय का एक तार भेजेगा? हम उम्मीद करें कि कल तक राष्ट्रपति तक दस हज़ार तार इस अनुरोध के साथ पहुंच जायेंगे कि दूसरा मोर्चा खोला जाये!'

बैठक के बाद मैंने महसूस किया कि माहौल में तनाव और बेचैनी घुल गये हैं। डुडले फील्ड मालोने, जॉन गारफील्ड और मैं किसी जगह पर खाना खाने के लिए गये। 'यार, आपमें तो गज़ब की हिम्मत है,' गारफील्ड ने मेरे भाषण का ज़िक्र करते हुए कहा। उनकी बात ने मुझे विचलित कर दिया, क्योंकि मैं शहीद नहीं होना चाहता था और न ही किसी राजनैतिक पचड़े में फंसना चाहता था। मैंने वही कहा था जो मैंने ईमानदारी से महसूस किया था और जिसे मैंने सही समझा था। इसके बावजूद, जॉन के जुमले के बाद मैं बाकी पूरी शाम हताशा महसूस करता रहा। लेकिन भाषण के नतीजे के रूप में मैंने जिन डरावने बादलों की उम्मीद की थी, वे सब हवा में उड़ चुके थे और बेवरली हिल्स वापिस आ कर जीवन एक बार उसी ढर्रे पर चलने लगा था।

कुछ ही हफ्तों बाद मुझे एक और अनुरोध मिला कि मैं मेडिसन स्क्वायर में होने वाली विशाल जनसभा को टेलीफोन पर ही संबोधित करूं। चूंकि ये सभा भी उसी मकसद के लिए थी, मैंने उसे स्वीकार कर लिया। और करता भी क्यों नहीं? इस सभा को सर्वाधिक सम्मानित व्यक्तियों के संगठनों द्वारा प्रायोजित किया गया था। मैं चौदह मिनट तक बोलता रहा। यह भाषण औद्योगिक संगठनों की कांग्रेस की परिषद को इतना अच्छा लगा कि उन्होंने इसे प्रकाशित करना उचित समझा। इस प्रयास में मैं अकेला ही नहीं था, ये बात सीआइओ द्वारा प्रकाशित पुस्तिका से स्पष्ट हो जायेगी:

भाषण

'रूस के लड़ाई के मैदानों पर

लोकतंत्र जियेगा या मरेगा'

विशाल भीड़, जिसे पहले से ही चेतावनी दे दी गयी थी कि वह न तो बीच में टोकेगी और न ही तालियां बजायेगी, प्रत्येक शब्द पर हिस हिस करती रही और तनाव में बैठी रही। इस तरह से वे अमेरिका की महान जनता के महान कलाकार चार्ल्स चैप्लिन को चौदह मिनट तक उस वक्त सुनते रहे जब वे हॉलीवुड से टेलीफोन पर उन्हें संबोधित कर रहे थे।

22 जुलाई 1942 की शाम होने से पहले न्यू यार्क में मेडिसन स्क्वायर पर ट्रेड यूनियनों के सदस्य, नागरिक, भाई बिरादर, बुजुर्ग सदस्य, समुदाय और गिरजा घर संगठनों और अन्यों के सत्रह हज़ार सदस्य जुटे ताकि वे हिटलर और उसकी चांडाल चौकड़ी पर अंतिम विजय के पलों को निकट लाने के लिए दूसरा मोर्चा तत्काल ही खोलने के लिए राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट के समर्थन में अपनी आवाज़ उठा सकें।

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