तर्ज़नी से अनामिका तक - भाग ६ in Hindi Novel Episodes by Rajesh Maheshwari books and stories Free | तर्ज़नी से अनामिका तक - भाग ६

तर्ज़नी से अनामिका तक - भाग ६

                      41.  संकल्प ही सफलता का सूत्र है

 

श्री संजय सेठ एक सुप्रसिद्ध चार्टर्ड एकाऊंटेंट होने के साथ साथ संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठ चिकित्सक स्वर्गीय डाॅ. जे.एन. सेठ के ज्येष्ठ पुत्र भी है। वे नगर के सुप्रसिद्ध नर्मदा क्लब जिसका निर्माण ब्रिटिष षासन काल में सन् 1889 में हुआ था और इसी क्लब में विष्व में सबसे पहली बार स्नूकर का खेल खेला गया था। वह ऐतिहासिक टेबिल जिस पर इस खेल को खेला गया था आज भी यहाँ पर सुरक्षित है। ऐसे प्रतिष्ठित नर्मदा क्लब में वे  सन् 2004 से लगातार अध्यक्ष पद हेतु निर्वाचित हो रहे है।

वे अपने बीते हुए जीवन के विषय में बताते हैं कि उन्होंने विज्ञान विषय में बी.एस.सी की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। वे असमंजस में थे कि वे विज्ञान विषय में आगे अध्ययन करें या अपनी षैक्षणिक दिषा बदल ले क्योंकि उनकी अभिरूचि चार्टर्ड एकाउटेंट बनने की दिषा में हो गई थी। उनका कहना है कि वह समय बहुत ही चुनौतीपूर्ण लग रहा था और उनके षुभचिंतकों की सलाह थी कि विज्ञान विषय में उत्तीर्ण होने के पष्चात सी.ए. की परीक्षा में सफल होना बहुत कठिन है। उनके साथ पढने वाले एक सहपाठी ने सबके सामने उन्हें ताना मारते हुए कहा कि ये तो पढाई में इतने होषियार है कि सी.ए बन ही जायेंगे।

उसकी इस उलाहना से उन्होने मन में यह संकल्प लिया कि चाहे जो कुछ भी हो जाये, उन्हें कितना भी परिश्रम क्यों ना करना पडें, वे सी.ए की परीक्षा को अवष्य उत्तीर्ण करके ही रहेंगें। इस दृढ निष्चय के कारण वे रात दिन अपने संकल्प को पूर्ण करने में व्यस्त हो गये। उनके परिवार के सदस्यों ने भी उनका मनोबल बढाया और सी.ए. की परीक्षा के उपरांत जब परीक्षा परिणाम आया तो वे आष्चर्यचकित रह गये और उन्हें महसूस हुआ जैसे वे कोई स्वप्न देख रहे हो परंतु यह हकीकत थी कि वे अच्छे नंबरों से सी.ए. की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये थे।

उन्होंने अपने परिवार की भावना के अनुसार अपने पैतृक स्थल जबलपुर से ही प्रैक्टिस षुरू की और सफलता के उच्च आयामों को छुआ। उनका युवाओं के लिए संदेष है कि इंसान सच्चे मन से कोई संकल्प ले और उस दिषा में अथक परिश्रम करे तथा ईमानदारी से प्रयासरत् रहे तो कोई भी ऐसी मंजिल नही है जिसे वह पा नही सकता हो। 

 

 

 

                         42.   अक्षयपात्र 

 

हरिप्रसाद एक मध्यमवर्गीय परिवार से था जो कि बी.काॅम अंतिम वर्ष में अध्ययनरत था। एक दिन वह अपने मित्र जो कि षासकीय अस्पताल में भर्ती था उसे देखने के लिए गया था। वहाँ उसने महसूस किया कि ऐसे अस्पतालों में गरीब लोग ही आते है और जनसुविधा के नाम पर बहुत ही सीमित सुविधाएँ उन्हें उपलब्ध होती है। उसके मित्र का दोपहर के भोजन का समय हो गया था और उसे संतुलित आहार अस्पताल के माध्यम से प्रदान किया जाता था।

उसका मित्र जब भोजन कर रहा था तो उसके बगल मंे लेटे हुए दूसरे मरीज के परिवार का एक बच्चा अपनी माँ से भूख लगने की बात कहकर भोजन देने के लिए कह रहा था परंतु उसकी माँ उसे हर बार चुप करा देती थी षायद उसे पास भोजन खरीदने के लिए रूपये नही थे। हरिप्रसाद को यह दृष्य बहुत द्रवित कर रहा था। उसने अपने मित्र से पूछा कि क्या यहाँ पर मरीजों के साथ आने वालों के लिए भोजन की व्यवस्था नही है ? उसके मित्र ने यह सुनकर कहा कि यहाँ मरीजों को ही भोजन प्रदान किया जाता है उसके साथ आये हुए लोगों को बाहर अपनी व्यवस्था स्वयं करनी पडती है। यदि आपके धन खर्च करने की क्षमता है तो आप भोजन खरीद कर खा सकते है अन्यथा आपको स्वयं ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी।

कुछ समय पष्चात हरिप्रसाद वापस आ जाता है परंतु उसके मन में यह चिंतन चलता रहता है कि ऐसे गरीब व्यक्तियों के लिए जो अपने परिजनों के इलाज के लिए अस्पताल आते है उनके भोजन के लिए भी कुछ व्यवस्था की जानी चाहिए। हरिप्रसाद के पास साधन बहुत सीमित थ,े फिर भी उसने अपने मित्रों के साथ मिलकर गरीब मरीजों के परिजनों को निःषुल्क भोजन उपलब्ध कराना प्रारंभ कर दिया।

इस जनसेवा की खबर जब षहर के समाज सेवी संगठनों तक पहुँची तो उन्हेांने इसकी विस्तृत जानकारी लेने हेतु हरिप्रसाद को अपने पास बुलाया। उसकी कार्ययोजना को सुनकर वे सभी बहुत प्रभावित हुए और हरिप्रसाद के अनुरोध पर वे भी इस जनहितकारी कार्य में अपना सहयोग देने के लिए सहमत हो गये। अब यह कार्य और भी विस्तृत और सुचारू रूप से होने लगा था और इस कार्य की महत्वता को देखते हुए एक उद्योगपति ने भोजन वितरण की सुविधा हेतु एक मारूति वेन प्रदान कर दी।

हरिप्रसाद ने अपनी सेवा के विस्तार को देखते हुए एक ट्रस्ट की स्थापना कर की जिसका नाम अक्षयपात्र रखा गया। धीरे धीरे इस योजना का विस्तार दूसरे षासकीय अस्पतालों में भी हो गया। इस प्रकार एक छात्र की दृढ इच्छा षक्ति, लगन और समर्पण की भावना ने जनसहयोग से एक अविस्मरणीय कार्य संपन्न करके दिखा दिया।

 

 

                 

                   43.   षव की षवयात्रा

 

नर्मदा नदी के बहाव के साथ एक षव भी बह रहा था जो कि लकडियों की अर्थी पर रखा हुआ, फूल मालाओं से ढका हुआ था। उस षव को अपनी ओर आता देख नदी में स्नान कर रहे लोग भाग खड़े हुए, इसकी सूचना जब स्थानीय प्रषासन तक पहुँची तो वे भी चैंक गये क्योंकि आज ही सायंकाल नर्मदा मैया की आरती के समय प्रदेष के मंत्री जी द्वारा नर्मदा षुद्धिकरण अभियान पर अपना उद्बोधन जनता के बीच देने वाले थे। यदि यह षव बहता हुआ मंत्री जी के कार्यक्रम के दौरान उस घाट पर पहुँच जाता तो बहुत भारी हंगामा खडा हो सकता था। सभी अधिकारीगण एकमत थे कि  येन केन प्रकारेण षव को तुरंत नदी से निकाला जाए। अब गोताखोरों की एक टीम षव को अपने नियंत्रण में लेकर उसे किनारे ले आयी। उन्होने जब षव को देखा तो वे सभी चैक गये और उन्होने अपने अधिकारियो को इस बात से तुरंत अवगत कराया। यह जानकर अधिकारीगण भी सकते में आ गये और उन्हेाने तुरंत मामले को रफा दफा करने का निर्देष दे दिया। 

मंत्री जी अपने निर्धारित समय पर नर्मदा जी के घाट पर पहुँचे और आरती में षामिल होने के उपरांत नर्मदा जी को प्रदूषण से मुक्त कराने की नयी योजनाओं की जानकारी जनता को प्रदान करके वापिस चले गये। उनके जाने के उपरांत अधिकारीगण आपस में एक दूसरे को बता रहे थे कि यह कार्य किसी राजनैतिक व्यक्ति के द्वारा किया गया हो सकता है।

वह षव जो नदी में बह रहा था, वह वास्तव में षव ना होकर एक पुतला था जिसका रंग, रूप एवं आकार हूबहू मंत्री जी से मिलता था। किसी के द्वारा हंगामा खड़ा करने की नीयत से यह कार्य किया गया था। यदि आरती के निर्धारित समय पर यह बहकर उस घाट पर पहुँच जाता तो उससे अप्रिय स्थिति निर्मित होकर एक बवाल मच सकता था। अब सभी अधिकारीयों ने भगवान के प्रति धन्यवाद व्यक्त करते हुए, श्रद्धापूर्वक नर्मदा मैया के प्रति भी आभार व्यक्त किया। हमें आजकल पुनीत कार्य में भी अवरोध पैदा करने वाले षरारती तत्वों से सदैव सावधान रहना चाहिए। 

 

 

 

 

                                     44.   भ्रात प्रेम

 

एक षहर में रमेष और महेष नाम के दो सगे भाई रहते थे। उनके बीच में संपत्ति के बँटवारे को लेकर मतभेद थे जो कि इतने बढ़ गये थे कि उनमें आपस में बातचीत भी बंद हो गई थी। एक दिन महेष एक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया और उसे अस्पताल ले जाया गया। वहाँ पर चिकित्सकों ने उसका तुरंत आॅपरेषन करने का निर्णय लिया और इसके लिए रक्त की आवष्यकता थी। महेष का ब्लड गु्रप बहुत ही दुर्लभ था जो कि बहुत तलाष करने पर भी उपलब्ध नही हो पा रहा था। जब इस बात की जानकारी रमेष को लगी तो वह तुरंत भागा भागा अस्पताल आया और अपना खून देने की पेषकष की क्योंकि उसका ब्लड गु्रप भी महेष के ब्लड ग्रुप से मेल खाता था।

यह जानकर रमेष के पहचान वालों ने उसे समझाना षुरू किया कि तुम रक्तदान मत करो। यह तुम्हारा सगा भाई होते हुए भी तुम्हारे हिस्से की भी संपत्ति हडपने की फिराक में था। ऐसे व्यक्ति से इतनी सहानुभूति क्यों ? वहाँ पर महेष के हितैषियों ने भी उसके परिजनों को कहने लगे कि रमेष भाई होते हुए भी किसी दुष्मन से कम नही है। वह महेष के हिस्से की संपत्ति को भी हड़पना चाहता है। ऐसे व्यक्ति से कोई भी सहयोग लेना उचित नही है।

इतना बोलने के बाद भी रमेष ने अपना खून दिया और महेष ने उसे स्वीकार कर लिया और आॅपरेषन सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। अपने भाई को मुसीबत में देखकर उसके प्रति उमडे प्रेम ने दोनांे के बीच के संपत्ति के बँटवारे के विवाद को सुलझा दिया और वे पुनः एक हो कर रहने लगे।

 

 

 

                           45.   विदाई

 

रामसिंह षहर के एक जाने माने उद्योगपति थे। उनकी दो बेटियों हेमा और प्रभा का विवाह बडी धूमधाम से संपन्न हो गया था उनकी विदाई का समय आ गया था और सारा माहौल गंभीर होकर गमगीन सा हो गया था। रामसिंह ने अपनी पत्नी को जिसकी आँखों से अनवरत् आँसू बह रहे थे, उसे समझाया कि यह तो एक सांसारिक प्रक्रिया है कि बेटी को विदा होकर अपने घर जाना होता है। हमें इतने अच्छे रिष्ते मिले है कि हमें खुषी खुषी बेटीयों को विदा करना चाहिए।

रात हो गई थी और रामसिंह विश्राम के लिए अपने कमरे में चले गये थे परंतु उनकी आँखों से नींद आज गायब हो गई थी। वे आज से बीस वर्ष पूर्व की घटना को अपने मनस पटल से नही भुला पा रहे थे। वे उस समय संघर्ष करके अपने व्यवसाय को को बढाने का प्रयास कर रहे थे। उनके यहाँ एक मुनीम हरिराम जो कि बहुत ही ईमानदार एवं कार्य के प्रति समर्पित व्यक्ति था। उनके कार्यालय में व्यापार से संबंधित बीस लाख रूपये आये थे। जिसे मुनीम हरिराम ने गिनकर तिजोरी में रख दिये थे। उसी कार्यालय में दो व्यक्ति ऐसे भी थे जो हरिराम से बहुत ईष्र्या रखते थे क्योंकि हरिराम सेठ जी का बहुत करीबी और विष्वासपात्र था जिसकी वजह से वे लोग अपने कार्य में कोई गडबडी नही कर पाते थे। उन्होंने हरिराम को सेठ जी नजरों से गिराने के लिए एक षडयंत्र रचा।

वे मुनीम जी के पास पहुँचे और बोले कि जो रूपये आये हैं उनकी जानकारी में बीस लाख ना होकर पंद्रह लाख ही है। क्या आपने नोटों की गिनती ठीक से की है। यह सुनकर मुनीम जी सकते में आ गये और पुनः गिनती करने के लिए उन्होने तिजोरी खोली एवं गिनने पर बीस लाख रूपये पाये। उन्होंने तिजोरी को बंद करके उन लोगों से कहा कि रूपये पूरे है और संतुष्ट होकर अपने घर चले गये। कुछ समय बाद उन दोनो कर्मचारियों ने अपनी पूर्व योजना के अनुसार तिजोरी की डुप्लीकेट चाबी से तिजोरी खोलकर उसमें से पाँच लाख रूपये गायब कर दिये।

दूसरे दिन रामसिंह ने तिजोरी खोलकर जब गिनती की तो उसमें पाँच लाख रूपये कम पाये गये तभी उन दोनो कर्मचारियों ने सेठ जी के कान भरते हुए कहा कि कल आपके जाने के बाद हरिराम ने पुनः तिजोरी खोली थी और उसमें से रूपये गिन रहे थे। इस घटना की वीडियो रिकार्डिंग भी उन्होंने सेठ जी को दिखा दी और उन्हें इस प्रकार भ्रमित कर दिया कि वे सच में मान बैठे कि चोरी हरिराम ने की है। उन्होंने उसे अपने पास बुलाकर कहा कि तुम्हारी पुरानी सेवाआंे को देखते हुए में इस मामले को पुलिस में नही दे रहा हूँ। केवल तुम्हें सेवा से मुक्त कर रहा हूँ। यह सुनकर हरिराम बहुत गिडगिडाया कि मैंने चोरी नही की है पंरतु सेठ जी का इस पर कोई प्रभाव नही पडा और वह दुखी मन से कार्यालय से चला गया।

कुछ दिनों पष्चात एक दिन सेठ जी को कार्यालय से निकलते समय काफी रात हो गई थी और वे अकेले ही कार चलाकर घर लौट रहे थे। एक सुनसान जगह पर कुछ लोगों ने उनकी गाडी रूकवाई और जैसे ही सेठ जी गाडी से बाहर निकले उन लोगों उन पर लूट के इरादे से हमला कर दिया। संयोगवष हरिराम भी उसी समय वहाँ से गुजर रहा था जैसे उसने यह दृष्य देखा वह बिना विचार किये सेठजी को बचाने के लिए उन लोगों से भिड गया और इस हाथापाई के दौरान सेठजी को बचाने के दौरान एक चाकू का वार उसके सीने पर लग गया और वह जमीन पर गिर पडा। यह देखते ही गंुडे वहाँ से तुरंत भाग लिये। सेठजी ने तुरंत उसे अस्पताल पहुँचाया रास्ते में उसने सेठ जी से इतना ही कहा कि वह चोर नही है और बेहोष हो गया। अस्पताल पहुँचने पर डाॅक्टरों ने कहा कि अत्याधिक रक्त स्त्राव के कारण इसकी मृत्यु हेा चुकी है।

सेठ जी को विष्वास था कि मरता हुआ व्यक्ति झूठ नही बोलता है तो उन्होंने उस चोरी की घटना की जाँच पुनः की और उन दोनो कर्मचारियों की कडाई से पूछताछ की और उन्हें पुलिस में देने की धमकी दी तो उन लोगों ने सारी सच्चाई सेठजी को बता दी। सारा सच सुनने के बाद सेठजी को बहुत दुख हो रहा था। वे तुरंत दुखी मन से उसके घर पहुँचे और वहाँ जानकर हतप्रभ रह गये कि हरिराम की दो छोटी बच्चियाँ थी जो कि अब अनाथ हो चुकी थी और उनके लालन पालन की विकट समस्या थी। रामसिंह ने त्वरित निर्णय लेते हुए उन दोनो बच्चियों को अपने घर लाकर अपने बच्चो की तरह उनका पालन पोेषण किया।

आज उन्ही दोनो बच्चियों की विदाई करके रामसिंह की आँखें भर आई थी। यह सब सेाचते सोचते ना जाने कब रामसिंह की नींद लग गई और उन्होंने स्वप्न में देखा कि जैसे हरिराम की आत्मा कह रही हो कि आज मुझे षांति एवं मुक्ति मिल गइ्र्र है।

 

 

 

                            46.  उपचार या उपकार

 

डाॅ. वरूण साहनी एक प्रसिद्ध दंतचिकित्सक है एवं वे एलायंस क्लब इंटरनेषनल के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्र में नागरिकांे के हितार्थ होने वाले चिकित्सा षिविरों में अपनी निषुल्क सेवाएँ प्रदान करते है। वे अपने जीवन का प्रेरणादायक संस्मरण बताते हुए कहते है कि कुछ वर्ष पहले एक ग्रामीण महिला उनके पास इलाज हेतु आयी थी। उसने बताया कि चिकित्सक सरकारी हाॅस्पिटल में उसे भर्ती करने में हीला हवाली कर रहे थे। वह दूसरे दंत चिकित्सकों के पास अपने इलाज हेतु गयी तब उन्होंने उसके मुुँह में कैंसर की संभावना बताकर इलाज में दो से तीन लाख रू. खर्च होने का अनुमान बताया। वह एक गरीब महिला थी और उसकी आर्थिक स्थिति के अनुरूप वह इतना भारी भरकम खर्च नही वहन कर सकती थी। यह कहते हुए उसकी आँखों में आँसू आ गये और उसने रूंधे गले से कहा कि आपको मैंने गांव में सेवाएँ देते हुये देखा है और मैं बहुत उम्मीद से आपके पास आयी हूँ।

उसकी बातें सुनकर मैं भावुक हो गया एवं उसका इलाज निषुल्क करने का मन में निष्चय कर लिया। मैंने बहुत सावधानी पूर्वक उसके मुख का परीक्षण किया एवं उसे आॅपरेषन करवाने की सलाह दी। मैंने उसे आष्वस्त किया कि वह बिल्कुल ठीक हो जायेगी। उसकी सहमति के बाद मैंने अपने कुछ मित्र चिकित्सकों को बुलाकर उसकी सर्जरी संपन्न की जिससे उसे काफी आराम हुआ। उसे एक सप्ताह तक अस्पताल में रखा गया और इसके उपरांत उसे घर जाने की इजाजत दे दी गई।

अस्पताल से विदा होते समय उसने सभी चिकित्सकों को बहुत आषीष एवं दुआयें दी। उसे जब पता हुआ कि उसकी निषुल्क चिकित्सा संपन्न हुई है तब उसकी आँखों में जो कृतज्ञता का भाव था वह आज भी मैं नही भूल सकता हूँ। मैं आज के युवा चिकित्सकों को यही सलाह देता हूँ कि हम मरीज के साथ सहयोगपूर्ण व्यवहार करते हुये जरूरतमंद, गरीबों का उपचार निषुल्क करने का मन में भाव रखे इससे ईष्वर की कृपा सदैव बनी रहेगी।          

 

 

 

 

                                   47.  अप्रतिम चाहत

 

यषवंतपुर नाम के एक नगर में प्रेमवती नाम की एक संभ्रांत महिला रहती थी। उसे बचपन से ही चित्रकला का बहुत षौक था। वह दिन भर केनवास पर रंग बिरंगे रंगों से चित्र बनाती रहती थी। धीरे धीरे उसकी चित्रकला की प्रसिद्धि बढ़ती गयी। उसकी एक एकल चित्रकला प्रदर्षनी का आयेाजन किया गया था जिसे देखकर दर्षक भावविभोर होकर उसकी कला की प्रषंसा कर रहे थे। हेमंत नाम का एक व्यक्ति भी वह प्रदर्षनी देखने के लिए आया हुआ था। उसने सभी चित्रों को देखकर प्रेमवती से कहा कि आपकी इतनी अच्छी पेंटिंग्स के लिए आपको बधाई देता हूँ परंतु इनकी बनावट से महसूस होता है कि आपके दिल में एक बहुत बडा दर्द छिपा हुआ है। आपके ना चाहते हुए भी मानवीय संवेदनाओं का चित्रण कहीं ना कहीं नजर आ जाता है।

प्रेमवती चैंकी और पूछ बैठी कि आप यह कैसे कह सकते है। वह बोला मै भी एक अच्छा चित्रकार था परंतु अब चित्रकारी नही करता हूँ परंतु इसका ज्ञान तो रखता ही हूँ। वार्तालाप के दौरान दोेनो के बीच अच्छी पहचान बन गयी और एक दिन निकट के काॅफी हाऊस में काॅफी पीने बैठ गये।

इस दौरान हेमंत ने बताया कि वह एक उद्योगपति परिवार से है और चित्रकला उसका षौक है। उसका विवाह हो चुका था परंतु दुर्भाग्य से उसकी पत्नी ब्लड कैंसर के कारण अस्पताल में अपने अंतिम समय का इंतजार कर रही थी। मैं उसको बहुत चाहता था, मुझे फोन पर सूचना मिली कि उसकी स्थिति काॅफी गंभीर है और वह मुझे याद कर रही है। मैं अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्षनी में कुछ महत्वपूर्ण मंत्रियों, राजनैतिक प्रतिनिधियों के बीच घिरा हुआ था इसलिये मुझे उनसे विदा लेने में कुछ समय लग गया और जब अस्पताल पहुँचा तो मुझे यह जानकर गहरा सदमा पहुँचा कि वह अंतिम समय तक मुझे याद करती हुयी मुझसे बिना मिले ही हमेषा के लिए बिछुड गयी। इस घटना से मुझे इतना गहरा सदमा पहुँचा कि मैंने पेंटिंग्स करना बंद कर दिया। यह सुनकर प्रेमवती स्तब्ध रह गयी और उसने सहानूभूति व्यक्त करते हुए उसे सांत्वना दी।

हेमंत के द्वारा उसके बारे में पूछने पर प्रेमवती ने भी अपने बारे में उसे बताया कि वह विवाहित थी एवं उसका पति अमेरिका में रहता था तथा पाष्चात्य सभ्यता और संस्कृति में इतना घुल मिल गया था कि मेरी उसकी पटरी नही बैठ पाई और हम लोग अलग हो गये। इसका दुख तो मुझे बहुत हुआ कि मैं अपने माता पिता की अकेली संतान हूँ परंतु मैंने अपने को संभाल कर पेंटिग के क्ष़्ोत्र में ही अपने आप के समर्पित कर दिया है और इसकी बिक्री से जो भी रकम प्राप्त होती है उसे गरीब बच्चों की पढाई में खर्च कर देती हूँ।

इस प्रकार दोनो की मित्रता बढती गयी और यह भावनात्मक संबंधों में बदल गयी। मानव सोचता कुछ है परंतु जीवन में कभी कभी कुछ और हो जाता है। कुछ ऐसा ही इन दोनो के जीवन में भी हुआ। एक दिन हेमंत अपने आॅफिस में बैठा था तभी उसे अचानक ही सूचना प्राप्त हुई कि पे्रमवती का किसी कार से एक्सीडेंट हो गया है और वह गंभीर अवस्था में अस्पताल में है। हेमंत तुरंत अस्पताल पहुँचता है जहाँ उसे पता चलता है कि एक्सीडेंट के कारण प्रेमवती का दाहिना हाथ बेकार हो गया है।

प्रेमवती के होष में आने के बाद जब उसे इसकी जानकारी मिलती है तो वह फफक फफक कर रोने लगती है। यह देखकर हेमंत आगे बढकर उसे समझाते हुए कहता है कि देखो मेरे ये दोनो हाथ भी तो तुम्हारे ही है। मैं आज भी तुम्हारे लिए उतना ही समर्पित हूँ जितना कल था। कुछ समय बाद अस्पताल से प्रेमवती की छुट्टी हो जाती है और हेमंत उसे लेकर उसके घर पहुँचता है तो वह देखती है कि उसके द्वारा छोडी हुयी अधूरी पेंटिग पूरी बन चुकी थी और उसे पता होता है कि इसे हेमंत ने पूरा किया है।

ये देखकर प्रेमवती की आँखें सजल हो जाती है। कुछ माह उपरांत एक दिन हेमंत प्रेमवती के सामने षादी का प्रस्ताव रखता है परंतु प्रेमवती यह कहते हुए मना कर देती है वह अपंग हो चुकी और जीवन भर उस पर बोझ नही बनना चाहती है। यह सुनकर हेमंत कहता है कि विवाह दो दिलों के भावानात्क संबंधों के मिलन की परिणिति होती है। हेमंत के बहुत अनुरोध करने के बाद भी प्रेमवती विवाह करने से इंकार कर देती है। वह कहती है कि उसका स्वभाव पुराने विचारों का है इसी कारण अमेरिका में उसकी पटरी नही बैठ पाई। हेमंत यह सुनने के बाद इतना ही कहता है कि जिसमें में तुम खुष हो वही मेरे जीवन की खुषी है। अब वह अपना समय प्रेमवती के अधूरे सपनों को पेंटिग्स के माध्यम से पूरा करने लगाता है और यही उसके जीवन का लक्ष्य बन जाता है।

ऐसा कहा जाता है कि वक्त किसी भी पीडा के घाव को समय के साथ बदल देता है। प्रेमवती के साथ भी ऐसा ही हुआ, वह साहसी, निडर एवं कर्तव्यनिष्ठ महिला थी। उसने अपना दाहिना हाथ खराब हो जाने का दुख मन से निकाल कर कुछ माह के उपरांत अपने बायें हाथ से पेंटिंग बनाने का अभ्यास षुरू किया और फिर उसे धीरे धीरे अपने इस प्रयास में सफलता मिलने लगी। वह एक वर्ष में इतनी पारंगत हो गई कि पहले के समान ही पेंटिंग बनाने लगी। अब हेमंत और प्रेमवती दोनो अपनी पेंटिंग्स को बेचकर उससे प्राप्त होने वाली आय को सद्कार्यों में खर्च करने लगे। प्रेमवती ने अपने आत्मविष्वास और दृढ़ निष्चय से यह साबित कर दिया था कि जीवन में किसी भी कठिन परिस्थिति से बाहर निकला जा सकता है।

 

 

 

 

                                           48.   प्रायष्चित

 

नर्मदा नदी के किनारे पर बसे रामपुर नामक गाँव में रामदास नाम का एक संपन्न कृषक अपने दो पुत्रों के साथ रहता था। उसकी पत्नी का देहांत कई वर्ष पूर्व हो गया था, परंतु अपने बच्चों की परवरिष में कोई बाधा न आए इसलिए उसने दूसरा विवाह नहीं किया था। उसके दोनो पुत्रों के स्वभाव एक दूसरे के विपरीत थे। उसका बड़ा बेटा लखन लालची प्रवृत्ति रखते हुए धन का बहुत लोभी था, परंतु उसका छोटा पुत्र विवेक बहुत ही दातार, प्रसन्नचित्त एवं दूसरों के कष्ट के निवारण में मददगार रहता था। वह कुषल तैराक था। वह अपने पिता के कामों में बहुत कम रूचि रखता था। वह सीधा, सरल, एवं नेकदिल इंसान था एवं उसे अपने बडे भाई पर गहन श्रद्धा एवं विष्वास था।

रामदास ने अपनी वृद्धावस्था को देखते हुए अपनी वसीयत बनाकर अपने सहयोगी मित्र के पास रखवा दी थी और उसे रजिस्टर्ड करने का निर्देष भी दिया था। परंतु ऐसा होने के पूर्व ही दुर्भाग्यवष हृदयाघात के कारण उसकी मृत्यु हो गई। उसके बडे बेटे लखन ने हालात का फायदा उठाकर अपने पिता के मित्र को येन केन अपनी ओर मिलाकर वह वसीयत हथिया ली एवं अपने पिता की हस्ताक्षर युक्त कोरे कागज पर नई वसीयत बनाकर खेती की पूरी जमीन व अन्य संपत्तियाँ, गहने, नकदी आदि अपने नाम लिखकर उन्हे हथिया लिया और विवेक को संपत्ति में उसके वाजिब हक से बेदखल कर दिया। विवेक के हितेषियों ने उसे न्यायालय जाने की सलाह दी, परंतु उसे ईष्वर पर गहरी श्रद्धा एवं विष्वास था और वह प्रभु से न्याय करने की प्रार्थना करके चुपचाप रह गया।

विवेक अपने सीमित साधनों में ही अपनी गुजर बसर करके अपना जीवन यापन कर रहा था। इस घटना के बाद दोनेा भाईयों में पूर्णतः संबंध विच्छेद हो गये और लखन के विवाह में भी विवेक को नही बुलाया गया। कुछ वर्षों बाद लखन को पुत्र की प्राप्ति हुई, परंतु सभी समारोह में विवेक की उपेक्षा की गई। वक्त बीत रहा था और लखन का बेटा 2 वर्ष की उम्र का हो गया था।

एक दिन वह अपनी माँ के साथ नाव से नदी पार कर रहा था तभी न जाने कैसे हादसा हुआ और बच्चा छिटककर नदी में गिर गया। विवेक इस घटना को पास के ही टापू से देख रहा था। उसका मन अपने अपमान को याद करके सहायता करने से रोक रहा था। विवेक ने देखा कि वह अबोध बालक लगभग डूबने की स्थिति में आ गया है और उसके दोनो हाथ पानी के ऊपर दिख रहे हैं। यह हृदय विदारक दृष्य देखकर वह अपने आप को रोक नही सका एवं तुरंत बिजली की गति से पानी में तैरकर उस बालक के पास पहुँच गया। अपनी तैराकी के अनुभवों से उसे बचाकर किनारे की ओर ले आया। इस दुर्घटना की खबर आग की तरह सारे गाँव में फैल गई और लखन बदहवास सा नंगे पैर दौडता हूआ नदी के पास आया।

वहाँ पर उसने देखा काफी लोग विवेक को घेरकर उसके साहस, त्वरित निर्णय एवं भावुकता की भूरि भूरि प्रषंसा कर रहे थे। लखन को देखकर विवेक बच्चे को हाथ में उठाकर उसे देने हेतु उसके पास आया। यह दृष्य देखकर लखन स्तब्ध रह गया और उसके मुख से ये षब्द निकल पडे कि आज मैं याचक हूँ और तुम दाता हो, उसकी आँखे सजल हो गई और वह फूट-फूटकर रो पडा मानो पष्चाताप आँसुओं से झर रहा था। वह रूंधे गले से कह रहा था, मैंने तेरे साथ हमेषा अन्याय किया हैं। मेरी धन लोलुपता एवं लोभी स्वभाव ने मुझे अधर्म के पथ पर ले जाकर भ्रष्ट कर दिया था। तुमने अपने अपमान को पीकर भी अपनी जान जोखिम में डालकर मेरे बच्चे की रक्षा की हैै। मुझे मेरी गलतियों के लिए माफ कर दो और मेरे साथ घर चलो।

विवेक चुपचाप खड़ा सोच रहा था तभी वह बालक चाचा चाचा कह कर उसकी गोद में आने के लिए मचलने लगा। ऐसे भावपूर्ण दृष्य ने लखन और विवेक के दिलों को एक कर दिया। लखन ने विवेक को घर ले जाकर उसे उसकी संपत्ति का हिस्सा देने के कागजात तुरंत बनवाए एवं इसके साथ ही गहने, नकदी तथा अन्य चल संपत्तियों में जो भी वाजिब हिस्सा विवेक का था वह उसे दे दिया। लखन ने कहा कि तुम्हारा अधिकार तुम्हे देकर भी मैं अपने पापों से मुक्त नही हो सकता। यह सुनकर विवेक ने अपने बड़े भ्राता के कंधे पर हाथ रखकर कहा कि उसके मन मेें अब किसी भी प्रकार का दुराभाव नहीं है। आप भी अपने नकारात्मक विचारों को हृदय से निकालकर सकारात्मक षुरूआत करें। यही आपके लिए जीवन का सच्चा प्रायष्चित होगा। 

 

 

 

                             49.   हिम्मत

 

मुंबई से हैदराबाद एयर इंडिया का हवाई जहाज जा रहा था। हैदराबाद के पास अचानक ही मौसम खराब हो जाने के कारण विमान हिचकोले खाने लगा। इससे सभी यात्रियों में दहषत होने लगी तभी सीट पर बैठे एक दस वर्षीय बालक ने अपने सहयात्री से पूछा कि अंकल इस हवाई जहाज में क्या हो रहा है ? वे मुस्कुराते हुए बोले बेटा कुछ नही जैसे तुम कभी कभी खेलते हो वैसे ही विमान की भी इच्छा खेलने की हो रही है और इसी कारण यह ऊपर नीचे होकर मनोरंजन कर रहा है। यह सुनकर वह लडका हँसा और इस घटना का आनंद लेने लगा। दूसरी तरफ एक महिला यात्री जो कि विमान में यात्रा के दौरान राम नाम की माला जप रही थी, घबराकर उसके हाथ से माला छूट जाती है। वह एयर होस्टेस को बुलाकर पूछती है कि क्या हमारा विमान टकराने वाला है। वह एयर होस्टेस मुस्कुरा कर कहती है कि नही बिल्कुल नही आप भगवान के प्रति आस्थावान महिला है तब ऐसा कैसे हो सकता है। आप निष्चिंत रहे, कोई दुर्घटना नही होगी। तीसरा यात्री अपने सहयात्री को एक लिस्ट दिखाकर कहता है कि इतना रूपया मुझे लोगो से वसूलना है अगर यह विमान दुर्घटनाग्रस्त हेा गया तो मेरा काफी नुकसान हो जायेगा। उसका सहयात्री उसको कहता है कि ऐसी स्थिति में तुमको रूपये याद आ रहे हैं, यहाँ तो हम सब की जान पर आ बनी है। भगवान से प्रार्थना करने की जगह तुम अपने नुकसान और उधार वसूली के बारे में सोच रहे हो। चैथे यात्री इस संभावित दुर्घटना से बचने के लिए भगवान से तरह तरह की मन्नतें माँगने लगा। हवाई जहाज के पायलट काफी अनुभवी थे और उन्होंने जोखिम का सामना करते हुए बिना किसी भय के अपने अनुभव से विमान को सुरक्षित हैदराबाद में उतार लिया। अब सबकी जान में जान आ गयी और चेहरे पर मुस्कुराहट दिखने लगी। किसी ने सच ही कहा है कि यदि परिस्थितियाँ विपरीत भी नजर आ रही हो तो भी हमें मन से डर निकाल देना चाहिए और संयम रखते हुए उस कठिन समय के समाप्त होने का इंतजार करना चाहिए या आत्मविष्वास के सहारे कठिन समय का सामना करना चाहिए।

 

 

 

                              50.   नवजीवन

 

डाॅ. अनुपम साहनी जो कि प्रसिद्ध न्यूरोफिजिषियन है, वे मुंबई में देष के सुविख्यात न्यूरोफिजिषियन डाॅ.खादिलकर के मार्गदर्षन में कार्यरत थे। वे बताते है उनके गुरू की यह विषेषता थी कि वे प्रतिदिन जे.जे.अस्पताल मुंबई में गरीब एवं असहाय मरीजों की निषुल्क चिकित्सा करके आवष्यकता होने पर उनका दवाईयों का व्यय भी स्वयं ही वहन करते थे। डाॅ. अनुपम साहनी अपने गृहनगर जबलपुर में माता पिता की सेवा एवं इस षहर में उच्चस्तरीय चिकित्सा सुविधाओं वाला एक अस्पताल खोलना चाहते थे ताकि यहाँ के मरीजों को चिकित्सा हेतु महानगर ना जाना पडे। उन्होंने जबलपुर आकर बेस्ट सुपर स्पेषिलिटी हाॅस्पिटल के नाम से आधुनिक उपकरणों एवं सभी सुविधाओं से युक्त अस्पताल का निर्माण किया। इससे पहले वे षासकीय मेडिकल काॅलेज जबलपुर में भी सेवारत रहे।

उन्होने एक घटना बताते हुए बताया कि जब वे जबलपुर मेडिकल काॅलेज में अस्सिटेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे तभी एक दिन एक गरीब व्यक्ति जो कि मायसथिमिया ग्रेविस नाम की बीमारी से पीडित था अपने इलाज हेतु उनके पास आया। यह न्यूरोमस्कुलर आॅटोइम्यून बीमारी थी जिसमेें व्यक्ति के षरीर की मांसपेषियाँ कमजोर होकर आँखे, चेहरा आदि अंगों में काम करने की क्षमता कम हो जाती है और धीरे धीरे व्यक्ति लकवाग्रस्त हो जाता है। उसकी खतरनाक एवं गंभीर अवस्था को देखते हुए उसे वेंटीलेटर पर रख दिया गया था। इस बीमारी का एकमात्र इलाज आइवीआइजी इंजेक्षन या प्लाज्मा फैलेसिसि नाम की दवाई ही होती है जो कि बहुत मँहगी दवा है। वह एक गरीब परिस्थिति का व्यक्ति था और उसके परिवार के लिए इतना खर्च वहन करना संभव नही था। यह दवाईयाँ षासकीय मेडिकल काॅलेज में भी उपलब्ध नही थी। षासकीय अस्पतालों में वेंटीलेटर की उपलब्धता भी सीमित होती है और इस कारण प्रायः प्रतिदिन दूसरे विभागों मे वेंटीलेटर की आवष्यकता के कारण विवाद की स्थिति बन जाती थी।

वे उस व्यक्ति की जीवन रक्षा हेतु बहुत परेषान थे कि वेंटीलेटर से हटाने के बाद इसकी जीवन रक्षा कैसे की जा सकेगी। उन्होंने उस मरीज को विभिन्न प्रकार के स्टेराॅयड देने का निर्णय लिया। ईष्वर की कृपा से यह स्टेराॅयड उस पर काफी असरकारी सिद्ध हुआ और वह दो महीने में ही काफी ठीक हो गया। उस मरीज को दो माह तक वेंटीलेटर पर रखा गया और इतने लंबे समय तक वेंटीलेटर पर रहने के बाद भी उसका ठीक हो जाना प्रभु कृपा ही थी मैं तो केवल निमित्त भाव से उसकी सेवा करके अपने कर्तव्य की पूर्ति कर रहा था। आज वह खुषी खुषी अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। वह व्यक्ति डाॅ. साहनी के प्रति इतना सम्मान और आदर रखता है कि वह किसी भी बीमार व्यक्ति को सीधे उनके पास इस विष्वास के साथ ले आता है कि वे उसके रोग का निदान कर देंगें। डाॅ. साहनी को बहुत खुषी होती है कि म.प्र. का वह पहला मरीज था जिस पर इस चिकित्सा प्रणाली का प्रयोग किया गया था और वह सफल रही। इस कार्य से उन्हें बहुत आत्मसंतोष एवं आत्मविष्वास प्राप्त हुआ।        

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Rajesh Maheshwari

Rajesh Maheshwari Matrubharti Verified 3 months ago