तर्ज़नी से अनामिका तक - भाग १० in Hindi Motivational Stories by Rajesh Maheshwari books and stories Free | तर्ज़नी से अनामिका तक - भाग १०

तर्ज़नी से अनामिका तक - भाग १०

                     81.  समाधान

 

स्वामी प्रषांतानंद जी से उनके एक षिष्य ने पूछा कि मेरे तीन प्रष्न है जिनका समाधान मैं चाहता हूँ। यह इस प्रकार हैं 1. जीवन में तनाव व चिंता कैसे समाप्त हो ? स्वामी जी बोले इस प्रष्न का उत्तर बहुत सरल है। तुम अपने जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ ही ना आने दो जो कि तनाव और चिंता को जन्म दे। यदि किसी कारण से तनाव मन से नही निकल रहा हो तो उसका भी उपाय है। यह याद रखो कि चतमअमदजपवद पे इमजजमत जीमद बनतमण् एक उद्योगपति जिसका व्यापार कई षहरों में फैला हुआ था। वे अपने कार्यालय में दिनभर की दिनचर्या समाप्त करने के बाद जब बाहर आते थे तो उनके चेहरे पर मुस्कान और खुषी महसूस होती थी। उससे जब पूछा गया कि इसका क्या राज है? तो उन्होने कहा कि मैं कार्यालय की झंझटे घर पर नही सोचता उसे वही पर छोड़कर आ जाता हूँ और इसके बाद कितना भी महत्वपूर्ण विषय हो उस बारे में मन में चिंतन नही करता हूँ। ऐसा करने से मैं प्रतिदिन प्रसन्नचित्त रहकर अपनी पूर्ण क्षमता एवं बुद्धिमत्ता का उपयोग किसी भी समस्या के समाधान हेतु करता हूँं।

उस विद्यार्थी ने दूसरा प्रष्न किया कि हम षांति और सौहार्द्र का जीवन जीना चाहते हैं परंतु आतंक वाद बहुमुखी प्रयास के बाद भी समाप्त नही हो पा रहा। हमें इस दिषा में क्या करना चाहिए ? इस प्रष्न का उत्तर देते हुए स्वामी जी ने कहा कि जब तक मानव मे मानवीयता का गुण उसके मन, हृदय एवं आत्मा में आत्मसात नही होगा तब तक आतंकवाद या इसके समकक्ष बुराइयाँ खत्म नही होंगी। प्रभु की सबसे अच्छी संरचना मानव है परंतु हमने अपने आप को जाति, धर्म, संप्रदाय राष्ट्र की सीमाओं में बांट दिया है। हम अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एंव संस्कारेां को भूलकर इस सदी की सबसे बडी भूल कर रहे है। समय अपने आप परिवर्तन करने की क्षमता रखता हैं और आतंकवाद की यह प्रवृत्ति भी समय एवं परिस्थिति के अनुसार एक दिन समाप्त हो जायेगी। वह दिन कब आयेगा, कैसे आयेगा, कौन लायेगा इन प्रष्नों का समाधान स्वमेव ही हो जायेगा।

वह तीसरा प्रष्न पूछता है कि जीवन में मानसिक संतुष्टि एवं सर्वांगीण विकास का आधार क्या है। स्वामी जी कहते हैं कि विकास और संतुष्टि दो अलग अलग विषय है। संतुष्टि लक्ष्य के प्राप्त हो जाने से मिल जाती हैं। लक्ष्य के प्रकार कई हो सकते है। सर्वागीण विकास का लक्ष्य एक ही होता है और वह हेै सकारात्मक सृजन। इसका मूलभूत आधार है हमारी सभ्यता, संस्कृति और संस्कार, इनको प्राथमिकता देते हुए इन्हें आधारस्तंभ मानकर कड़ी मेहनत एवं लगन से जो कार्य संपन्न होगा तो वह सर्वांगीण विकास का आधार होता है।

 

 

 

                               82.   ज्ञान

 

रामसिंह ने अपने परिश्रम और लगन से अपने उद्योग की तरक्की करके उद्योग जगत में अपना विषिष्ट स्थान बना लिया था और उसे अपनी उपलब्धि के लिए आज उद्योग श्री की उपाधि से सम्मानित किया गया था। इस अवसर पर जब पत्रकारों ने उससे सफलता का राज जानना चाहा तो उसने विनम्रता पूर्वक बताया कि मेरी इस प्रगति का राज यह है कि पहला तो मैंने जीवन में मित्रता करते समय इस बात का ध्यान रखा कि वह जीवन में विपरीत समय में मुझे प्रेरणा स्त्रोत बनकर सही राह व दिषा का मार्गदर्षन देने की योग्यता रखता हो ना कि मेरे हर कथन पर मेरी हाँ में हाँ करके चापलूसी करके मुझसे मित्रता का अनुचित फायदा उठाने प्रयास करे। जीवन में सही वक्त पर सही सलाह देकर आपका मित्र आपको आने वाली कठिन परिस्थितियों से बचा सकता है।

दूसरी बात यह है कि किसी भी उद्योग के संचालन में अच्छे एवं बुरे दिन दोनो ही आते जाते रहते है। हम अच्छे दिनों में सुखी होकर बहुत प्रसन्नचित्त रहते है परंतु बुरे दिन आने पर हडबडाकर इसे अपना दुर्भाग्य मान लेते है। मैंने ऐसे अवसरों पर इसे नियति का विधान मानकर अपनी अंतर्चेतना को जागृत करके, परिस्थितियों से डटकर सामना करने की षक्ति प्राप्त की और मनन चिंतन से सही दिषा का ज्ञान प्राप्त कर सब कठिनाईयों को दूर करके पुनः अच्छे दिन में परिवर्तित कर लिया। हमें ऐसे समय विचलित और दिग्भ्रमित नही होकर संघर्ष करने की क्षमता और ऊर्जा प्राप्त करना चाहिए। इसलिये कहा जाता है कि सुख और दुख देानो परिस्थितयों में हमारा व्यवहार संतुलित रहना चाहिए। तुम दुख को अपना दुष्मन मत समझो इसे अपना मित्र समझो जो कि तुम्हें आत्मसंयम एवं आत्मविष्वास को बढाकर जीवन जीने की कला सिखाता है। इतनी बात बताकर रामसिंह वहाँ से प्रस्थान कर लेता है।

 

 

 

 

                                 83.   मार्गदर्षन

 

मेरा एक मित्र रमेष बहुत परेषान रहता था। पिछले कुछ समय से उसे बहुत आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। वह प्रायः कहता था कि समय और भाग्य साथ नहीं देते हैं। ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे उसके धर्म और कर्म में कोई कमी रह गई है। एक दिन वह मेरे पास आया और उसने मुझे सारी परिस्थितियों से अवगत कराया। मैंने उसे समझाया- कि जीवन में वक्त व भाग्य कभी खराब नहीं होते है एवं वे कभी हमारा अहित नहीं करते है। हमें यदि अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं तो उसके लिये हम स्वयं उत्तरदायी हैं।

रमेष अपना आत्मविष्वास खो चुका था और वह मायूसी और अनिर्णय की स्थिति में आ गया था। मैंने उसे सुझाव दिया कि तुम्हारा बेटा बी.काम की पढाई पूर्ण करके एम.बी.ए. कर रहा है। तुम उसे अपने कारखाने के प्रबंधन की जवाबदारी धीरे धीरे देना प्रारंभ करो। मुझे विष्वास है कि वह सुचारू रूप से कारखाने को संचालित कर पायेगा। रमेष मेरी बात से सहमत था और उसने मुझसे विनम्रतापूर्वक आग्रह किया कि मैं अपने अधीनस्थ कारखाने को लेकर मेरे बेटे राहुल को प्रषिक्षण देकर इस योग्य बना दूँ, कि वह कारखाने को अपने बलबूते पर संभालने के योग्य हो जाये। हम दोनो की मित्रता बहुत पुरानी थी और रमेष के करोड़ों रूपये उसके कारखाने में उलझे हुये थे। मैने उसका निवेदन सहर्ष स्वीकार कर लिया और राहुल को उसी दिन से मैंने प्रषिक्षण देना प्रारंभ किया।

मैंने उसे बुलाकर समझाया कि हमें हमारा चिन्तन, मनन एवं मन्थन सही दिषा का मार्गदर्षन दे तभी हमें सफलता प्राप्त होती है। हम सही राह एवं दिषा से भटक रहे हैं इस कारण हम असफल होते हैं और हमें हानि उठाना पड़ती है। ऐसी स्थिति में हम अपने भाग्य व समय को दोष देने लगते हैं। हमें अपनी गलतियों को खोजकर सुधारना चाहिए। जीवन में सफलता के लिये भाग्य और वक्त पर विष्वास रखो और चिन्ता मत करो। नैतिकता आस्था और विष्वास जीवन की प्रगति के आधार स्तम्भ हैं। इनके अभाव में जीवन उस वृक्ष के समान होता है जिसके पत्ते झड़ चुके होते हैं और अब उसमें न तो षीतलता देने वाली छाया है और न ही वह प्राण वायु का उत्सर्जन करता है।

मानव इस सृष्टि में ईष्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है जिसके कंधों पर सृजन का भार है। उद्योग इस सृजनषीलता का एक रुप है। यह समाज की सक्रियता और राष्ट्र की गतिषीलता का दर्पण है। इसमें समय के साथ परिवर्तन, परिमार्जन एवं परिष्करण होता रहता है।

किसी भी उद्योग में कर्ज और पूंजी में समन्वय होना चाहिए, हमें कर्ज के प्रति सावधानी बरतना चाहिए, चाहे वह बैंक से, षासकीय संस्थानों से या निजी व्यक्तियों से लिया गया हो। पूंजीगत निवेष को कार्यकारी पूंजी से हमेषा अलग रखना चाहिए इससे उद्योग को अर्थाभाव का सामना नहीं करना पड़ेगा। अधिकांष उद्योगों की असफलताओं के पीछे यही एक कारण होता है। उद्योग का संचालन गणित का खेल है। यदि आप इसमें पारंगत हैं तो आप उद्योग को सफलता पूर्वक चला सकेंगे। किसी भी उद्योग के लिये आवष्यक है कि समय पर उत्पादन हो एवं बिक्री होकर समय पर भुगतान प्राप्त हो। हमें उद्योग के निर्माण में आधुनिक तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। उत्पादन की गुणवत्ता बनाये रखने और न्यूनतम उत्पादन लागत पर उत्पादन हो इसका भी हमें ध्यान रखना चाहिए है।

मैंने महसूस किया कि राहुल में वे सभी क्षमताएं हैं जो कि किसी उद्योगपति को सफलता देकर समाज में अपना विषिष्ट स्थान बनाने में समर्थ बनाती हैं। मैंने उसे यह भी समझाया कि ईष्वर की महिमा अपरम्पार हैं। उनकी कृपा से ही जीवन में सफलता एवं लक्ष्य की प्राप्ति होती है। हमारी कल्पना में भविष्य की रुपरेखा होनी चाहिए एवं वह वास्तविकता पर आधारित होना चाहिए। उसका स्वभाव हर काम समय पर करने वाला होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसका स्वभाव मृदु और वाणी में विनम्रता होना चाहिए। हमें काम, क्रोध, लोभ, माया और मोह को नियन्त्रित करके सुखी जीवन के लिये संघर्षरत रहना चाहिए।

मैं उनका कारखाना जो कि लगभग बंद हो चुका था उसका गंभीरता पूर्वक अध्ययन करने के पष्चात इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि यदि इसे वापिस प्रारंभ करना है तो इसमें मजदूरेां की छटनी करना, उनके वेतन में परिवर्तन करना, उत्पादन में वृद्धि के उपाय खोजना, अधिकारियों एवं कर्मचारियों के बीच अनुषासन लाकर उनमें सामंजस्य स्थापित करना, माल की बिक्री के लिए विक्रय विभाग को पूर्ण रूप से नया स्वरूप देना, उत्पादन की लागत कम करने हेतु बिचैलियों को हटाकर स्वयं कच्चा माल खरीदना, पुरानी मषीनों को धीरे धीरे हटाकर नयी मषीने लेकर बिजली की खपत कम करके उत्पादन की लागत घटाना, माल की बिक्री सीधे उपभोक्ता को करने का प्रयास करना ताकि वितरकों पर होने वाले कमीषन की राषि का खर्च बच सके आदि महत्वपूर्ण परिवर्तन करने पडेंगें तभी यह कारखाना एक नया स्वरूप लेकर अपने पैरों पर खड़ा होकर मजबूत स्थिति में आकर लंबे समय तक चल सकेगा। मैंने यह सभी बातें अपने मित्र रमेष और उसके पुत्र राहुल के सामने रख दी तथा इस पर होने वाले आर्थिक व्यय की समस्त जानकारी भी बता दी। वे मेरी बातों से सहमत हुए और उस पर कार्य षुरू कर दिया।

हमने समयबद्ध कार्यक्रम में कंपनी की मषीनों का आधुनिकीकरण करके कर्मचारियों की छंटनी के उपरांत उनमें कडा अनुषासन लाकर उत्पादकता को बढाते हुए माल की बिक्री हेतु कमीषन बढाकर माल की गुणवत्ता में सुधार करके कारखाने को एक नयी दिषा दे दी। मैंने राहुल को समझाया कि जीवन में हमेषा चार सिद्धांतों को याद रखना चाहिए पहला अपनी कार्यप्रणाली से किसी को दुख एवं पीड़ा ना पहुँचे। दूसरा धन का उपार्जन नीतिपूर्ण एवं सच्चाई पर आधारित हो। तीसरा जीवन में जो भी कर्म करो उसे ईष्वर को साक्षी मानकर सम्पन्न करो तथा चैथा अपनी मौलिकता को कभी खोने मत दो। इन्हीं सिद्धांतों में जीवन की सच्चाई छुपी है। मैं उसे हमेषा कहा करता था कि हम अकेले कुछ नही कर सकते, हमारे अधिकारियों और कर्मचारियों का सामूहिक प्रयास ही हमें सफलता देता है। हमें उनमें लगातार ऊर्जा का संचार करते हुए उत्साह बनाए रखना चाहिए। मैंने एक वर्ष तक इसके संचालन में अपना सहयोग एवं सुझाव दिया इसके उपरांत वह कारखाना राहुल के मार्गदर्षन में सुचारू रूप से आज भी अच्छे आर्थिक लाभ में चल रहा है।

 

 

 

                              84.   रहस्य

 

मेरे बचपन की एक घटना मुझे आज भी स्मृति में हैं। हमारे घर में एक बुजुर्ग पारिवारिक मित्र जिन्हें बादषाह नाम से बुलाया जाता था। वे प्रतिदिन षाम के समय आया करते थे और मनोरंजक एवं प्रेरणाप्रद कहानियाँ सुनाते थे। एक दिन उन्होने हमारे ही परिवार की पुरानी धरोहर जिसे नया महल नाम से जाता है के विषय में यह कहानी सुनायी।

हमारे मुहल्ले में डाॅ. खान रहते थे। एक दिन रात में 12 बजे के आसपास उनके दरवाजे पर दस्तक हुयी और दरवाजा खोलने पर एक सज्जन अंदर आकर बोले डाॅ. साहब एक मरीज बहुत गंभीर अवस्था में है। आपको चलकर उसे देखना है यह एक अषर्फी आप अपने पास रखिये। आप के इलाज के उपरांत एक अषर्फी और बतौर फीस दे दी जाएगी। डाॅ. खान अषर्फी का मूल्य समझते थे और वे तुरंत ही उसके साथ अपना बैग लेकर चल पडे़ जिसमें आपातकालीन दवाएँ थी।

वे सज्जन बिना कोई बातचीत किये चुपचाप चल रहे थे और उनके पीछे पीछे डाॅ. साहब चल रहे थे। उन्हें यह देखकर आष्चर्य हो रहा था कि उस व्यक्ति के दोनेा हाथ नही दिख रहे थे। उन्होने इसको अपना दृष्टिभ्रम समझा और चुपचाप चलते रहे। वह व्यक्ति उन्हें उस महल में ले गया और सीढी ऊपर चढ़ने लगा यह देखकर डाॅ. ठिठके और उन्होने पूछा कि तुम मुझे कहाँ ले जा रहे हो ? यहाँ तो पहली मंजिल के बाद कोई भी नही रहता। उसी समय उन्हें आभास हुआ कि उनके पीछे एक आदमी और आ गया है और वे दोनो उन्हें इषारा करके ऊपर चढने के लिये कह रहे हैं। वे उनकी बात मानकर चलते रहे और तीसरी मंजिल पर पहुँच गये।

वहाँ पर जीने से बाहर आकर बरामदे का दरवाजा खुलने पर अंदर का दृष्य देखकर वे हतप्रभ हो गये वहाँ दिन के उजाले के समान रोषनी जल रही थी, खूबसूरत झाड़ फानूस टंगे हुये थे कुछ लोग हाथ से पंखा चला रहे थे और वहाँ की आंतरिक साज सज्जा देखकर डाॅ. साहब भौचक्के रह गये। हाल के बीचों बीच एक खूबसूरत औरत जिसके पैरों में घुंघरू बंधे हुये थे, लेटी हुयी थी और पेट दर्द के कारण कराह रही थी। डाॅ. साहब ने उसे कुछ दवा दी जिससे आष्चर्यजनक रूप से वह आधे घंटे में ही काफी ठीक हो गयी। डाॅ. साहब ने उसे अगले दो दिन की दवाई बनाकर दे दी। जो व्यक्ति उन्हें वहाँ पर लेकर आया था उसने अपने वादे के अनुसार एक अषर्फी उन्हें बतौर फीस देकर कहा इस घटना का जिक्र आप किसी से भी किसी भी परिस्थिति में कहीं पर भी नहीं करंेगें अन्यथा आप को इसका कड़ा दंड भोगना पड़ेगा। इतना कहकर उन्हें वापिस नीचे तक छोडने के लिये वह आया और डाॅ. उससे विदा लेकर तेज कदमों से चलते हुये अपने घर पहुँच गये।

डाॅ. साहब को रात भर नींद नही आयी और वे इस घटना का विष्लेषण करते रहे। दूसरे दिन सुबह होते ही वे मेरे दादाजी के पास गये और इस अद्भुत घटना की जानकारी दी। यह सुनकर वे बोले डाॅ. साहब आज सुबह सुबह कौन सा सपना देखा है मुझे तो आपने बता दिया किसी और से ऐसा मत कहियेगा अन्यथा लोग आपको पागल और सिरफिरा कहने लगेंगे। डाॅ. खान ने तुरंत अपनी जेब से दोनो अषर्फियाँ निकालकर सामने रख दी और बोले ये इस बात का सबूत है कि मैं मनगढंत बातें नही कह रहा हूँ।

मेरे दादाजी यह सुनकर चार पाँच अंगरक्षकों के साथ डाॅ. साहब लेकर नये महल की उस मंजिल पर पहुँचे जिसे नाच महल कहा जाता था तो सभी ने देखा कि उस कमरे में ताला लटक रहा था। बड़ी मुष्किल से उसको तोड़कर दरवाजा खोला गया। उस कमरे के अंदर चमगादड़ लटक रहे थे धूल की परत जमी हुयी थी, दीवारांे का चूना उखड रहा था और अजीब सी गंध फैली हुयी थी। डाॅ. खान यह देखकर भौचक्के रह गये और उनसे कुछ भी कहते नही बन रहा था। सभी लोग वापिस आ गये मेरे दादाजी ने डाॅ. साहब को घर जाकर आराम करने की सलाह दी। उन्होने अपने मुनीम से अषर्फियों की जाँच करवायी तो वह असली पाई गयीं। जिसे उन्होेने डाॅ. साहब को सौंपकर हँसते हुये कहा कि हम लोगों को भूत प्रेतों के दर्षन ही नही होते आपकी मुलाकात होकर बातचीत भी हुयी और आपने उनका इलाज करके अषर्फी भी प्राप्त कर ली।

जब परिजनों को इस घटना की जानकारी हुई तो सभी ने इस पर गंभीरता से चिंतन किया। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह घटना प्रेतात्माओं से जुड़ी हुई है और यदि इसे गंभीरता से नही लिया गया तो डाॅ. के जीवन पर संकट आ सकता है। नगर के विद्वान पंडितों से चर्चा के उपरांत यह तय हुआ कि अगले सप्ताह में ही भागवत कथा का पाठ किसी योग्य पंडित जी से करवाया जाए। अब बाहर से एक पंडित जी को बुलाया गया और भागवत कथा का पाठ प्रारंभ कर दिया गया। इस कथा के अंतिम दिन समाप्ति के पहले सभी को आवाज सुनायी दी कि हम मुक्त हुए, हम मुक्त हुए और इसके पष्चात वातावरण में अजीब सी षांति का अनुभव होने लगा। डाॅ. साहब को भी ऐसा महसूस हुआ कि उनके सिर से जैसे वनज हट गया हो। इसके बाद कभी भी उस हवेली ऐसी कोई घटना घटित नही हुई।

 

 

 

 

                                  85.  समय की पहचान                  

 

हरि सिंह और राम सिंह दोनो आपस में अच्छे मित्र थे। रामसिंह का व्यापार बहुत अच्छा चल रहा था परंतु वह परिवार में अकेला था उसकी पत्नी का स्वर्गवास कई वर्ष पूर्व हो गया था एवं रामसिंह की कोई संतान भी नही थी। वह अपने भाई के बच्चों को ही अपना समझते हुए प्रेम करता था। हरिसिंह एक षिक्षक था और वह बहुत ही मिलनसार, नेकदिल और बुद्धिमान व्यक्ति था।

रामसिंह ने अधिक धन प्राप्ति की लालसा में अपने किसी मित्र की बातों में आकर सट्टे का काम करना षुरू कर दिया। प्रारंभ में तो उसे आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ परंतु बाद में घाटा इतना अधिक हो गया कि उसकी जमापूंजी भी समाप्त होकर उसका व्यापार चैपट हो गया। कुछ वर्ष पूर्व उसने पाँच लाख रू. अपने मित्र हरिसिंह को दिये थे। वह उन रूपयों को वापिस लेने के लिये हरिसिंह के पास जाता है। हरिसिंह उसका बहुत पुराना मित्र था और वह रामसिंह के विषय में सब कुछ जानता था कि उसका व्यापार किस वजह से चैपट हुआ है।

उसने रामसिंह को कहा कि यह ठीक है कि मुझे तुम्हें पाँच लाख रूपये वापिस करने है परंतु मित्र अभी तुम्हारा समय ठीक नही चल रहा है। जब वक्त खराब होता है तो कोई साथ नही देता है। हम दुष्मन को मित्र और मित्र को दुष्मन समझने लगते है। इस खराब वक्त में तुम्हारा भाई भी तुमसे दूर हो गया है। मुझे मालूम है कि तुम उसके परिवार को बहुत चाहते थे परंतु उन्होने भी तुम्हें किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद देने से इंकार कर दिया है। मेरे पास जो तुम्हारे पाँच लाख है वही अब तुम्हारी जमा पूंजी बची है यदि यह भी मैं तुम्हे दे दूँगा तो विपरीत समय होने के कारण इसे भी तुम गँवा बैठोगे।

तुम अभी किसी भी प्रकार से जीवन यापन करने का प्रयास करो जब तुम्हारे दिन फिरेंगें और अच्छा समय वापिस आ जायेगा तो मै स्वयं तुम्हारे पास आकर तुम्हारी यह पूंजी तुम्हें वापिस कर दूँगा ताकि तुम इसका सदुपयोग करके धनोपार्जन कर सको। मेरी एक बात को हमेषा याद रखना कि व्यक्ति का वक्त हमेेषा एक सा नही होता है। समुद्र में जैस ज्वारभाटा आता है वैसेे ही जीवन में अच्छे और बुरे दिन आते है। जब वक्त खराब होता है तो सोना भी मिट्टी बन जाता है और जब वक्त अच्छा रहता है तो मिट्टी भी सोना बन जाती है। यह कहकर उसने रामसिंह को उसके रूपये वापिस नही लौटाये और उसे खाली हाथ वापिस लौटना पडा। रामसिंह मन ही मन सोच रहा था कि उसके सबसे विष्वसनीय दोस्त ने भी उसका साथ छोड दिया और उसका धन वापिस ना करने के कारण उसे उसकी नीयत पर संदेह होने लगा था।

अब समय बीतता जा रहा था कुछ माह बाद रामसिंह ने एक दिन अचानक ही लाॅटरी का टिकट खरीद लिया और प्रभु कृपा से उसे उसमें पचास हजार रू. का लाभ प्राप्त हुआ। एक दिन वह कौतुहलवष घुड़दौड़ देखने के लिये गया। उसे इसके विषय में कोई जानकारी नही थी। उसने वहाँ ऐसे ही किसी घोडे के ऊपर सौ रू. का दाँेव लगा दिया और उसकी किस्मत से वह घोड़ा जीत गया। इसमें उसे पंद्रह हजार रू. प्राप्त हुआ जिसे लेकर वह घर आ गया।

यह जानकारी जब हरिसिंह को मिली तो वह रामसिंह के घर पहुँचकर बोला कि  मित्र तुुम्हारे खराब दिन बीत चुके है। जीवन मंे अनायास ही धन की प्राप्ति यह बताती है कि तुम्हारा समय बदल रहा है। अब मैं तुम्हारे पाँच लाख रू. वापिस कर रहा हूँ जिसे बुद्धिमानी पूर्वक उपयोग करके अपने खोये हुये धन और प्रतिष्ठा को वापिस प्राप्त करो। उसके यह वचन सुनकर रामसिंह के मन में उसके प्रति दुर्भावना खत्म हो गयी और आँखेों से खुषी के आंसु निकल पड़े।

 आज उसे अपने जीवन की सबसे बडी सीख मिल गयी थी कि सच्चा मित्र ऐसा ही होता है जो सही वक्त पर सही सलाह देकर जीवनपथ में मार्गदर्षन देता है। रामसिंह ने बहुत सर्तकता के साथ इन पाँच लाख रूपयों को अपने व्यापार में लगा दिया और उसके भाग्य से वह दिन दूनी और रात चैगुनी तरक्की करने लगा। इससे यह षिक्षा मिलती है कि हमें बुरे वक्त में अपनी गतिविधियों को सीमित रखते हुए समय को व्यतीत करना चाहिए और जब हमें अहसास हो कि वक्त अच्छा आ गया है तो वापिस अपनी सक्रियता बढाकर उसका लाभ प्राप्त करना चाहिए।

 

 

 86.  मानवीयता

 

एक दिन मैं अपने मित्रों के साथ सिविल लाइन्स में कार से जा रहा था। एक जगह काफी भीड़ देखकर हमने अपनी कार रोकी और कारण जानने का प्रयास किया तो पता चला कि अभी अभी एक मोटरसाइकिल सवार का एक्सीडेंट हो गया है एवं उसे काफी चोटें आई है। एम्बुलेंस बुलाने के लिए फोन कर दिया गया है और उसकी प्रतीक्षा कर रहे है।

मेरा साथी डाॅक्टर था। वह तुरन्त कार से उतरा और उस पीड़ित व्यक्ति के पास पहुँचा। उसके बच्चे और पत्नी रो रहे थे और सहायता की अपेक्षा से एम्बुलेंस की प्रतीक्षा कर रहे थे। मेरे मित्र ने तत्काल ही दूसरों की सहायता से उसे मेरी कार में लिटाया, उसकी पत्नी और बच्चों को साथ लेकर मुझे तुरन्त निकट के अस्पताल में चलने को कहा। अस्पताल में पहुँचकर उसका तुरन्त उपचार चालू हुआ एवं उसे खून देने की व्यवस्था की गई। वहाँ के वरिष्ठ चिकित्सकों ने बताया कि यदि इसको यहाँ लाने में थोडी देर और हो जाती तो इसका बचना मुष्किल था।

मेरे मित्र की तत्परता और सेवा भावना से एक व्यक्ति के प्राणांे की रक्षा हो गई थी और एक परिवार बिखरने से बच गया था। हम लोगों को लग रहा था कि प्रभु ने ही उसकी रक्षा के लिए हम लोगों को निमित्त बनाया था। इसका बहुत संतोष था।

 

 

 

                          87.  खंडहर की दास्तान

 

नर्मदा के तट पर एक भवन का खंडहर देखकर एक पर्यटक ने उसके निकट एक झोपडे में धूनी रमाए बैठे हुए एक संत से पूछा कि यह खंडहर ऐसा क्यों पडा है ? वे बोले कि बहुत समय पहले की बात है, यहाँ पर मोहनसिंह नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह गरीब था किंतु ईमानदार, कठोर परिश्रम करने वाला, बुद्धिमान एवं सहृदय था। वह जो भी अर्जित करता था उसमें से सामने रहनेवाले एक अपंग और गरीब व्यक्ति को प्रतिदिन भोजन कराता था। वह स्वयं जाकर उस अपंग को भोजन दिया करता था। वह प्रायः संध्या के समय मेरे पास आकर दिन भर की दिनचर्या बतलाता था और मुझसे सलाह ही लेता रहता था। प्रभु की कृपा से उसकी मेहनत रंग लाई। धीरे धीरे उस पर लक्ष्मी जी की कृपा होने लगी। उसके पास धन आने लगां उसकी आर्थिक स्थिति सुधरने लगी। उसके जीवन में सुख के साधन जुटने लगे। उसने इस सुंदर भवन का निर्माण कराया और इसे अपना निवास बनाया। वह नर्मदा जी का भक्त था। अपने दिन का प्रारम्भ वह नर्मदा जी की स्तुति के साथ करता था। अपनी उन्नति के लिए नर्मदा माँ का आषीर्वाद माँगता था।

उसका एक पुत्र था, उसका स्वभाव अपने पिता से विपरीत था। एक दिन अचानक मोहनसिंह की निधन हो गया। मोहनसिंह के निधन के बाद उसके पुत्र ने उस अपंग व्यक्ति को भोजन देने के लिए अपने नौकर को भेजा। जब वह नौकर उस अपंग के पास भोजन लेकर गया तो उसने भोजन लेने से मना कर दिया और कहा कि इस घर से इतने दिन का ही दानापानी उसके भाग्य में था। मोहनसिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र उसका कामकाज नही संभाल सका और धीरे धीरे जमीन, जायदाद सभी कुछ बिक गया। वह गरीबी की हालत में पहुँच गया। उसकी मित्र मंडली गलत आदतों का षिकार थी। उनके साथ रहकर उसमें भी जुआ, सट्टा, षराब आदि के सभी व्यसन आ गए। एक दिन वह अधिक षराब के नषे में लडखडाता हुआ घर तक पहुँचा किंतु घर के भीतर ना जा सका और दरवाजे पर ही उसकी मृत्युु हो गई। अब उसका कोई वारिस ना होने के कारण यह भवन आज खंडहर मंे तब्दील हो चुका है। यह खंडहर इस बात का प्रतीक है कि जहाँ सद्कर्म होते हैं वहाँ सृजन होता है और वहाँ लक्ष्मी व सरस्वती का वास होता है, किंतु जहाँ दुष्कर्म होते हैं वहाँ ना तो सरस्वती रहती है और ना ही लक्ष्मी ठहरती है, वहाँ विनाष हो जाता है।

 

 

                           88.   सीख

 एक वृद्ध व्यक्ति षहर की प्रतिष्ठित फलों की दुकान में कार्यरत था उसकी दुकान से प्रतिदिन एक ग्राहक आकर फल खरीदता था और जाने के पहले कुछ फल किसी ना किसी बहाने से छोड जाता था। यह बात दुकान का मालिक कई दिनों से भांप रहा था। एक दिन उसने उस वृद्ध कर्मचारी से पूछा कि यह व्यक्ति ऐसा क्यों करता है? इसका क्या कारण है, और तुम चुपचाप क्यों रहते हो ? उस वृद्ध कर्मचारी ने बताया कि मेरी इस अवस्था को देखते हुए यह जानकर की कि मैं इतने मँहगें फलों को खरीदने की क्षमता नही रखता हूँ, वह जानबूझकर कुछ फल मेरे लिए छोड जाता है। मेरा एक लडका है जो कि एक कारखाने में अच्छे पद पर कार्यरत है। मुझे बहुत दुख है कि मेरी इस अवस्था में सेवा करने के स्थान पर उसने संचित धन को भी हथिया लिया और मुझे घर छोडने पर मजबूर कर दिया, इतना कहते कहते उसकी आँखों में आँसू छलक आये। दुकान का मालिक यह सुनकर किंकर्तव्यविमूढ हो गया और सोचने लगा कि एक अनजान ग्राहक कितनी सेवा का कार्य प्रतिदिन करके चला जाता है और में दुकान का मालिक होकर भी इसकी मदद के विषय में कुछ भी नही सोच सका। मै भी अपनी जो कमाई करता हूँ वह पूरी की पूरी अपने बेटे को दे देता हूँ, इसका हश्र देखकर मैं चिंतित हो रहा हूँ कि भविष्य में कभी मैं काम करने के योग्य नही रह सका और धनोपार्जन में असमर्थ हो गया तब बेटे का व्यवहार मेरे साथ कैसा रहेगा। उसने उस वृद्ध व्यक्ति को कहा कि कल से तुम उसके फल लेना बंद कर दो मैं तुम्हारे लिए इतने फल खुद प्रदान करूँगा। तुम्हारी दषा से मुझे यह षिक्षा भी प्राप्त हुई है कि मुझे अपनी कमाई का कुछ अंष भविष्य के लिए संचित रखना चाहिए ताकि हमें किसी के ऊपर निर्भर ना रहना पडे।

 

 

 

                         89.   राष्ट्र का विकास

 

हमारे देष में षहरों के विकास के लिए प्रायः जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों के प्रतिनिधि मंडल को विकसित देषों के षहरों के अध्ययन हेतु भेजा जाता है। उनसे यह अपेक्षा रहती है कि वे वहाँ के विकास का अध्ययन करते हुए यहाँ पर भी षहरों के विकास की ऐसी योजनाएँ बनाएँ जिसका लाभ लंबे समय तक नगरवासियों को मिलता रहे।

इसी संबंध मेंएक प्रतिनिधि मंडल लंदन गया था। वहाँ पर उन्हंे पूरा षहर घुमाया गया एवं सभी आवष्यक व्यवस्थाओं से अवगत कराया गया। यह सब देखकर और इसके तकनीकी पक्ष से अवगत होकर प्रतिनिधि मंडल के सदस्य बहुत प्रभावित हुए और उन्होने वहाँ के अधिकारियों से उनके षहर एवं देष की बहुत तारीफ की और कहा कि विष्व में इसकी मिसाल मिलना बहुत कठिन है। वे सभी सोच रहे थे कि यह सुनकर वहाँ के अधिकारीगण बहुत प्रसन्न होंगें परंतु उनके उच्च अधिकारी ने बहुत षालीनतापूर्वक ऐसा जवाब दिया कि भारतीय प्रतिनिधि मंडल के सभी सदस्य सन्न रह गये।

उस अधिकारी ने बताया कि वह दस वर्ष तक भारत में रह चुका हूँ और गांव से लेकर देष के सभी प्रमुख स्थानों पर भ्रमण कर चुका हूँ, उसकी व्यक्तिगत दृष्टि में भारत की सभ्यता, संस्कृति और संस्कार विष्व में सर्वश्रेष्ठ है। आपका देष विष्व में अन्य देषों की तुलना में प्रगति इसलिए नही कर पाता क्योंकि आपके यहाँ जनसंख्या का विस्तार और भ्रष्टाचार पर कोई नियंत्रण नही है। आपके देष में प्राकृतिक संपदा व संुदरता भरपूर है, जैसे ताजमहल, प्राचीन किले एवं अन्य पुरातात्विक धरोहरें, कष्मीर और बद्रीनाथ जैसे स्थल जो कि स्विट्जरलैंड से भी ज्यादा संुदर हैै। आप ऐसे पर्यटन स्थलों का विकास करके बहुमूल्य विदेषी मुद्रा प्राप्त कर सकते है। आपके देष में प्राकृतिक संपदा एवं संसाधन भरपूर है। हमें आष्चर्य होता है कि आपके देष के खनिजों को खुदाई करके विदेषों में क्यों निर्यात किया जाता है ? वे इन खनिजों से लोहा, एल्युमिनियम आदि का  उत्पादन करते है। आपका देष स्वयं ही इनका उत्पादन कर सकता है जिससे आपको और विदेषी मुद्रा प्राप्त हो सकती है। किसी भी राष्ट्र के विकास में वहाँ के नागरिकों की सोच एवं भमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। मैं आपको एक उदाहरण बता रहा हूूँ जो कि हम सभी के लिए प्रेरणादायक है।

अमेरिका की एक कंपनी ने जापान के टोक्यों षहर में अपना बहुत बड़ा कार्यालय  प्रारंभ किया। इसमें उच्च पदों पर अमेरिका के अधिकारियों केा नियुक्त किया गया। उन वरिष्ठ अधिकारियों की सोच यह थी कि हमें अमेरिका के समान सप्ताह में पाँच दिन कार्य करना चाहिए एवं देा दिन षनिवार और रविवार को अवकाष रखना चाहिए। ऐसा करने से कर्मचारियों में उत्साह एवं पाँच दिन पूर्ण क्षमता के साथ अच्छा काम करने की उर्जा बनी रहेगीे। उन्हेांने जब अपनी इस सोच को कार्यरूप में परिणित किया तो वे हैरान रहे गये कि वहाँ के कर्मचारियों में इसका विरोध करते हुए हड़ताल कर दी। उनका कथन था कि हमें देा दिन की जगह सिर्फ एक दिन रविवार को ही अवकाष दिया जाए अन्यथा हम आलसी और अकर्मण्य हो जायेंगें। यदि षनिवार को भी अवकाष रहा तो हम बाजार में बेवजह फिजूल खर्ची करके अपने धन का दुरूपयोग करने लगेंगें।

अमेरिका से आये अधिकारीगण यह सुनकर आष्चर्यचकित रह गये और उन्हें षनिवार का अवकाष समाप्त करना पड़ा। यह उदाहरण बताता है कि जापान के लोगेंा में कार्यरत रहने की कितनी प्रबल अभिलाषा है और यही कारण है कि जापान आज विष्व में तरक्की के उच्च षिखर पर है।

ब्रिटेन के अधिकारियों के यह सब तर्क सुनकर भारतीय प्रतिनिधि मंडल यह सोचता हुआ स्वदेष वापस आ गया कि अपने देष में भी विकास की ऐसी भावना यदि आ जाए तो हम प्रगति के उच्च षिखर पर पहुँच सकते है।

 

 

                           90.  षिक्षा

यदि मन में सच्ची लगन दूर दृष्टि और पक्का इरादा हो तो हम अवरोधों से संघर्ष करते हुए भी सफलता पा सकते है। एक गरीब परिवार में एक बालक रहता था जिसके पिताजी की आय इतनी कम थी कि उसे बमुष्किल दो वक्त का भोजन ही उपलब्ध हो पाता था। उस बालक के मन में अध्ययन करने हेतु षाला जाने की प्रबल इच्छा थी, परंतु उसके पिता अपनी गरीबी के कारण उसका दाखिला कराने में असमर्थ थे। वह बालक इन परिस्थितियों को समझकर चुप रहता था परंतु उसके मन में उत्साह कम नही हुआ था। वह अपने मित्र छात्रों की किताब को पढकर ज्ञान प्राप्त करने लगा।

एक दिन वह अपने पिता के साथ बाजार जा रहा था। उसी समय एक व्यक्ति ने अंग्रेजी में किसी रास्ते के विषय में जानकारी हेतु उसके पिताजी से पूछा। वे तो अंग्रेजी भाषा से अनभिज्ञ थे, तभी उस बालक ने अंग्रेजी में उन सज्जन को बताया कि टर्न राइट, गो स्ट्रेट एंड फ्राम क्रासिंग गो लेफ्ट। यह सुनकर वह व्यक्ति थैंक्स कहता हुआ उसके बताए रास्ते पर आगे बढ गया। उसकी अंगे्रजी भाषा सुनकर उसके पिताजी हतप्रभ रह गये और उन्होंने निष्चय कर लिया कि चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ झेलना पडे परंतु अपने इस पुत्र को षाला में दाखिला दिलाऊँगा और उन्होने इसे कार्यरूप में परिणित कर दिया। डस बालक ने अपनी कुषाग्र बुद्धि से 19 वर्ष की आयु में ही अध्ययन में निपुणता प्राप्त कर सबको प्रभावित कर दिया। अब उसके जीवन में बहुत बदलाव आ गया था और उसे अच्छे पद पर आकर्षक वेतन के साथ नियुक्ति प्राप्त हो गयी थी। वह बालक और कोई नही हमारे देष के श्रद्धा के पात्र पंडित ईष्वरचंद्र विद्यासागर थे।

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