विशाल छाया - 2 in Hindi Social Stories by Ibne Safi books and stories Free | विशाल छाया - 2

विशाल छाया - 2

(2)

मगर विनोद अपनी धुन में चलता रहा । हमीद ने कई बार रुक रुक कर उन आंखों को घूरा, किसके कारण वह विनोद से पीछे रह गया । 

विनोद ने कार की पिछली सीट पर रमेश को लिटा दिया । सरला भी पिछली ही सीट पर बैठी, और विनोद अगली सीट पर बैठा । 

हमीद जैसे ही कार के समीप पहुंचा, कार स्टार्ट हो गई । 

“अरे ---अरे –सुनिये तो –रोकिए –” हमीद चिल्लाता हुआ दौड़ा मगर कार स्पीड में आ चुकी थी । 

हमीद ओर तेजी से दौड़ा, मगर उसके चेहरे पर धूल पड़ी और वह आंखें मलने लगा। 

और जब आंखों पर से हाथ हटाया तो कार दूर जा चुकी थी । 

हमीद खड़ा सोचता ही रह गया । 

प्रकट है विनोद की यह हरकत केवल तफरीह नहीं हो सकती थी, इतनी गंभीर स्थिति में विनोद से वह इस प्रकार के मनोरंजन की आशा भी नहीं कर सकता था, मगर उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिर विनोद उसे इस प्रकार छोड़ कर कैसे चला गया। अगर छोड़ना ही था तो वह उससे कह भी सकता था । 

सड़क सुनसान पड़ी थी और किसी टेक्सी के मिलने की आशा भी नहीं थी । इस वीरानी का कारण वह घटनाएं थीं, जो इधर नगर के कुछ भागों में हुई थी । 

यह कुछ विचित्र सी बात थी कि ऐसी ही दो चार घटनायें नगर के कुछ भागो में हुई थी और बिजली की सी तेजी के साथ उनका समाचार सारे नगर में फेल गया था, जिसके कारण लोगों के दिलों में भय बैठ गया था । 

इन घटनाओं का क्रम सर टिका राम के घर से आरंभ हुआ था । 

एक दिन सर टिका राम अपने घर वालों के साथ ड्राइंग रूम में बैठे थे । बातें हो रही थी, कहकहे फूट रहे थे । अचानक घर के एक आदमी की नजर सामने वाली दीवार पर पडी । दिवार पर एक चोपये की परछाई हिलती डोलती नजर आ रही थी और परछाई के सर पर आदमियों के समान फेल्ट दिखाई दे रही थी । 

बस सब लोग डर कर भागे और आतंक फैल गया । कोठी का कोना कोना तलाश किया गया, मगर कहीं कोई एसी वस्तु नजर नहीं आयी, जिससे उसकी परछाई का सुराग मिल सकता । 

अगर बात वही तक रह जाती तो कोई बात न होती, मगर कुछ ही देर बाद सर टिका राम के जवान लड़के पर पागल पण का दौरा पड़ा और वह पागलों के समान हरकतें करने लगा । उसने अपने कपडे फाड़ डाले । उलटी सीधी बातें करने लगा । इस सिलसिले में सबसे विचित्र बात यह थी की वह किसी को पहचान भी नहीं रहा था । फिर उसे अस्पताल ले जाया गया । बड़े बड़े डाक्टर बुलाये गये, मगर कोई यह नहीं बता सका कि उसके पागलपन का कारण क्या था । 

इसके ठीक तीन दिन बाद यही घटना पीर भाई बाल्टी वाले के यहां हु, मगर इस घटना का शिकार उनके घर का कोई आदमी नहीं हुआ, बल्कि वह ख़ुद पागल हो गये । 

तीसरी घटना पोलक एन्ड कम्पनी के मालिक मिस्टर वेरी के साथ हुई । 

और उन्हें अपनी जवान लड़की से हाथ धोना पड़ा । वह मरी तो नहीं मगर पागल पन ने उसे मुर्दा से भी बुरा बना दिया । वह हर तेज़ाब की बोतल खोजती रहती थी । 

इन तीन घटनाओं ने नगर में सनसनी फैला दी थी । लोग डर गये थे । कारण किसी को मालूम नहीं हो सका था ! लोगों के दिलों में इतना भय बैठ गया था कि वह जहां भी परछाईं का वर्णन सुनते उनके मुख पीले पड़ जाते थे और ऐसा लगता था जैसे उनके शरीर का रक्त कोई खींच रहा हो । वह जल्दी से भाग कर अपने घरों में और बाहरी द्वार बंद करके धार्मिक पुस्तकों का पाठ करने लगते थे । 

सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि यह घटना चाहे नगर के जिस भाग में होती, मगर देखते ही देखते पूरे नगर में इसकी खबर फैल जाती थी और सारे नगर में आतंक छा जाता था । 

आज रमेश के साथ भी यही हुआ और उसके इलाके के तमाम लोग अपने घरों के द्वार अंदर से बंद करके कमरों में दबाक गये । 

हमीद सड़क पर खड़ा विनोद पर ताव खता रहा और फिर टेक्सी की आशा छोड़ कर पैदल चलने लगा । 

वह कुछ ही दूर चला होगा कि तीन लड़कियां झांकती हुई दिखाई दी .....बस क्या था। हमीद के मस्तिष्क से थोड़ी देर पहले की तमाम बातें निकल गई और वह शरारत करने के मूड में आ गया । वह खड़ा होकर उन्हें घूरने लगा । 

उनमे से दो तो कमसिन थीं, मगर तीसरी की अवस्था चालीस के लगभग थी । तीनों देशी ही थी । उनके बाल पिन से बंधे हुए थे और तीनों ने स्कर्ट पहन राखा था । वह तीनों बड़ी गंभीरता से नीचे की ओर देख रहीं थीं । 

अचानक एक की नजर हमीद की नज़रों से टकरा गई और हमीद ने आवारों के समान अपने सीने पर हाथ रख कर दाहिनी आंख दबा दी । 

उस लड़की ने अपने साथी को कुहनी मारी और वह भी ह्हमिद की ओर देखने लगी । 

हमीद ने फिर सीने पर हाथ रख कर आंख मार दी । 

उसने शर्मा कर निगाह हटा ली । मगर हमीद उसी प्रकार ऊपर देखता रहा जब भी वह उसकी ओर देखतीं, हमीद सीने पर हाथ रख कर आंख मार देता था । 

अचानक बूढी औरत की नजर भी उस पर पड़ गई । वह कुछ क्षण तक तो हमीद को घूरती रही, फिर जोर से बोली ---

“अरे बाबा ! तुम यहां क्यों खड़ा है । जाओ अपना रास्ता नापो । ”

“तुम ख़ुद बाबा !” हमीद बिगड गया ---”क्या यहाँ खड़ा रहना जुर्म है ?”

“तुम किस माफिक बात करता है ---” बूढी भी बिगड गई ---”तुमको अबी पुलिस से निकलवाना मांगता है । ”

हमीद उसकी बात अनसुनी कर गया और उन लड़कियों की ओर देख कर कहने लगा

“आओ मेरी जूलिएट ! सागर उस पार रेट में केकड़े अपनी केकड़ीयों के साथ बिहार कर रहे हैं और मैं तुम्हारे बिना यहाँ उदास खडा हूं । ”

“शटअप !” बूढी औरत ने गर्जन की । 

दोनों लड़कियां मुंह फेर कर हंसने लगी । 

हमीद ने सीने पर हाथ रख कर कहा । 

“जेरे दिवार खड़े हैं, तेरा क्या लेते हैं ---”

बूढी औरत क्रोध से पागल हो उठी । उसने जल्दी से लड़कियों के पट बंद कर लिये । मगर हमीद उसी प्रकार खड़ा रहा और लड़कियों की ओर देखता रहा। शायद वह सोच रहा था कि बूढी औरत नीचे आयेगी और उसके साथ दोनों लड़कियां भी आएँगी, फिर वह किसी न किसी प्रकार बात बराबर कर लेगा, मगर बूढी औरत के बजाय एक लम्बा तडंगा और काले रंग का आदमी बाहर निकाला । उसके शरीर पर केवल नेकर और बनियाइन थी । हमीद उसे देखते ही सिटपिटा गया । 

“धडन तख्ता !” काले आदमी ने गरज कर कहा ---तुम यहाँ क्यों खड़ा है ?:

उसकी आवाज सुन कर हमीद दहल गया, मगर फिर संभल कर बोला---

“ऊपर एक लड़की रहती है । उसने मुझसे सो रुपये उधार लिये थे । मैं अपने रुपयों के लिये खड़ा हूं । 

“धड़न तख्ता ! –” वह फिर गरजा –”तुम झूठ बोलते हो । ”

“देखो दोस्त !” हमीद ने कोमल स्वर में कहा –”सड़क पर इस प्रकार खड़े हो कर बात बढ़ाने से कोई लाभ नहीं होगा ! अच्छा तो यह होगा कि हम फ्लैट में बैठ कर मैत्री पूर्ण वातावरण में बातें करें । ”

हमीद के स्वर में जो कोमलता आ गई थी उसका कारण यह नहीं था कि वह काले आदमी से डर गया था । बल्कि उसने खिड़की की दराज से एक लड़की को ब्लाउज के अंदर से छोटा सा रिवाल्वर निकालते देख लिया था इसलिये उसने यह सोच लिया था कि किसी प्रकार फ्लैट के अंदर पहुंच जाये ताकि पता लग सके कि यह दोनों लड़कियां और वह बूढी कौन है । प्रकट है कि किसी लड़की के ब्लाउज के अंदर रिवाल्वर का होना कोई साधारण बात नहीं हो सकती थी, जिसे जाने बिना छोड़ दिया जाता । 

“धडन तख्ता –” उस आदमीने गरज कर कहा –”मेरे साथ आओ ....लेकिन अगर लड़की ने रूपया न लिया होगा ?”

“धडन तख्ता –” हमीद ने उसकी नक़ल उतारते हुए कहा ---”तुम एक बहादुर आदमी हो दोस्त ! इसलिये मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा । ”

“अच्छा तो आओ –” काले आदमी ने कहा और घूम गया । 

अब हमीद उसके साथ सीढ़ियों पर चढ़ रहा था । 

फ्लैट का दरवाजा खुला हुआ था । दोनों लड़कियाँ इजी चेर पर आराम से बैठी थीं और बूढी औरत बार बार अपना पाँव पटक रही थी । 

“धड़न तख्ता !” उस आदमी ने अंदर दाखिल होते हुए कहा –”यह आदमी कहता है कि तुम दोनों में से किसी ने इससे सौ रुपये उधार लिये...बताओ तुम दोनों में से किसने लिये थे ?”

“मैंने । ” एक लड़की ने जल्दी से कहा । 

हमीद उछल पड़ा । उसे स्वप्न में भी इस बात की आशा नहीं थी कि लड़की एक झूठी बात को इस प्रकार स्वीकार कर लेगी । उसका ध्येय तो बस इतना था कि वह इन लोगों को बातों में उलझा कर इस रहस्य का पता लगा लेगा कि वह लड़की इस प्रकार अपने ब्लाउज में रिवाल्वर क्यों रखती है । 

मगर उसने अपने को संभाला और मूर्खो के समान उस आदमी की ओर देख कर बोला,

“देखा आपने ! मैंने ठीक कहा था ना !”

“धडना तख्ता !” वह आदमी दहाड़ा और उसने लड़की को घूरना आरंभ कर दिया, फिर बोला,”तुम....तुम...। ”

वह अपना वाक्य पूरा नहीं कर सकता था, क्योंकि उसीसमय हवा का एक तेज झोंका आया और फ़्लैट की खिड़कियाँ अपने आप खुलीं, और फिर हमीद को दीवार पर वैसी ही परछाई दिखाई पड़ी जैसी वह रमेश के कमरे में देख चुका था । 

वह काला आदमी भी चीखा और उसकी चीख के साथ ही बूढी औरत तथा एक लड़की के मुख से भी चींखे निकल गई । मगर वह लड़की जिसके पास रिवाल्वर था और जिसने इस बात का समर्थन किया था कि उसने हमीद से रुपये उधार लिये है, केवल मन्द सी सिसकारी भर कर रह गई । 

चींखो के साथ ही वह लोग कमरे से निकल कर बाहर की ओर भागने लगें । 

हमीद ऐसी उलझन में पड़ गया था कि वह उनमें से किसी को भी भागने से न रोक सका । 

या फिर कदाचित यह कारण रहा हो कि उस परछाई में दिलचस्पी लेने के लिये वह विवश हो गया हो । वह दौड़ कर खिड़की के पास आया और खिड़की से सर निकाल कर बाहर की ओर देखने लगा । सड़क पहले ही के समान सुनसान थी । दो एक राहगीर आते जाते दिखाई दे रहे थे । 

अचानक हमीद को ठोकर लगी और वह खिड़की से हट कर उस दीवार की ओर मुडा जिस पर परछाई हिल डोल रही थी । वह उलझ कर गिरा । दुसरे ही क्षण उसका हाथ एक ऐसी वस्तु पर पड़ा जो कैमरा समान थी । 

हमीद ने उसे हाथ में उठा लिया । 

मगर हाथ में लेते ही उस पर खाँसी दौरा पड़ गया । ऐसा लगता था जैसे कोई वस्तु गले में फंस गई हो । उसने चीखना चाहा, मगर आवाज न निकल सकी । वह उठ कर दरवाज़े की ओर भागा, मगर लड़खड़ा कर फिर गिर पड़ा और उसके हाथ से वह कैमरा छूट कर गिर पड़ा । 

कमरे में अब कुछ ऐसी आवाज़ें गूंज रही थीं जैसे कोई लोहार किसी गर्म लोहे पर अपने हथौड़े से चोटें मारता है । 

“खट...खट....खट !”

उसके नेत्रों में जलन हो रही थी, मगर फिर भी उसने यह नोट कर लिया था कि कैमरा हाथ में लेते ही दीवार वाली परछाईं अचानक गायब हो गई थी । 

उसने अंतिम बार पूरी शक्ति लगा कर द्वार तक आने की कोशिश की, मगर इस कोशिश में वह सफल होने के बजाय उलट कर ढेर हो गया । 

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