अवधूत गौरी शंकर बाबा के किस्से - 3 in Hindi Spiritual Stories by ramgopal bhavuk books and stories Free | अवधूत गौरी शंकर बाबा के किस्से - 3

अवधूत गौरी शंकर बाबा के किस्से - 3

अवधूत गौरी शंकर बाबा के किस्से  3

 

                    रामगोपाल भावुक

                          सम्पर्क- कमलेश्वर कोलोनी (डबरा) भवभूतिनगर   

                          जि0 ग्वालियर ;म0 प्र0 475110

                          मो0 9425715707,   , 8770554097

                         ई. मेल. tiwariramgopal5@gmail.com

 

 

 

          कुछ दिन ठीक रहने के बाद बाबा वहाँ से भी चल दिये। ग्वालियर जिले के पंचमहल क्षेत्र का कोई गाँव ऐसा नहीं हैं जहाँ बाबा नहीं गये हों। वे चाहते तो अपने लिये कहीं भी आश्रम बना सकते थे। इनका देशभर में कहीं कोई आश्रम नहीं मिलेगा। रमता जोगी बहता पानी वाली कहावत को चरितार्थ करने में लगे रहे। इस क्षेत्र के हर गाँव में बाबा के भक्त बिखरे हुये हैं जो इनके गुणगान करने में अघाते नहीं हैं। जब भी कोई बाबा का भक्त मिल जाता है उनके चमत्कारों का वर्णन करने लगता है ,उस समय लगता है-बाबा रूप धारण करके सामने हैं। यों उस परम सत्ता से रूबरू होने का सौभग्य मिलता रहता है।

         मुझे उस दिन की बात रह-रहकर याद आती है जिस दिन बाबा परमानान्द सिन्धी की दुकान पर बैठे थे। मैं अपने गाँव सालवई से डबरा कस्वे में बाजार से सौदा लेने आया था। वहाँ आकर पता चलाया कि बाबा कहाँ हैं? उन्हें खेजता हुँआ उस दुकान पर जा पहुँचा।....किन्तु आश्चर्य मेरे वहाँ पहुँचने का बाबा को पहले ही पता चल गया वे पहले से   ही एक पेन(कलम) लिये वहाँ बैठे थे। जैसे ही मैं उनके सामने पहुँचा,वे उस कलम को मुझे देते हुये बोले-‘‘लो...।’’

         मैं युग-युगान्तर से कलम के लिये प्यासा  था। मैंने उनकी कृपा को सिर माथे से लगाया और उस कलम को संभालकर रख लिया। उस दिन मुझे अपना लेखन फलीभूत होता दिखा था। मुझ जैसे गाँवटी व्यक्ति की आज की तारीख तक ग्यारह पुस्तकें आठ उपन्यासों सहित दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी हैं। रत्नावली और एकलव्य जैसे उपन्यास की चर्चा विदेशों में भी की जाने लगी है। खास बात यह है ,इनके प्रकाशन में मुझे अपना पैसा नहीं लगाना पड़ा है। उल्टा कुछ मिल ही रहा है। यह सब बाबा की कृपा का ही प्रतिफल है। वह कलम आज भी मेरे पास सुरक्षित है। होली -दीपावली की दौज को घर में उसी कलम की पूजा की जाती है। 

          अब तक हमारा कुआ खुद चुका था। उसमें कामचलाऊ पानी निकल आया था। पैसे की तंगी के कारण हम हार -थककर बैठ गये। एक दिन की बात है- पहले से बिना बुक किये एक बोरिगं मशीन घर के पास आ रुकी। उसके दो कर्मचारी हमें तलाशते हुये हमारे घर आये। एक बोला-‘‘हम यहाँ पास ही सडक से गुजर रहे थे कि एक लम्वे-तगड़े बाबा जी ने हमारी गाड़ी रोककऱ कहा-तुम लोग सालवई ग्राम में तिवारी के घर चले जाओ,वे बोरिंग करा लेंगे। हम बिना एडवान्स के कहीं जाते नहीं हैं,पर पता नहीं इधर कैसे चले आये।’’

          इसे मैंने बाबा की आज्ञा मानकर उनसे कहा-‘‘इस वक्त घर में एक पैसा नहीं है,हमें कितने पैसे की व्यवस्था करना पड़ेगी?’’

 

उनमें से छूसरा बोला-‘‘कम से कम पाँच सौ रुपये तो चाहिये ही। शेश तुम्हारी किस्मत! देख लें ,हम घन्टे भर प्रतीक्षा करेंगे अन्यथा लौट जायेंगे।’’मैंने पैसे के लिये इधर-उधर दृष्टि डाली।  मेरे विद्यालय के एक साथी शिक्षक कालका सिंह चौहान को इस बात का पता चल गया होगा। वे आते ही बोले-‘‘किस सोच में डूवे हो?’’

         मैंने अपने मन की व्यथा कही, वे बोले-‘‘चिन्ता नहीं करें,आप दो तीन दिन में दे देना।’’यह कहकर उन्होंने पाँच सौ रुपये अपनी जेब से निकाल कर मुझे दे दिये। मैं समझ गया ,बाबा ने इस काम के लिये पैसों की व्यवस्था भी कर दी। बाबा का यह चमत्कार भुलाये नहीं भूलता।

        हमने अपने गाँव के कुआ गुनने वाले को वुलाया। वे बोले-‘‘इस कुये के पश्चिम की ओर बगल में बोरिंग करायें। उनके बताये अनुसार बोरिंग कराना शुरू कर दी। पच्चीस फीट पर जाकर बेांरिंग की मशीन फस गई। उस समय  बाबा ने जहाँ खूंटा गाडा था उस स्थान की याद आई। हमने उसी स्थान पर पुनः बोरिंग कराना शुरू कर दी। पेंतीस फीट पर जाकर पानी की धार बह निकली। यों उस जमाने में कुल दो सौ पचास रुपये बोरिंग वालों ने रखे शेष बापस कर दिये। हमारे गाँव के लोग आज भी इस घटना की चर्चा कर बाबा के गुनगान करते रहते हैं। 

         बाबा की कृपा से कुये में पर्याप्त पानी हो गया तो हमें सत्यनारायण की कथा कराने की याद आई। पिता जी ही कथा बचवाने के लिये बाबा को बुलाने गए। बाबा का घर में दुबारा आगमन, यह हमारे जीवन का सबसे अच्छा समय था। घर में आनन्द की वर्षा होने लगी।

          उस दिन सोमवार था। जिस दिन बाबा ने स्वयं उस कुये पर बैठकर संस्कृत में कथा वाँची थी। सारे परिवार ने उनके श्रीमुख से सत्यनारायण की कथा सुनी। परम सौभाग्य की बात यह थी कि दो दिन बाद ही गुरू पुर्णिमा थी। चौदस की रात्री बाबा खटिया पर लेटे रहे। देर रात तक बाबा के पास बैठक चलती रही।  गाँव के सभी लोग अपने-अपने घर चले गये। पिताजी भी आराम करने वहीं बाबा के पास लेट गये। उनकी नीद लग गई तो बाबा उठकर कहीं चल दिये। पिताजी की नीद खुली तो निगाह बाबा की ओर गई। बाबा गायब। पिताजी की वही दशा हो गई जो भक्त के सामने से भगवान के अदृश्य होने पर होती है। वे बाबा-बाबा चिल्लाकर उन्हें इधर-उधर ढूढने लगे। घर के सभी लोग जाग गये। रात्री के तीन बजे होगे ,घर के सभी लोग बेसब्री से उन्हें खोजने लगे। छोटे भाई को उन्हें खोजने डबरा शहर भेज दिया। उन्हें ढूढते-ढूढते दिन निकल आया। गाँव के किसी व्यक्ति ने आकर बताया-बाबा ताल के ऊपर जो कुआ है, वहाँ पर बैठे हैं। हम सब उन्हें खोजते हुये वहाँ पहुँचे, बाबा पालथी मारे आराम से उस कुये पर बैठे मुश्करा रहे थे।

          इस समय मुझे एक दिन पहले की बात याद हो आई। मैंने ही बाबा से कह दिया था-‘‘बाबा इस कुये का पानी कुछ-कुछ खारा सा है।’’ बाबा का इस कुये पर होना क्या संकेत है?कहीं बाबा  इस कुये से उस कुये का सम्बन्ध तो नहीं जोड़ रहे हैं। बाबा का यहाँ होना निश्चय ही कोई बात है। यदि इसे और गहरा बोर करायें तो उस कुये की झिर मिल जायेगी। यही सब सोचते हुये मैं बाबा के पीछे-पीछे चलकर घर आ गया। सन्तों की बात का अर्थ लगाना कोई खेल नहीं हैं।

          उस दिन वर्ष 1975 की गुरू पूर्णिमा थी। इस अवसर का लाभ लेने की बात मन में आने लगी। यह सोचकर मैंने बाबा से पूछा-‘‘ बाबा बच्चों का विद्यारंभ संस्कार कराना है आप करा दीजिये।’’

         बाबा बोले-‘‘ बुला वच्चों को और पटटी और बोरंखा तो ला।’’ मैं बाबा की  बात समझ गया। पुत्री ज्योति एवं भतीजे देवेश और प्रवीन को बाबा के पास बुलाया। स्लेट-बत्ती उठा लाया। स्लेट-बत्ती बाबा के सामने रखदी। बाबा ने क्रम से तीनों को उनका हाथ पकड़कर ‘श्री गणेशाय नमः’ लिखाया और बुलवाया भी। यों  इन तीनों वच्चों का विद्यारंभ संस्कार बाबा ने ही कराया है। आज तीनों पढ-लिखकर व्यवस्थित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यह बाबा की कृपा का ही फल है।

         मैं अपने जीवन की उस अविस्मरणीय गुरू पूर्णिमा की याद करके पश्चाताप करता रहता हूँ कि उस दिन अपने आध्यात्मिक जीवन के लिये उनकी कृपा की याचना भी नहीं कर पाया।

           सच तो यह है उस दिन तक मैं आध्यात्म के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानता था। वैसे भी महापुरुषों का साधना क्र्रम प्रायः संसार की दृष्टि से अदृश्य ही बना रहता है। सामान्य जनों में उसके जानने की कोई रुचि भी नहीं होती और ना हीं वे इसकी कोई आवश्यकता ही समझते हैं। वे तो सन्तों का गुणगान करने तक ही अपने को सीमित बनाये रखते हैं। बाबा अपने अन्तर में क्या-क्या अनुभव समेटे थे? उनकी साधना पद्धति क्या थी। उनने कब, किससे, कहाँऔर कैसे अनुग्रह प्राप्त किया था? आदि प्रश्न सामान्य जन के लिये निरर्थक ही रहते हैं।

        बाबा तो अपने प्रियतम की याद में तल्लीन थे। प्रसिद्धि की उन्हें कोई चाह नहीं थी, वे उससे कोसों दूर थे। उन्हें किसी से कुछ लेना- देना नहीं था। मैंने उन्हें किसी से कुछ माँगते भी नहीं देखा। यदि किसी से कुछ लेते तो वह अपने लिये नहीं वल्कि लोगों को बाँटने के लिये ले लेते थे। उन्होंने न कभी कोई आश्रम बनाया और न कोई कुटिया। वे तो भीड़ भरे बाजार में एकान्त में रहते थे। उनके लिये भीड़ भरे बाजार और जंगल की कन्दरायें एक समान थीं। उनके किसी कार्य कलाप में कोई व्यवधान  नहीं पड़ता। आज साधना के लिये जंगलों का अभाव है तो बाबा जैसे परमहंस सन्तों के लिये भी भीड़ ही साधना स्थली है। मैंने तो बाबा को उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते हर पल साधना में निरत महसूस किया है। वे एक पल भी अपने प्रियतम से दूर नहीं रहते थे। जगत में रहते हुये हर पल साधना में बने रहते ।

         इन बातों के ध्यान में आते ही आपके मन में एक प्रश्न उभरेगा-क्या ऐसे साधक अब भी हैं?

           मेरे गुरुदेव परमश्रद्धेय हरिओम तीर्थ जी के गुरुदेव स्वामी शिवोम् तीर्थ जी की कृति अन्तिम रचना में इस प्रश्न का उत्तर महाराज श्री ने यों दिया है-शक्तिपात् विद्या के साधकों की दो धारायें हैं,-एक स्थाई दूसरी अस्थाई। एकान्तप्रिय साधकों की धारा स्थाई है। इसका अधिक विस्तार नहीं होता किन्तु निरन्तरता सदैव अखन्ड बनी रहती हैं। किसी भी परिस्थिति में  इसकी निरन्तरता में अन्तर नहीं आता। बाबा की तरह इसके साधक महातपस्वी,महात्यागी,जन-समाज में रहते हुये जन-समाज से दूर,साधना में रत एवं दैवी शक्तियों से सम्पन्न होते हैं।

        जब संसार में अस्थाई धारा का प्रचार-प्रसार बढ जाता है तब भी स्थाई धारा भूमिगत प्रवाहशील बनी रहती है।  स्थाई धारा के महापुरुष शक्ति सम्पन्न होते हुये भी किसी को दीक्षा नहीं देते। वे तो शक्ति के उत्थान के लिये साधना में लगे रहते हैं।

          मेरी जानकारी में बाबा ने किसी को भी दीक्षा नहीं दी है। इसके बावजूद बाबा के अनेक भक्त इस क्षेत्र में विखरे हुये हैं। मेरे एक मित्र डा0 लक्ष्मी नारायण शर्मा के मन में विचार आया-मुझे बाबा से दीक्षा लेना है। वे व्याकुल होकर बाबा से प्रार्थना करने लगे -बाबा मुझे अपना शिष्य  बना लो। सारा दिन प्रार्थना करते निकल गया। रात इसी धुन में सोये। झपका सा लगा,बाबा स्वप्न में आकर कहने लगे-‘‘चेला कोई किसी का नहीं है,चेला तो सब बद्रीश के हैं।’’ यह कहकर वे अदृश्य होगये। नीद खुल गई। दूसरे दिन उन्होंने सारी घटना का मेरे पास आकर व्यान कर किया। इस घटनासे मैं समझ गया-बाबा किसी को अपना चेला नहीं बनाते।                    

         मैं अपने विवाह के पूर्व श्री श्री 108श्री स्वामी सहजानन्द जी महाराज से दीक्षा लेकर उनकी कृपा प्रप्तकर चुका था। उनके प्रति श्रद्धा-समर्पण में कोई कमी नहीं थी। इसीलिये मैंने बाबा से इस तरह का अनुग्रह प्राप्त करने की कोई प्रार्थना नहीं की। वे तो उस गुरु पूर्णिमा से मेरे चित्त में परमाराध्य बनकर बिराजमान हो गये हैं। अब तो मेरा चित्त हर पल अपने इस इष्ट के इर्द-गिर्द बना रहना चाहता है।

         गुरु पूर्णिमा के दूसरे दिन प्रातः ही घर से जाने लगे। पिताजी बैल-गाड़ी ले आये। बाबा के साथ मैं भी गाड़ी में बैठ गया। पिताजी से बाबा बोले-‘‘तूने मुझे अंग वस्त्र नहीं दिया। यह ठीक रहा पिताजी उस समय कन्धे पर धोती डाले हुये थे,उन्होंने तत्काल उस धोती को उन्हें ओढ़ा दी। वे बोले-‘‘चल यही ठीक है।’’यह कहकर वे मुश्कराने लगे।

          यों बाबा की लीलायें देखकर चित्त बार-बार उनकी ओर जाने लगा। उस समय एक गीत-सा प्रस्फुटित होने लगा-             

                           मस्तराम की मस्ती में राम नजर आया है।

                           बिष में अमृत का भाव नजर आया है।।

                           चेतना  अन्तः मुखी   हो   उठती है,

                           तुम्हारे गुणगान करने में ये पाया है।।

                           नस-नस में तेरा स्वर फूटने लगा है,

                           हर स्वर में तेरा स्वर नजर आया है।।

                           नजर भर के कहीं गौर से देखा तो,

                           हर रूप में तेरा रूप नजर आया है।।

                           सारे दश्य परिदृश्य उलट-पलट डाले,

                           हर दृश्य में तेरा दृश्य नजर आया है।।

                           सियाराम मय है सारा जड-चेतन,

                           भावुक के मन में समाधान आया है।।

        हर पल ये भाव मन में रहने लगे। घीरे-धीरे यही भाव स्थाई भाव का रूप धारण करते चले गये। आज बाबा के अलावा कोई देव इष्ट के स्थान पर बिराजमान नहीं हो पाया। अब तो प्रश्न्न हेाकर दर्शन देने वाले देव से यही प्रार्थना है कि वे दर्शन दें तो बाबा के वेश में हीं दें,तो ही मुझे उनकी प्रश्न्नता स्वीकार है। मैं क्या कहूँ-जब भी किसी देव ने कृपा की है बाबा के रूप में हीं उनने दर्शन दिये हैं।

         मार्च-अप्रैल 1976 की बात है-उन दिनों मैंने बाबा की कृपा से डबरा नगर में  मकान बनवाना शुरू कर दिया था। मकान बनाने में यदि कोई बाधा आती तो मैं प्रार्थना लेकर बाबा के पास पहुँच जाता। जब मकान बनकर तैयार हो गया तो मैंने बाबा से उनका छायाचित्र प्राप्त करने के लिये प्रार्थना की-‘‘बाबा अमर फोटो स्टूडियो के यहाँ आपका फोटो है आपकी कृपा हो जाये तो मैं उससे आपका फोटो प्राप्त करलूं।’’

          बाबा बोले-‘‘जा उसके यहाँ से जाकर ले ले।’’मैंने अमर फोटो स्टूडियो के यहाँ से बाबा के दो फोटो ले लिये। उन्हें ले जाकर अपने नव निर्मित मकान में प्रतिष्ठित कर दिया।’’

           उन्हीं दिनों बाबा से मैंने अपने ट्रान्सफर के लिये प्रार्थना की-‘‘बाबा आप मेरा स्थानान्तर डबरा नगर के आस-पास शहराई ग्राम में की करा दें।’’

           वे बोले- ‘‘वहाँ नहीं , वहाँ तो इक्का से जाना पड़ेगा।’’यह सुनकर मैं चला आया था। आप इसे संयोग ही कहेंगे, बिना प्रयास के छह दिन बाद ही मेरा स्थानान्तर डबरा नगर के बीचों-बीच मा0 वि0 डबरा क्रमांक तीन में हो गया। मैंने 28जून 1976 को डयूटी ज्योइन करली। अब गृह प्रवेश का कार्यक्रम अनिवार्य था। पंडित जी से गृह प्रवेश का मुहूर्त निकलवाया गया। 30 जून का मुहूँर्त निकला। इस कार्यक्रम में बाबा को बुलाने पिताजी गये थे। उन्होंने बाबा से जाकर प्रार्थना की-‘‘बबा चलो,घर में प्रवेश तो करो।’’

        बाबा बोले-‘‘ मैं वहाँ बैठा तो हूँ। जा मेरे लिये पेड़ा तो ले आ।’’

       सच मानिये पिताजी  पूरे डबरा नगर के हलवाइयों के यहाँ पेड़ा तलाशते फिरे ,किन्तु पेड़ा कहीं नहीं मिले। उन्हें एक उपाय सूझा-बाबा ने पेड़ा मांगे हैं तो वर्र्फी के ही पेड़ा बनवाकर ले चलूं। यों उन्होंने वर्र्फी के पेड़ा बनवाये और बाबा के पास लेकर पहुँचे। बाबा उन्हें दूर से ही देखकर बोले-‘‘क्यों नहीं मिले पेड़े ।चल ठीक है जो ले आया है उन्हें ही पाये लेता हूँ।’’ यह कहकर उन्होंने वे पेड़े ले लिये और प्रेम से पा लिये। पिताजी ने घर आकर ये सारी बात हमें बतलाई थी। उसके वाद पिताजी घर से उनके लिये प्रसाद लेकर गये थे। जिसे बाबा ने खुद भी पाया और पास बैठे भक्तों में बाँट दिया था।

         बाबा का यह कहना कि मैं वहाँ बैठा तो हूँ। उस दिन गृह प्रवेश की भड़-भड़ी में इस बात का अर्थ समझ नहीं पाया था।...किन्तु आज अच्छी तरह समझ में आ गया है। बाबा के बास से घर से सूनापन गायव है। मुझे कभी नहीं लगता कि मैं इस घर में अकेला हूँ। घर में तरह-तरह की सुगन्ध ,बाबा की उपस्थिति का आभस कराती रहती है। बाबा के भोग की महक मन को आन्दित कर बाबा की उपस्थिति का आभस करा देती है। यों घर में रहकर मन बाबा से जुड़ा रहता है। आप कहेंगे,यह सब मेरी श्रद्धा और विश्वास है। मैं आप से पूछता हूँ-‘‘मैं वहाँ बैठा तो हूँ ,बाबा के इस कथन का आपके पास क्या उत्तर है ?’’    

       बात 1 जौलाई 1976  यानी ग्रह प्रवेश के दूसरे दिन की है। मैं विद्यालय से लौट रहा था।  नये घर की व्यवस्था जमाने के चक्कर में बाबा से मिलने भी नहीं जा पाया था। लौटते में बारह वजे का समय रहा होगा। मैन रोड से घर जाने के लिये मुड़ा। तेज भूख लगी थी। कदम घर पहुँचने के लिये धूप के कारण तेजी से उठ रहे थे।सड़क दोपहरी के कारण सूनसान थी। बाबा नाथूराम खर्द के मकान के सामने नीम के पेड़ की छाया में चबूतरे पर बैठे थे। एक टीन का डिव्वा पास रखा था। मेरी निगाह बाबा पर पड़ी। मुझे लगा-बाबा दिशा -मैदान से लौटे हैं। मैं बाबा को डिस्टर्व क्यों करू? यह सोचकर उन्हें प्रणाम करके आगे बढ़ गया। बाबा मुझे जाते हुये देखते रहे और मैं मुड़-मुड़कर उनकी दृष्टि को निहारता रहा।

          उनकी उस दृष्टि को मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ। लगता है वे आज भी मुझे उसी दृष्टि से निहार रहे हैं।

        उस दिन सोचा था, शाम को बाबा के दर्शन करूंगा। शाम को मैंने बाबा की तलाश की। पता चला-बाबा तो कल शाम से ही कहीं चले गये हैं।यह सुनकर धक्का सा लगा-बाबा मुझे दर्शन देने आये थे। मैं पागल उनके चरण नहीं पकड़ पाया। आज भी इस आग में झुलसता रहता हूँ।

         उस दिन सोचा था ,अपने बिलौआ गाँव चले गये होगे। ...लेकिन दो-चार दिन में यह हवा फैल गई कि बाबा जाने कहाँ चले गये?उनके भक्तों ने उनकी खोज -खबर लेना चाही। उनका कहीं पता नहीं चला।

       उस दिन से आज तक यह सोचता रहा हूँ-अदृश्य होने से पहले बाबा मुझ पर कृपा करने आये थे। उनकी ही इच्छा रही होगी इसीलिये मैं उनके चरण नहीं छॅ सका। नहीं , यह बात भी नहीं हो सकती,यदि ऐसा होता तो उस दिन साधना में उपस्थित होकर बाबा का यह कहना-और पास आ....।.... और पास आ....। .....और पास आ। यों बाबा मुझे सर्म्पूण पास बुलाना चाहते हैं। उस दिन तो मैं ही अपने माया-मोह,भूख-प्यास के चक्कर में आगे बढ़ गया था। इसके परिणाम स्वरूप दिन-रात अपनी मूर्खता पर पश्चाताप करता रहा। अपने विवेक को धिक्कारता रहा। दूसरी ओर मैं मन- वेमन अगरबत्ती लगाकर बाबा के सामने बैठता रहा। इधर-उधर भाग रहे मन को पकड़कर बाबा के चरणों में लाता रहा। वे मन की इस क्रिया से भी जिन्दगी की मन्जिल आसान होती चली गई। बस इसी तरह सोचने में जिन्दगी के बारह वर्ष   गुजर  गये।