जीवन ऊट पटाँगा - 4 - मार्गरेट आने वाली हैं in Hindi Short Stories by Neelam Kulshreshtha books and stories Free | जीवन ऊट पटाँगा - 4 - मार्गरेट आने वाली हैं

जीवन ऊट पटाँगा - 4 - मार्गरेट आने वाली हैं

नीलम कुलश्रेष्ठ

उस दिन को कितने वर्ष हो गए होंगे ---चालीस के लगभग ? एक दो साल इधर या उधर --तब उसे विवाह के बाद यू पी से आये कुछ वर्ष ही हुए थे, पश्चिमी भारत, बम्बई या गोआ का रौब उस पर कम नहीं हुआ था। तब कहाँ थी ये ग्लोबलाइज़्ड दुनियाँ ? आज बच्चे विश्व की जानकारी का दम्भ भरते हैं, तब प्रदेशों के विषय में बहुत कम जानकारी होती थी। जब तेतीस साल बाद वड़ोदरा छोड़ने से पहले ख़बर मिल गई थी कि अनिल के कलीग मिस्टर शाबास, रिटायरमेंट के बाद गोआ लौट जाने वाले, वे नहीं रहे। उनकी पत्नी मारग्रेट भी शायद बचीं हो, उनका बेटा कहाँ होगा ? कैसी है ये ज़िंदगी जो लोग कभी हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा होते हैं, किस तरह ज़िंदगी उन्हें पीछे छोड़ती चली जाती हैं ---पता नहीं चलता। चालीस बरस पहले वह कैसी बौखलाहट में थी कि मार्गरेट उसके घर आने वालीं हैं ---ये दिन कभी कभी उसकी नज़रों में साकार होता रहता है -----

----- ऋतु ने एक बार सारे घर में घूम कर देखा, कहीं कोई गंवारपन नहीं दिखाई दिया । दीवार पर टंगी घड़ी तथा कलाकृतियाँ, खिड़की पर रखा नन्हा कैक्टस का गमला, बाहर रखे बोनसाई पौधे, सभी कुछ तो आधुनिक था । अब कोई घर देख कर यह नहीं कह सकता था कि घर में कोई पिछड़ापन है ।

उस ने घड़ी देखी, ‘ओह, मार्गरेट के आने में बस आधा घंटा रह गया है ।’ पता नहीं इस नई मेहमान के आने की ख़बर से उस के दिल में क्यों धुकधुक हो रही थी ? तब तक मचलती समुद्री लहरों वाला, रंग बिरंगी बिकनी पहने देसी विदेशी लड़कियों, सिर्फ रंगीन बर्मूडाज़ व केन के हैट पहने पुरुषों का गोआ स्मगलर्स का गढ़ उसने सिर्फ फ़िल्मों में देखा था। एक तो आनेवाली ईसाई थीं, ऊपर से गोआ की रहने वालीं, इसलिये वह अपने व्यक्तित्व के साथसाथ घर की साज संवार के प्रति अतिरिक्त सजग हो उठी थी । अंदर रखी हुई सजावट की वस्तुएँ निकाली थीं । कुशन, पर्दे, यहाँ तक कि तकिये के गिलाफ़ तक बदल दिये थे ।

एक बार फिर वह ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी हो गई । कितने महीनों बाद उस ने मिडी पहनी थी । कमर में व्हाइट मेटल की घुटने तक लटकती चेन वाली बेल्ट बाँधी थी वर्ना शादी के बाद मन अपने आप बदल जाता है, लड़कपन की पोशाक पहनने में स्वयं ही संकोच होने लगता है । अनिल को कोई मतलब नहीं था । कुछ भी पहनो, फिर भी वह मिडी रात में कहीं बाहर जाते समय ही पहन पाती थी ।

उस ने सोचने की कोशिश की कि मार्गरेट कैसी होंगी । उम्र तो उन की चालीस वर्ष के आसपास होगी, क्योंकि उनके पति, अनिल के दोस्त मिस्टर शाबास हैं तो छोटे कद के, सांवले रंग पर काला चश्मा लगाये और साधारण व्यक्तित्व वाले हैं लेकिन चुस्त बहुत हैं. बस उनके कनपटियों के पास के कुछ सफेद बाल उन की उम्र की चुगली खाते थे.

वे जब शहर से बाहर जाते हैं तो चोरी के डर के कारण उन्हें अपने फ़्लैट में सोने के लिये कह देते हैं।वह सोचती है -देखने में भी वह ज़रूर चुस्त होंगी आख़िर रह भी तो गोआ में रहीं हैं। अच्छा तो मिडी पहन कर आएंगी या पेंट पहन कर या जींस पहन कर?

धत, तीन दिनों से मार्गरेट किस कदर उस के दिमाग़ पर छाई हुई हैं । कितनी बार उस ने इस बात को दिमाग़ से झटकना चाहा है कि मार्गरेट उस के घर आने वाली हैं, किंतु हर बार वह दिमाग में घुसती ही जा रही है । वह भी क्या करे ? मिस्टर शाबास से उन के बारे में व उन के परिवार की शान शौकत के बारे में इतना सुना है कि यह उन्हें बिना देखे ही मोहित हो गई थी । वे हमेशा बताते रहते थे आजादी से पहले मार्गरेट के पिता किस तरह अँग्रेज़ अफ़सरों के साथ शिकार पर जाया करते थे । उन लोगों के परिवार के साथ उन के परिवार का दिन भर का उठना बैठना था ।

तभी तो वह तीन दिनों से परेशान थी कि मार्गरेट यहाँ आ कर उस में या उस के घर में कोई गंवारपन न नोट कर लें । मन ही मन उस ने उन से बात करने के लिये बेहतर से बेहतर अंग्रेज़ी वाक्य छांट रखे थे । वह किसी पब्लिक स्कूल में नहीं पढ़ पाई तो क्या, लेकिन अंग्रेज़ी माध्यम के अच्छे स्कूल में तो पढ़ी हुई थी ।

अनिल और मिस्टर शाबास का परिचय तो बहुत पुराना था । वह नौकरी की खातिर गोआ से इतनी दूर चले आये थे । उन की पत्नी बच्चों के साथ गोआ में निजी मकान में अपने बूढ़े सास ससुर के कारण रह रही थीं ।

वैसे भी मिस्टर शाबास व मारग्रेट के लम्बे स्मार्ट बेटे का उस पर काफ़ी रौब पड़ चुका था बल्कि जब उसे देखा था तो आश्चर्य में पड़ गई थी कि मुश्किल से पाँच फ़ीट के मिस्टर शाबास का बेटा इतना लम्बा स्मार्ट कैसे था ? ज़रूर उनकी पत्नी स्मार्ट होंगी। उसका इलाहाबाद के किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया था। वह यहां अपने पिता से मिलकर इलाहाबाद जाना चाह रहा था। अनिल ने उन दोनों को डिनर पर बुलाया था। वह गोआनीज़ लड़का यू पी का खाना कहकर बहुत थ्रिल्ड था। अचानक उसने कचौरी उठाई और आश्चर्य से पूछने लगा, "ये तो चारों तरफ़ से बंद है तो आपने इस पूरी में बटाटा [आलू ] कैसे डाला ?"

उसकी हंसी निकल गई क्योंकि बचपन से खाई हुई कचौरी किसी को एक तिलिस्म लगेगी, हैरत में डाल देगी - कभी सोचा न था। ऋतु ने उसे कचौरी बनाने की विधि बताई थी, "अब तो आप हमारे कचौरी व समोसे के स्टेट में पढ़ने जा रहे हैं ।"

“."इलाहबाद में ये खाने को मिलेगा ?वैरी गुड।"

"चीं........चीं....चीं.... ” चिड़ियानुमा घंटी की आवाज़ सुनकर वह हाथ का कंघा छोड़कर दरवाज़ा खोलने भागी । उफ ! मार्गरेट आ ही गईं --जल्दी में ड्राइंग रूम की मेज़ से टकरा गई । मेज़ के उलटने से उस पर रखी एश ट्रे गिर गई । उस ने एश ट्रे को झटपट मेज़ पर रख कर दरवाज़ा खोला ।

दरवाज़े पर डाकिये ने उस के हाथ में तीन पत्र थमा दिये । उस ने झल्ला कर ज़ोर से दरवाज़ा बंद कर दिया ।

तीनों पत्र पढ़ने के बाद फिर सोचा, चलो रसोई में एक चक्कर लगा आये । सूप, उबली हुई सब्जियाँ व अंडे तैयार थे । पुडिंग बना कर भी फ्रिज में रख दी थी ।

उन लोगों के आने पर सैंडविच तो शांति सेक देगी । रसोई का एक चक्कर लगा कर वह ख़ुश हो गई । कितना मजा है यूरोपीय खाना बनाने में, न मेहनत, न कोई झंझट । अगर हिन्दुस्तानी खाना बनाया होता तो अब तक वह रसोई में ही लगी होती । रसोई भी तो कितनी साफ़ सुथरी लग रही हैं । नहीं तो इस में मसाले व इलायची की ख़ुशबू ही भरी होती ।

बहुत दिनों पहले देखी किसी अंग्रेज़ी फ़िल्म की नायिका की तरह वह ऊंची एड़ी के सैंडिलों को खटखट करती चलती बैठक में ‘शिक’ पत्रिका ले कर बैठ गई । हाथ पत्रिका को उलटपुलट कर रहे थे, लेकिन अभी भी उस के दिल में मार्गरेट के आने की उत्तेजना भरी हुई थी ।

“चीं........चीं....चीं.... ” इस बार दरवाजे पर अनिल, मिस्टर शाबास व साथ में एक महिला फूहड़ तरह से साड़ी में लिपटी, माथे पर सिंदूर की बिंदी लगाये खड़ी हुई थी । वह खीज उठी, “उफ़, सारी मेहनत पर पानी फिर गया । आखिर मार्गरेट नहीं आई । ”

वह उन से चहक कर “हाय !” कहे इस से पहले ही उस महिला ने हाथ जोड़ कर कहा, “नमस्ते, ऋतुजी, मैं मार्गरेट हूं ।”

उसे सहज होने में कुछ सेकंड लगे, “नमस्ते, आइये...आइये ।”

“मैं आप से मिलने की बहुत इच्छुक थी ।”

ऋतु को गुस्सा आया । वह तो हिंदुस्तानी में ही बात कर रही है । उस के छांट कर रटे हुए अंग्रेज़ी वाक्यों का क्या होगा ?

ऋतु उन की ओर लगातार कनखियों से देखती जा रही थी । जिस शिष्टाचार को सिखाने में उस के मां बाप ने जान लगा दी, मार्गरेट उन में से एक का भी पालन नहीं कर रही थी ।

उफ, मेज़ पर बैठते ही उन्होंने गिलास फूल की तरह सजा नेपकिन टांगों पर न बिछा कर बेदर्दी से मेज़ पर पटक दिया था । प्लैट के एक तरफ रखे हुए छुरी कांटे को उन्होंने छुआ भी नहीं था । सेंडविच हाथ में ले कर आराम से खा रही थीं ।

“ओह !” वह झुंझला उठी । कहाँ तो वह कल्पना कर रही थी कि मार्गरेट धीमे से खाने की मेज़ की कुर्सी खिसका कर आहिस्ता से उस पर बैठेंगी ।लम्बे नाखूनों पर लगी नेलपॉलिश वाली उंगलियों की पोरों से नेपकिन उठा कर अपनी टांगो पर फैला कर बातों के बीच धीमे धीमे सूप सिप करेंगी । बाद में नज़ाकत से छुरी काँटे से सेंडविच खाएंगी ।ख़ैर, इतना न सही, कम से कम पुडिंग की ही तारीफ़ कर दें ।

जब उस से रहा नहीं गया तब वह पूछ बैठी, “क्या आप को खाना पसंद नहीं आया?”

“ऐसी बात नहीं है, सब चीजें बहुत स्वादिष्ट हैं । खास तौर से यह पुडिंग, लेकिन हमें तो उम्मीद थी कि आप के यहाँ आज तो पूरी, बटाटा वाली कचौरी .....खीर खाने को मिलेगी । मुझ को तो वही पसंद आता है । घर में भी मैं तो रोटी बनाती हूं । ब्रेड से अधिक पौष्टिक होती है ।”

उसे लगा जैसे उस के चेहरे का मेकअप एकदम से किसी ने पोंछ दिया हो । वह तो तीन दिन से परेशान होती रही कि कौन कौन सा यूरोपीय भोजन बनाये और मेम साहब हैं कि अभी भी पूरी कचौरी के ज़माने में रह रही हैं ।

लंच लेकर अनिल और मिस्टर शाबास ऑफ़िस चले गए। ड्राइंग रूम में ये दोनों सोफ़ों पर अधलेटी सी बैठ गईं। ऋतु ने एक कुशन अपनी गोदी में रखकर कहा, "मिस्टर शाबास बहुत जैंटिल पर्सन हैं। "

"माई फुट -- जेंटिल और शाबास ?उदर गोआ आता चीख चीख कर सारा घर सिर पर उठा लेता है --मैं इतना पइसा भेजता है किदर जाता है ?अपनी मदर पापा से झगरा करता है। "

वह चौंक जाती है, "मैंने तो कभी उनकी ऊंची आवाज़ नहीं सुनी। "

"वह सिर्फ़ नाम को घर आता है। गुजरात ड्राई एरिया है इसलिये गोआ आते ही ये दारू चढ़ाकर किसी समुद्री बीच पर सैंड पर पड़ा रहेगा। मेरे को काम बढ़ जाता है। मैं या सर्वेंट ढूँढ़कर इसको बुरी हालत में घर लाता है। "

"ओह। "

"घर आते ही कभी उल्टी करेगा तो सारे कपड़े बदलो। उसके बाद नौटंकी करेगा, रोयेगा --मार्गरेट मुझे माफ़, कर दो, आई लव यू।इसके पीने की आदत के कारण मैं इसके साथ यहॉं आकर नहीं रहती। इससे तो ये इस शहर में ही पड़ा रहे तो मुझे शांति है। "

ऋतु को मार्गरेट पर सच ही दया उमड़ पड़ी -पति से दूर रहकर गृहस्थी चलाना, उस पर सास ससुर की देखभाल करना, दो बेटों को सम्भालना --कैसे मार्गरेट इतराकर सलीके से साड़ी का पल्लू लहरा सकतीं हैं ?

"इनको किसी बात का दुःख है ?"

"कुछ भी नहीं। हमारे फ़ादर इन लॉ का बड़ा बँगला है। शाबास के दो दोस्त इस शहर में करोड़पति बन गये हैं और ये नौकरी कर रहा है। बस यही ग़म इसे खाये जा रहा है।"

" ये भी कोई फ्रस्ट्रेशन की बात हुई। ?इन्होंने बताया था कि एक प्रसिद्द आर्कीटेक्ट बचपन के दोस्त हैं। अरे हाँ, मेरी एक रिलेटिव आर्कीटेक्ट को वहां नौकरी भी लगवाई थी। `

" दूसरी बात ये भी है मेरे पापा के आलीशान घर व उनके आलीशान रहन सहन से बहुत कॉम्प्लेक्स पैदा हो गया था ."

वह पूछना चाहती है कि जीवन स्तर में इतना अंतर था तो शादी कैसे हो गई ?संकोच में पूछ नहीं पाती। वैसे भी भारत के कुछ घरों में लड़कियों की शादी उन्हें ठिकाने लगाने जैसी होती है।

मारग्रेट घड़ी देखकर बोलीं, "ओह !तीन बज रहें हैं। मैं चलतीं हूँ, आप भी आराम करिये। "

वह उनके ग़मज़दा चेहरे को देखकर कुछ कह नहीं पाई। वही मुस्करा कर बोलीं, “एक दिन हम आप के घर पूरी कचौरी खाने फिर आयेंगे । और हां, आप इस सन्डे सुबह हमारे साथ नाश्ता करने आइये । आप लोगों के लिये हलुआ और सैंडविच बनाऊंगी ।” फिर वह शालीनता से नमस्ते कर के चल दीं ।

"हलुआ और सैंडविच ! क्या अद्भुत संगम है, हिन्दुस्तानी और यूरोपीय खाने का । वह विस्मित थी। वह क्यों बावली बनी, पश्चिमी सभ्यता के पीछे भागती जा रही है ? क्यों नहीं उस ने समन्वय ढूँढ़ने की कोशिश की ? मार्गरेट का यह संतुलन सचमुच मोहक है ।

वह खिसियाई हुई बाहर जाती हुई मार्गरेट को देख रही थी । उस का मन हुआ कि ज़ोर ज़ोर से चीख कर वह तीन दिन से रटे हुए अंग्रेज़ी वाक्यों को दीवारों को ही ज़ोर से सुना दे ।

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- श्रीमती नीलम कुलश्रेष्ठ

kneeli@rediffmail.com

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