Gaze (for enlightened adults only) in Hindi Adventure Stories by Pawan Kumar books and stories PDF | टकटक (केवल प्रबुद्ध वयस्कों के लिए)

टकटक (केवल प्रबुद्ध वयस्कों के लिए)

Story Title: Taktak WITH PAWAN KUMAR

टक टक

{केवल प्रबुद्ध वयस्कों के लिए}

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जैसे जैसे ज़हर का नील मेरे लहू में घुलता जा रहा था,मेरी यादें माज़ी की बदरोटी कोख से निकल कर सफ़ेद हुई जा रही थीं।सफ़ेद शफ़्फ़ाक़ चीज़ें मुझे दर्द देती थीं।मेरा बाप भी समाज़ का बड़ा सफ़ेदपोश इंसान था,मेरी माँ के कालेपन से लजा कर किसी सफ़ेद शफ़्फ़ाक़ हुस्न की आग़ोश में चला गया।लावालिदी ने मुझे दर्द तो दिया हीं,साथ में दी चोरी चकारी की गलाज़त भरी दुनिया।

मैं हौका ,असल नाम मत पूछिए क्योंकि हम जैसे लोग ऐसे हीं बेढ़ब सिफ़ाती नामों से जाने जाते हैं।हाँ काम पूछेंगे तो बताऊंगा कि काम नहीं कलाकारी किया करता था मैं,.. एलीट सफेदपोशों को कलात्मक तरीके से लूटने की कलाकारी।टकटक गैंग का सुल्तान था मैं।

मेरे इस हुनरबाजी वाले धंधे ने मुझे पैसे भी दिए और अपने अंदर की हुलसती आग को वक़्ती तौर पे शांत करने के कई मौके भी।पर उस दिन इसी हुनर ने मुझे आज वाले दर्दनाक हश्र में पहुँचा दिया।

उस दिन झमाझम बारिश हो रही थी।किसी कॉर्पोरेट का एक एग्जीक्यूटिव फिसलन भरी सड़क पर बड़े अख़्तियार से कार चलाता अपने ऑफिस की ओर जा रहा था कि तभी मैं कार के बोनट से जा टकराया।जी हाँ मैं कार से टकराया ,कार मुझसे नहीं पर राह चलते राहगीरों ने तोहमतें बरपाई उस कार चालक पर।कार की खिड़की पर टकटक की आवाज़ हुई और जब उस एग्जीक्यूटिव ने कार का शीशा नीचे किया,गालियों के गुच्छे से उसका एहतराम हुआ।

'भूतनी के अंधा है क्या, ठोक डाला बंदे को'

'ये साले सड़क पर माइकल शुमाकर बन जाते हैं'

एग्जीक्यूटिव ऐसा कहने वाले मेरे छोकरों से ज़ुबानी हाथापाई कर रहा था कि तभी मैं कार की डैश बोर्ड पर पड़ा उसका मंहगा फ़ोन ले उड़ा। यह हमारा लूटने का निराला अंदाज़ था। इस तरह की लूट से कीमती चीज़ें और अमीरों की ज़ानिब भरी अंदर की भड़ास को सुकून ,दोनों हासिल हुआ करता था।पर उस दिन तो उस लूट से कुछ और भी हासिल हुआ था।

मैं आदतन इन रईसों की दुनिया में झांकने की नीयत से अपने हाथों लुटे एग्जीक्यूटिव का मोबाइल खंगाल रहा था कि तभी मुझे कुछ ऐसी चीज़ें दिखीं जिसने मेरे लहू की रवानगी को तेज़रफ़्तार कर दिया।

एग्जीक्यूटिव के मोबाइल के वीडियो में उस एग्जीक्यूटिव और किसी बेहद ख़ूबसूरत लड़की के ज़ाती लम्हें क़ैद थे।इन चिड़ा चिड़ी के प्रेम-कीड़ा ने मेरी हवस की बंद गठरी खोल दी।मोबाइल को खंगालने के दौरान उस मोबाइल के कॉन्टैक्ट लिस्ट में मेरे हवसनाक मन पर पिस्सू की तरह चिपकने वाली उस लड़की की डीपी भी नज़र आई ।डीपी में वह किसी और मर्द के साथ चिपक कर खड़ी थी ।उतना पास अमूमन एक ख़सम हीं होता है।तो क्या वह लड़की टू टाइमिंग कर रही थी।अगर कर रही थी तो वहाँ थ्री टाइमिंग की भी संभावना थी।

'टू टाइमिंग' मेरे अंग्रेज़ीदां दोस्त ने बताया था,पति के रहते किसी और से मज़े करना।

'हाय जानू उस दिन बड़ा मज़ा आया।चलो न फिर वही सब करते हैं'

'यू नॉटी ....नेक्स्ट वीकेंड मिलते हैं ।ये तब टूर पे होंगे '

मैंने जब एग्जीक्यूटिव बनकर उसके मोबाइल से यह मैसेज लड़की को भेजा तो बोसे की इमोजी के साथ लड़की का यह जवाब आया ।जवाब ने इस बात की तसदीक कर दी कि लड़की के एग्जेक्युटिव से नाजायज़ तालुक्कात हैं।

लड़की की तरफ़ से एक और मैसेज आया।

' बट प्रॉमिस यु विल यूज़ रेनकोट दिस टाइम बेबी '

अंग्रेज़ी में तंगहाथ मुझे यह समझ में आया कि लड़की मुझे यानी कि एग्जीक्यूटिव को रेन कोट पहन कर आने को कह रही है वो तो बाद में जब मैंने यह मैसेज अपने अंग्रेज़ीदां दोस्त को दिखाया तो उसने बताया कि बंदी कंडोम यूज़ करने कह रही थी ।पर यह ज्ञान आया बाद में...उससे पहले लड़की से चैटिंग के दौरान मेरी बेसब्री ने मुझसे यह जवाब लिखवा दिया था-' अरे डार्लिंग रेन कोट की ज़रूरत नहीं पड़ेगी ।मानसून फिनिश है बारिश नहीं पड़ेगी '

मेरे इस अहमकाना जवाब ने लड़की को शक़ का सबब दे दिया।फ़ौरन उस लड़की का उस मोबाइल पर कॉल आ गया।मैंने मोबाइल को बजने दिया ।पर लड़की बार बार कॉल करती रही तबतक जबतक कि मैंने कॉल उठा नहीं लिया।

'हेल्लो हेल्लो'

मैं ख़ामोश रहा ।मेरी ख़ामोशी ने उसे मेरे एग्जीक्यूटिव न होने के बाबत आश्वस्त कर दिया।

'तुम जतिन नहीं हो ।कौन हो तुम कम ऑन यू बास्टर्ड ओपन योर ब्लडी माउथ।'

लड़की की गाली ने मुझे सुलगा दिया।मैं भी फट पड़ा।

'अपने पति के रहते दूसरों के साथ गुलछर्रे उड़ाती है न तू ।ठहर तेरा वीडियो तेरे पति को भेजता हूँ और यही वीडियो उस जतिन के घर भी भेजूंगा'

यह सुन वह लड़की शेरनी से मेमनी बन गई।

'क्या चाहते हो ?'

'तेरे साथ एक रात गुज़ारना चाहता हूँ।हिल्टन पैलेस में मिल मुझे ख़ुश कर और मोबाइल ले जा ।'

मैंने बग़ैर कोई लाग लपट के अपने मक़सद को उसके सामने बक डाला ।लड़की गिड़गिड़ाती रही ,अपनी अस्मत के बदले पैसे की चॉइस देती रही पर मैं अपनी मांग से टस से मस न हुआ।मिन्नतों में लिपटा उसके यार जतिन का सिफ़ारिशी कॉल भी आया पर साला मैंने जब उस ख़ूबसूरत बंदी की मिन्नतें ठुकरा दी तो इस हलकट की क्या सुनता ।

वे जानते थे मेरा खुलासा उन दोनों की ज़िंदगी में तूफ़ान ला सकता था और इसलिए उन्होंने घुटने टेक दिये।लड़की मेरी बताई जगह पर आई और मुझे जन्नती लज़्ज़त देकर और मोबाइल लेकर चली गई,एक ऐसी लज़्ज़त जो साला रईस सफ़ेदपोशों की बपौती रही है ।मैंने उस लज़्ज़त की ख़ुमारी में कई दिन गुज़ारे।उस दिन अपने छोटे बोसीदे से घर में लेटा मैं ऐसा हीं एक मख़मूर दिन गुज़ार रहा था कि तभी मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई।

'टकटक'

दरवाजा खोलकर देखा तो सामने ड्राइवर की लिबास में मलबूस एक आदमी खड़ा था।

'साहेब बहुत बीमार हैं।मिलने के लिए बुलाया है।'

'कौन साहेब?'

'साहिल साहेब'

इस नाम ने मेरे कानों में गरम लावा उड़ेल कर मुझे छिलमिला दिया पर इसी नाम ने पीछे खड़ी मेरी माँ की आंखों का बांध खोल दिया।मैंने ड्राइवर से दो टूक कह दिया कि मैं अपने गद्दार बाप से मिलने नहीं जाऊंगा भले वह मर जाए पर देरीना जज़्बातों में क़ैद माँ ऐसा न कर पाई ।उसने ज़िद धर ली मुझसे वहाँ ले चलने को ।और आख़िरकार मुझे मन मारकर अपने बाप के घर जाना पड़ा।

अपने बाप के शानदार बंगलो में मौज़ूद शाहाना चीज़ों से उलझता,रश्क़ करता जब मैं बाप के कमरे में दाख़िल हुआ तो मैंने पाया मेरी यादों का धुंधलका पर जवान पुरनूर चेहरा अब झुर्रियों का अड्डा बन चुका था जिसपर दर्द ने अपनी तहरीरें लिख रखीं थी। मेरे बाप का दर्द बड़ा था पर उससे बड़ा था मेरा गुस्सा और इसलिए मैं दूर खड़ा रहा ।माँ रोती बिलखती मेरे बाप की मिज़ाजपुर्सी कर रही थी कि तभी कुछ ऐसा हुआ कि मैं उल्टे पांव वहां से भाग आया।घर आकर मैंने फिनाइल की पूरी बोतल अपने हलक में उड़ेल ली।अब जबकि अस्पताल में मैं मौत से हाथापाई कर रहा हूँ,मैं जानता हूँ कि मौत हीं जीतेगी क्योंकि ज़िंदा रखने की ताक़त जिसे ज़मीर कहते हैं मैं कब का गंवा आया हूँ। मरने से पहले मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि मैं वहां से क्यों भाग आया था।मैं अपने बाप के घर से भाग आया था क्योंकि मुझे मेरे बाप के घर में मेरे कर्मों का हिसाब दिखा था,वो औरत दिखी थी जिसके साथ मैं हमबिस्तर हुआ था।वो औरत जो मेरे हीं बाप की ज़ायी,मेरी बहन थी।

टकटक गैंग के सुल्तान को आख़िरी टकटक बड़ी मंहगी पड़ी।

-पवन कुमार


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