जीवन ऊट पटाँगा - 10 - दीव के तट पर in Hindi Short Stories by Neelam Kulshreshtha books and stories Free | जीवन ऊट पटाँगा - 10 - दीव के तट पर

जीवन ऊट पटाँगा - 10 - दीव के तट पर

नीलम कुलश्रेष्ठ

सुना है गुजरात के पड़ौसी केंद्रीय शासित प्रदेश दीव को स्मार्ट सिटी बनाने का काम बहुत ज़ोर शोर से चल रहा है वर्ना बस में भावनगर से आगे के रास्ते में सड़क की बदहाली के कारण शरीर के अंजर पंजर ढीले हो जाते हैं. ये रास्ता फ़ोर लेन रास्ते से जुड़ेगा और ये भव्य पर्यटन स्थल के रुप में जाना जायेगा वर्ना यहाँ दो तीन रिज़ॉर्ट बन गए हैं, उससे क्या ? इस बार हम दीव पहुँचकर फेरी में बैठकर समुद्र के रास्ते एक विवाह में शामिल होने जा रहे हैं. सुबह के दस बज़ रहे है इसलिए फेरी भरी हुई है ऑफ़िस जाते लोगों से, भारी भरकम स्कूल का बैग उठाये बच्चों से. मछुआरिनें इसके फ़र्श पर बैठी चख चख कर रहीं हैं. उनके टोकरों से आती मछलियों की बदबू से परेशान हो मै अपनी नाक पर रूमाल रख लेती हू. फेरी के इंजन की आवाज़ भी अलग होती है जिसे किसी बड़े पाइप में से ज़ोर से धुँआ फूँका जा रहा हो -"फुक--फुक ---फुक"

फेरी कुछ आगे बढ़ी है कि मै एक द्रश्य देखकर चकित रह जाती हूँ --दूर दिखाई दे रहा है एक अधबना पुल समुद्र के बीच में दो चार खम्बों पर टिका हुआ. उसकी हालत देखकर लग रहा है कि उसे बने अरसा हो गया --जैसे काम बीच में ही रुक गया हो. मै इनसे कहती हूँ, "अरे देखो कैसा पुल है अधूरा. "

सामने की तरफ बैठा एक नौजवान मुसकरा देता है, "आंटी !ये यूनिअन टेरिटरी है यानि कि केंद्रशासित प्रदेश इसलिए यहाँ की हर बात अजीब है. "

"वह कैसे ?"

"ये पुल इसलिए नहीं बन पाया कि दूसरे गांव वाले अपने यहां इसे बनाने की इजाज़त नहीं दे रहे हैं. "

"तो सरकारी पैसे से इतनी बड़ी योजना दूसरे गान्वा से पूछे बिना ही ऎसे ही बना ली ?"

"देश के एक कौने में पड़े हिस्से में काम करना ही कौन चाहता है ?केन्द्र सरकार हर साल अपने बजट से करोड़ों रुपया देती है लेकिन कौन देखने आता है वह पैसा इस्तमाल हुआ या नही. जैसे कि मान लीजिये पिछले साल यहाँ पाँच करोड़ रुपया सेंशन हुआ जिसमें से कुछ प्रतिशत रुपया केंद्रीय सरकार ने दे दिया और काम शुरु हो गया बाकी का रुपया रिलीज़ कर दिया गया लेकिन आलस व कामचोरों के कारण वैसे ही पड़ा रहा.. मान लीजिये प्रशासन पी डब्ल्यू डी को सड़क बनाने के लिये कुछ करोड़ रुपया देता है. तो वह कुछ महीने बाद सर्वे करके रुपया लौटा देता है हमे सड़क बनाने के लिये ज़मीन नहीं मिल रही. अब इस वर्ष और दीव के लिये सौ करोड़ पैसे के बजट का पैसा केन्द्र से मिल जायेगा-यानि कि हर वर्ष दीव मालामाल हो जाता है जैसे कि एक फटे हाल भिखारी की गोदड़ी के नीचे करोड़ों रुपये रक्खे हों -हा ---हा --हा. "

"अरे------ये तो बड़ी विचित्र बात है ?"

"सन् 2011 के सर्वे के अनुसार यहाँ जनसंख्या 55, 000 थी लेकिन लोग दीव छोड़कर जाते रहते है, यहां कोई विकास व नौकरी के अवसर पैदा नहीं हो पा रहे. "

"आपको ये सब कैसे पता है ?"

"मै एक पत्रकार हू, सब छानबीन करता रहता हूँ, एक ए जी ऑफिस की बंगाली महिला ऑफ़िसर ने मेहनत करके यहां ड्यूटी पर आकर सर्वे किया व अपनी रिपोर्ट कैग के जनरल में प्रकाशित करवाई थी. संसद में शोर हुआ और इधर कुछ पर्यटन स्थल की तरह इसे सँवारा जा रहा है. समझ लीजिये ऎसे कि जैसे किसी बेहद बीमार स्त्री को ब्यूटी पार्लर में ले जाकर ऊपर से खू़बसूरत बना दिया जाए "

"हम लोग दमन गए थे, वह भी यूनियन टेरिटरी है. वहाँ तो बहुत टूरिस्ट आते है. क्या यहां भी समुद्र तट पर मीरामार जैसे बीच होटल बन गए हैं ?"

"यहां कैसे होंगे ? एक तो दमन मुम्बई से पास है तो वहा' वीक एंड 'में बीच होटल का मज़ा लेने मुँबई के छोटे छोटे फ़्लेट में रहने वाले टूरिस्ट उमड़ पड़ते हैं. समुद्र के किनारे बहुत विशाल होटल बनाए गए हैं. "

"और पता है गुजरात से जाने वाला कोई शराब का शौकीन जैसे ही दमन की सीमा पर पहुँचेगा तो खिल उठता है कि यहाँ दारू पीने को मिलेगी. "

तब तक फेरी किनारे आ लगी. उसके मालिक ने एक लकड़ी के पट्टे को ज़मीन पर लगाया और फेरी से उतरने के लिये दो लोग पट्टे पर डगमगा कर चलते हुए यात्रियों के हाथ पकड़कर मदद करने लगे. किनारे पर उतरते हुए मेरी सैंडिल्स में गीली बालू लग ही गई. 

इस तट से चौंतीस पैंतीस वर्ष पहले के दीव से तो कुछ सुधरा हुआ लग रहा था आज का दीव जब हम लोग यहाँ आए थे. 

उन दिनो मुंबई के हाजी मस्तान व दीव के स्मगलर्स सुकुर नारायण बखिया का ज़माना था और अचानक हमारा यहाँ घूमने का इरादा हो गया. होता ये है कि जब हम बस या ट्रेन में बैठे होते हैं तो कब चुपके से दूसरे प्रदेश में पहुँच गए पता भी नही चलता लेकिन उन दिनों ये दीव यात्रा इसलिए भी रोचक लगी थी कि हम गुजरात के पर्यटन विभाग के अहमदपुर मांडवी के रिसॉर्ट की झोंपड़ीनुमा कमरे में ठहरे थे जो कि ऎसे सजाया गया था जैसे कि वह सौराष्ट्र का गांव हो. 

इस रिसॉर्ट से ही आगे जाता था दीव का रास्ता. कुछ किलो मीटर दूर जाने पर एक लम्बी दीवार दिखाई दे रही थी और लीजिये गुजरात की सीमा ख़त्म. एक दरवाजे से हमारी बस केंद्रशासित दीव के अन्दर प्रवेश कर गई थी. बड़ा अनूठा लगा था ये दो प्रदेश का विभाजन. जबकि अब वह दीवार हटा दी गई है. बस दो खम्बों के बीच बोर्ड सीमा की सड़क पर स्वागत करता हुआ मिलता है. पाँच सात मिनट में हम गोधुला पहुँच गए थे. लम्बी बाँह जैसे समुद्र तट के एक तरफ फैले दीव को देखकर ऎसा लगता था कि गोवा की ही भूमि का टुकड़ा यहाँ वहां भटकता हुआ गुजरात के सीमा के पास आकर ठिठक गया है. दिविक के हाथ में ग्रीवा के दिए पैकेट्स थे. उसने बहुत आग्रह से कहा था, "दीव में ये मेरी ननद श्रेया के पास पहुँचा देना. बिचारी कम उम्र में विधवा हो गई थीं. "

कैसी होंगी श्रेया ? बड़ा भला लग रहा था कि अजनबी जगह घूमने के स्थान पर कोई जान पहचान का सूत्र तो हमारे हाथ में था. तभी फेरी किनारे आ लगी. अब हमको दाहिने तरफ के कच्चे रास्ते पर जाना था. समुद्र के किनारे बने हुए थे मछुआरो के झोपड़े. उन झोंपड़ों के सामने तार पर, ज़मीन पर बिछे प्लास्टिक पर मछलियां सूख रही थी. इनकी गंध से हम दोनों का सिर भन्ना गया था. बदबू थी कि नाक के रूमाल के आर पार जाकर दिमाग का पीछा नही छोड़ रही थी. इन झोंपड़ियों में मछुआरिनें गहरे नीले, काले, लाल रंग में लांगदार धोती पहने खाना बनाती या कपड़े धोती दिखाई दे रही थीं. जिनका काम ख़त्म हो गया था वे बाहर रक्खे अपने टोकरे में मछ्ली भर बाज़ार जाने की तैयारी कर रही थीं. कुछ अधनंगे से बच्चे बालू में खेल रहे थे. 

इस बस्ती के आगे जाते ही कुछ राहत पहुँची. पता नही मेरे सिर पर क्या फ़ितूर स्वर हुआ, "अरे सुकर नारायण बखिया तो जेल में हैं. उसका घर देखते हैं कैसा होता है स्मगलर्स का घर ? "

"क्या करोगी उसका घर देखकर ?"

"एक एडवेंचर --"मैंने एक सायकल पर जाते लड़के से पूछा, "भाई ! सुकर नारायण बखिया का घर बता सकते हैं ?"

मेरी बात से वह् अचकचा गया, "क्या ? "फिर गर्दन पीछॆ घूमकर बोला, "मुझे बस इतना पता है कि वो सामने वाली बसावट में रहता है. "फिर वह घबराता हुआ तेज़ सायकल भगाता ले गया. 

हम लोग गलियों में ऎसे ही घूमते हुए लोगो से उसके घर का पता पूछ रहे थे. सब लंबे, मोटे ताज़े या दाढ़ी वाले लोग हमें स्मगलर्स नज़र आ रहे थे। उनकी आँखें भी खूँखार नज़र आ रही थी या कहिये ऎसे छोटे तटीय शहर में स्मगलिंग ख़ूब होती है तो हमारी नज़रें भी बदल जाती हैं. हम एक और गली में पहुँचे, एक दस बारह वर्ष की फ़्रॉक पहने लड़की अपने घर के सामने लगे हैंड पंप में से अपनी बाल्टी में पानी भर रही थी. हमने उससे वही प्रश्न किया. उसने हैंड पंप चलाना बंद करके कुछ घबराते हुए आँख के इशारे से बताया कि सामने वाला घर ही बखिया का है. 

"ओ----. "मेरी खुशी से हल्की सी चीख निकाल गई. 

तभी एक औरत अचानक. घर के दरवाज़े से निकली और आते ही उसने इसकी पीठ पर दो धौल रख दिए, "सू कहे छे ?"वह् औरत हमारी तरफ देखकर बोली, " मने ---------एमने नथी ख़बर. "और वह् उसे खींचती हुई घर के अन्दर ले गई. 

उस नाम का ऎसा भय ? हम लोगो ने पीछॆ मुड़कर देखा बड़े बड़े पत्थरो से बना एक विशाल अहाता गली के एक कोने से दूर समुद्र तक फैला हुआ था जिसे देखकर याद आ जाये कि' एक पन्छी तक घर के अन्दर पर नही मार सकता बिना मालिक की इज़ाज़त के. 'दूर समुद्र में इस अहाते के खूँटे से बंधी दो नौकायें दिखाई दे रही थी. मै बेहद थ्रिल्द थी ---जैसे कोई खजाना पा लिया हो -----इन्ही नौकाओं से होती होगी स्मगलिंग. तब आज जैसी फ़िल्म भी तो नहीं बनती थीं जो स्मगलर्स के बेडरूम तक की बात बता दें. तब हम दोनों को नहीं पता था कि स्मगलर्स तो बदनाम होते ही हैं. उन छोटे मोटे गुरु घंटालो का क्या कीजिये जो लोगों को धर्म के नाम पर बेवकूफ़ बनाते रहते हैं और हम ऎसे ही व्यक्ति की कारस्तानी जानने जैसे दीव आए थे. 

श्रेया जी ने ही दरवाज़ा खोला था, वे हमे देखकर मुसकरा उठी, " ग्रीवा भाभी का फोन आ गया था कि आप लोग आने वाले हैं. "

हम लोग जब कुर्सी पर बैठ गए तो वो अपना आँचल सम्भालते हुई बोली, "आप लोगों के आने से मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि कोई तो अपनी तरफ का मेरे घर आया. "

"आपके स्कूल के बच्चे नहीं दिखाई दे रहे ?"

"आप लोग आने वाले थे इसलिए मैंने उन्हें छुट्टी दे दी है. "

उनकी आत्मीयता मुझे छू गई. श्रेया जी जब चाय बनाने में लग गई तो मै उनके इस कमरे की दीवारों पर बच्चो की बनाई पेंटिंग्स व चार्ट्‌स देखने लगी. एक काँच की आल्मारी में खिलोने व गेम्स सेट सजे हुए थे.. चाय पीने के बाद वो मुझसे बोलीं, "चलिए मै आपको अपने गुरु महाराज से मिलवाती हूँ. "

"क्या वे आपके साथ ही रहते है ?"साथ के उस छोटे कमरे में कदम रकह्ते हुए पूछा. 

"हाँ, उन्ही के आशीर्वाद के कारण मै अपने अकेलेपन का सूना पन काट रही हूँ. "

मै आश्चर्यचकित रह गई थी क्योँकि कमरे में कोई नहीं था. उन्होंने अपने एक तरफ़ बने मन्दिर के सामने पड़ा फूलों की प्रिंट वाला पर्दा हटाया. उसमें थीं राम सीता, कृष्ण व शिव की मूर्तियां. इस सबके बीच रक्खी थी एक व्यक्ति की तस्वीर जिसके नीचे ताजे गुलाब महक रहे थे. अगरबत्ती की सुगंध से कमरा महक रहा था. उस व्यक्ति की तस्वीर पर नज़र पड़ते ही मै बहुत बुरी तरह चौक गई थी---गुजरात के सीमा पार करके इन महाश्य की अनुकम्पा दीव तक भी पहुँच गई है, "श्रेया जी ने तस्वीर के सामने सिर झुकाया, "मेरी ज़िन्दगी इन्ही की कृपा से काट रही है. गुरु आपका भी कल्याण करे. "

मन हुआ मै कहूँ, "एक धोखेबाज़ पाखंडी मेरा क्या कल्याण करेगा?जाने किस कोने मे पड़़ा अपने कल्याण को तरस रहा होगा. "श्रेया जी की श्रद्धा ने मेरे होंठ सिल दिए थे. 

फिर उन्होंने बहुत आत्मीयता से कहा, "आप लोग जब तक दीव घूम आइये। मैं भोजन बनाकर रखती हूँ. "

दीव का नागोआ बीच, सफ़ेद गिरजाघर की सफ़ेद विशाल मदर मेरी की मूर्ति व ऑटो में घूमते हुए दमन गोवा की तरह समुद्री हवा यें, दिखाई देते यहाँ के घरो का यूरोपियन स्थापत्य देखने के चाव में मेरा मन कम लग रहा था. मेरी नज़रों में बार बार श्रेया जी व गुरु जी की छवि घूम रही थी. पुराने विशाल किले में वास्को डि'गामा की मूर्ति दिखाकर गाइड बता रहा था, "वास्को डि ' गामा सबसे पहले भारत में समुद्री रास्ते से दीव ही आया था इसलिए यहाँ उसकी मूर्ति लगाई गई है. "

तब मुझे पता नहीं था कि मै तीस बरस बाद कोचीन में भारत का वह प्रथम क्रिश्चियन चर्च भी देखूंगी जहाँ वास्को डि'गामा दफ़नाये गए थे. लेकिन बाद में बरसों बाद इनका बेटा इनक़ी अस्थियां ले गया था. 

थोड़ा आगे चलते ही दिविक ने पूछा, "तुम क्यों अनमनी लग रही हो ?"

"पता है श्रेया जी के मन्दिर में किसकी तस्वीर लगी हुई थी ?

"किसकी ?"

" लालचंद गुरु की ?"

"क्या ?तुमने उनके बारे में कुछ बताया ?"

"कैसे बताती ? उस मन्दिर को देखकर लग रहा था कि वे रोज़ उस पर फूल चढ़ाती हैं. सच्चाई क्या हैं, ये उन्हें पता नहीं हैं. "

जब हम लोग घूमकर लौटे तो खाना तैयार था. नीचे चटाई बिछाकर खाना परोसा गया था. श्रेया जी ने गिलास में से थोड़ा पानी हाथ में लिया और बोली, " कहिये गुरु महाराज की जय. "

उनका मन रखने के लिए हमें कहना पड़ा, " गुरु महाराज की जय"

फिर उन्होंने हाथ का जाल खाने के चारों ओर छिड़का और बोलीं, "भोजन शुरू कीजिये. "

रोटी का कौर तोड़ते हुए दिविक ने पूछा, "आपकी इनसे पहचान कैसे हुई ?"

"मेरा अहोभाग्य ही था कि वे दीव में दस वर्ष पूर्व पधारे थे. मै उन दिनो गहन अंधकार में घिरी हुई थी मेरे पति की मृत्यु उन्ही दिनों हुई थी. वे हमारे पड़ौसी के यहाँ प्रवचन देने आए थे. उनके अमृत वचनों से मुझे ऐसी शान्ति मिली कि मैंने एक सप्ताह में ही दीक्षा ले ली. आप ये समझ लेजिये कि वो मेरी जीवन नौका को पार लगा रहे हैं. "

"कैसे ?"

"हर तीसरे चौथे महीने वो यहां प्रवचन देने आते हैं. मेरे पर उनकी कृपा है इसलिए वो मेरे यहां ही ठहरते हैं और शांति जाप करवाते हैं. "

" उसके लिए वो रुपये ऐंठते होंगे ?"

सुनयना जी का चेहरा क्रोध से लाल पड़ गया "ऐसी अशुद्ध भाषा नहीं बोलिये. वो कुछ नहीं माँगते. जो मै दे देती हू स्वीकार कर लेते हैं. "

उनके क्रोध से मेरी हिम्मत नही हुई कुछ कहूँ. दिविक ने ही पूछा, "आप क्या क्या भेंट करती हैं ?"

"कभी उनके लिए या पत्‍‌नी के लिये वस्त्र, फल मिठाई व रुपये. "

मै जोड़ नहीं पाई कि नि;संतान मध्यवयस की औरत से वे और क्या क्या लेते होंगे या वे ही उनमें क्या आलम्बन खोजती होंगी फिर भी मैंने अपना गुस्सा दबाते हुए पूछा, "ये आपके यहाँ आखिरी बार कब आए थे ?"

"सात मास पहले आए थे फिर तो इनका एयरपोर्ट से फोन आया था कि मै लंदन अपने भक्तों के बुलाने पर जा रहा हूँ. "

"अच्छा ?"

" हाँ, मुझसे फ़ोन पर कह गए हैं कि लंदन से आते ही सीधे वो मेरे पास दीव आयेंगे. "उनके चेहरे पर जो सल्लज मुस्कान उभरी उसने बहुत कुछ कह दिया था कि गुरु घंटाल क्यों श्रेया जी के घर चार पाँच दिन रुककर जाता होगा. 

.   होटल में रात में बिस्तर पर लेटते हुए मुझे नींद नहीं आ रही थी. ग्रीवा भी तो कितना पीछॆ पड़ती थी कि इन गुरु महाराज के प्रवचन में मै चलूँ. मै समझ नहीं पाती थी कि लोगो को क्या हो जाता है कितने ही गुरुओं के भ्रष्टाचार खोलो फिर भी वे अपनी अंधश्रद्धा से ऊपर नहीं उठ पाते. 

एक बार ग्रीवा इनके प्रवचन में क्या हो आई थी कि उनकी भक्त हो गई थी. मै उसे समझाती, "तू क्यों अपने तीन चार घंटे प्रवचन सुनने में बर्बाद करती है ?"

" ऎसा मत कह, भगवान तुझ पर पाप चढ़ायेगा. उनकी वाणी में अमृत है. घर की झिक झिक से मै घबरा जाती हू. उनकी बात सुनकर मेरा तनाव दूर हो जाता है. "

"तुझे तनाव दूर करना है तो पेंटिंग कर, गरीब बच्चो को पढ़ा या किसी संस्था द्वारा समाज सेवा कर. क्या प्रवचन में तीन चार घंटे हाथ पर हाथ रक्खे बैठी रहती है ? "

"मेरी बात तेरी समझ में नहीं आयेगी. इसी माया मोह में फँसकर तो लोग अपना परलोक बिगड़ लेते है. उन्हें स्वर्ग नहीं मिलता. "

मैंने अपने सिर पर हाथ मार लिया था, "ये तू बोल रही है या ढ़ोंगी गुरु लालचंद ?स्वर्ग किसने देखा है ?"

"तू चुपकर नास्तिक ! गुरुजी मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बता रहे हैं स्त्रियों को अलग, पुरुषों को अलग. "

"क्या स्त्री पुरुषों का मोक्ष मार्ग अलग होता है ?"मै व्यंग करती. 

"मेरे साथ प्रवचन में चल तो सब स्पष्ट हो जायेगा. "

"मुझे अपना समय नष्ट नहीं करना है. मुझे इस दुनिया में बहुत कुछ करना है. तू मोक्षधाम जाकर दुनिया से पीछा छुड़ा. "

"अरे !इतनी जल्दी मुझे स्वर्ग मत भेज, मेरे बच्चो का क्या होगा ? "

पड़ी लिखी ग्रीवा की बातों से मै कुढ़ती रही. वह् एक हफ़्ते के बाद आँखें नचाती आ गई, "इनका प्रमोशन होने वाला है. "

"क्यो क्या मुख्यालय से ख़बर आई है ?"

"नही, नही गृह ख़राब हो तो मुख्यालय क्या करेगा ? गुरुजी ने उपाय करके गृह सीधे कर दिए हैं. "

मै अपना माथे पर हाथ मारती रह गई और दस दिन बाद वह व उसके पति राजेश एक प्लेट में मिठाई लेकर चले आ रहे थे. उसने एक विजयी मुस्कान से मुझसे कहा, "मुँह खोल. "और मेरे मुँह खोलते ही प्लेट से एक पेड़ा उठकर मेरे मुँह में डाल दिया. "गुरु जी की कृपा से इनका दस दिन में प्रमोशन हो गया. "

"ये संयोग भी हो सकता है. "

"हर बार कैसे संयोग होगा ? प्रकाश जी को तो आप भी जानती है --अरे वही जिनका सीनेरिओ मौल में कपड़ों का शो रूम है. उनकी बहुत इच्छा थी कि उन्हें देवी के दर्शन हो, तो उन्हें दर्शन हो गए.. प्रवचन के समय उन्होंने सबको बताया था. "

"तुम ये बताओ कि तुम्हे प्रमोशन पाने के लिये क्या उपाय बताया था ?"

"गुरुजी ने कसम दी है कि मै किसी यहाँ तक कि अपने पति को भी नहीं बताऊं कि मैंने क्या उपाय किया है. "

उसके पति अचरज से बोले कि, "भाभी जी !सबूत के तौर पर हम आपके सामने बैठे है तब भी आप विश्वास न नहीं कर रहीं ?"

दिविक बोले थे, "अब तुम्हारा काम पूरा हो गया है तो अब क्या हर्ज है उपाय बताने में. मेरे भी ऑफ़िस के काम अटके पड़े हैं, हो सकता है गुरु जी उन्हें पूरे करवा दें. "दिविक ने सच निकलवाने के लिए नाटक किया था. 

"तू कुछ भी कह, मै नहीं बता सकता. "

"यार !वैसे तो तू पक्का दोस्त बनता है. एक ज़रा सी बात नहीं बता सकता ?"

राजेश कुछ देर असमंजस में फँसा रहा फिर कह ही उठा, "अब तेरे से क्या छिपाना लेकिन तू किसी से नहीं कहना. "

"मेरे पर विश्वास नहीं कर रहा ?"

"गुरुजी ने मुझे अकेले अपने कमरे में बुलाकर एक रुपये का सिक्का दिया व बोले मै इसे अपने मन्दिर में रोली चावल से पूजा कर रक्खूँ व इसकी आरती उतारूं. दूसरे दिन मै इस शहर के तालाब में फेंक आऊँ. यदि मेरा काम पूरा होने वाला होगा तो वही सिक्का तीसरे दिन मुझे अपने मन्दिर में बिछे कपड़े के नीचे मिलेगा. "

"तो ऎसा ही हुआ ?"

"हाँ, "राजेश उत्तेजित होकर कहने लगा था, "सबसे बड़ा चमत्कार तो ये था कि दो दिन पानी में रहने के बाद भी उसका रोली चावल ज्यों का त्यों था. "

"क्या ?" मेरे व दिविक के मुँह से एक साथ निकला

"सुनो तो ---. "ग्रीवा उत्तेजना में कुछ कह नहीं पा रही थी. 

"तुझे क्या हुआ ?"

"वह् --- वह् सिक्का तो गुरुजी के कहने पर पूनम की रात को मैंने रोली चावल लगाकर व उसकी आरती उतारकर मैंने मन्दिर के कपड़े के नीचे रक्खा था. "

"बाप रे ! तो जो सिक्का मुझे मिला था वह् वो नहीं था जिसे मै तालाब में डाल आया था. गुरुजी ने तो मुझसे प्रमोशन करवाने के पाँच हज़ार रुपये ले लिए थे व कहा था यदि मैंने ये उपाय किसी को बताया तो मेरी पत्‍‌नी, मर जायेगी. "राजेश का चेहरा देखने लायक हो रहा था. 

ग्रीवा का चेहरा भी उतर गया था, "मुझसे कहा था कि मै ये बात किसी को बताऊंगी तो आप मर जाओगे. "

"हे भगवान 1"

अब सारी बाज़ी मेरे हाथ में थी, "मै कहती थी कि इन साधु पंडितों के चक्कर में नहीं पड़. तुम लोगो पर पाँच हज़ार की चपत तो पड़ी और इतनी बार आश्रम फल मेवे लेकर गए वह् अलग. "

दिविक ने ठहाका लगाया, "और पढ़े लिखे होकर बेवकूफ बने वह अलग. "

राजेश शर्माये से कहने लगे, "लगता है जो गुरुजी ने प्रकाश को देवी के दर्शन करवाये हैं, उसमें भी कुछ धोखा होगा. चलो उसके घर चलाते हैं. "

प्रकाश ने ही अपने घर का दरवाज़ा खोला था और राजेश को देखते ही गले लग गया, "जय श्री गुरु महाराज. "

राजेश भी बिना मन के गले लग गया, "जय श्री गुरु महाराज. "फिर. उन्होंने हमे बताया गुरु भाई ऎसे ही गले मिलते हैं. 

थोड़ी सी इधर उधर की बातचीत के बाद राजेश ने पूछा था, "सुना है आपको देवी के दर्शन हुए थे ?"

"ओह !क्या बात याद दिला दी. पहले तो ऎसा लगा कि मै हवा में उड़ा जा रहा हूँ. बादल पार करके स्वर्ग पहुँच गया हूँ, जहां सिंह पर स्वर साक्षात दुर्गा माँ बैठीं हुईं हैं. ज़रा ठहरिये मै बेटे को अन्दर जाकर चाय बनवाने के लिए बोल दूँ. "वह् बात अधूरी छोड़कर अन्दर चले गए. 

उनके आते ही राजेश ने पूछा, "गुरुजी ने आपको देवी दर्शन के लिये उपाय बताया होगा ?"

"माफ़ कीजिये वह उपाय तो मैं आपको नहीं बता सकता गुरु जी ने मुझे कसम दी है. "

राजेश से रहा नहीं गया, "वह् गुरु हम सबको बेवकूफ़ बना रहा है. "कहते हुए उसने आपबीती सुना दी. 

उसकी बात अभी ख़त्म हुई थी कि प्रकाश जी का बेटा वहाँ आ गया, "नमस्ते आंटी अंकल !आप लोग तो बहुत दिनों बाद आए हैं.. "साथ आए नौकर के हाथ की ट्रे में से लेकर नाश्ते की प्लेट्स मेज पर लगाने लगा. 

नौकर के हाथ से चाय लेकर प्रकाश बोले, "माना कि आपको धोखा हुआ था लेकिन मेरी पत्‍‌नी को मरे तो पाँच वर्ष हो चुके हैं. "

उनके बेटे ने कहा, "पापा आप बताइये तो सही गुरु ने क्या उपाय करने को कहा था ?क्या पता उन्होंने हमें भी चीट किया हो. '

सबके बीच घिर गए प्रकाश जी को बताना ही पड़ा था, " गुरुजी ने मुझसे कहा था कि तुम पूनम की रात को एक खाली लोटा अपने पलंग के नीचे रख देना व घड़ी में दो बजे का अलार्म लगाकर रख देना, जब तुम जागोगे तो देखोगे कि वह् लोटा चरणाम्रत से भरा है. जैसे ही तुम उसे पीओगे वैसे ही तुम्हे देवी के दर्शन हो जायेंगे. जैसे ही मैंने रात के दो बजे वह् पीया, मुझ पर भक्तिरस की मस्ती छाने लगी और मुझे दुर्गा माँ के दर्शन हो गए थे. "

हम चारों का सिर चकरा गया था कि जाहिर है वह ताला लगाकर ही सोते होंगे. 

तभी उनका बेटा झेंपता हुआ सा बोला, "पापा !चमत्कारी जल व पानी मिला चरणाम्रत तो मैंने ही उस रात एक बजे आपके पलंग के नीचे रक्खे लोटे में डाला था. "

"क्या ?” हम सबके मुँह से निकल गया था. 

"मै भी तो उन गुरु के पास जाता था. उन्होंने मुझे एक शीशी मे चमत्कारी जल दिया था कि मेरी मानता पूरी हो जायेगी. "

प्रकाश जी खिसया गए, "तेरी ऐसी कौन सी इच्छा मै पूरी नहीं कर रहा ?"

उनका बेटा झेंपते हुए बोला था, 'आप नीमा से मुझे कहाँ शादी करने दे रहे थे ? देवी के दर्शन की ख़ुशी में आपने दूसरे दिन ही शादी की अनुमति दे दी थी. "

मैं बोल पड़ी थी, "उस शीशी में ज़रूर कुछ नशीली चीज़ होगी. 

जो बेवकूफ़ बने थे वे वे खिसियाकर हंस रहे थे. फिर तो जैसे हमें एक जुनून स्वर हो गया था. हम सब उनके शिष्यों से मिलकर इनकी ठगी की दास्ताँ बताने लगे थे. उन्होंने किसी को भभूत देकर, ताबीज देकर, सिंदूर की पुड़िया, सिंदूर लगे नीबू या सुपारी या हल्दी देकर बेवकूफ़ बनाया था. वो कहाँ भूमिगत हो गए पता नहीं लगा. 

दो महीने बाद मै व ग्रीवा बाज़ार में घूम रहे थे कि गुरु महाराज की पत्‍‌नी दिखाई दी. उनके पास आने पर हमने सोचा कि उन्हें खरी खोटी सुनाये लेकिन उनकी हालत मामूली धोती में तो बदतर लग रही थी. वही पास आ गई और सामने आकर हाथ जोड़कर सिसकने लगी, 'मेरे पति को माफ़ कर दीजिये. "

"वह माफ़ करने लायक है क्या ?"ग्रीवा चिल्लाई. 

"जिन भगवान का नाम लेकर वे लोगो को ठग रहे थे उसी भगवान ने उनके दोनों पैरों को लकवा मार दिया है. अब वे बिस्तर पर पड़े रहतें हैं. "

तब हम क्या कहते उस सजायाफ़्ता स्त्री से ? क्या कहूँ नख से शिख तक गुरुजी की श्रद्धा में डूबी श्रेया जी से ? उनका भ्रम तोड़ दूँ या इन्हे इसी श्रद्धा के सहारे ज़िन्दगी गुज़ारने दूँ -?--- ---ये निर्णय ग्रीवा भी नहीं ले पा रही होगी ------- दीव के तट पर घूमती हुई मैं भी निर्णय नहीं ले पा रही. 

 

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नीलम कुलश्रेष्ठ

Kneeli@rediffmail. com

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