विश्वासघात--(सीजन-२)--भाग(११) in Hindi Novel Episodes by Saroj Verma books and stories Free | विश्वासघात--(सीजन-२)--भाग(११)

विश्वासघात--(सीजन-२)--भाग(११)

मैं टैक्सी में नहीं आऊँगी,लाज बोली।।
लेकिन क्यों? प्रकाश बोला।।
मै तुम्हारा भरोसा क्यों करूँ?लाज बोली।।
अच्छा !तो तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं,तुम्हें याद है,पहली मुलाकात में तुम रातभर मेरी टैक्सी में सोती रही,उस दिन तो तुमने भरोसा कर लिया था, अगर मैं बुरा इन्सान होता तो सुबह तुम मुझे शुक्रिया कहते हुए ना जाती,प्रकाश बोला।।
उस दिन मैं होश में नहीं थी,इसलिए भरोसा कर लिया था,तो आज तुम क्या चाहते हो?लाज बोली।।
मैं तुम्हें चाहता हूँ,प्रकाश बोला।।
क्या बकते हो? मुझे जाने-पहचाने बिना तुम ऐसा कैसे कर सकते हो?लाज ने पूछा।।
मौहब्बत जान-पहचान करके नहीं होती,मेमसाहब!प्रकाश बोला।।
तुम तो मेरा नाम भी नहीं जानते,लाज बोली।।
तो अब बता दो अपना नाम,प्रकाश बोला।।
बड़े ठीट हो जी!पीछे ही पड़ गए,लाज बोली।।
मौहब्बत की है,मज़ाक नहीं किया,पीछे तो पड़ना ही था,प्रकाश बोला।।
मतलब !तुम ऐसे नहीं मानोगे,लाज बोली।।
नहीं! बिल्कुल नहीं! तुम जितना मुझसे दूर जाओगी,उतना ही मैं तुम्हारे करीब आऊँगा,प्रकाश बोला।।
मैं घर जा रही हूँ,लाज बोली।।
जाओ,किसने रोका है? लेकिन नाम बताकर जाओ,प्रकाश बोला।।
वो तो मैं नहीं बताऊँगी,लाज बोली।।
तो तुम अपना नाम नहीं बताओगी,प्रकाश बोला।।
बिल्कुल नहीं,कभी नहीं,लाज बोली।।
तो मैं भी तुम्हारा पीछा आसानी से छोड़ने वाला नहीं,प्रकाश बोला।।
तो कान खोलकर सुन लो,तुम्हारे सिर से भी मैने मौहब्बत का भूत ना उतार दिया तो मेरा नाम लाज नहीं,लाज बोल तो गई लेकिन फिर सोचा कि ये तो उसने अपना नाम बता दिया।।
अच्छा तो तुम्हारा नाम लाज है,देखा आखिर मेरी मौहब्बत सच्ची है,खुदबखुद तुमने अपना नाम बता दिया,प्रकाश बोला।।
मैं घर जाती हूँ,लाज बोली।।
चलो टैक्सी से छोड़ दूँ,प्रकाश बोला।।
नहीं,इतना एहसान करने की जुरूरत नहीं है,मैं चली जाऊँगी ,लाज बोली।।   
क्यों? मेरी टैक्सी में बैठोगी तो मैं तुम्हें खा जाऊँगा क्या? प्रकाश ने पूछा।।
खा गए तो,लाज बोली।।
तो क्या मैं तुम्हें कोई पिशाच दिखाई देता हूँ? प्रकाश बोला।।
पिशाच ही तो हो तभी तो पीछे पड़े हो,लाज बोली।
अच्छा! ज्यादा नखरे मत करो,चुप करके टैक्सी में बैठ जाओ,प्रकाश बोला।।
हुक्म दे रहे हो,लाज ने पूछा।।
नहीं,महारानी जी! ये आपके दास की विनती है,प्रकाश बोला।
तब ठीक है,अगर विनती है तो चलो बैठ जाती हूँ तुम्हारी टैक्सी में,तुम भी क्या याद रखोगे? लाज बोली।।
बहुत बहुत मेहरबानी जी!प्रकाश बोला।।
  लाज टैक्सी में बैठ गई तभी प्रकाश ने लाज से पूछा....
बुरा ना मानो तो एक बात पूँछू।।
हाँ, लेकिन ये मत पूछना कि मुझे भी तुमसे मौहब्बत है या नहीं,लाज बोली।।
नहीं,वो नहीं पूँछूगा,प्रकाश बोला।।
तो पूछो जो पूछना चाहते हो,लाज बोली।।
तुम्हारा उस इन्सेपेक्टर के साथ क्या नाता है?प्रकाश बोला।।
मतलब तुम मेरा पीछा कर रहे थे,लाज बोली।।
मुझे गलत मत समझो,वो तुम मुझे बाजार में दिखी तो मैने सोचा जरा मैं भी तो देखूँ कि तुम कहाँ जा रही हो? इसलिए तुम्हारे पीछे गया था,प्रकाश बोला।।
जनाब! सच्ची मौहब्बत करने वाले शक़ नहीं किया करते,लाज बोली।
लेकिन,जिससे मौहब्बत हो तो हमेशा ये डर भी तो लगा रहता है कि कोई तुमसे उसे छीन ना ले,प्रकाश बोला।।
तो तुम्हें इन्सपेक्टर को देखकर कैसा लगा? कि वो मेरा कौन हो सकता है? लाज ने पूछा।।
अब मैं क्या जानू?बता दो ना कि क्या नाता है तुम्हारा उसके साथ? क्यों मेरा जी जलाती हो,प्रकाश बोला।।
नहीं ,बताती जाओ,लाज बोली।।
पता है मैं तुम्हें पहली मुलाकात से ही समझने की कोशिश कर रहा हूँ लेकिन तुम मुझे समझ में नहीं आ रही,उस रात तुम मुझे दुखो में डूबी हुई लगी,फिर दूसरी मुलाकात में तुम मुझे पैसे वाली अय्याश घमण्डी लड़की लगी और तीसरी मुलाकात में तुम सूती साड़ी में एक साधारण सी घरेलू लड़की लगी और आज तुम्हारा फिर अलग रूप,तुम ही साफ साफ बता दो कि तुम्हारा कौन सा रूप असली है,मैं सच में तुमसे मौहब्बत करने लगा हूँ,मेरे दिल की धड़कनों को महसूस करने की कोशिश करो,मेरी आँखों में झाँककर देखो तुम्हें असीम प्रेम का भण्डार दिखाई देगा,मुझे तुम अच्छी लगने लगी हो,दिनरात मैं तुम्हारे बारें में ही सोचा करता हूँ,प्रकाश ने अपने दिल की बात कहते हुए कहा।।
ये सुनकर लाज फिर कुछ ना बोल सकी....
लाज के चुप होने पर प्रकाश ने पूछा....
क्या हुआ? चुप क्यों हो गई? क्या मेरी बातें अच्छी नहीं लग रहीं।।
अब लाज भला क्या बोलती? कि उसके अतीत ने उसके होठों पर चुप्पी लगा रखी है,वो भी तो कहना चाहती है कि तुम भी मुझे पसन्द हो लेकिन.....
क्या हुआ? लाज! बोल क्यों नहीं रही? कुछ तो बोलो,कुछ तो कहो,तुम्हारी चुप्पी का मैं क्या मतलब समझूँ?
प्रकाश ने पूछा।।
लाज बोली.....
टैक्सी रोको! घर आ गया।।
लाज टैक्सी से उतरी और प्रकाश को पैसे देने लगी....
इसकी कोई जुरूरत नहीं है,प्रकाश बोला।।
फिर लाज कुछ ना बोली और जाने लगी....
तब प्रकाश बोला...
प्यास लग रही है,पानी पिला देती तो...
अच्छा! आओ! अन्दर आओ,लाज बोली।।
और प्रकाश टैक्सी से उतरा उसने लाज के हाथों से सामान का थैला लिया और भीतर चला गया.....
तभी अनवर चाचा ने भीतर से आवाज दी....
आ गई बिटिया!
हाँ! अनवर चाचा! मैं आ गई और साथ में वो कल वाले टैक्सी ड्राइवर भी आएं हैं,उन्हें प्यास लग रही थी तो मैं भीतर लिवा लाई,लाज बोली।।
अच्छा! किया बिटिया! मैं तुम दोनों के लिए पानी और कुछ मीठा लेकर लाता हूँ।।
अनवर चाचा दो गिलास पानी और कुछ मीठा लेकर आ गए और प्रकाश से बोले....
बैठो बेटा!लो पानी पिओ और ये मिठाई खाओ,मेरी अम्मी कहा करती थी कि खाली पेट पानी नहीं पिया करते।।
प्रकाश ने पानी पिया और अनवर  चाचा को शुक्रिया बोला....
तब अनवर चाचा ने लाज से पूछा....
बिटिया! लिस्ट में अरहर की दाल और हल्दी लिखना भूल गया था।।
कोई बात नहीं अनवर चाचा! मुझे याद था,मै दोनों चींजें ले आई हूँ,लाज बोली।।
और करन मिला था उससे मुलाकात हुई या नहीं,कैसा है वो?अनवर चाचा ने लाज से पूछा।।
बिल्कुल ठीक है,आज तो उसने मुझे कुछ रूपए भी दिए,मैं नहीं ले रही थी तो बोला रख लो दीदी काम आएगें,लाज बोली।।
जब प्रकाश ने सुना तो अनवर चाचा से पूछा....
जी,तो क्या वो इन्सेपेक्टर इनके भाई हैं?
हाँ! बेटा! अभी एक महीने पहले ही हमें पता चला कि वो ही हमारा करन है,अनवर चाचा बोले।।
मैं कुछ समझा नहीं,ये कैसी पहेली है? प्रकाश ने पूछा।।
अब क्या बताऊँ?बहुत लम्बी कहानी है बेटा! अनवर चाचा बोले।।
मैं भी सूनना चाहूँगा,सुनाइए ना अनवर चाचा! प्रकाश बोला।।
तब अनवर चाचा ने प्रकाश को सब बता दिया,अब प्रकाश को सारा माजरा समझ में आया कि क्यों लाज उससे दूर भागती है? अब प्रकाश के मन में कोई संदेह ना रह गया था,कुछ देर उसने सबसे बात की और फिर बोला....
अब मैं चलता हूँ,देर हो रही है,माँ ने राशन मँगवाया था,राशन ना पहुँचा तो शाम के खाने को देर हो जाएगी।।
ठीक है बेटा! अच्छा लगा तुम आए,अब आते रहना,अनवर चाचा बोले।।
जी, बिल्कुल,आप लोंग तो मुझे अपने से लगे,प्रकाश बोला।।
      प्रकाश बाहर आकर अपनी टैक्सी में बैठा,आज वो बहुत खुश था क्योंकि आज उसके मन से एक बोझ उतर गया था,वो सोचने लगा कि एक ना एक दिन वो जरूर लाज का दिल जीत कर रहेगा,प्रेम की आँच से तो बड़े से बड़े पत्थरदिल भी पिघल जाते है और लाज को तो उसकी मजबूरियों ने बाँध रखा है,एक ना दिन वो भी दिल से मुझे अपना लेगी,क्योंकि मुझे अपने प्यार पर पूरा भरोसा है,यही यही सोचते प्रकाश अपने घर भी पहुँच गया।।
      
       और इधर विश्वनाथ और शकीला ,जूली को लेकर परेशान थे कि आखिर जूली गई तो कहाँ गई?विश्वनाथ के गुण्डों ने शहर का कोना कोना छान मारा लेकिन जूली कहीं ना मिली,उधर नाइट स्टार क्लब का मालिक भी परेशान था क्योंकि उसे जूली जैसी और कोई डान्सर ना मिल रही थी,इसलिए उसके क्लब में अब लोगों का जाना कम हो गया था,उसने परेशान होकर विश्वनाथ को टेलीफोन किया.....
  विश्वनाथ ने टेलीफोन उठाकर कहा....
विश्वनाथ स्पीकिंग!
उधर से आवाज आई,मैं हरदयाल थापर।।
हाँ!बोलो,थापर! कैसे हो?विश्वनाथ ने पूछा।।
कैसा हूँगा? विश्वनाथ साहब!क्लब का धन्धा चौपट हुआ जा रहा है?थापर बोला।।
मैं जानता हूँ कि इसका कारण जूली है,विश्वनाथ बोला।।
तो जल्द से जल्द ढूंढिए उसे,थापर बोला।।
मेरे आदमियों ने बहुत कोशिश की लेकिन वो कहीं नहीं मिली,विश्वनाथ बोला।।
आपको पता है ना वो क्लब आपका है,मैं तो केवल नाममात्र के लिए ही उसकि मालिक हूँ,थापर बोला।।
हाँ,पता है,सब पता है,विश्वनाथ बोला।।
तो अब क्या करें? कोई दूसरी डान्सर भी तो नहीं मिल रही,थापर बोला।।
तुम टेलीफोन रखो,मैं देखता हूँ अगर कोई और डान्सर मिल सके तो,विश्वनाथ बोला।।
जी,मैने इसलिए टेलीफोन किया था कि अब आप क्लब की जिम्मेदारी किसी और को दे दीजिए क्योंकि मेरी बेटी शर्मिला विलायत से आ गई है और मैं रोज रोज उससे झूठ बोलकर क्लब नहीं जा सकता ,थापर बोला।।
थापर तुम भी धोखा देने पर उतारू हो गए,विश्वनाथ चीखा।।
ये धोखा नहीं है मजबूरी है विश्वनाथ साहब! थापर बोला।।
ठीक है मरो,जो करना है करो लेकिन अभी टेलीफोन रखो....
और इतना कहकर विश्वनाथ ने टेलीफोन रख दिया....

क्रमशः.....
सरोज वर्मा.....


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