नैनं छिन्दति शस्त्राणि - 17 in Hindi Novel Episodes by Pranava Bharti books and stories Free | नैनं छिन्दति शस्त्राणि - 17

नैनं छिन्दति शस्त्राणि - 17

17

पता नहीं क्यों समिधा को उसके शब्द कुछ सहमे से हुए लगे, वह बिना कुछ उत्तर दिए चुपचाप बाहर की ओर चल पड़ी | जहाँ यह काफ़िला ठहरा हुआ था उसी बँगले के सामने एक नाला खोदा जा रहा था जहाँ दस/पंद्रह मज़दूर काम कर रहे थे | समिधा ने उन्हें पहले भी देखा था परंतु चाहते हुए भी अभी तक उनसे बात नहीं कर पाई थी | यदि किसी भी स्थान की वास्तविकता से अवगत होना हो तो वहाँ के पुराने निवासियों तथा निचले तबके के लोगों के पास जाना चाहिए | इनसे ही स्थान विशेष की संस्कृति का पता चलता है | 

खुले रूप में तीर-कमान अपने पास रखने वाला आदिवासी उसे कहीं से भी अपराधी नहीं लगा था | समिधा जब बँगले में पहुँची रैम को अपनी प्रतीक्षा करते हुए पाया | उसका खाना आ चुका था और रैम बिना खाना खाए उसकी प्रतीक्षा कर रहा था | 

“कहाँ चली गईं थीं आप मैडम ? बहुत देर हो गई, आपको भूख लगी होगी | ”वह एक ही साँस में बोल गया | 

“ऐसा करो, तुम खा लो –मुझे अभी भूख नहीं है –मैं अभी सामने वाले मज़दूरों से मिलकर आती हूँ | ”

कहकर समिधा ने कमरे में जाकर टौफ़ियों और बिस्किटों व और अन्य खाने की चीज़ों के पैकेट्स लिए और बाहर की ओर चल दी | रैम भूख के मारे बेहाल हो रहा था, उसने कहा भी कि वह खाने के बाद समिधा के साथ चलेगा पर समिधा ने उसे समझाया कि वह अभी नाश्ता करके आई है, थोड़ी देर में आकर खा लेगी, सामने ही तो जा रही है | जानती थी, अभी उसने आलस्य किया तो बाद में आसानी से निकल नहीं पाएगी | वह उन लोगों से जल्दी मिलना चाहती थी जिन्हें उसी दिन से कड़ी धूप में खुदाई करते देख रही थी जिस दिन से वह यहाँ आई थी | 

दो मिनट में समिधा उस मिट्टी के ढेर के पास पहुँच गई जहाँ आदिवासी औरतें और मर्द अपने काम में फुर्ती से लगे हुए थे | पुरुष मज़दूरों ने अपनी जाकेटनुमा बंडी या कमीज़ें मिट्टी के ढेर पर रखी हुईं थीं और पसीने से तरबतर, बिना इधर-उधर देखे खुदाई में मसरूफ़ दिखाई दे रहे थे | औरतें उनकी खोदी गई मिट्टी तसलों में भर-भरकर मिट्टी के टीले पर फेंक रहीं थीं जिससे वह मिट्टी का टीला खूब ऊँचा होता जा रहा था | मिट्टी के इस ढेर पर ही बच्चे कूदा-फाँदी मचा रहे थे | 

उसे अपनी ओर बढ़ते देख औरतों के हाथ का काम कुछ सुस्ता सा गया, वे चोरी-छिपे उसकी ओर देखने का उपक्रम करने लगीं, उधर से उन्हें पुरुष उन्हें मिट्टी भरने के लिए उन्हें आवाज़ दे रहे थे | जब उन्होंने किसी भद्र महिला को मज़दूर औरतों के पास खड़े देखा तो फावड़ा चलाते हुए उनके हाथ भी थम गए और वे जिज्ञासावश समिधा की ओर ताकने लगे | 

समिधा औरतों की ओर देखकर मुस्कुराई और उन्हें अपने पास आने का इशारा किया परंतु वे उसे दूर से ही ताकती रहीं | एक मिनिट प्रतीक्षा करके उसने दुबारा से औरतों को अपने पास आने का इशारा किया | दो-एक औरतों ने सिर पर ढके हुए और पीछे कमर पर लटकते हुए पल्लू का कोना पकड़कर अपने दाँतों में कैद कर लिया और एक-दूसरे को देखकर धीमे से मुस्कुराने लगीं | फिर उनमें से दो ने अपने हाथों के तसलों को मिट्टी के ढेर पर रख दिया और शरमाते से कदमों से आगे बढ़ीं | 

“सब आओ न ---!”

समिधा ने मर्दों को भी अपनी ओर आने का संकेत किया | शोर सुनकर समिधा ने मिट्टी के ढेर के दूसरी ओर देखा –

अरे! इतनी देर में बच्चे मिट्टी के ढेर से दूसरी ओर पहुँच गए थे और सब एक गोल घेरे में खड़े होकर शोर मचाते हुए पेशाब करने लगे थे | समिधा के चेहरे पर मुस्कान तैर गई | बच्चे अलग-अलग किस्म की कितनी बचकानी हरकतें करते रहते हैं !

औरतों ने पीछे घूमकर बच्चों को आवाज़ दी फिर मर्दों की ओर देखा और उन्हें हाथ के इशारे से बुलाया | कुछ असमंजस की सी स्थिति में मर्द मज़दूरों ने अपने हाथ के फावड़े लगभग फेंकने की मुद्रा में नीचे रख दिए और कोई अपने सिर पर बाँधे अँगोछे से तो कोई अपनी लुंगी नीची करके अपने मुँह से टपकते पसीने को पोंछते हुए उसकी तरफ बढ़ने लगे | 

औरतें पहले ही उसके पास पहुँच चुकी थीं और संकोच में भरी उसके सामने अपने आधे चेहरे को पल्लू में छिपाए खड़ी हो गईं थीं | 

“लो, तुम्हारे लिए है –“

समिधा ने टॉफी, बिस्किट और नमकीन के छोटे-छोटे पैकेट्स उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा | वे संकोचवश अभी भी आगे नहीं बढ़ रहीं थीं | अब तक मर्द भी आकर उनके पीछे खड़े हो गए थे | क्षण भर में मिट्टी के टीले के दूसरी ओर से फलाँगे मारते बच्चे भी अपनी नेकरें या पायजामानुमा अधोवस्त्र सँभालते हुए उसको घेरकर खड़े हो गए | 

“अरे ! लो न ---!” समिधा ने अपने पास खड़ी औरत का हाथ पकड़कर उसके हाथ पर लगभग ज़बरदस्ती खाद्य-सामग्री कुछ इस प्रकार रख दी जैसे कह रही हो ----“ऐसे तो कैसे नहीं लोगी ?”यानि लेना उनकी मज़बूरी थी----!

समिधा ने देखा सभी लोगों की दृष्टि उसके कंधे पर लटके हुए झोले पर थी | 

“सबके लिए है –“समिधा ने कहा और अपने कंधे पर लटके हुए बैग में से पैकेट्स निकालकर सबको देने लगी | छोटे-बड़े हाथों में टॉफी और बिस्किट्स थमते हुए उसने देखा ये वो ही बच्चे थे जो उस दिन गाड़ी के रुकते ही भागते हुए आकर गाड़ी को घेरकर खड़े हो गए थे और बंसी ने उन्हें डाँटकर भगा दिया था | 

बंसी ने उसे बताया था कि ये बच्चे बड़े बदमाश हैं, गाड़ी के टायरों पर कुत्ते की तरह पेशाब करके भाग जाते हैं | ये ही बच्चे बँगले में आकर रहने वालों के कार्य -कलापों  को देखने के लिए एक-दूसरे की पीठ पर चढ़कर ऊँची खिड़की में से भीतर झाँकने का प्रयास करते थे | 

बच्चों की आँखों से शैतानी झर रही थी, स्वादिष्ट खाद्य-पदार्थ के स्वाद ने उनके मुँह में पानी भर दिया था | यह समिधा को साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था और उनके खिले हुए प्रसन्न मुखड़े देखकर उसे अच्छा लग रहा था | सब वहीं मिट्टी के ढेर पर नीचे-ऊपर बैठकर स्वाद लेने लगे थे | उनके सहमे हुए चेहरों पर समिधा के लिए धन्यवाद का भाव पसरा हुआ था और समिधा के चेहरे पर तृप्ति का !

एक बेहद शरारती बच्चा उसे घूर रहा था | समिधा ने अचानक ही उसका हाथ पकड़ लिया और बोली ;

“अच्छा ! तू ही बदमाशी करता है ?”

बच्चा भयभीत होकर भागने की कोशिश करने लगा | समिधा की पकड़ से न छूट पाने पर वह रुआँसा हो उठा | उसने देखा, एक नन्हा सा भय उसकी शरारती आँखों में से झाँकने लगा था | बारी-बारी से सब मर्द और औरतें बिस्किट चबाते हुए उसे देखते रहे | 

“अब क्यों डरता है?” समिधा ने बच्चे से पूछा जिसकी आँखों में उसे एक हिंसा सी उभरती दिखाई देने लगी थी| यकायक बंसी का चित्र उसकी आँखों में घूमने लगा था | , वही तो उन्हें डाँटकर भगा देता था | 

“तुम इन सबके लीडर हो ---?”

“डरो मत, मैं कल वापिस जा रही हूँ, शाम को अपने दोस्तों के साथ आ जाना, मैं तुम्हें गाड़ी में सैर कराने लेकर चलूँगी | ”

उसकी बात सुनकर बच्चे की आँखों में अविश्वास तैरने लगा | समिधा ने उसका हाथ छोड़ दिया और बच्चे के मिट्टी भरे बालों में प्यार से हाथ फिरा दिया | समिधा ने बच्चे के चेहरे पर एक तरलता और धन्यवाद का भाव महसूसा | उसकी आँखों में एक ऐसा अधपका अविश्वास भर उठा था मानो कोई स्वप्न-परी उसके समक्ष आकार खड़ी हो गई हो और वह अपने सपने पर भौंचक हो गया हो | 

“अरे! ऐसे क्या देख रहा है ---पक्का, ले जाऊँगी | सब दोस्तों को लेकर आ जाना | आएगा न ?”

“हो---हो –“बच्चों ने मिलकर उछलते हुए शोर मचाकर अपनी प्रसन्नता प्रदर्शित की और भाग गए | 

Rate & Review

Pranava Bharti

Pranava Bharti Matrubharti Verified 3 months ago