Tantric Masananath - 5 in Hindi Horror Stories by Rahul Haldhar books and stories PDF | तांत्रिक मसाननाथ - 5

तांत्रिक मसाननाथ - 5

तांत्रिक मसाननाथ व कापालिक ( 5 )


उस समय रात के 2 बज रहे थे । नरेंद्र को बैठे - बैठे नींद लग रही है लेकिन मच्छरों की वजह से चुपचाप बैठा नहीं जा रहा । सर्वेश के घर के सामने कोई झाड़ी नहीं है इसीलिए रास्ते पर ही बैठना पड़ा । क्योंकि उन्हें कल जैसा भूल आज नहीं करना है । आज दोनों ही अपने साथ सर्विस रिवाल्वर को भी लेकर आए हैं । यशपाल के प्लान के अनुसार घर के सामने वाले दरवाजे पर बाहर से कुंडी लगा दिया गया है । जिससे सर्वेश बाहर न निकल सके ।दरवाजे पर कुछआवाज होते ही वो तुरंत उसे गिरफ्तार करेंगे । 1 घंटे बीतने के बाद भी जब कोई खतरा नहीं दिखा तब यशपाल धीरे- धीरे सर्वेश के घर की ओर बढ़े । नरेंद्र भी अपने रिवाल्वर को लोड करके उनके पीछे चल पड़ा । बाहर से कुंडी खोलते ही वो चौंक गए क्योंकि अंदर से दरवाजा खुला हुआ था ।इसका मतलब सर्वेश ने बाहर निकलने की कोशिश की थी परंतु बाहर से दरवाजा बंद रहने के कारण वह नहीं निकल पाया । यशपाल दरवाजे को खोलकर घर के अंदर पहुंचे । उस बूढ़े आदमी ने बताया था कि सर्वेश की बूढ़ी मां अभी भी जिंदा है । अगर उनके साथ वही हुआ तो नहीं नहीं ।
कुछ अंदर जाकर एक कमरे में टॉर्च जलाते ही उन्होंने जो दृश्य देखा उसका वर्णन करना भी बहुत ही कठिन है । बूढ़ी महिला के सीने पर जो बैठा हुआ है वह मानव है या कोई जानवर व कुछ दूसरा नहीं बताया जा सकता । लंबा सा हाथ बूढ़ी महिला की मांस को फाड़कर खा रहा था ।
पूरे कमरे में चारों तरफ लाल खून फैला हुआ था । आसपास का वातावरण एक दुर्गंध से भर गया था । यह दुर्गंध यशपाल पहचानतें हैं ।
" सर्वेश "
आवाज नरेंद्र के मुँह से निकलते ही उस भयानक जानवर ने उनकी तरफ चेहरा घुमाया । भयानक और वीभत्स चेहरा , नाक और आँख कुछ भी नहीं है ।
उसकी जगह कुछ है तो केवल बड़े बड़े दाँत । यह भयानक दृश्य देखने के बाद उन दोनों में से किसी को भी गोली चलाने की हिम्मत नहीं हुई ।
उस जानवर के दरवाजे की ओर बढ़ते ही यशपाल नरेंद्र के हाथ को पकड़कर बाहर की ओर भागे ।
जल्दी से सामने के दरवाजे को पार कर वो दोनों बाहर कच्चे रास्ते पर दौड़ते रहे । पीछे से उस समय भी उस भयानक जीव की आवाज सुनाई दे रही थी । लगभग 20 मिनट तक दौड़ने के बाद दोनों गांव के उत्तर की ओर एक खुली जगह पर पहुंचे । दोनों की हाँफते - हाँफते हालत खराब है ।
सांस की गति कम होने के बाद नरेंद्र बोला - " सर यह किसी मनुष्य का काम नहीं है । यह केस हमारे द्वारा सॉल्व नहीं होगा । बड़े ऑफिसर को बताने से हमें पागल समझा जाएगा और हमारी नौकरी भी जा सकती है ।
इससे अच्छा जो इन सब बातों को जानते हैं उन्हें ही
बुलाना ठीक रहेगा । "
अब यशपाल बोले - " किसकी बात बोल रहे हो तुम । "
" तांत्रिक "
" लेकिन इस समय मैं तांत्रिक कहां से बुलाऊंगा । "
" नहीं सर आप को खोजने की कोई जरूरत नहीं ।
जब मैं छोटा था हमारे घर में एक तांत्रिक आए थे । घटना क्या था यह मुझे याद नहीं लेकिन शायद घर पर कोई कालदोष लगा था । पिताजी से सुना था कि उस तांत्रिक ने सब कुछ ठीक कर दिया था । उनका पता मेरे पिताजी के पास होगा । उनको एक बार बुला लिया जाए तो कैसा रहेगा । "
यशपाल ने कुछ देर इस बारे में सोचा और फिर बोले - " कौन हैं ये तांत्रिक ? "
" सर् , उनका नाम है तांत्रिक मसाननाथ "……

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पिछले 2 दिनों से लगातार बारिश हो रही है । बारिश एक बार भी थमने का नाम नहीं ले रहा कभी छिट - पुट तो कभी मूसलाधार । अगर ऐसे ही चलता रहा तो जयरामपुर गांव में बाढ़ जल्द ही आएगी । लेकिन देवाशीष जी को इस बारे में सोचने का समय नहीं है क्योंकि इससे उन्हें किसी तरह की असुविधा नहीं हो रहा । लेकिन असली समस्या कहीं और है । उस मुख्य घटना पर जाने से पहले कुछ बातों को जानना होगा ।

लोग बताते हैं कि 18 वीं शताब्दी के अंत में जमींदार जयराम सारंगी को उत्तराधिकार के रूप में किशनगंज के पास बहुत सारा जमीन प्राप्त हुआ था । बाद में उन्होंने वहां पर कुछ गरीब लोगों को रहने के लिए आदेश दे दिया । देखते-देखते कुछ ही वर्षों में वहाँ लोगों की संख्या दोगुनी हो गई । खाने की जरूरत के लिए वहां के लोगों ने खेती करना शुरू कर दिया । जयराम सारंगी के मरने के बाद उनके स्मृति के रूप में इस जगह का नाम जयरामपुर रखा गया । वही जयरामपुर आज एक गांव है जिसका मेरुदंड कृषि है ।
आज से लगभग 60 वर्ष पहले देवाशीष के पिता अपने परिवार के कुछ सदस्यों को लेकर बांग्लादेश ( उस समय पाकिस्तान ) से इस देश में चले आए थे । अपने पिताजी से देवाशीष ने सुना था कि उस रात भयानक बांग्लादेश के साम्प्रदायिक दंगे में देवाशीष के दो दीदी मारे गए थे । बहुत कोशिश करने के बाद भी अपने दोनों लड़कियों को उन्होंने नहीं बचा पाया था । देवाशीष उस समय बहुत ही छोटे थे । उसकी मां कलावती ने अपना परिचय नूरा बेगम बताकर देवाशीष के जान को बचाया था ।
इसके बाद भाईजान नजमुल ने अपने जान की परवाह किए बिना उस रात देवशीष के परिवार को इस देश में आने के लिए सहायता किया था । हालांकि बाद में नजमुल मारा गया ।
इस देश में आने के बाद एक ही रात में वे सभी मध्यमवर्गीय परिवार से भिखारी में परिवर्तित हो गए थे । कुछ महीनों बाद जयराम सारंगी की कृपा से यहां पर देवाशीष के परिवार ने जीवन यापन शुरू किया । जयरामपुर के उत्तरी तरफ एक छोटी सी जगह उन्हें रहने के लिए दिया गया । दिन - रात मेहनत करके देवाशीष व उनके पिता आमदनी बढ़ाते रहे । छोटी झोपड़ी धीरे-धीरे पक्के घर में परिवर्तित हुआ । इस समय जयरामपुर गांव में दो तल्ले का घर केवल देवाशीष के पास ही है ।
बाकी गांव वाले अभी भी अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं । अब असली घटना बताता हूं ।
दो-तीन सप्ताह पहले की बात है । एक दिन दोपहर को देवाशीष के घर में एक अद्भुत घटना घटी । देवाशीष की मां कलावती देवी दोपहर को खाने के बाद लेटी हुई थी । अचानक उन्हें ऐसा लगा छत से एक छोटा बच्चा माँ - माँ कहकर बुला रहा है । एक बार उन्होंने सोचा उनका पोता नरेंद्र है लेकिन फिर उन्हें ख्याल आया कि नरेंद्र तो घर पर नहीं है । कुछ दिन पहले ही वह अपनी मां के साथ मामा के घर गया है । जल्दी से उस कमरे के बाहर आते ही उन्होंने देखा देवाशीष के पिता वहां पर खड़े होकर एकटक छत वाले सीढ़ी को देख रहे हैं ।
कलावती देवी को अब कुछ संदेह हुआ । अपने पति से क्या हुआ पूछते ही जो बातें देवशीष के पिता ने बताया उसे सुनकर वो भी सोचने के लिए मजबूर हो गई ।
उन्होंने बताया - " मैं यहां बाहर कुर्सी पर बैठा था । अचानक मुझे ऐसा लगा 3 - 4 छोटे बच्चे छत वाले सीढ़ी से ऊपर चले गए । बच्चे दिखने में बहुत ही सुन्दर थे , उनके उम्र यही 4 - 5 साल होगा ।
आश्चर्यजनक इस घटना को देखकर जल्दी से कुर्सी छोड़ यहाँ पर आते ही देखा कि छत वाले सीढ़ी का दरवाजा बंद है लेकिन वो बच्चे आखिर गए कहां ।
और तुम्हें बुलाने जा रहा था लेकिन तुम खुद ही बाहर निकल आई । "
सुनने के बाद कलावती देवी ने भी अपने द्वारा सुने उस आवाज के बारे में बताया ।
उस दिन के लिए यहीं पर सबकुछ समाप्त हो गया । लेकिन एक सप्ताह बाद और एक घटना ने उन्हें परेशान किया । नरेंद्र उस समय अपने मामा के घर से लौट आया था । सुबह के समय घर में काम करने वाली लड़की रूपा छत पर किसी काम से गई तो उसने वहाँ पर जगह-जगह खून के छींटे देखे । यह देखकर वो जल्दबाजी में सीढ़ी से नीचे उतरने लगी और अचानक पैर फिसलने से नीचे गिर गई ।
इसके बाद रूपा को होश नहीं आया । डॉक्टर का कहना है कि यह एक सडेन स्ट्रोक है लेकिन देवाशीष के पिता इसे नहीं मानते ।
कई बातों की तरह यह घटना भी सभी के दिमाग़ से कुछ ही दिनों में निकल गया । लेकिन परसों रात को कुछ हुआ उससे पूरा परिवार सकते में आ गया । इस घर में कुछ तो हुआ है क्योंकि सब कुछ पहले जैसा नहीं है । उस दिन रात को नरेंद्र अपने दादी के पास सो रहा था ।
रात की उस समय 2 बज रहे होंगे अचानक नरेंद्र को ऐसा लगा कि उसकी मां छत से उसे बुला रही हैं । वह बिस्तर छोड़कर उठते ही उसकी दादी यानि कलावती देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया । उन्होंने कहा कि इस आवाज को उन्होंने पहले भी सुना है । इधर नरेंद्र के मां को भी सुनाई दिया कि उन्हें कोई छत से माँ -माँ कहकर बुला रहा है । नरेंद्र के पिता यानी देवाशीष उस समय गहरी नींद में थे । उन्हें जगाकर इस बारे में बताते ही वो कमरे से बाहर निकले । और तभी उन्हें ऐसा लगा कि कुछ बच्चे सीढ़ी से ऊपर चले गए ।
जल्दी से सीढ़ी की ओर जाते ही वो चौंक गए क्योंकि सीढ़ी वाला दरवाजा तो बाहर से बंद है । यह घटना क्यों हो रहा है किसी को भी समझ में नहीं आया । अगले दिन सुबह चाय के टेबल पर इस बारे में बातचीत हुई ।
देवाशीष के बूढ़े पिता का कहना है - " इस घर में कोई भयानक दोष लगा है । उन बच्चों को केवल देव ने ही नहीं मैंने भी देखा था । बहु व बच्चे उस समय अपने घर गए थे । वो सभी डर जाएंगे इसीलिए मैंने कुछ नहीं बताया । अब उपद्रव बढ़ रहा है । मसाननाथ को एक बार बुलाना होगा । "
उस दिन शाम को देवाशीष के पिताजी ने एक चिट्ठी लिखकर हरिहर से पोस्ट करवाया । इस चिट्ठी के ग्राहक हैं स्वयं तांत्रिक मसाननाथ ।
तांत्रिक के साथ देवाशीष के पिताजी का क्या संपर्क है यह बताना बहुत ही कठिन है । बातों से एक दूसरे के दोस्त मालूम होतें हैं परंतु दोनों में उम्र का फर्क लगभग 40 साल है । नरेंद्र के दादाजी का उम्र 70 पार है लेकिन उनके दोस्त मसाननाथ अभी प्रौढ़ दिखते हैं । सफेद चेहरा , उज्वल शरीर , सिर के बाल कंधे तक लम्बे एवं बड़ी - बड़ी दाढ़ी में भी वो वृद्ध नहीं दिखते ।
चिट्ठी भेजने के 3 दिन बाद मसाननाथ गांव में पहुंच गए । इधर घर का छोटा लड़का नरेंद्र बचपन से ही तंत्र - मंत्र की कहानियों में रूचि रखता है ।
बाद में वह समझ गया था कि सभी तांत्रिक घूमन्तु नहीं होते । कुछ ऐसे भी तांत्रिक हैं जो साधारण मानव की तरह एक निश्चित स्थान पर रहते हैं । जिनके घर पर चिट्ठी भेजने पर उत्तर भी आता है ।
नरेंद्र ने देखा कि घर में प्रवेश करते ही मसाननाथ ने उसके पिता से 1 किलो पीली सरसों लाने के लिए कहा । इसके बाद मंत्र रूपी सरसों से घर के चारों तरफ एक लकीर बनाकर गृह बंधन किया गया । इसके बाद किस तरह नरेंद्र के घर का दोष दूर हुआ इससे वह अनजान है क्योंकि अगले दिन ही नरेंद्र के दादाजी ने उन्हें अपने नाना के घर भेज दिया । वंश की एकमात्र लड़के को कोई हानि हो यह उन्होंने नहीं चाहा । मसाननाथ भी यही चाहते थे । इस बात से नरेंद्र बहुत ही गुस्सा था लेकिन अपने दादा जी से कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई ।
मसाननाथ ने नरेंद्र को अपने पास बुला कर कहा था ।
- " यज्ञ शुरू होने के बाद दुष्ट शक्ति यही घूमेंगे और उनका आहार क्या है जानते हो तुम्हारे जैसे छोटे लड़के इसीलिए इस वक्त तुम्हारा यहां नहीं रहना ही सही है । लेकिन तुम चिंता मत करो मेरा मन कह रहा है भविष्य में हम फिर मिलेंगे । हम दोनों मिलकर किसी भयानक शक्ति का सामना करेंगे लेकिन तुम डरोगे तो नहीं । "……..

अगला भाग क्रमशः ...


@rahul