विशाल छाया - 9 in Hindi Social Stories by Ibne Safi books and stories Free | विशाल छाया - 9

विशाल छाया - 9

(9)

“कौवा नहीं, वह एक औरत थी । ” हमीद ने कहा । 

“यहां से निकलने का मार्ग जानते हो ?” अचानक शशि पूछ बैठी । 

“मैं आदमी की औलाद हूँ और केवल जन्नत से निकलने का मार्ग जानता हूँ पता नहीं तुम जन्नत का अर्थ समझती हो या नहीं ?”

“जन्नत स्वर्ग को कहते है । ” शशि जल्दी से बोली । 

“हो सकता है की तुम्हारा कहना ठीक हो । ” हमीद ने कहा”मगर मेरी भाषा में औरत की गोद को जन्नत कहते है । ”

“यह मिर्चे क्यों जला रहे हो ?” शशि हँस कर बोली । 

“तुम क्यों जाल रही हो ?” हमीद ने जाल कर कहा”देखा न जाता हो तो तुम पत्थर चबाना आरंभ कर दो ! देखो ना ! कितने सुडौल टुकड़े पड़े हुये है । ”

“मैं इस जंगल का मार्ग जानती हूँ । ” शशि ने फिर बात बदली । 

“जानती होगी । ” हमीद ने लापरवाही से कहा”मगर मैं अकेला ही जाना चाहता हूँ । ”

“इतना साहस है ?” शशि ने व्यंग किया । 

“तुम्हारा स्टीमर कब वापस आयेगा ?” हमीद ने उसकी बात उड़ाकर पूछा । 

“एक महीने बाद । ”

“वह क्यों ?”

“हमारा स्टीमर सोना लेने गया है, राजेक एक बहुत बड़ा स्वतंत्र इलाका है, वहीँ से सोना ख़रीद कर लाया जायेगा और इसी मार्ग से तुम्हारे देश जायेगा । ”

“क्या तुम लोग स्मगलर हो, क्या ?”

“यही समझ लो । ” शशि मुस्कुरा कर बोली”मगर मेरा संबंध इसी शाखा से है । ”

“तो क्या और भी शाखायें है ?”

“हां, मगर मैं नहीं जानती । ”

“अच्छा, टाटा । ” हमीद ने कहा और पहाड़ी पर चढ़ने लगा । जैसे उसे विश्वास था कि शशि उसका पीछा नहीं छोड़ेगी और यह बात भी सत्य ही, क्योंकि शशि भी उसके पीछे पीछे आ रही थी । 

वह दोनों ऊपर चढ़ते गये और फिर तेज धारों वाली नदी जल की एक रेखा के समान दिखाई देने लगी । 

“शायद तुम थक गये हो ?” शशि ने पूछा । 

“नहीं तो । ” हमीद झट से बोला । 

“मगर भूख तो अवश्य लगी होगी ?”

“हां, और अब मैं तुम्हें भूनकर खाऊंगा । ” हमीद किचकिचा कर बोला । 

“तो क्या तुम आदमखोर हो ?” उसने खिल्ली उड़ाते हुए पूछा । 

“नहीं, मैं औरत खोर हूं । ”

“इन वृक्षों को देख रहे हो ? इनके फल तो मीठे होते ही हैं, इनकी पत्तियां भी कम स्वादिष्ट नहीं होतीं । इन्हें लोग खाते हैं । ”

हमीद उन वृक्षों की ओर देखने लगा, उनमें बेल के समान गोल गोल और बड़े बड़े फल लगे हुए थे । उनकी पत्तियां चाय की पत्तियों के समान थीं । 

“फेंकोन पत्थर ?” शशि ने तुनुक कर कहा । 

“अच्छा मेरी लैला, मगर फिर यह न कहना कि कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को । ”

शशि झेंप कर दूसरी ओर देखने लगी । 

हमीद ने पत्थर का एक गोल सा टुकड़ा उठाकर निशाना लगाया । दो फल गिरे । शशि ने दोनों फल उठा लिये और एक को तोड़ती हुई बोली । 

“इसका गूंदा बहुत ही मीठा और स्वादिष्ट होता है, लो तुम भी चखो । ”

यह सच था कि हमीद को बहुत तेज भूख लगी हुई थी, इसलिये उसने दूसरा फल शशि के हाथ से ले लिया और उसे तोड़कर खाने लगा । शशि की बात ठीक ही निकली । फल सचमुच बहु मीठा और स्वादिष्ट था । 

“तुम इधर से कितनी बार आ जा चुकी हो ?”

“तीन बार । ” शशि ने उत्तर दिया । 

“तुम्हें कौन सा काम सौंपा गया था ?”

“तुमसे प्यार करना । ” शशि ने कहा –”मौत सामने खड़ी मुस्कुरा रही है और तुम हो कि अपनी ही रागिनी छेड़े हुए हो !”

“मौत ?” हमीद ने चौंक कर सर उठाया, फिर मुस्कुरा कर बोला”ओह तो तुम्हारा नाम मौत है, क्यों ?”

“जी नहीं... इस इलाके का नाम मौत है । ”

“मतलब ?”

“मतलब यह है कि यह आजाद कबायली इलाका है । यहां के रहने वाले किसी हथियार से वध करने के बजाय टाँगे चीर कर फेंक दिया करते हैं । ”

“अरे ! तब तो बड़ा मजा आयेगा । ” हमीद ने मुंह चलाते हुए कहा”वैसे इस फल का क्या नाम है ?”

“इसे गोलचा कहते हैं । यहां के निवासी इसे बड़े चाव से खाते हैं । ”

“स्टीमर पर तुम्हारे साथियों ने मेरी या तुम्हारी खोज न की होगी ?” हमीद ने पूछा”होना तो यह चाहिये था कि वह स्टीमर मोड़ कर हमें तलाश करते । ”

“शायद ही उनमें से किसी को हमारे गिरने का पता चला हो । ” शशि ने कहा”हो सकता है कि तुम इसे झूठ समझो । मगर यह सत्य है कि उसमें से दो जो उपरी खंड पर बैठे थे ऊँचा सुनते हैं । नदी में हर समय धमाके होते ही रहते हैं और उस पर से स्टीमर का शोर, उनको यह संदेह भी न होने पाया कि तुम नदी में कूद भी सकते हो । ”

“मगर तुमने चीखकर अपनी सहायता के लिये उन्हें क्यों नहीं बुलाया ?”

“चीख तो रही थी, मगर उन्होंने मेरी आवाज सुनी न होगी । ”

हमीद ने फल उठाकर फेंक दिया और पेट पर हाथ फेरता हुआ बोला –”आओ चलें, हाथ धो आयें । पानी भी पी लें तो अच्छा है । ”

शशि ने कोई उत्तर नहीं दिया । 

दोनों उतर कर फिर नदी तट पर आये । 

हमीद ने चुल्लू से पानी पिया और शशि की ओर पानी उछलता हुआ बोला ---

“बड़ा ठंडा और मीठा पानी है, अगर इसी में तुम्हारी समाधि बन जाये तो कितना अच्छा हो। ”

“तुम मुझे बार बार मौत की धमकी क्यों दे रहे हो?”

“इसलिये कि तुम मेरी प्रेयसी हो न, मैं छाहता हूं की तुम भी मर कर देखो। हाय हाय हम एक बार एक लड़की पर मर गये थे मगर जानती हो क्या हुआ उसने हमें प्यार से अंकिल कहना आरंभ कर दिया था?”

“तुम बहुत सुवर हो” शशि झल्ला कर बोली। 

“बड़ा सुवर तो मेरी खोज में फ़िल्मी हीरों के समान जंगलों में भटकता फिर रहा होगा” हमीद ने कहा। ”वैसे लिली कहां होगी?”

“वह नारेन के पास है !”

“तुम लोगों ने पहली बार मुझे कहाँ कैद किया था?”

“उस समय भी तुम दुसरे ही देश में थे। फ्लैट में बेहोश कर दिये गये थे। उसके बाद तुम दो दिन में होश में आये थे और उसके चार दिन बाद स्टीमर पर तुम्हारी चेतना लौटी थी। ”

“और अब यदि बेहोश हुआ तो शायद जीवन भर होश न आयेगा। ”

“तुम इसी प्रकार बकवास ही करते रहोगे या कुछ सोचोगे भी?”

स”मैं अब कुछ भी नहीं सोचना चाहता “ हमीद ने कहा “अभी मुझे एक लंगूर दिखाई दिया था। वह अंगूर खा रहा था। मैंने साहब सलामत के बाद उससे पूछा कि वह यहाँ क्या कर रहा है तो वह दांत निकल कर कहने लगे कि बेटा! तुम्हारे बाप दादा भी पहले जंगलों में ही रहा करते थे, इसलिये तुम भी अब यहीं रहो”

शशि ने चकित द्रष्टि से हमीद की ओर देखा और फिर नदी के जल से खेलने लगी। 

“अब तुम यहाँ से भाग जाओ “ हमीद ने कहा” मैं तुमको ओने साथ नहीं रखूंगा। ”

शशि ने कोई उत्तर नहीं दिया, वह उसी प्रकार खेलती रही। 

हमीद नदी के किनारे किनारे पश्चिम की ओर बढ़ने लगा। एक बड़ी चट्टानों की आड़ में पहुंच कर उसने अपने गिले कपडे उतारे और उन्हें सूखने के लिये पत्थरों पर डाल दिया। 

फिर वह एक साफ़ चट्टान पर बैठ गया। अब उसे अपना पाउच याद आ रहा था जो नदी में गिरने के कारण चोपट हो गया था। 

तम्बाकू के साथ साथ चाय या काफ़ी की इच्छा बढ़ती जा रही थी। उसने दो चार लम्बी जम्हायाँ ली और फिर कंठ से कुछ विचित्र प्रकार की आवाजे निकालता हुआ चट्टान पर सर के बल खड़ा होने की कोशिश करने लगा! इसी कारण से घुटनों में खरोंच आ गई उसने हलकी सी सिसकारी भरी और फिर बैठ कर घुटनों को सहलाने लगा। 

फिर कपडे सूख गये। उसने पतलून उठाई और उसे घूंसा दिखलाते हुए पहनने लगा फिर कोट कंधे पर डाला और एक ओर बढ़ाना ही चाहता था कि मधुए आवाज कण से टकराई। 

“मैं आ सकती हूं ?”

“आग ..कभी नहीं “ हमीद ने जनाने स्वर में कहा। 

दूसरी ओर शशि के हंसने की आवाज सुनाई दी और फिर वह उसके सामने आ गई । 

“हाय अल्ला ! मैं तो शर्मा गई” हमीद दांतों में उंगली दबा कर बल खा गया। 

शशि ठहाका मार कर हंस पड़ी। उसके चेहरे पर थकावट के चिन्ह बिलकुल नहीं थे बल्कि रोनक आ गई थी। 

“हंसती हो ?” हमीद गला फाड़ कर चीखा”शर्म नहीं आती । ”

“अच्छा अब चलो” शशि ने बड़े प्यार से उसकी भुजा पर हाथ रख कर कहा। 

“अरे बाप “ हमीद उछल कर दूर हट गया और बोला”देखो जाने मन ! अब मुझे कभी न छूना । ”

“क्यों ?”

“इसलिए कि जब और मुझे छूती है तो मुझे ज़ुकाम हो जाता है और फिर फिर जो देखता है वह यही कहता है कि –पहले लड़की को ज़ुकाम हुआ करता था, मगर अब हमीद को भी होने लगा। ”

“तुम बड़े मजेदार आदमी हो” शशि ने कहा। 

“तुम मुझे खा तो नहीं जाओगी!” हमीद ने बौखलाने की एक्टिंग करते हुए पूछा। 

और फिर उसने इस प्रकार दांत निकाले कि शशि झिझिक कर पीछे हट गई। 

“मगर नहीं “हमीद बोला “तुम मुझे नहीं खा सकतीं, क्यूंकि तुम्हारे दांत बहुत कमजोर मालुम होते है। मसूड़ों से पानी आता है। दांतों में पिला पण है, शायद पायरिया भी है। मेरी मनो टी कुल्लू छाप मंजन प्रयोग करो। लाभ न होने पर डाक द्वारा मूल्य वापस कर दिया जायेगा। ”

“तुम बहुत बातूनी हो” शशि ने हमीद को ढकेलते हुए कहा। 

“तुम आगे चलो “ हमीद ने कहा। 

कभी कभी पहाड़ियों से टकराने वाली धुप, गर्म हवाओं के झोंके लेकर आती, मगर ठंडी नमी इस गर्मी को जल्द ही दूर कर देती थी। मौसम अच्छा था इसलिये थकावट का अधिक एहसास नहीं हो रहा था। 

“मुझे फ्लैट से क्यों ले जाया गया था?” हमीद ने पूछा। 

“तुमने हमारा मैक्रो केमरा देख लिया था और हम लोगों को यह भी संदेह हो गया था कि तुम हमारे ठिकाने को जान गये हो,बस यही कारण था। ”

“नारेन ने मुझे क़त्ल क्यों नहीं किया?”

“वह तुमसे कोई खास काम लेना चाहता था। ”

“मगर तुम मुझे नहीं बताना चाहती कि वह खास काम क्या था?”

“मैं तुम्हें बताउंगी “ शशि ने कहा “मैं दूसरी बातें भी तुमको बता दूँगी। ”

“वह किस खुशी में?” हमीद ने व्यंग किया । 

“यह तुम अपने दिल से पूछो”

“अरे बाप रे फिर वही दिल वाली बात” हमीद अपने मुंह पर थप्पड़ मार कर बोला”मेरे पास दिल नहीं है बल्कि दिल्ली है ....क्या समझीं!”

शशि मूर्खों के समान उसकी ओर देखने लगी। 

“समाज सको तो इस वाक्य का अर्थ समाज लो “ हमीद ने कहा”मैं अपने समय का सबसे बड़ा दार्शहिक हूं। ”

“तुम मुर्ख हो “ शशि ने कहा। 

“हो सकता है और शायद इसलिए हो सकता है कि मैं किसी लड़की से प्रेम नहीं करता” हमीद ने कहा “लेकिन क्या यह नहीं बताओगी कि नारेन मुझे स्टीम दारा क्यों भेज रहा था?”

“और किसी भी मार्ग से यदि वह तुम्हें भेजता तो पासपोर्ट और परमिट की समस्या बीच में आ जाती और बड़ी कठिनाइयाँ उठानी पड़तीं। और इस मार्ग में इस प्रकार की कठिनाइयों का मामला नहीं था, हालांकि यह भी गैर कानूनी है। ”

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