विशाल छाया - 3 in Hindi Social Stories by Ibne Safi books and stories Free | विशाल छाया - 3

विशाल छाया - 3

(3)

हमीद की आंख खुल गई । 

उसने चारों ओर आँखे फाड़ फाड़ कर देखा । यह एक बड़ा सुंदर कमरा था, जिसमें दीवारों पर राग रागनियों की तस्वीरें बनी हुई थीं । कमरे के चारों कोनों पर संगमरमर की प्रतिमाएं थीं । फर्श पर ईरानी कालीन बिछी हुई थी और हमीद उसी पर लेटा हुआ था । 

कमरे में इतने रंगों का प्रकाश था कि उनसे तबियत खुश होने के बजाय भारी मालूम होने लगी थी । रंगों वाले बल्ब जाल रहे थे । एक कोने पर स्टेंडर्ड लें था जिसके पीछे कटलाख के काम का प्रतिबिम्ब डालने वाले शीशे लगे थे । कमरे में दरवाजे भी थे और एक खिड़की भी थी । 

हमीद ने उठ कर खिड़की के पट खोले । मगर यह खिड़की एक दुसरे कमरे में खुली। उस कमरे में उसे वही लड़की बैठी हुई दिखाई पड़ी जिसको उसने फ्लैट में रिवाल्वर निकालते देखा था । 

“हेलो केप्टन !” उसने मीठे स्वर में कहा –” मुझे आशा थी कि तुम जागते ही मुझे इस बात की सूचना दोगे कि तुम जाग गये हो । ”

“ लाओ ! मेरे सौ रुपये निकालो। ”हमीद ने चहक कर कहा । 

“ सौ रुपये .....छि छि छि –” उसने नाक सिकोड़ कर कहा –” यह कैसी छोटी बातें कर रहे हो । मैं तुम्हें एक लाख तक दे सकती हूँ। ”

फिर वह खिड़की की राह से हमीद वाले कमरे में आ गई । 

“ तुमने डपोरशंख की कहानी सुनी है ?” हमीद ने कहा । 

“ नहीं –” लड़की ने मुस्कुरा कर कहा –” सुनाओ!”

“ एक पंडित था, जिसके पास एक आदमी आया और कहने लगा किअगर यह मुर्गी मुझे दे दो तो मैं तुम्हें ऐसा तुहफा दूंगा कि जिससे अगर एक मांगोगे तो दो देगा । पंडितजी हर्षित हो गये। उन्होंने उस आदमी को मुर्गी दे दी । उस आदमी ने पंडितजी को एक शंख दिया । जब वह आदमी चला गया तो पंडितजी ने शंख से कहा---

“लाओ भाई ! एक रूपया दो । ”

शंख ने कहा –” दो लो । ”

पंडितजी ने कहा –”लाओ दो ही दो । ”

शंख से आवाज आयी –”दो क्या चार लो। ”

पंडित ने झल्ला कर कहा ---”लाओ चार ही दो । ”

शंख ने कहा –”चार क्या आठ लो ?”

अचानक हमीद रुक गया । 

“फिर क्या हुआ ?” लड़की ने हंस कर पूछा । 

“दो बच्चे ----” हमीद दांत निकाल कर बोला –”मगर तुमने यह नहीं पूछा कि वह आदमी कौन था जिसने पंडित को शंख दिया था ?”

“एः कौन था ?” लड़की ने पूछा । 

“बीमा कम्पनी का एक एजेंट ---” हमीद ने कहा –”अब चुपके से सौ रुपये दे दो ताकि मैं अपने घर जाऊं वर्ना फादर मारते मारते खाल गिरा देगा । 

“चले जाओ । ” लड़की ने हंस कर कहा”क्या मैंने तुम्हें रोका है ?”

हमीद ने उसकी ओर देखा और बोला । 

“तो क्या तुम मेरे सौ रुपये नहीं दोगी ?”

लड़की के चेहरे पर भोलापन तो था मगर आंखों में शरारत नाच रही थी । उसने इन्कार में सर हिला दिया । 

हमीद आगे बढ़ा और दरवाजे के पास पहुंच कर हैन्डिल घुमाया । मगर दरवाजा खुला नहीं । उसने लड़की की ओर मुड़ कर कहा । 

“आह प्यारी मर्जीना ! जल्दी से खुल जा समसम....कह....दो..ताकि मैं अली बाबा हा जाऊं, वर्ना चालीस चोर मिल कर मेरा भर्ता बना देंगे । ”

“तुम अब दिन का उजाला न देख सकोगे । ” लड़की ने कहा । 

“तो क्या तुम जीवन भर मुझे यहीं रखोगी ?”

“हां, मुझे तुमसे प्रेम हो गया है और मैंने यह निश्चय कर लिया है कि तुम्हारे साथ विवाह कर लूंगी । ”

“अरे बाप रे !” हमीद कानों पर हाथ रख कर उछला”कदाचित तुमको यह नहीं मालूम है कि मेरे खानदान में सात पुश्तों से हर आदमी कुंवारा रहता चला आ रहा है । ”

अचानक लड़की की मुख मुद्रा बदल गई । उसने रूखे स्वर में कहा । 

“शायद तुम्हें अपना परिणाम मालूम नहीं है । वर्ना तुम इस प्रकार चहक कर बातें न करते । तुम कल सबेरे क़त्ल कर दिये जाओगे । ”

“देखो ! जरा धीरे धीरे गला काटना, ताकि मैं उस समय गा सकूं..गला काट लो गुलबदन धीरे धीरे !”

“एक शर्त पर तुम्हें छोड़ा जा सकता है । ” लड़की ने हमीद की बातों को अनसुनी करके कहा । 

“बीमा तो नहीं कराना होगा न ?” हमीद ने पूछा । 

“तुम केवल यह बता दो कि तुम उस फ़्लैट के नीचे क्यों आकर खड़े हो गये थे ?”

“हाय ! बस यही मत पूछो । ” हमीद ने सीने पर हाथ मार कर कहा”यह मोहनी सूरत दिखाई दी और मेरा दिल इश्क में हिलोरे खाने लगा । ”

लड़की एक क्षण के लिये मौन हो गई और हमीद यह सोचने लगा कि लड़की के इस प्रश्न का क्या मतलब हो सकता है । क्योंकि यह तो केवल उन दोनों लड़कियों को ही देख कर रुक गया था । मगर अब उसे यह प्रकट करना ही था कि वह किसी काम से ही वहां खड़ा हो गया था । 

वह दरवाजे के पास से पलट कर फिर लड़की के पास आ गया और बोला । 

“तुम लोग कौन हो और क्या चाहते हो ?”

“यही प्रश्न मैं तुमसे भी कर सकती हूँ । ”

“मेरा नाम हमीद है । बाप का नाम मजीद औए दादा का नाम सईद और पर दादा का नाम रशीद, नगड़ दादा का वहीद....गुप्तचर विभाग में आने से पहले नमकीन पकौड़े बेचा करता था । अब तुम अपना नाम और काम बताओ ?”

“क्या तुम्हें विश्वास है कि मैं अपना सही नाम बताउंगी ?”

“केवल इसीलिये ना कि तुम्हें भय है कि अगर मैं बच गया तो तुम जेल में पहुंच जाओगी...अर्थात मुझसे डर रही हो और इसका यह मतलब हुआ कि मैं बच भी सकता हूँ मगर ठहरो.....क्या तुम मेरे लिये सलाई की व्यस्था कर सकती हो । मैंने बड़ी देर से पाइप नहीं पिया है । ”

लड़की ने लाइटर उठा कर हमीद की ओर बढाया । लाइटर हाथ में लेते ही हमीद के नेत्रों में चमक पैदा हो गई और प्रथम इसके कि लड़की कुछ सोच सके उसने अपने हाथों को झटक दिया । लड़की उसकी ओर झुकती चली गई और प्रथम इसके कि वह चीख सके हमीद का एक हाथ उसके मुँह पर पड़ा और दुसरे हाथ से उस लड़की के दोनों हाथ पकड़ लिये । 

“हाँ डार्लिंग !” हमीद ने कहा”वह कहानी अब इस प्रकार आरंभ होती है कि अब मैं तुम्हारे मुँह में कपड़ा ठूंस दूँगा और इसके बाद इसी लाइटर से तुम्हारा चेहरा जला दूँगा....क्या समझी ! तुमने आदम खोरों का नाम सुना होगा । मगर मैं औरत खोर हूँ । ”

लड़की अपने को छुड़ाने के लिये कसकसा रही थी मगर ऐसा लग रहा था जैसे वह बिलकुल विवश हो गई हो । 

अचानक दरवाज़ा खुला और एक दूसरी लड़की कमरे में दाखिल हुई फिर जो कुछ हुआ उसे एक अनहोनी ही कहा जा सकता था । 

हमीद उसका हाथ छोड़ कर खड़ा हो गया था और वह उस आने वाली लड़की तथा उसके साथी को ध्यान पूर्वक देखने लगा था जो लड़की के बाद कमरे में आ गया था । 

आने वाली लड़की का रंग सुनहरा था । बाल भी सुनहरे थे । शरीर पर जो वस्त्र था वह भी सुनहरा था । उसे देख कर केवल सुनहरी लड़की ही कहा जा सकता था । 

मगर हमीद को उस लड़की पर आश्चर्य नहीं था । उसे उसके साथी को देख कर आश्चर्य हुआ था । पैंतीस वर्ष का एक सुंदर युवक स्वास्थ्य अत्यंत अच्छा । चेहरे पर ऐश्वर्य मगर उस्क्व पाँव...मालूम होता था कि एक एक फीट की दो सूखी लकड़ियाँ उसके शरीर में जोड़ दी गयी हों । 

“लिली ! क्या यह तुम्हें छेड़ रहा था ?” उस आदमी ने लड़की से पूछा । 

लिली ने इन्कार मं सर हिला दिया । वह कुछ भयभीत मालूम होने लगी थी। वह आदमी सुनहरी लड़की कि ओर मुडा और कहने लगा ----

“तुम अकारण ही डर गई थी । शशि !”

“ओह ! तुम नहीं जानते नारेन कि यह आदमी कितना खतरनाक है। कर्नल विनोद के अतिरिक्त आज तक कोई इसे वश में नहीं कर सका –” सुनहरी लड़की ने कहा जिसका नाम शशि था । 

हमीद के भावों से ऐसा पता चलता था जैसे उसने यह बातें सुनी ही न हो । उसकी आंखें नारेन की दोनों सूखी टांगो पर जमी हुई थीं जो प्रकृति की एक अनोखा कृति थी । 

“केप्टन!” नारेन ने बड़े स्वर में कहा –”मेरी ओर क्या देख रहे हो ?”

“कुछ नहीं –” हमीद ने कहा ---”वास्तव में मैं यह सोच रहा था कि लड़कियां क्यों महेंगी हो गई है । ”

“तुम मेरी टांगों पर व्यंग कर रहे हो !” नारेनविषैली हंसी हंसा”समय आने पर तुम्हें मालूम हो जाएगा । ”

हमीद ने सोचा कि बात बढ़ाने से कोई लाभ नहीं, इसलिये गंभीरता के साथ बोला ---

“मुझे यहाँ क्यों रखा गया है ?”

“सुनो !” नारेनने कहा”पहला कारण तो यह है कि हम कर्नल को सीखादेना चाहते हैं कि वह इस मामिले कि ओर से ध्यान हटा ले । हमने इसीलिये रमेश पर हमला किया और तुम उसकी दशा देख चुके हो । तुम्हें यहाँ लाने का भी यही अर्थ है । ”

“और अगर मैं कर्नल साहब के साथ चला गया होता तो तुम किस प्रकार मुझे हरण करते !”

“बच्चों की सी बातें न करो—” नारेन ने कहा –कर्नल तुम्हें जान-बुझ कर छोड़ गया था

“तो तुम मुझे यहाँ कैद रखोगे ?”

“हां!”

“मगर लिली तो कह रही थी कि कल मुझे क़त्ल कर दिया जायेगा !”

“तुम्हारा मामिला कल पाँच बड़ों के सामने रखा जायेगा। हो सकता है कि कल तुम्हें क़त्ल ही कर दिया जाये। वैसे तुम्हारी बचत का बस एक ही मार्ग है । ”

“वह क्या ?”

“बस इतना बता दो कि इस प्रकार हमारे उस ठिकाने का पता चल गया था और वह हमारे बारे में क्या जानता है ?”

“सुनो दोस्तों !” हमीद मुस्कुरा कर बोला –”तुम हमारा मुख किसी भी प्रकार नहीं खुलवा सकते। ”

उसने बिलकुल ही अचानक तोर पर नारेन के ऊपर छलांग लगाईं मगर दुसरे ही क्षण उसकी आंखों के सामने तारे नाच गये। नारेन की सूखी टांग इतनी तेजी से चली थी जैसे उस में करेंट रहा हो और बस स्विच दबा दिया हो। उसका झटका भी इलेक्ट्रिक शोक से कम नहीं था। 

हमीद अथाह अंधकार सागर में डूबता चला गया। 

और फिर जब उसकी आंखें खुलीं तो उसे इस बात का भी अनुमान न हो सका कि वह कितनी देर तक बेहोश रहा था । उन लोगों ने उसके हाथ से घडी भी उतार ली थी। 

उसने चोंक कर आंखें फाडी और चारों ओर देखने लगा। 

शरीर हलके हलके हिलकोरे ले रहा था। ऐसा लगता था जैसे वह किसी लांच में हो। इस एहसास का कारण कदाचित यह मन्द सा शोर था जो पानी चीरने के कारण पैदा हो रहा था। उसने अपने हाथों की ओर ध्यान पूर्वक देखा। वह स्वतंत्र थे । वह फोल्डिंग बेड पर पड़ा हुआ था। 

अचानक उसके कानों से हिंदुस्तानी संगीत की कोमल लहरें टकराई। कोई मांझी अत्यंत करूँ स्वर में दर्द भरा गीत गा रहा था। 

गीत किसी ऐसे प्रेमी की दशा को प्रकट करता था जिसकी प्रेयसी ने नदी के उस पार मिलने का वादा किया था और समय था चन्द्रमा निकलने के बाद और अब प्रेमी इस बात की शिकायत कर रहा था कि चाँद निकल चुका है। रात ढल रही है। नदी की लहरें एक दुसरे से गले मिल रही है और आंख मिचोली खेलने वाले तारे इन लहरों की गोद में समां कर उन्हें प्रज्वलित कर रहें है –मगर तुम अभी तक नहीं आई मेरी प्रियतम।