tantrik masannath - 20 in Hindi Horror Stories by Rahul Haldhar books and stories PDF | तांत्रिक मसाननाथ - 20

तांत्रिक मसाननाथ - 20

यमहि मन्दिर का अभिशाप ( अंतिम )


कितना समय बीता है इस पर किसी का ध्यान नहीं । अचानक मंदिर के नीचे पानी में एक आवाज सुनाई देने लगा । कालीचरण ने मसाननाथ से इशारों में कुछ कहा । इसके बाद मसाननाथ के आंख बंद करते ही सुरक्षा चक्र और भी प्रज्वलित हो गया ।
उधर मंदिर का शिखर एक काले तरल से भर गया । उस काले तरल ने धीरे-धीरे सुरक्षा चक्र को खत्म करना शुरू कर दिया ।
सभी ने आश्चर्य होकर देखा कि दिनेश का मृत शरीर पानी से ऊपर हवा में तैर रहा था । और मंदिर के उस कोठरी वाले गड्ढे से फिर हिसहिस की आवाज सुनाई देने लगी ।
मसाननाथ डरे हुए आवाज से बोले - " यमहि आ रहा है सभी तैयार हो जाओ । "
बात समाप्त होने से पहले ही उस गुफा से दो हाथ बाहर निकल आए । इसके बाद फिर और चार हाथ दिखाई दिए । 6 हाथों के बाहर निकलते ही तीन कंकाल रुपी सिर दिखाई दिया । कुछ देर बाद ही यमहि के शरीर को भी सभी ने देखा । कितना विभत्स और भयानक चेहरा है उसका , जिराफ की तरह ऊंचा और चार पैर वाले उस जीव के सीने पर तीन लोगों का नग्न शरीर उल्टा होकर झूल रहा था । वह तीनों शरीर सजीव थे और उनके कमर उस भयानक जानवर के माथे में समाया हुआ था । यमहि के माथे पर बड़े बड़े सींग भी थे ।
यमहि के बाहर निकलते ही दिनेश का मृत शरीर अपने आप मंदिर के शिखर की ओर उड़ गया ।
कालीचरण ने देखा दिनेश के मृत शरीर क्या कुछ अंग हिल रहा था अर्थात दिनेश अभी मरा नहीं है । लेकिन उसका मरना तय है । कुछ देर बाद उसका हाथ पैर सुन्न होते ही दिनेश के शरीर से एक नीला धुआं निकल आया । धुआं न बोल इसे कोई विशेष शक्ति कहा जा सकता था । उधर यमहि के गले से लटकते तीन सिर उस नीले धुएँ को चूसते रहे और यमहि नामक जीव दिनेश के शरीर को फाड़कर उसके मांस को खाता रहा ।
मसाननाथ ने कालीचरण से कहा - " कुछ समझे कालीचरण कि यह जानवर इतना शक्तिशाली क्यों है । उसके सिर से जो तीन बड़े पुरोहित झूल रहे हैं वो आत्मा को खाते हैं और यह जानवर अपने प्राकृतिक मुंह से मांस व हड्डी खाता है । मनुष्य के आत्मा को भी यमहि शिकार करता है इसीलिए वह जिसे भी मारता है उसके बारे में सभी भूल जाते हैं । कोई पहले भूलता है कोई बाद में , जिसके मस्तिष्क में जितनी शक्ति है वो उसी तरह घटना को याद रखता है । इसलिए सभी भूल जाने के बावजूद साधक व साधिका लड़के के बारे में याद रख पाए ।
" अब इसे रोकने का कोई उपाय ? "
" उपाय केवल एक ही है क्योंकि पीतांबर चक्र ज्यादा समय तक नहीं रहेगा मुझे अभी त्रिकाल यज्ञ करके पूरे शिवपुर को दुसरे जगत में लेकर जाना होगा और वहीं मैं यमहि को बंदी बनाऊंगा । "
यह कहते हुए मसाननाथ चक्र के बीच में ही बैठ गए । इधर यमहि ने भी अपने ऊपर आने वाले खतरे को महसूस कर लिया है । उस जीव ने एक भयानक आवाज निकाल कर मसाननाथ की ओर दौड़ पड़ा ।
यह देख मणिप्रसाद और नरेंद्र सुरक्षा चक्र से बाहर भागे लेकिन कालीचरण अपने जगह पर खड़े रहे । पहले धक्के में यमहि पीतांबर सुरक्षा चक्र में प्रवेश नहीं कर पाया । लेकिन कुछ देर में ही काला तरल चारों तरफ बढ़ गया और तुरंत ही पीतांबर चक्र का पीला आभा खत्म हो गया । मसाननाथ तुरंत खड़े हो गए ।
" यह असंभव है । अब हमें यहां से भागना होगा । "
बोलकर वो पीछे की तरफ भागे । इधर कालीचरण चक्र के अंदर अब भी खड़े थे । आंख बंद करके उन्होंने फिर अपने नकारात्मक शक्ति के मंत्र को पढ़ना शुरू कर दिया । पीछे से मसाननाथ की आवाज सुनाई दी ।
" कालीचरण वहां से हट जाओ , उस जीव के पास आते ही कोई ईश्वरीय मंत्र काम नहीं करेगा । "
यह सुनते ही कालीचरण का शरीर कांप उठा । लेकिन तब तक बहुत देर हो गया था । तेजी से एक जोड़े सींग ने कालीचरण के पेट व सीने पर वार कर दिया । सींग के प्रहार से कालीचरण हवा में उछल गए । फिर एक प्रहार से कालीचरण हवा में उसके माथे पर लटके रहे और गले में लटकते एक शरीर ने उन्हें नींचे फेंक दिया ।
इसके बाद कुछ दूर जाकर जीव ने दोनों पैर उठा अपने विजय की घोषणा की । मसाननाथ नींचे गिरे हुए कालीचरण के अधमरे शरीर की ओर जल्दी से भागे ।
मसाननाथ का पूरा हाथ खून से भर गया । उन्होंने देखा कालीचरण के पेट व सीने में कई जगह चोट लगी थी । किसी तरह कालीचरण ने आंख उठाकर यमहि के तांडव दृश्य को देखा और बोले - " आप सभी यहाँ से भाग जाइए वरना मारे जाएंगे । मैं अब नहीं बचूंगा । "
" नही कालीचरण तुम्हें ऐसी अवस्था में छोड़कर मैं कहीं नहीं जाने वाला । "
" पागलपन मत कीजिये पीछे देखिए उधर यमहि फिर से इधर आ रहा है । "
कालीचरण के बात को सुनकर मसाननाथ को कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि दोस्त कालीचरण के अधमरे शरीर को छोड़कर वो नहीं जाने वाले ।
उधर यमहि ने अपने तांडव को रोक एक पैर घिसते हुए फिर से आक्रमण करने वाला था । मसाननाथ समझ गए कि अब उनकी मृत्यु निकट आ गई है । लेकिन कालीचरण को इस अवस्था में छोड़कर वो नहीं जा सकते ।
यमहि ने दौड़ना शुरू किया । मसाननाथ ने मृत्यु प्रहार सहने के लिए अपने आँखों को बंद कर लिया । लेकिन अचानक से एक सांड की आवाज सुनाई दी । यह सुनकर यमहि एक बार रुका लेकिन वह फिर मसाननाथ की ओर बढ़ने लगा । जिस वक़्त उसके सींग मसाननाथ पर प्रहार करने वाले थे उसी समय ना जाने कहां से आए एक जोड़े सींग ने उसे रोका । मसाननाथ आंख खोलकर देखा कि एक बड़े से सांड ने यमहि का रास्ता रोक दिया है । और उसके मुंह में एक सिंदूर लगा हुआ त्रिशूल है ।
दोनों तरफ के सींग टकराने से चारों तरफ का वातावरण कांप उठा । वह सांड अपने प्रहार से यमहि को पीछे गड्ढे की ओर लेकर जा रहा है ।
" नंदी , स्वयं देवदिदेव के शिष्य नंदी महाराज । "
दर्द में भी मसाननाथ के बात को सुन कालीचरण के चेहरे पर हंसी खिल गया ।
" नीला मनुष्य , मेरा नीला मनुष्य "
तुरंत ही उन्हें याद आया गरुड़ा के द्वारा दिए गए उस बेढंग श्लोक का अर्थ ।
"युद्धम आरम्भ जातो ,वीरणं सम्मुखे शस्त्रम् पतितानी सन्ति । परन्तु जस्य मनुषि प्रतिहिंशाया अग्नि नास्ति तस्य हस्ते वीर श्रेष्ठस्य कीर्तिध्वजः भविष्यति ।। "
अर्थात , युद्ध शुरू हो गया है । वीरों के सामने शस्त्र यानि त्रिशूल गिरा है । जिसके मन में प्रतिशोध की हिंसा नहीं है उनके हाथों में ही विजय ध्वज लहराएगा ।
कालीचरण समझ गए कि इसी त्रिशूल द्वारा यमहि को मारा जा सकता है । लेकिन कालीचरण का मन प्रतिशोध की आग से भरा हुआ है इसीलिए इस महान कार्य के योग्य वो नहीं हैं । यहां उपस्थित सभी में केवल मसाननाथ के मन में ही किसी के लिए प्रतिशोध की हिंसा नहीं है । इसीलिए यमहि को कोई खत्म कर सकता है तो वह तांत्रिक मसाननाथ ही हैं ।
सब कुछ समझ आते ही कालीचरण ने मसाननाथ से कहा - " महाकाल के त्रिशूल को केवल आप ही उठा सकते हैं । मेरा मन प्रतिशोध की हिंसा से जल रहा है और निवारण मुझे नहीं चाहिए क्योंकि मरने के बाद भी जिन्होंने मेरे अतीत के सुंदर दिनों को राख कर दिया उन्हें नहीं छोडूंगा । इस समय मैं कुछ नहीं कर सकता । आप जाकर नंदी महाराज की सहायता कीजिए । "
यही बोलते हुए कालीचरण बेहोश हो गए ।
मसाननाथ ने अपने मन में एक दृढ़ संकल्प लेकर खड़े हो गए । वो यमहि की ओर दौड़ पड़े ।
उधर नंदी महाराज ने अपने प्रहार से यमहि को कमजोर कर दिया था । मसाननाथ को आते देख सांड ने त्रिशूल को नीचे रख दिया । मसान नाथ ने जल्दी से त्रिशूल को उठाकर यमहि पर वार करने लगे । यमहि उस वक़्त भी नंदी महाराज के साथ लड़ने में व्यस्त था । लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि त्रिशूल से यमहि को कोई फर्क नहीं पड़ रहा ।
मानो एक काले तरल ने यमहि के चारों तरफ एक सुरक्षा कवच बना दिया है ।
मसाननाथ ने आसमान की ओर देखकर चिल्लाया - " हे महाकाल ! हमारी रक्षा कीजिए । हमें कोई रास्ता दिखाइए । "
अचानक त्रिशूल के तीन कोने चमक उठे और साथ ही न जाने कहां तीन बार बिजली गिरी ।
" समझ गया त्रिशूल के तीन कोने से उन तीन नरपिशाच का वध करना होगा । "
फिर से त्रिशूल लेकर मसाननाथ यमहि की ओर दौड़ पड़े ।
दूर से मणिप्रसाद चिल्लाकर बोलते रहे,
- " सैकड़ो वर्ष के अभिशाप से हमें मुक्त कीजिए । "
मसाननाथ छलांग लगाकर उस सांड के ऊपर चढ़ गए । यमहि की गली में लटकते तीन विभत्स नरमुंड आगे बढ़ना चाहते हैं लेकिन नंदी महाराज के सामने उनकी एक ना चल रही । मसाननाथ ने देवदिदेव को शरण करते ही त्रिशूल आकार में थोड़ा बड़ा हो गया । देर न करते हुए उन्होंने त्रिशूल से उन तीन नरपिशाच के सिर में वार कर दिया ।
यमहि के आवाज़ से चारों तरफ का वातावरण कांप गया । लगातार बिजली गिरने की आवाज सुनाई देने लगी । मंदिर के सभी सभी पत्थर गिरने लगे ।
नदी की ऊँची लहरों ने मंदिर को अपने अंदर समाना शुरू कर दिया । मणिप्रसाद और नरेंद्र पहले ही पानी में गिर गए थे । कालीचरण भी नहीं दिखाई दिए लेकिन मसाननाथ एक हाथ से नंदी महाराज के सींग पकड़ त्रिशूल को अपनी जगह जमाए रखा ।
पर ऐसा ज्यादा देर तक नहीं रहा सामने एक तेज आवाज से बिजली गिरते ही वो भी बेहोश हो गए ।

मसाननाथ को जब होश आया तब वो अजय नदी के किनारे लेटे हुए थे । शरीर की पूरी ताकत से किसी तरह खड़े होकर उन्होंने देखा कुछ दूर ही तीन आदमी उल्टे होकर बेहोश पड़े हैं । जल्दी से वो वहां पर पहुंचे , पास पहुंचते ही उन्हें पता चला यह तीन व्यक्ति उनके साथ वाले ही हैं ।
पहले उन्होंने तांत्रिक कालीचरण को सीधा करके उनके सीने से गाना लगाकर कुछ सुनना चाहा ।
नहीं , चोट ज्यादा होने पर भी हृदय की धड़कन अभी तक चल रही थी अर्थात कालीचरण अभी जिंदा हैं । मसाननाथ ने सोचा गांव के दक्षिण तरफ उन्होंने एक जड़ी-बूटी देखा था उसके सहारे कालीचरण के घाव को ठीक करके उन्हें स्वस्थ कर देंगे ।
इधर मणिप्रसाद अभी बेहोश थे लेकिन नरेंद्र को होश आ गया था । वह कांपते हुए मसाननाथ की तरफ गया और बोला - " तांत्रिक बाबा हम तो लहरों की वजह से पानी में गिर गए थे फिर हम बच कैसे गए ? "
" नीला मनुष्य , तांत्रिक कालीचरण के नीले मनुष्य ने हमें बचाया । "

इस घटना के लगभग 1 महीने बाद की बात है । मसाननाथ के आयुर्वेदिक ज्ञान ने कालीचरण को पूरी तरह ठीक कर दिया । अब कालीचरण इतने स्वस्थ हैं की वो स्वयं चलकर अपने घर जा सकते हैं ।
इसीलिए आज दोनों तांत्रिक आज यहां से जाने के लिए सभी के सामने उपस्थित हुए । मणिप्रसाद जानते हैं कि उनके वंश परंपरा मैं प्रचलित सभी बातें व भविष्यवाणी सच था । लेकिन उस कर्तव्य से अब सभी मुक्त हो गए हैं । ऐतिहासिक अभिशाप अब खत्म हो चुका है । और यह संभव हुआ केवल इन दो तांत्रिकों की वजह से । सभी को प्रणाम करके दोनों तांत्रिक वहाँ से चल दिए ।…...

....समाप्त....

।। तांत्रिक मसाननाथ क्रमशः ।।।


@rahul