tantrik masannath - 18 in Hindi Horror Stories by Rahul Haldhar books and stories PDF | तांत्रिक मसाननाथ - 18

तांत्रिक मसाननाथ - 18

यमहि मन्दिर का अभिशाप ( 8 )


मसाननाथ जब इन सब पर व्यस्त थे उस समय शिवपुर गांव के इस ओर एक दूसरी समस्या आ गई । एक अनजाना व्यक्ति शराब लेकर मंदिर में जाने की कोशिश कर रहा था और इसी कारण गांव वाले इसपर बिगड़ गए ।
आसनसोल स्टेशन से शिवपुर गांव आते ही बाएं तरफ पड़ता है पंडित बस्ती और वहीं पर गांव का एकमात्र भगवान शिव का मंदिर है । उसी मंदिर के सामने खड़े होकर कुछ लोग चिल्ला रहे हैं ।
झगड़े का कारण जो व्यक्ति है उससे हमारा परिचय कुछ ही देर पहले हुआ है ।
लोगों के बार - बार पूछताछ के कारण वो बोले - " अरे मैं बच्चा चुराने वाला नहीं हूं । मेरा नाम तांत्रिक कालीचरण है एक जरूरी काम के लिए इस गांव में आया हूं काम पूरा होते ही मैं लौट जाऊंगा । "
आसनसोल स्टेशन से शिवपुर गांव पहुंचने में कालीचरण को बहुत दिक्कतें आई । रास्ता खराब ऊपर से कोई बैलगाड़ी भी नहीं दिखा इसीलिए कालीचरण को इतनी दूर चल कर आना पड़ा ।
पंडित बस्ती के पास आते ही उन्हें यह मंदिर नजर आया । भगवान से आशीर्वाद लेने के लिए उस ओर बढ़ते ही अनजाने व्यक्ति को देखकर गांव के बच्चे हो - हल्ला करने लगे । लोगों के पकड़ने के बाद कालीचरण के बैग से जब शराब निकला तब उनकी शंका और भी बढ़ गई । सभी उनको बच्चे चुराने वाला समझ रहे थे । इसके बाद ही शुरू हुआ पूछताछ , गांव वालों के पूछताछ से परेशान होकर कालीचरण बोले - " मैं कह तो रहा हूं केवल उस शैतानी शक्ति का पता लगाकर चला जाऊंगा । एक बार मंदिर के अंदर तो जाने दो । "
लोगों को कुछ भी नहीं समझ आया और उन्होंने इस अनजाने व्यक्ति को धक्का देकर वहाँ से निकाल दिया । इतने व्यक्तियों से कालीचरण अकेले नहीं लड़ पायेगा यह सोचकर वो गांव के दूसरे रास्ते पर चल पड़े ।
कुछ दूर चलने के बाद ही अचानक एक कबूतर उनके कंधे पर बैठ गया । कालीचरण सिर घूमाकर उस कबूतर को देखना चाहते थे लेकिन तब तक बहुत देर हो गया था । उस कबूतर ने कालीचरण के सामने कुछ फेंककर फिर से आसमान में उड़ गया ।
पंखों के आवाज के अलावा कालीचरण को और कुछ भी समझ नहीं आया । इसके बाद उन्होंने देखा कि सामने रास्ते पर एक ताबीज गिरा हुआ है ।
शायद वह कबूतर यही देने आया था । कालीचरण समझ गए कि कोई उन्हें अपनी बात बताना चाहते हैं । उन्होंने सामने पड़े उस ताबीज उठाया और नाखून द्वारा उसे खोला । ताबीज़ खुलते ही उसके अंदर से एक कागज का टुकड़ा निकला । कालीचरण जान गए कि इसी कागज में किसी का संदेश है ।
कागज को खोलकर कालीचरण उसे पढने लगे उस
कागज में एक बेढंग संस्कृत श्लोक लिखा हुआ था ।
"युद्धम आरम्भ जातो , वीरणं सम्मुखे शस्त्रम् पतितानी
सन्ति । परन्तु जस्य मनुषि प्रतिहिंशाया अग्नि नास्ति तस्य हस्ते वीर श्रेष्ठस्य कीर्तिध्वजः भविष्यति ।। "
उस श्लोक का अर्थ हालांकि उन्हें नहीं समझ में आया और वो उस कागज को वहीं फेंक आगे बढ़ गए ।
कालीचरण जितना गांव के अंदर प्रवेश करते गए उतना ही उन्हें नकारात्मक शक्ति का आभास होने लगा । उन्होंने अनुभव किया कि इस नकारात्मक शक्ति का तरंग दूर नदी के बीच से चला आ रहा है ।

उधर दोपहर होते ही तांत्रिक मसाननाथ मणिप्रसाद, दिनेश और नरेंद्र को साथ लेकर अजय नदी के किनारे पहुंचे । नदी के किनारे दो छोटे नाव बंधे हैं उसी में से एक दिनेश का है । नाव पर चढ़ने से पहले दिनेश ने एक बार अपने बात को फिर याद दिलाया । मसाननाथ ना चाहते हुए भी उसपर सहमत हुए । इसके बाद तेजी से नाव सामने बीच नदी में खड़े मंदिर की ओर बढ़ चली । मसाननाथ ने ध्यान दिया कि उस बार लालू माझी जिस पथ से मंदिर लेकर गया था दिनेश उस तरफ नहीं जा रहा । इसका कारण पूछते ही दिनेश ने बताया कि वह सभी समय जहां से जा रहे हैं वहां मगरमच्छ का खतरा ज्यादा नहीं है ।
इसी बीच नरेंद्र बोला - " तांत्रिक बाबा मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा । जरूरी काम है कहकर आपने मुझे बुला लिया और साथ में एक टॉर्च भी लाने के लिए कहा । अब नाव से हम कहाँ जा रहे हैं ? "
मसाननाथ ने एक बार दिनेश की ओर देखा वह गाना गाते हुए नाव चलाने में व्यस्त था ।
मणिप्रसाद भी चुपचाप बैठे थे । मसाननाथ ने धीमी आवाज़ में नरेंद्र को सब कुछ बताया । नरेंद्र को कुछ बातों पर विश्वास हुआ और कुछ बातों पर नहीं । जिसमें वह खाना बनाने वाली मौसी के बारे में मानने को तैयार नहीं । हालांकि इससे मसाननाथ को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अगर ताकतवर कोई काम करना पड़ा तो नरेंद्र की जरूरत है ।
कुछ ही देर बाद ही सूर्य पश्चिम की ओर ढलने लगा था । नाव मंदिर के दीवार से टकराकर रुका । पहले मसाननाथ फिर मणिप्रसाद ,नरेंद्र एवं दिनेश ने मंदिर के फिसलन भरे पत्थर पर पैर रखा । इसके बाद सभी मंदिर के उस चपटी जगह पर पहुंचे जहां मसाननाथ ने त्रिकाल यज्ञ किया था । यहां तक ही सभी जानते हैं इसके आगे का रास्ता किसी को भी नहीं मालूम है ।
मसाननाथ ने मणिप्रसाद से पूछा - " पंडित जी मंदिर के अंदर जाने के लिए कोई गुप्त रास्ता है ? "
" हां है लेकिन आप निश्चित है कि मंदिर के अंदर कोई खतरा नहीं है । "
" नहीं है यह सोचकर हम यहां पर नहीं आए इसीलिए अगर कोई रास्ता है तो जल्दी बताइए । "
मणिप्रसाद ने कुछ देर सोचा फिर उत्तर दिया -
" आप सभी थोड़ा बगल होकर खड़े हो जाइए मैं देखता हूं । "
यह बोलकर मणिप्रसाद मंदिर के शिखर पर बने एक दीवार की ओर गए और उस दीवार के एक - एक पत्थरों को गिनने लगे । कुछ देर बाद एक विशेष पत्थर को दबाते ही मसाननाथ के सामने एक बड़ा पत्थर खुल गया । और तुरंत उस गुफा से एक सुगंधित हवा उनके चारों तरफ फैल गया ।
मसाननाथ चिल्लाकर बोले - " सभी अपने मन को नियंत्रण में रखो । यह सुगंध अभिशापित है । उस सुगंध में खुद को मत खो देना । "
लेकिन तब तक सभी धीरे-धीरे उस गुफा रुपी गड्ढे में उतरने लगे । मसाननाथ समझ गए कि ज्यादा समय नहीं है जो करना है जल्दी करना होगा ।
मसाननाथ ने अपने पास से मंत्र वाला हल्दी हाथ में लेकर आगे बढ़े और चलते हुए सभी के माथे पर एक तिलक लगा दिया । अचानक सभी मानो होश में आ गए । अब तक वो क्या कर रहे थे मानो उन्हें पता ही नहीं ।
मसाननाथ बोले - " नरेंद्र टॉर्च जलाओ हम सभी अब गड्ढे में नीचे जाएंगे । पंडित जी आपको भूलभुलैया का समाधान याद तो है । "
मणिप्रसाद के हाँ कहते ही मसाननाथ के साथ सभी आगे बढ़ चले । चार सीढ़ी उतरने के बाद अचानक मणिप्रसाद बोले - " सभी रुक जाओ पांचवी सीढ़ी पर कोई भी पैर मत रखना । इस पर पैर रखते ही पत्थर का द्वार बंद हो जाएगा । फिर हम यहां से निकल नहीं पाएंगे क्योंकि दरवाजे को खोलने के लिए बाहर उस विशेष पत्थर को दबाना होगा । और हमारे वंश के अलावा और कोई दूसरा उस पत्थर को दबाने से यह दरवाजा नहीं खुलेगा । क्योंकि दरवाजा खोलने के लिए एकमात्र चाभी हमारे वंश के लड़कों का हस्तरेखा ही है । "
मणिप्रसाद के कहे अनुसार सभी उस पाँचवी सीढ़ी पर पैर रखे बिना ही आगे बढ़ चले । सभी मणिप्रसाद के उद्देश्य से चलते रहे ।मणि पंडित उंगली गिनकर चल रहे थे पीछे नरेंद्र के हाथ में टॉर्च और उनके पीछे मसाननाथ व दिनेश । कुछ दूर आगे बढ़ते ही अचानक टोर्च बंद हो गया ।
" क्या हुआ नरेंद्र ? "
अंधेरे में नरेंद्र की आवाज़ सुनाई दिया ।
" पता नहीं तांत्रिक बाबा टॉर्च नहीं जल रहा । "
" जो जहां पर भी है वहीं खड़ा रहे । " बोलकर मसाननाथ ने आँख बंद करके मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया लेकिन फिर भी टोर्च नहीं जला ।
मसाननाथ बोले - " भगवान का साथ यहीं तक था यहां से मेरा कोई भी मंत्र काम नहीं करेगा । "
मणिप्रसाद चिल्लाकर बोले - " मतलब , हम यहां पर क्यों आए हैं ?
" मैंने जैसा सोचा था वैसा नहीं हो रहा । सभी थोड़ा पीछे चलिए । "
मसाननाथ के कहते ही सभी थोड़ा पीछे हो गए । तुरंत ही टोर्च जलने लगा ।
यह देखकर मसाननाथ बोले - " हाँ समझ गया इस मंदिर के अंदर जो नकारात्मक शक्ति है वो इतनी शक्तिशाली है कि उसका प्रभाव बहुत दूर तक है । "
मणिप्रसाद बोले - " ये सब उसी यमहि की शक्ति है । यमहि इसी मंदिर के अंदर है । "
मणिप्रसाद की बात समाप्त होने से पहले ही टॉर्च फिर से बंद हो गया ।
" तांत्रिक बाबा यहां तक तो यमहि की शक्ति नहीं पहुंच रही थी तो टॉर्च जलना क्यों बंद हो गया ? "
" नरेंद्र जल्दी से भागो मुझे लगता है कि यमहि हमारी ओर ही बढ़ रहा है । "
मणिप्रसाद कांपते हुए गले से बोले - " हां किसी के फिसफिसाहट की आवाज सुनाई दे रहा है । चलिए यहां से भाग चलते हैं । "
सभी पीछे की ओर दौड़ने लगे । मसाननाथ ने महसूस किया कि कोई जानवर उनके तरफ बढ़ रहा है । जल्दबाजी के कारण पांचवी सीढ़ी के बारे में किसी को याद नहीं और किसी के पैर ने उस पांचवे पत्थर को दबा दिया । तुरंत ही पत्थर का दरवाजा बंद होने लगा । नरेंद्र ने टॉर्च फेंककर बंद होते पत्थर को दबाए रखा ।

मसाननाथ ने मणिप्रसाद को लगभग गोंद में उठाकर बाहर कूद पड़े । इसी बीच दिनेश भी बाहर निकल आया । उधर नरेंद्र दो पत्थरों के बीच दबने वाला है । यह देखकर मसाननाथ जल्दी से नरेंद्र की ओर भागे ।
" नरेंद्र मेरा हाथ पकड़ो और मेरे तीन गिनने ही पत्थर को छोड़ देना ।"
मसाननाथ के इस बात को शायद नरेंद्र ने नहीं सुना । लेकिन जब उसने देखा कि मसाननाथ अपना हाथ आगे बढ़ा रहे हैं तब उसने पत्थर को एक हाथ से दबाकर दुसरे हाथ को बाहर निकाल दिया । मसाननाथ ने उस हाथ को पकड़ जोर से चिल्लाकर बोले - " 1,2,3 "
तुरंत ही नरेंद्र को खींचने के कारण दोनों बाहर जाकर
गिरे ।

अगला भाग क्रमशः...


@rahul