तर्ज़नी से अनामिका तक - भाग ९ in Hindi Motivational Stories by Rajesh Maheshwari books and stories Free | तर्ज़नी से अनामिका तक - भाग ९

तर्ज़नी से अनामिका तक - भाग ९

                 71.  संत जी

 

नर्मदा नदी के तट पर एक संत अपने आश्रम में रहते थे। उन्होंने अपने आश्रम को नया स्वरूप एवं विस्तार करने की इच्छा अपने एक व्यापारी षिष्य को बताई उस षिष्य ने अपनी सहमति देते हुए उन्हें इस कार्य को संपन्न कराने हेतु अनुदान के रूप में अपनी दो हीरे की अंगूठीयाँ भेंट कर दी। यह देखकर संत जी प्रसन्न हो गये और उन्होंने दोनों अंगूठियों की सुंदरता को देखते हुए उन्हें संभालकर अलमारी में रख दी।

एक दिन एक भिखारी जो कि अत्यंत भूखा एवं प्यासा था उनके पास भोजन की इच्छा से आया। संत जी ने उसे भोजन के साथ साथ मिठाई देने हेतु अलमारी खोली और उसमें से एक डिब्बा निकालकर उसे दे दिया। उस भिखारी ने घर आने पर डिब्बा खोलकर देखा तो उसके एक कोने में हीरे की अंगूठी चिपकी हुई थी। यह देखकर वह चैंक गया और तुरंत संत जी के पास आकर उन्हें इसकी जानकारी देते हुए उनके चरणों के पास अंगूठी रख दी और बोला कि यह आपकी वस्तु है जो कि धोखे से मेरे पास आ गई थी।

यह सुनकर संत जी कुछ क्षण के लिए मौन हो गये और चिंतन करने लगे कि यह भिखारी कितना गरीब है परंतु इसका मन कितना उज्जवल एवं विषाल है। यह ईमानदारी और नैतिकता का साक्षात उदाहरण है। मैं अपने आप को संत मानता हुआ भी इस अंगूठी की सुंदरता में उलझ गया और इसी कारण मैंने उस अंगूठी को बेचा नही। मुझे अभी अपने आप को और अधिक निर्मल करने की आवष्यकता है।

 

 

 

                         72.  लघुता एवं प्रभुता

 

एलायंस क्बल इंटरनेषनल के एक सदस्य ने पूछा कि हम सभी एक ही संस्था के एक समान सदस्य है परंतु कुछ सदस्य कार्यक्रमों की प्रस्तुति के अवसर पर मंच के ऊपर बैठते हैं और अन्य सदस्य मंच के नीचे विराजमान होते है। ऐसी व्यवस्था से उनके मन में हीनता का भाव आता है। इस प्रकार की परंपरा क्यों है? संस्था के एक बुजुर्ग सदस्य ने उसे समझाते हुए कहा कि जीवन में जो अच्छी बातों का अनुसरण करने की षिक्षा देता है, ऐसा ज्ञान देने वाला व्यक्तित्व हमेषा थोडा ऊँचा बैठता है। इसी प्रकार हम देखते है कि साधु संत विप्र जन जब भी हमारी मन, बुद्धि को उच्च स्तर पर ले जाने के लिए प्रयत्नषील होते है तो उनमंे गुरू का भाव आकर वे उच्च आसन पर बैठते है और अपने षिष्यों को बैठने के लिए नीचे स्थान देकर ज्ञानामृत प्रदान करते है। हम जब किसी भी सामाजिक संस्था की सदस्यता की षपथ लेते हैं तो षपथ के समय अपने हाथ की हथेली नीचे की ओर रखते हैं क्योंकि हम पीडित मानवता की सेवा के लिए प्रतिबद्ध रहते है। यह प्रकृति का नियम है कि दाता का पद याचक से ऊँचा होता है। मैं तुम्हें एक उदाहरण देता हूँ कि झरने के पानी का उपयोग जब वह पत्थरों पर से होता हुआ नीचे आकर बहना प्रारंभ करता है तब हम उसका उपयोग करते है ना कि चट्टानों पर चढकर उसके उद्गम स्थल पर जाकर जल प्राप्त करते है। इसलिये कहा जाता है कि देने वाले का हाथ ऊपर और लेने वाले का नीचे।

 

 

 

                   73.  षांति

 

देष के सुप्रसिद्ध उद्योगपति श्री बिड़ला जी का व्यक्तित्व महात्मा गाॅंधी के प्रति आजीवन समर्पित रहा है। वे कभी कभी उनके साथ सुबह की सैर पर जाते थे। एक दिन उन्होंने गांधी जी से पूछा मैं अपने व्यापार में दिन भर व्यस्त रहता हूँ। कार्यालय से आने के बाद भी व्यापार के विभिन्न विषयों पर मेरे मन में चिंतन चलता रहता है जिसके कारण जिस षांति की आषा जीवन काल में मुझे होनी चाहिए वह पूरी नही हो पाती। मुझे इसके निदान के लिए क्या करना चाहिए ? गांधी जी यह सुन मुस्कुराकर बोले तुम्हें ईष्वर पर पूर्ण विष्वास है या नही ? बिड़ला जी बोले कि मेरा मन ईष्वर के प्रति पूर्ण समर्पित है एवं मेरा ईष्वर के प्रति असीम विष्वास है। गांधी जी बोले इस दुनिया की बागडोर ईष्वर के हाथों में हैं। यह दुनिया ईष्वर के द्वारा नियंत्रित होकर चल रही है। यह संसार हमारे जन्म के पहले भी था आज भी है और हमारे संसार से विदा होने के बाद भी चलता रहेगा। तुम मन में यह विचार रखो कि तुम्हारा व्यापार भी ईष्वर कृपा से चल रहा है। इसका भविष्य भी उन्ही के हाथों में सुरक्षित है। तुम अपना कर्तव्य पूरा करते रहो और बाकी सभी बाते ईष्वर के उपर छोड दो। तुम अपने मन की चिंताआंे, विचारों और भविष्य की रूपरेखाओं की बागडोर भी मन से ईष्वर को सौंप दो। तुम्हें षंाति स्वमेव प्राप्त हो जायेगी। यह बात सुनने के पष्चात श्री बिडला जी के स्वभाव में काफी परिवर्तन आ गया। गांधी जी के प्रति उनकी श्रद्धा और भी अधिक बढ़ गई।

 

 

 

 

                       74.   सुंदरता 

 

जबलपुर के एक प्रसिद्ध महाविद्यालय में सहषिक्षा के माध्यम से बी.काॅम की पढ़ाई होती थी। इसके वार्षिक समारोह में प्रस्तुति देने हेतु छात्र छात्राएँ सज-धज कर आये हुए थे। उनके बीच में यह चर्चा चल निकली कि कौन सबसे आधुनिक, सुसंस्कृत एवं संुदर कपडे पहना हुआ है। उसी समय उनके नृत्य के षिक्षक तैयारियाँ देखने के लिए आये। उन्हें देखकर सभी छात्र छात्राओं ने उनसे अनुरोध किया कि आप इस बात का फैसला करें कि हम सब में कौन सा छात्र एवं कौन सी छात्रा का परिधान सबसे सुंदर है ? उन्होंने सभी उपस्थिति जनों को विद्यालय के बाहर बैठे एक गरीब लडके की ओर ध्यान देने का निवेदन करते हुए कहा कि देखो वह गरीब लड़का इस गर्मी में भी अकेला बैठकर प्यासे लोगों को पानी पिलाने हेतु प्याऊ खोलकर बैठा है। उसके साथ साथ जो अपाहिज और विकलांग लोग सडक को पार करना चाहते है उनकी भी मदद करके उन्हंे सडक पार करा रहा है। वह कितना अच्छा काम कर रहा है उसके मन की भावनायें कितनी अच्छी है। तुम लोग आपस में बाहरी सुंदरता को देखकर प्रसन्न हो रहे हो, उस बालक की अंदरूनी सुंदरता को देखने का प्रयास करो। तन की सुंदरता तो अस्थायी होती है परंतु मन की संुदरता में स्थायित्व होता है। यह सुनकर सभी छात्र छात्राओं ने भाव विभोर होकर निर्णय लिया कि वार्षिक समारोह में धन का अपव्यय रोककर उस बचत को वे सभी अपनी और महाविद्यालय की ओर से उसकी पढाई और अन्य व्यवस्थाओं हेतु उसे देने का संकल्प लेते है।

 

 

                   75.   दृष्टिकोण

 

एक दार्षनिक महोदय एक दिन छबिगृह में फिल्म देखने हेतु गये। उन्होंने एक सामान्य सी घटना को दार्षनिक स्वरूप में प्रस्तुत कर हमें सुनायी। वे बोले कि सिनेमाहाॅल में फिल्म का प्रदर्षन षुरू हो चुका था तभी देर से दो व्यक्तियों ने प्रवेष किया उनमें से एक को गेटकीपर उसके लिए आवंटित सीट पर बैठाने के लिए ले गया, उसी सीट पर कोई दूसरा व्यक्ति पहले से ही बैठा था। गेटकीपर ने नंबर चेक करने के बाद उस व्यक्ति से निर्धारित सीट पर जाने के लिए कहा तो वह बोला कि दूसरे गेट कीपर ने उसे यही बैठने के लिए कहा है। गेटकीपर ने पुनः उससे विनम्रता से सीट बदलने के लिए अनुरोध किया, उनके बीच वार्तालाप हो ही रहा था कि जो व्यक्ति गेटकीपर के साथ आया था वह बोला कि आप लोग दर्षकों को सही स्थान पर क्यों नही बैठाते ? ऐसा ना करने से सभी को तकलीफ होती है। बडी अनुनय विनय के बाद वह व्यक्ति उठकर अपनी सीट पर स्थानांतरित हो गया और यह व्यक्ति भी खीझता हुआ अपनी सीट पर बैठ गया।

अब गेटकीपर दूसरे व्यक्ति को उसके सही स्थान पर बैठाने हेतु ले गया। वहाँ पर भी उसने देखा की कोई और पहले से ही वहाँ बैठा हुआ है। इसके पहले की गेटकीपर उस व्यक्ति से सीट खाली करने के लिए कहता। गेटकीपर के साथ आया हुआ दर्षक उससे बोला कि इन्हें उठने का कष्ट मत दो मुझे ही कोई दूसरी सीट दे दो। गेटकीपर ने उसे तुरंत दूसरी सीट पर बैठा दिया। अब दार्षनिक महोदय बोले कि इस घटनाक्रम को देखकर मैं सोच रहा था कि पहला दर्षक अपने अधिकार के लिए सजग था और उसने अपने लिए आवंटित सीट पर बैठना अनिवार्यता समझी। दूसरा दर्षक प्रेमी व्यक्ति था उसने किसी दूसरे को तकलीफ ना हो सोचकर अपनी जगह बदल ली। यह बात अपने अपने दृष्टिकोण को दर्षाती है कि अधिकार और प्रेम के बीच कौन ज्यादा स्वीकार्य होना चाहिए ?

 

 

 

                         76.  भ्रातद्रोह

 

श्री राम विष्व के महानतम राजनीतिज्ञ, दार्षनिक एवं कुषल प्रबंधक थे। रावण के भ्राता विभीषण अपने अपमान को ना सहकर लंका छोड़कर जब श्री राम के पास अपनी व्यथा लेकर आये तो श्री राम ने बिना समय गंवाए विभीषण को अपने पास समुचित मान सम्मान देते हुए बैठाकर उन्हें उनका अधिकार दिलाने हेतु आष्वस्त कर दिया। यह देखकर उनके सभी प्रमुख सलाहकारगण यहाँ तक की हनुमान जी और लक्षमण जी भी भौंचक्के रह गये। उन्होंने श्री राम के इस व्यवहार के प्रति उन्हें आगाह किया परंतु श्री राम अपने निष्चय पर दृढ रहे। ऐसा कहा जाता है कि युद्ध समाप्त होने पर जब रावण मृत्युषैया पर था तो श्री राम के निर्देष पर लक्ष्मण जी उसकी विद्वता का ज्ञान प्राप्त करने हेतु रावण के पास गये थे। रावण ने उनको कहा मैंने अहंकारवष अपने भाई को भरी सभा में बेइज्जत कर दिया था। मुझे किंचिंत भी अनुमान नही था कि वह श्री राम के पास जाकर उनका षरणागत् हो जायेगा। जिसका सगा भाई उसके साथ ना हो उसे युद्ध में जीतना बहुत कठिन हो जाता है।

विभीषण ने मुझे वचन दिया था कि वह मेरी मृत्यु का राज कभी किसी को नही बतायेगा इसलिये मैंने उसे इससे अवगत करा दिया था। वह मेरा विष्वास तोड़कर आज मेरी मृत्यु का कारण बना है। वह कितना भी नीतिवान, धार्मिक, सदाचारी और राम के प्रति श्रद्धा रखने वाला हो परंतु देखना उसे जो मान सम्मान प्राप्त होना चाहिए, वह नही मिलेगा। आज के वर्तमान परिदृष्य में रावण का कथन षतप्रतिषत सही निकला है। युद्ध में जीतने के उपरांत श्री राम की सभी दिषाओं में वाहवाही और प्रषंसा हुई। उनके मंदिर बनकर उनकी पूजा अर्चना होती है जबकि उनकी जीत का कारण विभीषण द्वारा बताया गया रावण की मृत्यु का राज था परंतु विभीषण को घर का भेदी लंका ढाये के रूप में जाना जाता है। समय के साथ साथ विभीषण इतिहास के गर्त में कही खो गये। वे अपने आप को युद्ध में तबाह हुई लंका को पुर्नस्थापित करने में ही आजीवन व्यस्त रहे जबकि श्री राम इतिहास में युग पुरूष के नाम से जाने जाते है। इससे स्पष्ट है कि हमारा व्यक्तित्व कितना भी ऊँचा एवं चरित्रवान हो परंतु भ्रात द्रोह एवं राष्ट्रद्रोह के सम्मुख वह नगण्य रहता है।

 

 

                                    77.  अहंकार

 

मोहन और राकेष नामक दो मित्र आपस में अहंकार के विषय में चर्चा कर रहे थे। मोहन ने इसे समझाने के लिए एक उदाहरण दिया, जब भी आंधी, तूफान अपनी तीव्र गति से आता है तो धरती पर बहुत विनाष होता है और बडे बडे पेड़ पौधे, मजबूत मकान इत्यादि धराषायी हो जाते है परंतु दूबा ( एक प्रकार की घास ) एवं बेलपत्ती का पौधा ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी सुरक्षित रहते है। इसका कारण तेज हवा के झोंकों में इनका झुक जाना है और हवा के थपेडे इनके उपर से निकल जाते है जबकि मजबूत तने के वृक्ष और आधुनिक तकनीक से बने सीमेंट, लोहा, ईटों से निर्मित मकान धराषायी हो जाते है। वे इस तूफान का अपनी मजबूती से मुकाबला करने की क्षमता की भूल करते है और अपना अस्तित्व समाप्त कर लेते है। हमें अपनी क्षमताओं का सही आकलन करना चाहिए और यदि परिस्थितियाँ विपरीत हो तो हमें झुक जाना चाहिए और सही वक्त का इंतजार करना चाहिए यदि हम अहंकारवष ऐसा नही करेंगें तो अपना ही नुकसान करके अपने ही अस्तित्व पर संकट बुला लंेगें।

 

 

 

                                 78.   सुख

 

रामसुखलाल नगर के एक प्रसिद्ध कपड़ों के व्यापारी थे। उनका व्यापार दिन दूनी रात चैगुनी तरक्की कर रहा था और उनकी गिनती षहर के धनाढ्य व्यक्तियों मंे होती थी। वे स्वभाव से बहुत कंजूस प्रवृत्ति के थे। वे दान, धर्म और किसी की भी आर्थिक मदद करने से दूर रहते थे। उनकी सोच यह थी कि व्यक्ति गरीब या अमीर अपने कर्मों की वजह से है। एक दिन उनके यहाँ एक साधु आये जिनका उन्होंने काफी आदर सत्कार किया और अपने मन की उलझन बताते हुए कहा कि उनके पास सबकुछ है परंतु मन में षांति का अभाव है। इस कारण सब कुछ होते हुए भी जीवन में खालीपन सा लगता है। यह सुनकर महात्मा जी ने कहा जीवन में एक बात याद रखो कि बिना सेवा के वैभव बेस्वाद है। जब वैभव में सेवा की भावना जुड़ जाती है, तो वह महक उठता है। सेवा से अहंकार मिट जाता है, आसक्ति दूर हो जाती है एवं हमारे आत्मा की ज्योति प्रकाषित होकर हमारी अंदर की आँखों को खोल देती है। तुम ध्यान रखना कि धन से सब कुछ प्राप्त नही हो सकता। आप धन से दवाईयाँ खरीद सकते है परंतु स्वास्थ्य नहीं, आलीषान पलंग खरीदा जा सकता है, परंतु नींद़ नही। इसी प्रकार धन से सुविधायें प्राप्त की जा सकती है, परंतु षांति नही। रामसुखलाल पर इन बातों का बडा प्रभाव पडा और उन्होंने षनैः षनैः अपने स्वभाव में परिवर्तन करके सेवा और त्याग को जीवन में उतारना प्रारंभ किया। इससे उन्हें अपने स्वभाव में काफी परिवर्तन महसूस होकर आत्मीय षंाति एवं जीवन की सार्थकता का अनुभव होने लगा।

 

 

 

                                  79.  सुख की बंदरबाँट

 

प्रभु ने अपनी जन्मस्थली भारत के निवासियों को सुख प्रदान करने हेतू परिकल्पना की इसे भेजने हेतु उन्होंने नारद जी को अधिकृत किया। नारद जी सुख को लेकर भारत भूमि पर पहुँचे। वे यह देखकर हतप्रभ रह गये कि यहाँ पर लोग आपस में ही धर्म, जाति, संप्रदाय के संबंध में झगड़ रहे है। वे अपनी इन्ही विध्वंसक गतिविधियों में इतने अधिक व्यस्त थे कि उनके पास नारद जी से सुख लेने का समय ही नह़ी था। अपनी अवहेलना देखकर नारद जी सुख लेकर वापिस प्रभु के पास चले गये और उन्हें इन्ही बातों से अवगत् करा दिया।

अब प्रभु ने हनुमान जी को सुख बाँटने का दायित्व देकर भेजा। हनुमान जी ने बीच रास्ते से ही इसका संदेष धरती पर भिजवा दिया कि वे सुख लेकर आ रहे है, सभी लोग पंक्तिबद्ध होकर इसे प्राप्त करें। जब हनुमान जी भारत भूमि पर अवतरित हुए तो यह देखकर वे बहुत क्रोधित हो गये कि भ्रष्टाचारी, रिष्वतखोर, अनैतिक गतिविधियों से धनोपार्जन करने वाले बडे बडे व्यापारी, सरकारी अधिकारी और उद्योगपति पंक्ति में आगे  खडे थे और गरीब, असहाय एवं जरूरतमंद पीछे की ओर चुपचाप खडे थे। उन्होने अपनी गदा पटककर कहा कि जो सुख के वास्तविक हकदार है, वे पहले आगे आकर सुख प्राप्त करे। उनकी गदा की आवाज और उसकी धमक से सभी लोग इतने घबरा गये कि सभी उपस्थित जन भाग गये। हनुमान जी की सुख को बिना बांटे वापिस लेकर चले गये। 

प्रभु ने अब यमराज को बुलाकर उन्हें सुख बाँटने हेतु निर्देषित किया। यमराज सुख लेकर भारत भूमि पर पहुँचे और दो घंटे के अंदर ही भागकर वापिस प्रभु के दरबार में पहुँच गये। वे बोले कि हे प्रभु आपने मेरी किस गलती की यह सजा मुझे दी और मुझे सुख बाँटने के लिये भारत भूमि पर भेज दिया। वहाँ तो मेरे से भी बड़े यमराज नेता बने बैठे है। उनसे भी खतरनाक यक्ष अधिकारी बनकर प्रषासन कर रहे है। यदि मै ऐसे लोगों को सुख दे देता तो सुख के वास्तविक हकदारों को मुष्किल से दस प्रतिषत सुख भी उन तक नही पहुँच पाता, सारा सुख यही लोग हडप लेते। उन्होंने मेरे कपडे फाडकर, मेरे साथ मारपीट करके कहा कि यह कोई पागल है, जो कहता है कि मैं सुख लेकर यहाँ बाँटने के लिए परमात्मा के आदेष पर आया हूँ।

मैं भागकर अपनी जान बचाने के लिए यहाँ वापिस आ रहा था कि तभी धरती पर एक दीन हीन व्यक्ति दिखा। मैने सोचा कि कुछ सुख इसे दे दूँ, तभी वह मुझसे बोला कि एक दारू की बोतल हो तो दे जा। सुख वुख की क्या बात करता है। मै बडी मुष्किल से उससे पिंड छुडाकर भागकर यहाँ आ पाया हूँ। आप मेरी दुर्दषा और फटे हुये कपडे देखकर मेरी दषा का अनुमान लगा सकते है। इस दृष्टांत के बाद प्रभु ने सुख को तिजोरी में बंद कर दिया।

 

 

 

                         80.   मित्र हो तो ऐसा 

 

कुसनेर और मोहनियाँ एक दूसरे से लगे हुए जबलपुर के पास के दो गाँव हैं। कुसनेर के अभयसिंह और मोहनियाँ के मकसूद के बीच बचपन से ही घनिष्ठ मित्रता थी। वे बचपन से साथ साथ खेले-कूदे और पले-बढे थे। अभयसिंह की थोडी सी खेती थी जिससे उसके परिवार का गुजारा भली भाँति चल जाता था। मकसूद का साडियों और सूत का थोक का व्यापार था। उसके पास खेती की काफी जमीन थी। खुदा का दिया हुआ सब कुछ था। वह एक संतुष्टिपूर्ण जीवन जी रहा था।

अभयसिंह की एक पुत्री थी। पुत्री जब छोटी थी तभी उसकी पत्नी का निधन हो गया था। उसने अपनी पुत्री को माँ और पिता दोनो का स्नेह देकर पाला था, उसे अच्छी षिक्षा दी थी। वह एम.ए. कर चुकी थी। अब अभयसिंह का उसके विवाह की चिंता सता रही थी। अथक प्रयासों के बाद उसे एक ऐसा वर मिला जो उसकी पुत्री के सर्वथा अनुकूल था। अच्छा वर और अच्छा घर मिल जाने से अभयसिंह बहुत खुष था लेकिन अभयसिंह के पास इतना रूपया नही था कि वह उसका विवाह भली भाँति कर सके। उसे चिंता उसके विवाह के लिए धन की व्यवस्था की थी। जब विवाह के लिए वह पर्याप्त धन नही जुटा सका तो उसने सोचा- मेरा क्या है, मेरे पास जो कुछ है वह मेरी बेटी का ही तो है। ऐसा विचार कर उसने अपनी कुछ जमीन बेचने का निष्चय किया।

मकसूद का इकलौता पुत्र था सलीम। उसका विवाह हो चुका था। सलीम का एक छोटा चार साल का बच्चा भी था। पुत्री के विवाह के लिए जब अभयसिंह ने अपनी जमीन बेचने के लिए लोगों से चर्चा की तो बात सलीम के माध्यम से मकसूद तक भी पहुँची। मकसूद को जब यह पता लगा कि अभयसिंह बेटी के विवाह के लिए अपनी जमीन बेच रहा है तो यह बात उसे अच्छी नही लगी। एक दिन वह अभयसिंह के घर गया। उसने कहा “सुना है बिटिया का विवाह तय हो गया है।“ “हाँ। मंडला के पास का परिवार है। लड़के के पिता अच्छे और प्रतिष्ठित किसान है। लडका पढा लिखा है, पिता के साथ खेती भी देखता है। एक इलेक्ट्रानिक की अच्छी दुकान भी मंडला में है जिसे पिता पुत्र मिलकर चलाते है। सुमन बिटिया के भाग्य खुल गए है। उस घर में जाएगी तो जीवन सँवर जाएगा और मैं भी चैन से आँख मूँद सकूँगा।“

“ षादी की तैयारियों के क्या हाल है ? “

“वैसे तेा मैंने सभी तैयारियाँ अपने हिसाब से कर रखी थी लेकिन उन लोगो की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखकर कुछ और तैयारियों की आवष्यकता थी। मैंने सोचा कि मेरे बाद मेरा सभी कुछ सुमन का ही तो है। मेरे पास आठ एकड़ जमीन है अगर उसमें से चार एकड़ निकाल दूँगा तो इतनी रकम मिल जाएगी कि सभी काम आनंद से हो जाएँगे। बाकी बचेगी चार एकड़ तो मेरे अकेले के गुजारे के लिए वह काफी है।“

“ यह जमीन बेचकर तुम्हारे अनुमान से तुम्हें लगभग कितना रूपया मिल जाएगा ? “

“ एक से सवा लाख रूपये एकड के भाव से तो जाएगी ही लगभग चार पाँच लाख रूपया तो मिल ही जायेगा। इतने में सारी व्यवस्था हो जाएगी।“

“ तुमने मुझे इतना गैर समझ लिया कि ना तो तुमने मुझे यह बताया कि सुमन का विवाह तय हो गया है और ना ही तुमने मुझे यह बताया कि तुम अपनी जमीन बेच रहे हों। क्या तुम पर और सुमन पर मेरा कोई अधिकार नही है ? क्या वह मेरी भी बेटी नही है ?“

“ ऐसी तो कोई बात नही है। मैंने सोचा कि जब तुम्हारे पास आऊँगा तो सब कुछ बता दूँगा पर अभी बोनी आदि का समय होने के कारण मैं उस तरफ नही निकल पाया, वरना तुम्हें बिना बताए तो आज तक मैंने कोई काम किया ही नही है ?“

“ तब फिर जमीन बेचने का निष्चय तुमने मुझसे पूछे बिना कैसे कर लिया ? मेरे रहते तुम बेटी की षादी के लिए बेचो, यह मुझे कैसे स्वीकार होगा ? अब रही बात रूपयों की तो वे तुम्हें जब तुम चाहोगे तब मिल जाएँगे। जमीन बेचने का विचार मन से निकाल दो और बेटी की षादी की तैयारी करो।“ इतना कहकर मकसूद वहाँ से चला गया।

उनकी मित्रता ऐसी थी कि अभयसिंह कुछ ना कह सका। वह तैयारियों में जुट गया। उसने जमीन बेचने का विचार यह सोचकर त्याग दिया कि बाद में जब भी जरूरत होगी तो वह या तो जमीन मकसूद को दे देगा या उसके रूपये धीरे धीरे लौटा देगा।

विवाह के कुछ दिन पहले मकसूद का संदेष अभय के पास आया कि मेरी तबीयत इन दिनो कुछ खराब चल रही है। तुम षीघ्र ही मुझसे आकर मिलो। उस दिन रात बहुत हो चुकी थी इसलिए अभय नही जा सका। मकसूद की बीमारी की खबर सुनकर वह विचलित हो गया था। दूसरे दिन सबेरे सबेरे ही वह घर से मकसूद के यहाँ जाने को निकल पडा। अभी वह पहुँचा भी नही था कि उस ओर से आ रहे एक गाँववासी ने उसे देखा तो बतलाया कि मकसूद का स्वास्थ्य रात को अधिक खराब हो गया था और उसे मेडिकल काॅलेज ले जाया गया है।

यह सुनकर अभय ने उस व्यक्ति से कहा कि गाँव में वह उसकी बेटी को बतला दे कि वह मेडिकल काॅलेज जा रहा है, मकसूद चाचा की तबीयत खराब है। अभयसिंह वहाँ से सीधा मेडिकल काॅलेज की ओर चल दिया। जब वह मेडिकल काॅलेज पहुँचा तो मकसूद इस दुनिया को छोडकर जा चुका था।

अभय ने सलीम, सलीम की माँ और उसकी पत्नी को सांत्वना दी। वह उनके साथ गाँव वापस जाने की तैयारियाँ करने लगा। उसके ऊपर दुख का पहाड टूट पडा था। एक ओर उसका सगे भाई से भी बढकर मित्र बिछुड गया था और दूसरी ओर उसे बेटी के हाथ पीले करने थे।

मकसूद को सुपुर्दे-खाक करने के बाद अभय गाँव वापस आ गया। अगले दिन सबेरे सबेरे एक आदमी आया और उसने अभयसिंह से कहा कि उसे भाभीजान ने बुलाया है। अभय भारी मन से वहाँ गया। वहाँ जाकर वह सलीम के पास बैठा। सलीम बहुत दुखी था। अभयसिंह बडे होने के नाते उसे सांत्वना देता रहा जबकि वह स्वयं भी बहुत दुखी था। कुछ देर बाद ही सलीम की माँ उदास चेहरे के साथ वहाँ आई। उनकी आँखें सूजी हुई थी। उन्हे देखकर अभयसिंह की आँखों से भी आँसू का झरना फूट पडा। कुछ देर बाद जब उनके आँसू थमे तो कुछ बात हुई। कुछ समय पष्चात सलीम की माँ ने एक लिफाफा अभय की ओर बढाया। वे बोली - “ तीन चार दिन से इनकी तबीयत खराब चल रही थी। परसों जब उन्हंे कुछ अहसास हुआ तो उन्हेांने यह लिफाफा मुझे दिया था और कहा था कि यह आपको देना है, अगर मैं भूल जाऊँ तो तुम उसे याद से दे देना।“

अभय ने उस बंद लिफाफे को उनके सामने ही खोला। उसमें पाँच लाख रूपये और एक पत्र था। अभय उस पत्र को पढने लगा। पत्र पढते पढते उसकी आँखों से टप टप आँसू टपकने लगे। उसकी हिचकियाँ बँध गई और गला रूँध गया। सलीम ने वह पत्र अभय के हाथ से ले लिया और हल्की आवाज में पढने लगा-

“ प्रिय अभय, तुम्हारे जमीन बेचने के निर्णय से मैं बहुत दुखी हुआ था लेकिन मेरे प्रस्ताव को जब तुमने बिना किसी हील हुज्जत के मान लिया तो मेरा सारा दुख चला गया। हम दोनो मिलकर सुमन को विदा करें, यह मेरी बहुत पुरानी अभिलाषा थी। मुझे पता है कि भाभीजान के ना होने के कारण तुम कन्यादान नही ले सकते हो इसलिये मैंने निष्चय किया था कि सुमन का कन्यादान मैं और तुम्हारी भाभी लेंगे। लेकिन कल से मेरी तबीयत बहुत तेजी से खराब हो रही है और ना जाने क्यों मुझे लग रहा है कि मैं सुमन की षादी नही देख पाऊँगा। पाँच लाख रूपये रखे जा रहा हूँ। उसका विवाह धूम धाम से करना। तुम्हारा मकसूद।“

पत्र समाप्त होते होते वहाँ सभी की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने भाभीजान से कहा- “ भाभीजान आज मकसूद भाई होते तो इन रूपयों को लेने में मुझे कोई गुरेज नही था लेकिन आज जब वे नही रहे तो इन रूपयों को लेना मुझे उचित नही लग रहा है। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि ये रूपये आप वापस रख लीजिए।“

भाभीजान की रूलाई रूक गई। वे बोली-“ भाई साहब, अब हमारे पास बचा ही क्या है। उनके जाने के बाद अगर हम उनकी एक मुराद भी पूरी ना कर सके तो वे हमें कभी माफ नही करेंगें। खुदा भी हमें माफ नही करेगा।“

तभी सलीम बोला-“ चाचाजान आप नाहक सोच विचार में पडे है। दुनिया का नियम है आना और जाना। हम सब मिलकर सुमन का विवाह करेंगे। वह मेरी भी तो छोटी बहन है। मैं उसके लिए बडे भाई के भी सारे फर्ज पूरे करूँगा और अब्बा की ख्वाहिष भी पूरी करूँगा। आप ये रूपये रख लीजिए अगर और भी आवष्यकता होगी तो हम वह भी पूरी करेंगे।“

सुमन का विवाह नीयत समय पर हुआ। सलीम ने उसके भाई की सारी रस्में भी पूरी की और अपनी पत्नी के साथ उसका कन्यादान भी किया। आज भी लोग उस विवाह को याद कर उनकी मित्रता की मिसाल देते है।

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