Taapuon par picnic - 34 in Hindi Novel Episodes by Prabodh Kumar Govil books and stories PDF | टापुओं पर पिकनिक - 34

टापुओं पर पिकनिक - 34

डॉक्टर साहब की तमाम प्रॉपर्टी में एक अकेला यही फार्महाउस ऐसा था जिसके बारे में उनके बेटे आगोश को भी नहीं पता था।
जब ये छोटा सा घर और इसके साथ इसे घेरे खड़े हुए बांस के बाग़ को डॉक्टर साहब ने एक भूतपूर्व एमएलए से ख़रीदा था तब उन्होंने सोचा तो ये था कि एक दिन बेटे आगोश और उसकी मम्मी को यहां लाकर उन्हें सरप्राइज़ देंगे, किंतु उन्हीं दिनों उनकी अनुपस्थिति में आगोश पर उनके क्लीनिक के कुछ राज़ जाहिर हो गए और उनके ड्राइवर को भी वहां से हटाना पड़ा। तो डॉक्टर साहब का सारा का सारा प्लान धरा ही रह गया।
उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया।
इसके बाद से डॉक्टर साहब अपने बेटे आगोश से कुछ डरने से लगे। वो उससे ज़्यादा बात भी नहीं करते थे और अकेले में उसके सामने पड़ने से बचते थे। उन्हें जो भी कहना या करना होता था उसमें उनकी धर्मपत्नी, अर्थात आगोश की मम्मी ही बिचौलिया बन कर उनकी मदद करती थीं।
आगोश का अपनी मम्मी से बहुत लगाव था।
आगोश उनका इकलौता बेटा ही था इसलिए वो उसे हर तरह से ख़ुश रखने की कोशिश करते और ये खास ध्यान रखते थे कि आगोश के पास या उसके नाम ढेर सारा पैसा हर वक्त रहे।
एक तरह से ये उनका प्रलोभन ही था जिसके माध्यम से वो अपने बेटे को धन की महत्ता समझाने की कोशिश करते थे।
उन्हें लगता था कि बेटा रुपए- पैसे खर्च करने का इतना आदी हो जाए कि उसका ध्यान पैसे के रंग पर कभी जाए ही नहीं।
पैसा पैसा और बस पैसा! क्या ब्लैक मनी और क्या व्हाइट मनी!
लेकिन शायद डॉक्टर साहब ये नहीं जानते थे कि बच्चे अपने माता- पिता के जिस्म से पैदा होकर भी अपना दिमाग़ और नक्षत्र उनसे अलग लेकर आ सकते हैं।
उन्हें ये अहसास कभी नहीं हुआ कि बच्चों पर उनके साथ की जा रही किसी भी अति का उल्टा असर भी हो सकता है।
आगोश कभी- कभी ऐसा ही व्यवहार करता था।
वास्तव में आगोश ने किराए का अलग कमरा भी इसीलिए लिया था कि अगर किसी परिस्थिति में अपने पिता का घर उसे छोड़ना भी पड़े तो वह खुद कोई छोटी- मोटी नौकरी पकड़ कर अपने बूते, अपने पैरों पर खड़ा होकर रह सके।
उसने अपने सब दोस्तों को ये झूठी कहानी बना कर सुनाई थी कि उनका कोई रिश्तेदार यहां आकर रहने वाला है।
आगोश के दोस्त भी नहीं जानते थे कि उसके मन में क्या चल रहा है।
एक दिन आगोश अपने बंगले के बाहर बैठा अपने बैडमिंटन रैकेट के तार कस रहा था कि गेट के ठीक सामने ज़ोर का धमाका हुआ।
हड़बड़ा कर आगोश ने उधर देखा। पर वहां कोई नहीं था। शायद सड़क के उस पार से आवाज़ आई होगी, ये सोच कर वह फ़िर से अपने काम में लग गया।
मुश्किल से दो पल हुए होंगे कि धमाका फ़िर हुआ।
आगोश ने गेट की ओर देखा, वहां कोई नहीं था।
ये आवाज़ शायद सड़क पर किसी गाड़ी का टायर फटने की रही हो।
उसने ध्यान नहीं दिया।
बंगले के भीतर से एक - दो काम करने वाले नौकर लोग भी बाहर निकल कर झांके। पर जब उन्होंने आगोश को वहां बैठ कर रैकेट दुरुस्त करते देखा तो बिना कुछ कहे वापस भीतर चले गए।
आवाज़ फ़िर आई।
आवाज़ न केवल तेज़ थी, बल्कि बेहद करीब से ही आ रही थी। शायद ये किसी पटाख़े की आवाज़ थी।
आगोश ने सोचा ये सुबह के समय आतिशबाज़ी कौन कर रहा है।
वैसे ये कोई अजूबा नहीं था। अब शौक़िया लोग केवल दीवाली पर ही पटाख़े नहीं फोड़ते थे। किसी भी ख़ुशी के मौक़े पर किसी भी समय धमाके होना आम बात थी।
कोई शादी- सगाई हो, भारत क्रिकेट का कोई मैच जीत जाए या कोई नेता कहीं चुनाव जीत जाए सबसे पहले तो जश्न मनाने के लिए पब्लिक के कानों पर ही हमला बोला जाता था।
आगोश एक बार ये देखने के लिए उठ कर खड़ा हुआ कि ये जश्न कौन मना रहा है, आवाज़ें कहां से आ रही हैं, मगर फ़िर कुछ सोच कर वापस बैठ गया।
- ऐ , ये बाहर कचरा कौन फ़ैला रहा है? ये आवाज़ आगोश के घर में काम करने वाली लड़की की थी जो साइड के दरवाज़े से बाहर निकल कर बाउंड्रीवॉल के बाहर पटाख़े फोड़ने वाले बच्चों को डांटने निकली थी। आख़िर बाहर सारे में झाड़ू तो उसी को लगानी पड़ती थी।
- अब कोई दिवाली का त्यौहार है जो सारे में काग़ज़ का कचरा फ़ैला दिया... बड़बड़ाती हुई लड़की साइड से मुख्य गेट की ओर जा रही थी।
लेकिन लड़की जैसे ही सामने की ओर आई, वहां आगोश को बैठे देख कर झिझक गई। उसे थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि आगोश यहीं बैठा है और पटाख़े फोड़ने वाले शैतान बच्चों को कुछ नहीं कह रहा!
वह पैर पटकती हुई वापस भीतर चली गई। वह भी आगोश से डरती थी।
एक - एक करके पूरी सात आवाज़ें हुईं! बाउंड्री वॉल इतनी ऊंची थी कि उस के पार से पटाख़े फोड़ने वाले बच्चे को देख पाना संभव नहीं था।
कोई गेट तक जाए और बाहर झांके तभी उसे देख सकता था।
कुछ ऊब कर आगोश अब उठा और घर के भीतर जाने लगा। लेकिन इतने में ही उसे ज़ोर- ज़ोर से हंसने की आवाज़ आने लगी।
उसने पीछे मुड़ कर देखा तो दंग रह गया। गेट से आर्यन और सिद्धांत भीतर आ रहे थे।
वह रुक गया और तपाक से उन लोगों की ओर लपका।
आर्यन बोला- सात तोपों की सलामी लेकर भी जहांपनाह के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी?
- ओह, तुम लोग कर रहे थे ये बदमाशी? आगोश ने कहा।
- मैं नहीं, ये आइडिया सिद्धांत का था। कैंडल जलाकर बाहर रख दी और उसी से बम जला- जला कर फेंक रहा था। फेंकता, और फिर भाग कर छिप जाता। आर्यन ने कहा।
आगोश बोला- सालो, गेट के बाहर कचरा कर रहे थे न, हमारी लौंडी भड़क रही थी तुम पर।
सिद्धांत हंसता रहा। फ़िर आर्यन से बोला- इसे ये भी तो बता, कि ये जश्न हम किस ख़ुशी में मना रहे थे?
आर्यन ने एकदम ख़ुश होकर आगोश को बताया कि उसे एक बड़े सीरियल में काम मिल गया।
- कौन बोला?
- यार, कॉन्ट्रेक्ट हो गया, एडवांस मिल गया इसे पचास हज़ार! सिद्धांत चहक कर बोला।
आगोश ने आर्यन के गाल पर किस कर दिया !
आगोश और सिद्धांत भीतर जाने लगे। पीछे- पीछे ज़ोर से गाल को रगड़ कर पौंछता हुआ आर्यन भी चला आया।