जीवन ऊट पटाँगा - 5 - सांप...सांप.. in Hindi Short Stories by Neelam Kulshreshtha books and stories Free | जीवन ऊट पटाँगा - 5 - सांप...सांप..

जीवन ऊट पटाँगा - 5 - सांप...सांप..

नीलम कुलश्रेष्ठ

“सांप...सांप..” मलय चिल्लाता हुआ उठ कर बैठ गया और कांपने लगा ।

“कहाँ है?” प्रीति घबरा कर उठ बैठी । बिजली चली गई थी । छोटी बत्ती नहीं जल रही थी ।

“म...म...मेरे गले पर लिपटा है ।” मलय भयभीत स्वर में बोला ।

“क्या ?” घबराहट में सिरहाने के नीचे रखी टार्च नहीं मिल रही थी । बड़ी मुश्किल से उस ने टार्च जलाई । देखा, मलय अपनी गरदन पर हाथ फेर रहा था ।

“क्या हुआ?” शैलेश ने उनींदे स्वर में करवट बदले हुए पूछा । उस की हथेली अनजाने ही प्रीति की खुली पीठ पर लग गई तो वह भी चिंहुक उठी, “सांप....।”

शैलेष हड़बड़ा कर बिस्तर पर बैठ गया, “कहाँ है सांप?”

“मेरी कमर पर से सरसराता हुआ निकल गया है,” वह टार्च जला कर पलंग के नीचे झाँकने लगी ।

“वह तो मेरी हथेली थी ।”

“ओ, बाप रे... मैं तो डर ही गई थी,” कहते हुए उस ने सहमे हुए मलय को अपने सीने से लगा लिया ।

शैलेश ने लाचारी से उन दोनों को देखते हुए कहा, “जो होना है वह तो हो कर रहेगा । क्यों डरडर कर अपना खून जलाते हो?”

“हम भी क्या करें....वह कमबख़्त सांप का डर ऐसे मन में बैठ गया है कि हर समय ऐसा लगता है, साँप शरीर पर ही रेंग रहा है ।”

शैलेश जब भी घर में होता, उसे भी यही महसूस होता रहता । दफ़्तर में होता तो घर की चिंता में डूबा रहता । ज़ोर की सुविधा तो थी नहीं जो बारबार ज़ोर कर के प्रीति की खैरियत लेता रहे । लेकिन ऊपर से दृढ़ बनता हुआ बोलता, “मैंने तो कितनी बार बोला है, हम दोस्तों से सहायता मम्मी ग लें ।”

“पापा जी ! ऐसा नहीं करना, नहीं तो सांप मुझे काट लेगा...मैं मर जाऊंगा,” कहते कहते मलय ज़ोर ज़ोर से रोने लगा।

दहशत ने पूरे घर को जकड़ रखा था । वे एक पल के लिये भी मलय को अपनी आँखों से ओझल नहीं होन देते थे । शैलेश दफ़्तर जाते समय उसे अपने साथ स्कूल ले जाता था । फिर स्कूल बंद होते ही उसे पास के शिशु सदन में छोड़ देता । दफ़्तर से लौटते समय उसे अपने साथ ही लेता आता ।

सुबह प्रीति घर में चौकन्नेपन से जल्दी जल्दी काम खत्म करती । कभी मम्मी के पास चली जाती तो कभी किसी सहेली के यहाँ । घर पर वह लगभग उसी समय पर आती जब वे दोनों लौटने वाले होते ।

वे बाहर का दरवाज़ा खोल कर बाहर से ही ‘थपथप’ करते रहते । जब विश्वास हो जाता कि सांप दरवाजे के आसपास नहीं है तो पूरी सतर्कता से चौकन्नी दृष्टि से इधरउधर देखते हुए अंदर घुसते । पलंग की सब चादरें, गद्दे, तकिये उठा कर झाड़ते कि कहीं सांप बिस्तर पर तो नहीं बैठा । मलय को झाड़े हुए बिस्तर पर बैठा दिया जाता, वहीं उस की सारी ज़रूरतें पूरी कर दी जाती थीं ।

उस की मम्मी ने तो पूछा था, “प्रीति ! आजकल तू परेशान सी रहती है । तू बुरा नहीं मानना, यह घर तेरा ही है, लेकिन आजकल तू बहुत जल्दी जल्दी आ रही है । क्या कारण है?”

“नहीं मम्मी !बस मूड की बात है...कोई खास बात नहीं है ।”

“तू ज़रूर कुछ छिपा रही है,” मम्मी का शक फिर भी दूर नहीं हुआ था ।

प्रीति नजरें चुरा कर रह गई थी । उस लंबे तगड़े तांत्रिक की आकृति को याद कर कांप कर रह गई थी, जिस के काले भुजंग शरीर पर राख मली रहती थी । माथे पर काला त्रिशूल बना होता था । वह एक हाथ में पकड़े त्रिशूल को ऊँचा उठा अपनी लाल लाल आँखें निकालता हुआ बोला था, “उज्जैन के महाकालेश्वर के सेनापति हैं कालभैरव और कालभैरव का सेनापति हूँ मैं ।”

फिर दूसरे हाथ में पकड़े सांप की तरफ इशारा कर के कहा था, “यह मेरा सेनापति है । मैं अपने सेनापति को तेरे घर में छोड़ जा रहा हूँ । यदि तू ने मेरे बारे में किसी से चर्चा की या यह घर छोड़ कर कहीं गई तो मेरा सेनापति तेरे इस इकलौते बेटे को उसी समय डस लेगा । मेरी बात याद रखना,” कहते हुए उस ने कमरे में सांप फेंक दिया था ।

सांप, जो उस के हाथ की गिरफ्त में बुरी तरह छटपटा रहा था, उसे मुक्ति मिल गई थी । वह तेजी से सरकता हुआ संदूक के पीछे चला गया था ।

तांत्रिक भी ‘जय कालेश्वर, जय कालभैरव’ कहता चला गया था ।

शैलेश अपनी हाकी ले कर सारे घर में सांप को तलाशता रहा । वह घबराई सी उस के पीछे पीछे घूमती रही थी, ‘संभल कर रहिये, किसी को बुला लीजिये ।’

“मम्मी! ऐसा मत करना, सांप मुझे काट खायेगा, मैं मर जाऊँगा ।” मलय चीखचीख कर रोने लगा था ।

शैलेश लाचारी से बोला था, “मलय की बात बीच में नहीं होती तो मैं किसी को बुला ही लेता, मैं अंधविश्वासी नही हूँ, लेकिन मेरे सीने में बाप का दिल भी है ।”

प्रीति ने मलय को बहुत समझाया, “बेटे! वह तो आँख का भ्रम था । उस ने रबड़ का सांप फेंका और हम लोग डर गये ।”

उसे लगा था, वह अपनेआप को भी बहला रही है, नहीं तो मटमैले रंग के सांप को संदूक के पीछे रेंगते हुए उसने भी देखा था ।

“आप झूठ बोल रही हैं । वह सचमुच का सांप था ।” मलय इतना छोटा भी नहीं था कि असली व नकली सांप की पहचान भी न कर सके ।

“ऐसा करते हैं...चलो मम्मी के घर चल कर रहते हैं ।” प्रीति ने सुझाया ।

“घर छोड़ने पर भी वह बंदिश लगा गया है ।”

“तो क्या सांप के साथ इस घर में रहना होगा ?” उस के शरीर में एक झुरझुरी तैर गई थी ।

“मजबूरी है ।” वह लाचारी से बोला था ।

अचानक कमरे का बल्ब जल उठा । उस ने चौंक कर टार्च बुझा दी । मलय तो उस की गरदन में हाथ डाले व अपनी टाँग उस की टाँग पर रखे सो गया था । चेहरे के तनाव से लग रहा था कि यह किसी सोते हुए बेफिक्र बच्चे का चेहरा नहीं बल्कि आतंक से घिरे हुए बच्चे का सहमा हुआ चेहरा है । नींद उस की आँखों से कोसों दूर थी । शैलेश तो दफ़्तर के काम से थक जाता था, इसलिये वह तो तनाव रहते भी सो जाता ।

वह लेटेलेटे उस मंदिर के बारे में सोचने लगी कि वह कितना रहस्यमय लग रहा था । उज्जैन में कई मंदिरों एवं राजा भर्तृहरि की गुफाएं देख कर वे लौट रहे थे । उस ने तभी ऑटो वाले से पूछा था, “यहाँ कोई और स्थान देखने लायक है ?”

“पास ही कालभैरव का मंदिर है, जहाँ उन्हें शराब पिलाई जाती है ।”

“क्या, वहाँ शराब चढ़ाई जाती है ?” उस ने भी सुन रखा था कि कुछ देवियों के मंदिर में उन के भक्त शराब चढ़ाते हैं । लेकिन कालभैरव का नाम तो वह यहाँ आ कर ही सुन रही थी ।

“शराब भगवान को चढ़ाई नहीं, पिलाई जाती है ।”

“और वह पी लेते हैं?” वह हँस पड़ी थी ।

“आप को विश्वास नहीं है ? चलिये, अभी देख लीजिये ।” उस ने क्रोधित हो ऑटो मोड़ लिया था, “लोग शिव को बहुत मानते हैं...उतनी ही पूजा यहाँ कालभैरव की भी की जाती है । ऐसा माना जाता है कि यह उन तक फरियाद पहुँचाने वाले सेनापति हैं, यदि सेनापति को प्रसन्न कर लिया जाये तो शिव तो प्रसन्न हो ही जायेंगे।”

“और वह सेनापति शराब पी कर प्रसन्न होते हैं?” उसे फिर हँसी आ गई थी ।

“किसी की आस्था का मजाक नहीं उड़ाना चाहिये।” शैलेश ने उसे टोका था ।

बड़े से फाटक व ऊँची ऊँची दीवारों से घिरे उस बड़े से अहाते में पैर रखते ही वह समझ गई थी कि यह मंदिर शमशान घाट के बीच में बना हुआ है । किसी चबूतरे पर राख पड़ी हुई थी तो किसी पर आखिरी सुलगती हुई दो तीन लकड़ियाँ स्थूल शरीर को मात्र राख में परिवर्तित कर रही थीं । यह दृश्य उस ने जीवन में पहली बार देखा था । तभी दो लोग मंदिर में दारू की बोतल लिये आ गये ।

पुजारी ने मंत्र पढ़ते हुए बोतल की शराब प्लेट में उड़ेली व कालभैरव की मूर्ति से लगा दी । देखते ही देखते ही देखते आधी शराब ही प्लेट में बची रह गई । पुजारी उन लोगों के शंकित चेहरे देख कर कहा, “अहिल्या रानी होलकर के समय से लोग इस की खोज बीन करते आ रहे हैं । लेकिन आज तक यह नहीं पता लगा सके कि यह शराब कहाँ जाती है ।”

“अगर हम लोग खोजबीन करना चाहें तो?”

“तो आप को पुरातत्त्व विभाग से अनुमति पत्र लेना पड़ेगा ।” कहते हुए पुजारी ने प्लेट की बची शराब सब लोगों में प्रसाद की तरह वितरित कर दी थी ।

लेकिन कहाँ समय मिला था, खोजबीन करने का । यह अजीब मंदिर व अजीब दृश्य उस के स्मृतिपटल पर हमेशा के लिये अंकित हो गये थे । उस के अहाते में घूमते, शरीर पर भभूत लगाये दो तीन तांत्रिकों ने उस स्थान को और भी रहस्यमय बना दिया था । प्रीति को याद था कि चबूतरे पर पड़ी राख में से अस्थियों को बीनते परिवार को देखकर उस की नसों में कैसी सनसनाहट भी हो रही थी कि तांत्रिक क्या यहीं पर शव पर बैठ कर तंत्रसाधना करते होंगे ?

घर लौट कर कुछ महीनों बाद एक दिन उस ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, देख कर चौंक गई कि सारे शरीर पर भभूत लगाये एक लंबा चौड़ा तांत्रिक साधु खड़ा हुआ है । वह बोला, “मैं सीधा उज्जैन से चला आ रहा हूँ ।”

यदि पहले जैसी प्रीति होती तो एकदम से दरवाज़ा गुस्से से बंद कर देती । उसे साधु संतो की बातें सुन कर बहुत गुस्सा आता था।

“बच्ची, तू इस समय महासंकट में घिरी हुई है ?” साधु ने गर्जना की ।

“हाँ, मेरा बच्चा तीन महिने से बीमार है ।” उस के उतरे हुए चेहरे से न जाने कैसे निकल पड़ा ।

“मैं तेरी विपदा जान कर ही आया हूं ।”

“तो क्या आप कालभैरव के मंदिर से आये हैं ?”

“क्या ? हां..हाँ, वहीं से चला आ रहा हूँ । तू वहाँ माथा टेकने गई थी । कालभैरव तेरे परिवार पर बहुत प्रसन्न हैं । वह शिव के सेनापति है और मैं उनका सेनापति हूँ । उन का दूत बन कर ही तेरे पास आया हूँ ।”

“अंदर आइये महाराज ।” वह पता नहीं उस की बातों से कैसे प्रभावित हो गई थी या इकलौते बेटे की बीमारी ने उसे अंदर तक आक्रांत कर दिया था । सभी तरह के इलाज करवा चुकी थी, लेकिन बुखार था कि टूटने का नाम नहीं लेता था । रोटी का एक टुकड़ा खाते ही उलटी हो जाती थी । वह सिर्फ दूध व फलों के थोड़े से रस पर ही जी रहा था । वह लगातार सूखता जा रहा था । शैलेश व प्रीति उस की चिंता में बेहाल हो चुके थे। उस की मद्धिम पड़ती आवाज सुन कर उन का कलेजा मुँह को आने लगता था ।

वह तांत्रिक खड़ा ही रहा, “कालभैरव के सेनापति कुरसी पर नहीं बैठते...नीचे आसन दे ।”

वह पता नहीं कैसे यंत्रचालित सी अंदर चली गई । एक छोटी सी दरी उस ने नीचे बिछा दी थी । उसे शैलेश का भी भय नहीं लग रहा था कि उस ने किसी साधु को अपने घर में बैठने ही क्यों दिया ।

“अब तू अपने बीमार बच्चे को उठा कर ला ।” तांत्रिक आँखें बंद करता हुआ बोला ।

वह किसी तरह मलय को गोदी में उठा कर ले आई । वह अर्द्धनिद्रा में था । कमजोरी के कारण ठीक से आंखें भी नहीं खोल पा रहा था ।

“इसे मेरे सामने लिटा दे ।”

प्रीति ने फ़र्श पर ही मलय को लिटा दिया । वह तांत्रिक आंखें बंद कर के मंत्र पढ़ता रहा । फिर उस ने क्रोधित हो कर अपनी लाल आँखें खोलीं ।

उस की उन क्रोधित आँखों को देख कर प्रीति कांप गई व पछताने लगी कि इस सूने घर में उस ने इस तांत्रिक को घर में बिठाने की बेवकूफ़ी क्यों की ? लेकिन अब तो बेवकूफ़ी हो ही चूकी थी ।

तांत्रिक उस पर अपनी सुर्ख आंखें गड़ा कर बोला, “तुझ से कालभैरव का अपमान हुआ है।”

“मुझ से? मैं तो थोड़ी देर के लिये मंदिर में गई थी । मुझ से क्या अपमान ?”

“नहीं, तू अच्छी तरह सोच ।”

“मुझे कुछ याद नहीं आ रहा ।”

“फिर से सोच, कुछ न कुछ जरूर हुआ है ।”

उसे ऑटो रिक्शा की अपनी हंसी याद आ गई, जो उसे कालभैरव की बातें सुन कर आ गई थी ।

तांत्रिक उस के चेहरे से समझ गया, “याद आया न? उस बात की सजा उन्होंने तेरे बेटे को दी है । लेकिन तू ने उन्हें सिर भी नहीं झुकाया था, इसलिये मुझे तेरे बेटे को ठीक करने भेजा है ।” उसने अपनी झोली में से पेड़ की छाल निकाली व उसे थमा दी , “इसे सुबह शाम घिस कर इस का एक चम्मच रस बच्चे को दूध में पिलाना । मैं पंद्रह दिन बाद फिर आऊँगा । तब तेरा यह बेटा दौड़ता हुआ मेरे पास आयेगा ।” कह कर वह चला गया ।

प्रीति असमंजस में छाल हाथ में लिये खड़ी रह गई थी । वह दवा मलय को दे या न दे ? शैलेश को यह बात बताये या न बताये ? मलय का शरीर इतना दुबला हो गया था कि वह निरीह लगने लगा था, `जो होगा देखा जायेगा `सोच कर उस ने फैसला किया कि वह छाल घिस कर उसे देगी ही । जंगल की जड़ीबूटियों के बारे में उस ने भी सुन रखा था ।

रोज सुबह शैलेश के दफ़्तर जाने के बाद वह पत्थर पर छाल घिसती और थोड़े से दूध में मिला कर मलय को दे देती । शाम को भी जब शैलेश दफ़्तर से लौट कर अखबार पढ़ने बैठता, तभी वह चुपके से मलय को दवा पिला देती ।

देखते ही देखते मलय स्वस्थ होने लगा । एक सप्ताह के अंदर ही पूरी तरह खाना खाने लगा । शैलेश ने कहा भी, “पता नहीं कौन सी दवा जादू कर गई है ।”

तब धीमे से मुस्कुराते हुए उस ने पूरी बात बताई । इऩसान की सब से बड़ी कमज़ोरी उस की संतान ही होती है । साधु महात्माओं पर अविश्वास करने वाला शैलेश भी तांत्रिक के दर्शन करने को उतावला हो उठा । इसलिये उस ने पंद्रहवें दिन छुट्टी ले ली ।

ठीक पंद्रहवें दिन दोनों का दिल बहुत धड़क रहा था । दोपहर के समय बाहर से आवाज आई, “जय महाकालेश्वर...जय कालभैरव..”

प्रीति ने उत्सुकता से द्वार खोला । फिर दोनों ने भावविह्वल हो कर तांत्रिक के पैर छुए तो वह मुस्कराता हुआ बोला, “मुझे क्या प्रणाम करते हो, कालभैरव को प्रणाम करो ।”

उस को बैठा कर प्रीति अंदर से फल व दूध ले आई । शैलेश ने उन पर एक सौ एक रुपये रख कर कहा, “महाराज, यह छोटी सी भेंट है, स्वीकार कीजिये ।”

“पागल, हमारा अपमान करता है,” वह साधु क्रोध में काँपता हुआ उठ खड़ा हुआ ।

“महाराज, यह आप का अपमान नहीं, मान है,” प्रीति हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाई, “आप बैठिए तो सही।”

प्रीति की गिड़गिड़ाहट से वह पसीज उठा और शांत हो कर बैठ गया, “तुम लोग मूर्ख हो, इसलिये क्षमा करता हूं । तांत्रिक बनने के लिये सब से पहले यही मायामोह छोड़ना पड़ता है । उसी से तुम मुझे बांधने चले हो? तंत्र साधना कोई हंसीखेल नहीं है । मायामोह तो क्या, अपनी जान का मोह भी छोड़ अमावस्या की रात को शव पर बैठ कर साधना करनी पड़ती है । मैंने इस विद्या की साधना दूसरों के दुःखदर्द मिटाने के लिये की है न कि अपने स्वार्थ के लिये । मैं ये चीजें खाने नहीं आया । बस, तुम दोनों के चेहरे पर संतोष व शांति देख कर मन तृप्त हो गया ।” वह तांत्रिक अपने सद्भाव का प्रभाव छोड़ कर वहाँ से चला गया ।

अब तो कभी पंद्रह दिन, कभी महीने या दो महीने में जब भी तांत्रिक उधर से निकलता, उन के हालचाल पूछता चला जाता । मलय के सिर पर हाथ फेरता, “तुझ पर कालभैरव की विशेष कृपा है । बड़ा हो कर कलक्टर बनेगा ।” उस परिवार को अपना संरक्षण देने पर भी एक बार भी उस ने पानी तक नहीं पिया था ।

उन्हीं दिनों शैलेश को अपनी बहन की शादी तय होने की चिठ्ठी मिली । पापाजी ने उसे पत्र में लिखा था, “रीता की शादी तय हो गई है । उस के गहने बनवाने की जिम्मेदारी तुम्हें सौंपता हूं ।”

शैलेश चिंता में घिर गया था । जो भी रुपया जमा किया था, वह तो मलय की बीमारी में ख़र्च हो गया था । सोने के भाव आसमान छू रहे थे । एक तोला सोना खरीदने की बात भी वह सोच नहीं सकता था । कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे ।

“जय कालभैरव,” तांत्रिक इस इतवार को अचानक सामने आ कर खड़ा हो गया, “बच्चा, कुछ परेशान लग रहे हो?”

“नहीं, बस घरेलू मामला था।”

“कुछ धऩ की चिंता है?” वह भेदती हुई दृष्टि से उसे देखते हुए बोला ।

“जी.... आप को कैसे पता लगा?” वह चौंक कर खड़ा हो गया ।

“तांत्रिक से इस जगत की बात कैसे छिप सकती है?”

“तो आप ही इस समस्या से छुटकारा पाने का रास्ता बताइये ।”

“दफ़्तर से ऋण ले लो ।”

“वह तो बड़ी बहन की शादी में ले चुका हूँ । जो पैसा जमा किया, वह मलय की बीमारी में ख़र्च हो गया।”

“तो कुछ तंत्र उपासना करनी पड़ेगी ।”

“ ख़र्च कितना आयेगा, महाराज?”

“माया की बात बीच में मत लाया कर,” हरबार की तरह तांत्रिक की लाल आँखें जल उठीं, “कालभैरव ने तेरी रक्षा का भार हमें सौपा न होता तो तेरे दर पर ऐसे नहीं आते रहते । अगर मंजूर है तो कल अमावस्या की रात तेरे ही घर में अनुष्ठान करेंगे । किसी से कुछ कहना नहीं है । पूजा की सामग्री हम ही लायेंगे ।”

दूसरे दिन अमावस्या की रात थी । तांत्रिक ने रात को नौ बजे घर में उस ने पूजा की सामग्री नीचे सजा दी । फिर एक लाल कपड़ा चौकी के सामने रख कर उस के चारों ओर आटे का चौक बना दिया और कालभैरव की मूर्ति वहाँ रख दी । उस की जलाई अगरबत्ती व धूपबत्ती की खुशबू सब ओर फैल चुकी थी । मंत्र पढ़तेपढ़ते वह प्रीति से बोला, “इस लाल कपड़े पर आधी कटोरी चावल, आधी कटोरी गेहूँ, एक गांठ हलदी रख कर अपन सारे ज़ेवर उतार कर रख दे ।”

प्रीति हिचकिचाने लगी । तांत्रिक दहाडा, “तेरे मन में शंका हो तो पूजा बंद कर दूँ?”

शैलेश के इशारे पर प्रीति ने मंगलसूत्र सहित सब चूड़ियाँ, दो अंगूठियाँ और कान की बालियाँ उतार कर रख दीं ।

तांत्रिक ने थोड़ी देर बाद आँखें खोलीं, “मुझे ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि घर में कहीं और भी सोना है । जब तक सभी सोना इस कपड़े पर नहीं रख दिया जायेगा, तब तक पूजा पूर्ण नहीं होगी । लेकिन यदि पूजा पूर्ण हो गई तो तेरी समस्या हल हो जायेगी । ये गहने दोगुने हो जायेंगे ।”

हवन के धुएं, अगरबत्ती की खुशबू व तांत्रिक के व्यक्तित्व के ज्वलंत प्रभाव ने प्रीति की सोचने समझने की शक्ति नष्ट कर दी थी । वह मंत्रमुग्ध सी उठी और मम्मी का दिया दस तोले का सोने का सेट भी अलमारी से निकाल लाई, जिसे वह एक विवाह में शामिल होने के लिये एक दिन पहले ही बैंक से निकाल कर लाई थी ।

सेट लाल कपड़े पर रखते ही तांत्रिक ने उस कपड़े की पोटली बांध दी व आंखें बंद कर के जाप करने लगा । थोडी देर बाद वह पोटली झोली में रखता हुआ बोला, “कल तुम्हें यह पोटली लौटा दूंगा । अब शमशान जा कर तंत्रसाधना करनी पड़ेगी ।”

“यह क्या कर रहे हैं? मेरे ज़ेवर आप ने वापस नहीं लौटाये तो ?” प्रीति हड़बड़ा कर खड़ी हो गई ।

“लडकी, मुझ पर शंका करती है ?”

“आप का हम बहुत आदर करते हैं, लेकिन यह ज़ेवर आप को मैं नहीं ले जाने दूँगा।” शैलेश तांत्रिक की झोली में हाथ डालने के लिये झपटा । तांत्रिक ने उसका हाथ पकड़ लिया लेकिन शैलेश ने अपना हाथ छुड़ाकर उसके थैले में से गहनों की पोटली निकाल ली और पत्नी की तरफ उसे उछालते हुए बोला ,"तुम इसे अंदर अलमारी में लॉक कर दो और कमरा अंदर से लॉक करके वहीं बैठ जाओ. "

तांत्रिक ने तुरंत ही उस झोली से सांप निकाल लिया, “वहीं रुक जा, नहीं तो यह सांप तुझे डस लेगा ।”

शैलेश सहम कर अपनी जगह खड़ा रह गया ।

तांत्रिक आगबबूला होता हुआ बोला, “उज्जैन के महाकालेश्वर के सेनापति हैं कालभैरव, कालभैरव का सेनापति हूँ मैं और यह सांप मेरा सेनापति है । मैं अपना सेनापति तेरे घर छोड़ कर जा रहा हूँ । यदि तू ने मेरे बारे में किसी से चर्चा की या घर छोड़ कर कहीं गई तो मेरा सेनापति तेरे इस इकलौते बेटे को उसी समय डस लेगा । मेरी बात सदा याद रखना...” कहते हुए उस ने अंदर के दूसरे कमरे में सांप फेंक दिया ।

प्रीति पलंग पर लेटे लेटे सोच रही थी कि कैसी दहशत ने उस के घर को गिरफ्त में लिया हुआ है । चार पांच दिन पहले ही शैलेश ने समझाया भी था, “अब तक तो वह सांप कहीं बाहर निकल गया होगा । इतने दिन छिप कर नहीं बैठ सकता ।”

“मैं तुम्हारी बात कैसे मान लूं ? आज ही मैंने बक्स के नीचे डंडे की सहायता से मरा हुआ चूहा निकाला है।”

“मरे हुए चूहे तो अपने यहाँ पहले भी निकले हैं ।”

“लेकिन इस चूहे की दशा देखी नहीं जा रही थी।”

प्रीति ने पलंग पर पड़े पड़े सोचा, ‘`उन लोगों की हालत भी चूहों जैसी हो गई है । अपने ही घर में डरे सहमे पिंजरे में कैद चूहे जैसे, जो हर आहट पर अपने भयभीत विस्फारित नेत्रों से इधर उधर देखता रहता है । आखिर कब तक यह हालत रहेगी ? यह जीना भी कोई जीना है, डर की परछाईं तले सहमे सहमे सांस लेना ?” कुछ तो निर्णय लेना ही होगा । कल वह अपनी मम्मी से इस समस्या पर जरूर बात करेगी ।’ सोचते हुए वह निश्चिंत हो सोने की कोशिश करने लगी ।

मम्मी तो पूरी बात सुन कर सन्न रह गईं । “तू इतने दिनों से इतनी भयंकर परिस्थिति में जी रही है और मुझे बताया भी नहीं ।”

“मम्मी , इस समस्या का कोई हल भी तो नहीं है । मलय की बात बीच में है ।”

“हर समस्या का कोई न कोई हल होता है । आज मलय के स्कूल से वापस आने तक कुछ न कुछ हल ढूँढ़ना ही होगा ।”

मम्मी उसे अपने साथ रिक्शा में बिठा कर शहर के बाहर बनी सपेरों की बस्ती में ले गई । एक सपेरे को उन्होंने बताया, “हमारे घर में से सांप निकालना है ।” उसे संक्षेप में बात बता दी गई ।

सपेरे ने प्रीति के घर में आ कर बड़े कमरे में कटोरे में दूध रखवाया व बीन बजाने लगा । थोडी देर में एक मटमैला सांप झूमता हुआ बाहर निकल आया व कटोरी में से दूध पीने लगा । उसे देख कर सपेरा बहुत ज़ोर से हंस पड़ा,“आप इस सांप से डरे बैठे थे?”

उस ने एक झटके से सांप की पूंछ पकड़ कर उसे ज़ोर से घुमा दिया, “यह सांप तो जहरीला हो ही नहीं सकता । यह तो खुद आदमी को देख कर डर कर भागता है । इसे मैं अपने साथ लिये जा रहा हूँ ।” कहते हुए उस ने अपने थैले में सांप को डाल दिया ।

मलय की आंखों में शांति थी । वह अब निश्चिंत था ।

सपेरा रुपये मिलने से खुशखुश चला गया । प्रीति विस्मित सी पीछे रह गई, ‘तो क्या वह डर, वह सहमना, रातों की नींद उड़ जाना, एक भ्रम से पैदा डर था? कोई ठग जंगली जड़ीबूटियों की थोड़ी सी जानकारी से तांत्रिक बन कर ठगता रहा । उन दोनों को मलय क बीमारी ने इतना अशक्त बना दिया था, जो उस ठग की बातों मे आ गए ।’

उस के बाद वे हर रात चैन की नींद सोने लगे ।

यह तो मम्मी ने कई माह बाद बताया कि सपेरा, जो सांप पकड़ कर ले गया था उसने बीन बजाने की व दूध का कटोरा रखने का अभिनय किया था। । बीन सुनकर भला बहरे सांप कहीं आते हैं ? और साँप भी भला दूध पीते हैं ? शायद ये इत्तेफ़ाक़ हो कि भूखा साँप अपने शिकार के लिये सामान के पीछे से निकला हो ।

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- श्रीमती नीलम कुलश्रेष्ठ

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