नैनं छिन्दति शस्त्राणि - 20 in Hindi Novel Episodes by Pranava Bharti books and stories Free | नैनं छिन्दति शस्त्राणि - 20

नैनं छिन्दति शस्त्राणि - 20

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सारांश जानते थे समिधा अपने मन से कुछ भी कह व कर सकती है पर किसी के बाध्य करने पर कुछ भी नहीं | फिर भी उन्होंने पत्नी को मनाने का प्रयत्न किया | 

“करवा दो न भाई, काम पूरा---“

ये वही सारांश थे जो उसे परेशान देखकर इस योजना को छोड़ने के लिए उसे बाध्य कर रहे थे ! कमाल है सारांश भी! कभी अट्ट, कभी पट्ट !! वैसे तो इतने अवरोध डाले बीच में, अब जब वह काम करना चाहती है और अब जब वह जाना नहीं चाहती तब दामले की सिफ़ारिश कर रहे हैं ! कहीं कहीं उसका अहं सिर उठाने लगता है | वह जो कुछ करना चाहे करे, किसीके कहने से क्यों करना चाहिए उसे ?

ऐसी बात नहीं है, अक्सर समिधा को यह लगता ही है कि सारांश के कारण ही तो वह वो सब काम कर पाई है जो वो करना चाहती थी | फिर भी अकड़ है कि भीतर ही लपेटे से मारती रहती है !वास्तव में इंसान का अहं इंसान से बड़ा होता है इसीलिए तो वह जाने-अनजाने न जाने कितने झमेले पाल लेता है !

सारांश की सिफ़ारिश पर तो नहीं लेकिन हाँ, उसे लगा कि उसे चले जाना चाहिए और अपने मन की मालकिन बन समिधा ने जाने का निर्णय ले लिया | कभी-कभी मनुष्य को लगता है कि उसे फ़लाना काम कर लेना चाहिए और वह अपने अन्तर की आवाज़ अनसुनी नहीं कर पाता | वही आभास समिधा को हुआ और उसने दामले को हरी झंडी दिखा दी | 

पुण्या दूरदर्शन में उद्घोषिका थी, वह भी साथ आ रही थी | इस कार्यक्र्म की वही एंकर थी | दूरदर्शन में कार्यक्रम के दौरान उसकी पुण्या से हाय, हैलो तो कई बार हुई थी | उसने ¾ वर्ष पूर्व पुण्या के विवाह की बात सुनी थी | विवाहोपरांत वह लंदन भी चली गई थी | 2/1 वर्ष पूर्व दोनों ने एक-दूसरे को दूरदर्शन में देखा तो दोनों ओर से मुस्कान का आदान-प्रदान हुआ | बाद में किसी के माध्यम से समिधा को पता चला कि पुण्या सदा के लिए भारत वापिस आ गई थी | 

पुण्या को दामले पहले ही तैयार कर चुके थे और अब जैसे-तैसे समिधा भी तैयार हो गई थी अत: दामले प्रसन्न थे | सुनिश्चित दिन पर पहले दामले कुछ अन्य साथियों सहित समिधा को लेने पहुँचे फिर पुण्या को लेने | इस बार प्रसून नामक एक युवक भी दामले के साथ था और पूर्व -परिचित ड्राइवर बंसी भी---एक बार पुन: कारवाँ अपने गंतव्य झाबुआ की ओर बढ़ने लगा | इस बार उन्हें अलीराजपुर जाना था जिसका रास्ता झाबुआ होकर जाता था | 

गाड़ी में चुप्पी पसरी रही, एक अनजान सी चुप्पी !काफ़ी देर तक सभी चुप बैठे रहे | एक ऐसी चुप्पी जो भीतर ही भीतर कुछ बोलती है, शब्द मुँह में भरे रहते हैं –बस, निकालने भर की ताक में सब सुराग की तलाश में रहते हैं | पुण्या से तो उसका परिचय था भी पर प्रसून जो उभरता हुआ फोटोग्राफ़र था, सब उसे पहली बार ही मिले थे | वह शायद कम बोलता था, समिधा को ऐसा भी लगा | गाड़ी में मि. दामले के उपस्थित रहते हुए भी इतनी चुप्पी !कमाल था, सबके बीच जैसे एक झिझक सी पसरी हुई थी जो कम से कम समिधा को बहुत अजीब लग रही थी | यह भी संभव था कि मन में सभी यही सोच रहे हों कि पहल कौन करे ?

समिधा व पुण्या बीच में बैठे थे, दोनों में कुछ ही देर में वार्तालाप का सिलसिला प्रारंभ हुआ | दामले कानों पर हैडफोन चिपकाए बैठे थे | ड्राइवर बंसी और नवयुवक फोटोग्राफ़र प्रसून बिलकुल गुमसुम थे | शनै: शनै: दोनों की फुसफुसाहट बातों में तबदील होती जा रही थी | समिधा को लगा वह किसी रेल-यात्रा में है और जैसे बहुधा रेल-यात्रियों के बीच होता है, पहले सब गुमसुम बैठे रहते हैं फिर धीरे-धीरे इधर-उधर देखते हुए परिचय की सरगर्मी शुरू होती है और गंतव्य तक पहुँचने तक ‘हम सब एक राह के राही‘हो जाते हैं | बिछुड़ने के समय ऐसे मुहब्बतों के साथ विदाई होती है कि न जाने कितने पुराने मित्र बिछुड़ रहे हों और जल्दी ही फिर एक-दूसरे से मिलेंगे | आना-जाना होगा ---वायदों की एक कतार---डिब्बों से उतरकर जाते हुए पीछे मुड़-मुड़कर ऐसे देखा जाता है मानो कितनी पीड़ा हो रही हो | होती भी है पीड़ा पर घर पहुँचते ही सब वायदे ---हवा में तैरने लगते हैं | 

रेल-यात्रा में किए गए वायदे, मुस्कुराहटें, खिलखिलाहटें, बातें ---सब समाप्त !समिधा कुछ ऐसा ही महसूस कर रही थी | धीरे-धीरे अब दोनों में रेल-यात्रियों की सी मित्रता होने लगी थी, समिधा यही सब सोचकर मुस्कुरा रही थी | पुण्या ने जब समिधा से मुस्कुराने का कारण पूछा और उसने अपने मन में चलने वाले भाव बताए | दोनों इतनी ज़ोर से हँस पड़ीं कि दामले साहब को अपने कान खोलकर पूछना ही पड़ा | 

“क्या हुआ मैडम ? काय झाला ?”

“ये आपके राज में गाड़ी में--- चुप्पी खल रही है मि. दामले –“

“ओह !बिलकुल मैम –मेरे को भी तो ---अरे भाई प्रसून –आप भी थोड़ा ‘कम्फ़र्टेबल’ हो जाओ यार | दामले ने प्रसून को हिलाया | 

“आपको नहीं लगता, आप हम लोगों से अन्याय कर रही हैं ?”अचानक कामले ने दोनों स्त्रियों को टार्गेट किया और बिना इधर-उधर देखे पलक झपकते ही पुण्या के हाथ से वेफ़र्स का पैकेट लपक लिया, उसे तब चला जब अपना हाथ ख़ाली पाया | 

“मैं जानता हूँ मैडम –हर बार की तरह सर ने बैग भरकर दिया है आपको | ”प्रसून तथा बंसी की ओर पैकेट घूमकर दामले आराम से कचर-कचर चबाने लगे | 

धीरे-धीरे प्रसून भी सबसे खुल गया और गाड़ी में कुछ इधर-उधर की, कुछ काम की, कुछ बेकार की बातों का सिलसिला शुरू हो गया | 

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Pranava Bharti Matrubharti Verified 3 months ago