नैनं छिन्दति शस्त्राणि - 23 in Hindi Novel Episodes by Pranava Bharti books and stories Free | नैनं छिन्दति शस्त्राणि - 23

नैनं छिन्दति शस्त्राणि - 23

23

अब पीं-पीं करती हुई पुलिस की एस्कॉट-वैन ने उनकी गाड़ी के सामने से निकलकर आगे आकर एक टर्न ले लिया था और तेज़ी से भागने लगी थी | उस वैन के पीछे शूट की दो गाड़ियाँ थीं और उनके पीछे संभवत: अब तक बीस-पच्चीस गाड़ियों का एक कारवाँ चलना शुरु हो गया था | 

घना अंधकार—केवल गाड़ियों की आगे-पीछे की बत्तियों की रोशनी उस घने अंधकार को चीरती हुई आगे की ओर बढ़ती जा रही थी | पुलिस की गाड़ी इतनी तेज़ी से ऊपर–नीचे टीलों वाले मार्ग पर न जाने पल भर में कहाँ की कहाँ पहुँच गईं थीं | रास्ते में किसी भी प्रकार की रोशनी के चिन्ह नहीं थे और सारी गाड़ियाँ पुलिस की गाड़ी की रफ़्तार के समान तेज़ी से भाग नहीं पा रहीं थीं | जब गाड़ी किसी ऊँचे स्थान पर पहुँचती तब क्षण भर को उसकी रोशनी दिखाई दे जाती फिर पल भर में ही गायब हो जाती | 

तात्पर्य यह कि एस्कॉट-वैन का होना, न होना बराबर ही था | कुछ देर तो पी-पीं की आवाज़ आती रही, बाद में वह भी बंद हो गई | रात के सन्नाटे को चीरते ट्रक, बसें व गाड़ियों की घर्र घर्र और पीं-पीं की आवाज़ें –और कहीं कुछ नहीं | गाड़ियों में बैठे हुए यात्रियों के साथ जैसे गाडियाँ भी सहमी हुई थीं | 

“बताइए, इस खाना-पूरी का मतलब क्या है भला ? है कहाँ वह पुलिस की गाड़ी ?”समिधा ने चिंतित स्वर में कहा | 

“अरे ! मैडम, आप चिंता क्यों? “

मि. दामले के शब्द मुँह में भरे हुए ही रह गए, न जाने किधर से एक ज़ोरदार आवाज़ आई| अँधेरे को चीरता हुआ एक बड़ा सा पत्थर गाड़ी के आगे काँच को तोड़ता हुआ न जाने किधर उछल गया | अंदर बैठे हुए लोग सन्न रह गए | विंड स्क्रीन के काँच टूटने की कड़कती आवाज़ से सबको आभास हो गया था कि वह टूट गया है परंतु अंदर सब चुप्पी साधे बैठे रहे | बंसी ने फुर्ती से गाड़ी की स्पीड दबा दी | 

गाड़ी में बैठे-बैठे पीछे की गाड़ियों की तेज़ रफ़्तार को भली प्रकार महसूस किया जा सकता था | लगभग पैंतालीस, पचास मिनट में एक टिमटिमाती लटकती रोशनी के पास जाकर गाड़ी रुकी, जहाँ पुलिस एस्कॉट खड़ी हुई थी | शूट के लिए आई हुई दोनों गाड़ियाँ वहीं रुक गईं, पीछे आने वाले सभी वाहन अपने गंतव्य पर पहुँचने के लिए आगे बढ़ गए | 

छुटपुट सी रोशनी में पुलिस के लोग चाय की चुसकियाँ ले रहे थे | दूसरी गाड़ियाँ पल भर पूर्व ही वहाँ पहुँची थीं | 

“कमाल है न हमारी पुलिस व्यवस्था का भी –“

समिधा ने नीचे उतरकर गाड़ी के आगे के टूटे हुए काँच को देखते हुए कहा | 

सब चुप्पी साधे खड़े थे !यह क्या बात हुई भला !आदमी अपना मंतव्य भी प्रस्तुत नहीं कर सकता ? उसका मन कह रहा था इन लोगों को ‘ड्यूटी’का अर्थ समझाना आवश्यक है | किसी को तो बताना ही चाहिए कि पुलिस-एस्कॉट के साथ आने का अर्थ क्या है भला ? मुँह पर चुप्पी का टेप चिपकाए बैठना उचित भी तो नहीं है | यदि कोई कुछ कहेगा ही नहीं तो इनको कैसे समझ में आएगा कि यह ठीक नहीं है ! एक बात से उसे बहुत दुख होता था कि बहुधा लोग ‘चलता है’ कहकर बातों को नज़रअंदाज़ करके आगे बढ़ जाते हैं | कहीं पर भी देख लीजिए, यह एक आदत सी पड़ती जा रही है | जिस काम में कुछ तकलीफ़ हो, अथवा जिस काम को करने में थोड़ा सा भी कष्ट हो उसे ‘सब चलता है ‘कहकर छोड़ दिया जाता है | 

यह समिधा की बुद्धि से परे था, आखिर क्यों चलता है ?क्यों आदमी अपने कर्तव्यों से विमुख हो रहा है ? किसी न किसी प्रकार जीवन घसीटना ही है तो कहीं भी पड़ा रहे –इतने प्रयत्न करने की –इतने हाथ-पैर मारने की भला आवश्यकता ही क्या है ?सभी उसको अजीब सी निगाहों से देखने लगे थे | अजूबा सी बन गई थी क्या वह अचानक ?

“मैंने कुछ गलत नहीं कहा !आप ही बताइए थानेदार साहब !क्या आपको मालूम होता है अपनी गाड़ी के अलावा पीछे चलने वाली गाड़ियों के बारे में ? दूसरी गाडियाँ आपसे कितनी दूरी पर हैं ? उनके साथ क्या घटित होता है ? क्या यह केवल खाना पूरी नहीं है ?आप तो यह भी नहीं जानते कि हमारी गाड़ी पर पत्थर मरा गया था ? देखिए, इसका काँच !आप तो अपनी तथाकथित ड्यूटी करके चले आए | ”तकलीफ़ उसके चेहरे पर चुगली खा रही थी | सच!आज कितने लोग हैं जो अपना कर्तव्य ईमानदारी से निबाहते हैं ? इसी प्रकार की परिस्थितियों में समिधा को अपने दिवंगत मित्र की याद बरबस ही आ जाती थी | 

समिधा बोले जा रही थी, इस बात से बेख़बर कि उसके बोलने का प्रभाव किस पर क्या पड़ सकता है ?आहत थी कि कोई भी उसकी ओर से बोलने के लिए तत्पर नहीं था बल्कि उसके चारों ओर एक अजनबी दृष्टियों का जाल सा बनता जा रहा था | 

पुलिस वालों के हाथों चाय के प्याले थमे हुए रह गए | आज तक किसी ने उनसे इस प्रकार की बातें नहीं की थीं, वे इस प्रकार की बातें सुनने के आदी ही नहीं थे | वे बेचारे तो अपना पेट पालने के लिए रात में रोज़ाना न जाने कितनी बार गाड़ियों के चक्कर काटते थे | वे न तो किसी की सहानुभूतिवश आते थे, न ही वे मानवीयता की सेवा कर रहे थे | समिधा को अपनी ही बात अटपटी लगी परंतु वह तो अपने मन की भड़ास निकाल चुकी थी –बाकी लोग चुप ही बने रहे, माहौल भारी हो गया था | 

पुलिस वालों ने अपने हाथ में पकड़े चाय के प्याले पास पड़ी मेज़ पर रख दिए और वापिस जाने को तत्पर हुए | मि. दामले उनकी ओर तेज़ी से बढ़े और हाथ मिलाते हुए उन्होंने कहा –

“थैंक्स बौस “

पुलिस वालों ने एक करारी दृष्टि समिधा पर फेंकी जिसको देखकर वह सहम गई पर अपनी मुख-मुद्रा में उसने कोई परिवर्तन नहीं आने दिया | वह हक्की-बक्की रह गई, कमाल है न !वह एक पागल की भाँति प्रलाप कर गई और किसीके कान पर जूँ भी नहीं रेंगी | उसके लटके हुए मुँह को देखकर पुण्या उसे अपने साथ एक ओर ले गई और वहाँ पड़ी एक बैंच पर बैठा दिया | वह बहुत असहज दिखाई दे रही थी | पुण्या ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर सांत्वना देने का प्रयास किया | 

“रिलैक्स दीदी ---“

“तुम्हें अजीब नहीं लगा ?”

“मैं बहुत कुछ देख चुकी हूँ –आप पहली बार आईं हैं न !”

हाँ, --समिधा को लगा, पुण्या ठीक कह रही है ।न जाने यहाँ कैसा माहौल है ? वह बिना कुछ जाने, बिना कुछ समझे अपनी भड़ास निकाले जा रही है | अब क्या करे ? जो असहज लगा, वह मुँह से निकल गया| समिधा मन को शांत करने का प्रयास करने लगी | 

टिमटिमाती रोशनी के बीच प्लेटों में घुलबत्ता भात और आलू का रसा परोस दिया गया था | सबको ज़ोरदार भूख लगी थी –जैसे-तैसे भात में आलू का रसा मिलाकर निगला गया | समिधा का मन कुछ भी खाने का नहीं था | इस समय उसके स्वाभिमान की भूख ने उत्पात मचा रखा था, उसके पेट में नहीं, मन में ऐंठन हो रही थी| भड़ास निकल जाने के पश्चात पेट में भी कुलबुलाहट शुरू होने लगी | सो—सामने वाली प्लेट में से चम्मच उठाकर खाने का प्रयास किया | आलू में नामक, मिर्च के अलावा और किसी चीज़ का स्वाद नहीं था | 

गाड़ी में बैठने के बाद अब दामले सर का मुँह खुला | 

“मैडम ! आप सोच रही होंगी, मैं उस समय कुछ क्यों नहीं बोला –? लेकिन मैडम, यह इलाक़ा बहुत ख़तरनाक है—और ये सिपाही भी तो उन्हीं आदिवासियों में से ही हैं –इनका कोई भरोसा नहीं रहता | 

दामले ठीक कह रहे थे, समिधा को अपने आप पर खीज हो आई | पता नहीं क्यों उसके गले इतनी सी बात नहीं उतर पाती कि दुनिया उसके हिसाब से नहीं चलती | जो भी बात उसे गलत लगती है, उसे कहे बिना वह रह ही नहीं पाती | कुछ भी गलत उतर ही नहीं पाता उसके दिमाग में ! जैसे कुछ अपच सा हो जाता है, जब तक वह निकाल न दे, मन में ऐंठन सी होती रहती है | सारांश से न जाने कितनी बार इस बात पर उसकी झड़प हो चुकी है | आख़िर क्यों वह फटे में टाँग अड़ाती घूमती रहती है | परंतु वह समिधा है, उसे किसी की भी आग में स्वयं को झौंकना होता है, वह कहाँ और कैसे किसी की बेतुकी बात को पचा सकती है ?

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Pranava Bharti

Pranava Bharti Matrubharti Verified 2 months ago