विश्वासघात--(सीजन-२)--भाग-(१४) in Hindi Novel Episodes by Saroj Verma books and stories Free | विश्वासघात--(सीजन-२)--भाग-(१४)

विश्वासघात--(सीजन-२)--भाग-(१४)

प्रकाश और लाज बातों बातों में अस्पताल पहुँच गए,प्रकाश बोला...
अगर बुरा ना माने तो क्या मैं भी करन को देखने चल सकता हूँ?
हाँ..हाँ...बुरा किस बात का? करन को भी अच्छा लगेगा आपसे मिलकर,लाज बोली।।
ठीक है तो मैं टैक्सी पार्किंग में लगा दूँ फिर चलते हैं,प्रकाश बोला।।
और दोनों करन से मिलने पहुँच गए,जहाँ सुरेखा पहले से मौजूद थी,लाज को देखकर बोली....
दीदी! आ गई आप! मैं कब से आपका इन्तज़ार कर रही थी? और ये जनाब! कौन हैं?
जी,मैं इनका दोस्त प्रकाश हूँ,प्रकाश बोला।।
जी,केवल दोस्त या ख़ास दोस्त,सुरेखा मज़ाक करते हुए बोली।।
चुप कर ,हर घड़ी मज़ाक करती रहती है,इसकी तो आदत है मज़ाक करने की,लाज बोली।।
जी,नहीं ! मुझे बुरा नहीं लगा,प्रकाश बोला।।
करन! तुम्हारे एक्सीडेंट का सुनकर ,ये भी तुम्हें देखने चले आएं,लाज बोली।।
कोई बात नहीं,अच्छा लगा जो आप आएं,करन ने प्रकाश से कहा...
और अब कैसे हो?प्रकाश ने करन से पूछा।।
अब तो ठीक ही लग रहा है,करन बोला।।
और तभी सुरेखा ने लाज से कहा...
अच्छा! दीदी! तो चलिए अब खाना खा लेते हैं,बहुत जोरो की भूख लग रही है,
तो लगाओ खाना,देरी किस बात की,लाज बोली।।
ठीक है तो आप लोंग खाना खाइए मैं निकलता हूँ,प्रकाश बोला।।
ऐसे कैसे प्रकाश भइया! खाना लग रहा है और आप खाना खाकर ही जाइए,सुरेखा बोली।।
जी,नहीं आप लोंग खाइए ना! मैं अब चलूँगा,प्रकाश बोला।।
रूक जाइए ना! अब सुरेखा इतना कह रही है तो,लाज बोली।।
अच्छा तो ठीक है,आप कहतीं हैं तो खा लेता हूँ,प्रकाश बोला।।
अच्छा जी! मैने कहा तो नहीं रूके लेकिन लाज दीदी के एक ही बार कहने से रूक गए,सुरेखा बोली।।
कैसी बातें करती है तू? लाज बोली।।
सही तो कहती हूँ,सुरेखा बोली।।
अच्छा! बात कम कर और खाना परोस,लाज बोली।।
जी,परोसती हूँ....परोसती हूँ,सुरेखा बोली।।
सुरेखा सबके लिए खाना परोस ही रही थी कि तभी शर्मिला भी वहाँ आ पहुँची,उसे सुरेखा फौरन पहचान गई और बोली ....
शर्मिला ! तुम,आओ ...आओ तुम भी हमारे साथ खाना खाओ....
अरे,सुरेखा तुम यहाँ कैसें? शर्मिला ने पूछा।।
अरे,ये इन्सपेक्टर करन मेरे भइया है जिनकी तुमने जान बचाई थी,सुरेखा बोली।।
अच्छा! तुम ही शर्मिला हो,तुमने ही करन की जान बचाई थी,मैं करन की बड़ी बहन लाज हूँ,लाज ने शर्मिला से कहा।।
जी! मैं ही शर्मिला हूँ और मै तो इन्सपेक्टर करन से कुछ जुरूरी बात करने आई थी,शर्मिला बोली।
जी,कहिए! क्या बात है? करन ने पूछा।।
जी,मेरे डैडी हरदयाल थापर से कल रात  मिलने कोई विश्वनाथ नाम का आदमी आया था,जो कि धमकियांँ दे रहा था कि तेरी बेटी ने इन्सपेक्टर को क्यों बचाया? अगर आइन्दा ऐसा हुआ तो मुझसे बुरा और कोई ना होगा,शर्मिला बोली।।
तुम्हारे डैडी कहीं नाइट स्टार क्लब के मालिक तो नहीं,लाज ने पूछा।।
जी..वे वहीं हैं,शर्मिला बोली।।
मैं उसी क्लब में ही तो कैबरें किया करती थीं,लाज ने सबसे कहा।।
ये क्या कहतीं हैं आप? शर्मिला ने आश्चर्य से पूछा।।
इसलिए तो कहतीं हूँ कि पहले साथ में मिलकर खाना खाते है फिर तुम्हें सारी बात बताऐगें,सुरेखा बोली।।
इसका मतलब है कि विश्वनाथ ने एक बार फिर मेरी जान लेने की कोशिश की,करन बोला।।
अच्छा! करन तू पहले खाना खा,गुस्सा मत खा,तुझे इस वक्त खाने की ज्यादा जरूरत है,लाज बोली।।
लाज की बात सुनकर सब हँसने और साथ में खाने बैठें,खाना खाने के बाद शर्मिला को विश्वनाथ की सारी हकीकत लाज ने बताई,ये सुनकर शर्मिला बोली.....
तो मेरे डैडी भी इस मामलें में कहीं ना कहीं जिम्मेदार हैं....
लेकिन अब आगें इसका हल क्या है? करन के ठीक होते ही विश्वनाथ फिर उसके पीछे पड़ जाएगा,प्रकाश बोला।।
अब विश्वनाथ को पकड़वाना बहुत जरूरी हो गया है,नहीं तो वो फिर कुछ ना कुछ जरूर करेगा,लाज बोली।।
इसका तो एक ही समाधान हो सकता है,विश्वनाथ की मुखबिरी करके,उसके सभी काले धन्धों के खिलाफ सुबूत इकट्ठे करने होगें,प्रकाश बोला।।
अरे,आप तो ऐसे बात कर रहे हैं जैसे कि आप सी आई डी के आदमी हों,लाज बोली।।
जी,मै सी आई डी का ही आदमी हूँ,ये देखिए मेरा आई डी कार्ड,प्रकाश बोला।।
और प्रकाश की बात सुनकर एक पल को सब मौन हो गए लेकिन तभी लाज बोली....
तो आपने अब तक हम लोगों से छिपाया क्यों?
जी,ऐसे ही ये बातें सबसे नहीं कही जाती और अब भी ये बात हमारे बीच से और कहीं नहीं जानी चाहिए,प्रकाश बोला।।
तो फिर प्रकाश भइया! आगें क्या करें? करन ने पूछा।।
बस,ऐसे ही रहो जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं है,विश्वनाथ को ये पता नहीं चलना चाहिए कि तुम लाज के सगे भाई और धर्मवीर अंकल के बेटे हो,उसे अब हमें चकमा देना होगा और  अगर विश्वनाथ की मुखबिरी करने  के लिए लाज  फिर से शकीला के पास लौट जाएं क्योंकि विश्वनाथ लाज को कुत्तों की तरह ढूढ़ रहा होगा,प्रकाश बोला।।
ये क्या कह रहे हैं? मुझे फिर उस नरक में जाने को कह रहें हैं,लाज गुस्से से बोली।।
तुम वहाँ जाओ,तुम्हें छोड़ने मैं चलूँगा और शकीला से कहूँगा कि तुम्हारा मेरी टैक्सी से एक्सीडेंट हो गया था,इसलिए तुम अपनी याददाश्त खो बैठी हो ,इसलिए तुम इतने दिन अस्पताल में थी,तुम्हारे पर्स में इस घर का पता था इसलिए मैं तुम्हें पहुँचाने आया हूँ, अब तुम शकीला, कैबरें और अपना अतीत सब भूल चुकी हो,प्रकाश बोला।।
लेकिन प्रकाश भइया! दीदी को वहाँ भेजने में खतरा है,करन बोला।।
लेकिन इतना खतरा तो उठाना पड़ेगा,प्रकाश बोला।।
लेकिन ये बात पापा,डैडी और अनवर चाचा से भी तो बतानी होगी,करन बोला।।
उन सबके सहयोग के बिना तो ये सम्भव ही नहीं है,प्रकाश बोला।।
लेकिन इतनी खोज बीन दीदी के बस की नहीं है,करन बोला।।
मैं और मेरा भाई विकास शाम को हुलिया बदलकर क्लब जाते हैं ना!वहीं से तो विश्वनाथ के काले चीट्ठों का मुझे पता चला,हमारे विभाग को बहुत पहले से विश्वनाथ पर शक़ था,इसलिए तो मैं मुखबिरी करने के लिए ही तो टैक्सी ड्राइवर बना,प्रकाश बोला। 
हमे इस प्लानिंग के अनुसार जल्दी काम शुरू करना होगा,करन बोला।।
लेकिन तुम अभी ठीक तो हो जाओं,प्रकाश बोला।।
लेकिन भइया! उसने हम सबकी जिन्दगियांँ बर्बाद की हैं,वो मेरी मम्मी का कातिल है,उसकी वजह से पापा इतने साल तक जेल में रहे,करन गुस्से से बोला।।
मैं सब जानता हूँ और ये गुस्सा होने वाली ही बात है तुम्हारी जगह और कोई होता तो वो भी ऐसा ही करता लेकिन तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मेरे पिता का भी उसी ने कत्ल किया था,तब से मैने भी उससे बदला लेने का ठान लिया था,प्रकाश बोला।।
इसका मतलब है कि विश्वनाथ बहुत ही गिरा हुआ इन्सान है,करन बोला।।
और ना जाने कितनों का जीवन खराब करके बैठा है वो ,लाज बोली।।
तो अब मैं क्या करूँ? जो मेरे पास जानकारी थी वो मैने आप सब को बता दी ,शर्मिला बोली।।
शर्मिला जी! आपकी जान भी खतरें में पड़ सकती है,मुझे बचाकर आप भी अब विश्वनाथ की दुश्मन बन गईं हैं,करन बोला।।
लेकिन मुझे जो सही लगा मैने तो वही किया,शर्मिला बोली।।
विश्वनाथ जैसे हैवानों को हर सही चीज़ गलत ही लगती है,करन बोला।।
ठीक है तो अब मैं चलती हूँ,शर्मिला बोली।।
फिर कब आइएगा? करन ने बेसब्री से पूछा।।
जी कुछ कह नहीं सकती,शर्मिला बोली।।
शर्मिला जल्दी आने की कोशिश करना नहीं तो भइया तुम्हारी बाट जोहते रहेगें,सुरेखा मज़ाक करते हुए बोली।।
कुछ भी बोलती है ये तो,आप जाइए शर्मिला जी,करन बोला।।
ठीक है और इतना कहकर शर्मिला वहाँ से चली आई....
इधर सबके बीच विश्वनाथ के खिलाफ सूबूत इकट्ठे करने की योजनाएं बनने लगी,सब चाह रहे थे कि जल्द से जल्द विश्वनाथ जेल में दिखाई दे.....

और उधर शकीला परेशान थी कि उसकी जूली अब तक क्यों नहीं लौटी,विश्वनाथ भी पूरी पूरी कोशिश कर रहा था कि जल्द से जल्द जूली उसे मिल जाए,उसने अपने गुण्डो से  अब ये भी पता करवा लिया था कि धर्मवीर जेल से छूटकर आ चुका है,उसे लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि धर्मवीर ने जूली को ढूढ़ लिया हो और अपने साथ ले गया हो,अनवर और धर्मवीर तो अभी भी संग ही होगें।।
   इधर उसके क्लब काम भी ठंडा पड़ा था,इधर हरदयाल को भी अपनी जान के लाले पड़े थे उसे लगा कि अगर कहीं वो विश्वनाथ के खिलाफ गया तो एक ही झटके में विश्वनाथ उसे भगवान के पास पहुँचा देगा,बस इसी उधेडबुन में सबकी रातें कट रही थी.....
      और एक दिन अपनी योजना के अनुसार जूली,शकीला के पास लौट आई और उसे प्रकाश ही छोड़ने गया उसने वही कहा जो उनकी योजना में शामिल था कि जूली अब अपनी याददाश्त खो बैठी है,कृपया इसके दिमाग़ पर जोर डालकर इसे कुछ याद ना दिलाया जाए.....
   जूली के मिलने की खबर जब विश्वनाथ तक पहुँची तो उसने कुछ राहत कि साँस ली कि चलो बाप बेटी अभी तक मिल नहीं पाए।
     इधर प्रकाश और विकास क्लब की मुखबिरी करने लगें,उन्हें कुछ जानकारियाँ भी मिलीं और एक दिन फिर सबने एक जगह मिलने की योजना बनाई,इसके लिए उन्हें सेठ गिरधारी लाल जी आ घर ही सबसे महफूज लगा....
    लेकिन इधर जूली ने शकीला से कहा कि वो जरा बाहर घूमने जाना चाहती है....
तो शकीला बोली...
तुम बाहर अकेली नहीं जा सकती तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है,फिर से कही खो गई तो हुजूर को क्या जवाब दूँगी?
और उस दिन शकीला भी जूली के साथ  चली आई,जब जूली ने अपनी मोटर सेठ गिरधारीलाल जी के बंगले के सामने रोकी तो शकीला ने पूछा....
ये कहाँ आ गए हम?
खालाज़ान अन्दर तो चलिए,जूली बोली।।
तब शकीला अन्दर पहुँची और जूली ने शकीला को सबसे मिलवाते हुए विश्वनाथ की सारी सच्चाई कह दी..

क्रमशः.....
सरोज वर्मा.....


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