विशाल छाया - 12 in Hindi Social Stories by Ibne Safi books and stories Free | विशाल छाया - 12

विशाल छाया - 12

(12)

रोबी झल्ला कर ड्राइवर की ओर इस प्रकार झपटी जैसे सचमुच उसे नोच्दालेगी, मगर ड्राइवर का उलटा हाथ उसके मुंह पर पड़ा और उसने चीख कर दोनों हाथों से अपना सर थाम लिया। 

“आज का दिन तुम्हारे लिये बहुत ही खराब है “ ड्राइवर ने कहा “थोड़ी देर पहले तुम सरला से टकरा गई जिसमें तुम्हेंचोत खानी पड़ी और इस समय मेरा थप्पड़ खाना पड़ा, इसका मुझे हार्दिक दुख है। अगर तुम्हें अधिक चोट लगी हो तो मैं माफ़ी चाहता हूं। ”

रोबी मौन रही। 

“शधिक दुख करने की कोई बात नहीं है । ” ड्राइवर ने कहा”नारेन तुम्हें अवश्य छुड़ाने जायेगा, क्योंकि इस नगर में तुम्हीं उसकी प्रधान सहायक हो । क्या मैं गलत कह रहा हूँ ?”

रोबी फिर कुछ नहीं बोली । 

“मैं तुम्हें एक शर्त पर छोड़ सकता हूँ और वह शर्त यह है कि तुम मुझे लिली का पता बता दो । ”

रोबी इस प्रकार उछल पड़ी जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो । 

“तुमने मेरी जानकारी की प्रशंसा नहीं की ?” ड्राइवर ने कहा”इस नगर में मेरे अतिरिक्त नारेन के बारे में इतनी सारी बातें और किसी को मालूम नहीं, मैं यह जानता हूँ कि नारेन और तुम्हारे अतिरिक्त लिली के बारे में और कोई नहीं जानता । ”

“तुम लिली से क्यों मिलना चाहते हो ?” रोबी ने पूछा । 

“वह मेरे एक मित्र की प्रेमिका है । अगर मेरे मित्र को लिली न मिल सकी तो वह मर जायेगा । ”

रोबी कुछ कहने वाली थी कि ड्राइवर कार को एक कोठी के कम्पौंड में लेता चला गया । कार जैसे ही अंदर गई रखवाली करने वाले कुत्ते भूँकने लगे । ड्राइवर ने कराठ से एक मंद सी आवाज निकाली । कुत्ते चुप हो गये । ड्राइवर ने कार रोक दी और नीचे उतर के बोला”मिस रोबी ! उतर जाइये । ”

रोबी उतर गई । उसकी सारी तेजी ख़त्म हो गई थी । ऐसा लगता था जैसे वह बिलकुल ही विवश हो गई हो । 

रखवाली करने वाले कुत्ते ड्राइवर के आस पास उछलने लगे थे । ऐसा लगता था कि वह पंजो के बल खड़े होकर उससे लिपट जाना चाहते थे । 

ड्राइवर आगे बढ़ता रहा, मगर मिस रोबी कार के पास ही खड़ी रही । 

शायद वह सोच रही थी कि जल्दी से कार में बैठ कर निकल भागे । 

अचानक ड्राइवर मुडा । उसने रोबी का चेहरा देखते ही ताड़ लिया कि वह क्या सोच रही है, इसलिये उसने कड़क कर कहा”मालूम होता है, थप्पड़ की चोट भूल गई हो । चलो, आगे बढ़ो वर्ना इस बार हाथ उठा तो चेहरे की सुन्दरता हमेशा के लिये ख़त्म हो जायेगी । ”

रोबी कुछ नहीं बोली । वह चुपचाप ड्राइवर की ओर बढ़ी । ड्राइवर उसे लिये हुये एक कमरे में आया । कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया और फिर कमरे के अंदर रोशनी फैल गई । 

ड्राइवर ने अपनी टोपी उतारी और अपने चेहरे पर हाथ फेरता हुआ रोबी की मुडा । 

रोबी चीख कर दो क़दम पीछे हट गई, फिर हकला कर बोली”यह....तत....तुम हो.....कर्नल....विनोद !”

“हां में विनोद ही हूँ । ” विनोद ने कहा”अब आराम के बैठ जाओ । ”

रोबी हिचकिचाती हुई सोफे पर बैठ गई । विनोद उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया और कहने लगा”मिस रोबी ! मेरी नजर उस समय से तुम्हारे ऊपर है जब से तुमने हारिस के साथ पेंगें बढ़ानी आरंभ कीं थी । शायद तुमको यह बात नहीं मालूम थी कि हारिस भी मेरा ही आदमी था जो फेरियो में ज्वाइंट डायरेक्टर की हैसियत से काम कर रहा था । ”

रोबी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया । विनोद कहता रहा”तुम्हारे साथ ही साथ लिली भी निगाहों में आ गई थी । लिली को ठीक करने के लिये मैंने हमीद को चुना और तुम्हारे लिये मुझे ख़ुद दौड़ धुप करनी पड़ी । उस रात जब तुम फेरियो से निकल कर नारेन की प्रतीक्षा कर रही थी, मैं तुम से अधिक दूर नहीं था । नारेन तुम्हें हीरे की एक अंगूठी पहना कर अपनी मंगेतर बनाने जा रहा था । मैंने धोखा देकर तुम्हें उड़ा लिया । नारेन को जवान और स्वस्थ लड़कियों की आवश्यकता रहती है, इसलिये मैं सरला और रेखा को भी अपने साथ लेता गया था । वास्तव में मैं यह भी चाहता था कि तुम्हारा या नारेन का ध्यान मेरी ओर न जा सके और यही हुआ । फिर मैंने तुम तीनों को एक जगह बंद कर दिया और जान बूझ कर नारेन को उस जगह तक पहुंचने का अवसर दिया जहां मैंने तुम तीनों को बंद कर रखा था । हुआ भी यहीं । नारेन को उस स्थान का पता चल गया और उसने अपने तीन आदमियों को तुम लोगों को निकाल जाने के लिये भेजा । नारेन ने इस्सके लिये दो कारों की व्यवस्था की थी । एक कार ट्रेनिंग सेन्टर से आई थी, जिस पर वह तीनों आये थे । उन्हें आदेश था कि वह सरला और रखा को लेकर ट्रेनिंग सेन्टर वापस चले जायें । दूसरी कार नगर से आने वाली थी जो तुम्हें ले जाती । इसकी सूचना तुम को दे दी गई थी । शहर से जो कार आने वाली थी उसका ड्राइवर मैं था । मैंने अपनी गाड़ी कुछ दूर पर ही खड़ी कर दी थी और उस स्थान तक पेदल गया था जहां तुम तीनों कैद थीं । वहां मुझे नारेन के उन तीनों आदमियों से लड़ना पड़ा और फिर मैं जान बूझ कर भाग निकला और उस गाड़ी तक आया, जिसे मैं नगर से लेकर आया था, और फिर जो कुछ भी हुआ वह तुम जानती ही हो । ”

“तुम मेरे विरुद्ध अदालत में कुछ साबित न कर सकोगे—आया’ रोबी ने साहस बटोर कर कहा। 

“तुम्हें अदालत में नहीं ले जाऊँगा मिस रोबी—” विनोद ने हंस कर कहा। 

“तुम पर मान हानि का दावा करूंगी। ”

“और गवाही में उन सेंकडों लड़कियों को पेश करना जो तुम्हारे कारण चकलों में अपना जीवन व्यतीत कर रही है—” विनोद ने कठोर स्वर में कहा। 

रोबी ने अपना मुंह बंद कर लिया। 

“सुनो रोबी! तुम्हारा परिणाम क्या होगा, यह मैं नहीं जनता, मगर इस समय तुम्हें मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर देना ही पड़ेगा। पहला प्रश्न यह है कि लिली कहां है?”

“मैं नहीं जानती” रोबी ने कहा। 

“नारेन का वास्तविक नाम क्या है, अर्थात उसे लोग किस नाम स्व जानते है। 

“मैं नहीं जानती!”

“परछाईयों के दिखाने का तात्पर्य क्या है?। 

“मैं नहीं जानती!”

“तुम जानती नहीं हो या बताना नहीं चाहती?”

“हां, मैं बताना नहीं छाहती...मैं कुछ नहीं बताउंगी। तुम मुझसे कुछ नहीं मालूम कर सकते—” रोबी चीखने लगी। 

विनोद उठ कर रोबी के सामने खडा हो गया और उसकी आंखों में आंखें डालता हुआ बोला—

“तुमको बताना होगा। ”

रोबी ने महसूस किया कि वह विनोद के नेत्रों से नेत्र नहीं मिला सकती, और फिर उसकी निगाहें झुकती चली गईं । हाथ पाँव में विचित्र प्रकार की सनसनाहट दौड़ने लगी। 

“तुम्हें सब कुछ बताना पड़ेगा रोबी। अभी और इसी समय--|” विनोद ने विषैले स्वर में कहा—”तुम ऐसी लड़की नहीं हो, जिस पर दया की जा सके। ”

रोबी ने जैसे होंठ सी रखे थे। वह सर झुकाए बैठी रही। 

“अगर तुम यह सोच रही हो कि तुम किसी प्रकार बच निकलोगी तो यह तुम्हारी भूल है। तुम बुरी तरह फंस चुकी हो। तुम्हारे स्थापित किये हुए ट्रेनिंग सेंटर पर रमेश पहुंच गया होगा। बस इसी से अनुमान लगा लो कितुम किस स्थिति में हो। ”

“रमेश!” रोबी चोंक कर बोली। 

“हां, मुझे नारेन ने चेलेंज किया था कि मैं उसे पराजित करूँ। मैंने उसका चेलेंज स्वीकार कर लिया था और इसी कारण मुझे रमेश को पागल बनना पड़ा। नारेन समझता है कि रमेश को उसने पागल बनाया है, मगर वह मूर्ख यह नहीं जानता कि रमेश जैसे आदमी को पागल बनानाउस जैसे तुच्छ आदमी के वश की बात नहीं है। रमेश को मैंने पागल बनाया था, सचमुच का पागल नहीं, बल्कि नक्ली पागल, और वही रमेश बाद में तुम लोगों की टोली में शामिल हो गया। और वह भी इस प्रकार कि नारेन भी उसे नहीं पहचान सका- और मुझे आशा है कि रेखा और सरला के साथ ही साथ रमेश भी अब तक तुम्हारे ट्रेनिंग सेंटर पहुंच गया होगा। ”

रोबी मौन रही। विनोद ने कड़े स्वर में कहा—

“मैं घडी देख रहा हूं। मेरे पास केवल एक मिनट है। अगर इस एक मिनट में तुमने मुख न खोला तो फिर जो कुछ भी होगा उसका उत्तरदायित्व तुम पर होगा। ”

फिर कमरे में सन्नाटा फैल गया, केवल दिवार घडी की टिक टिक सुनाई देती रही। विनोद कमरे में टहलता रहा और रोबी सर झुकाए बैठी रही। 

एक मिनट बीत गया। विनोद बड़ी तेजी से कमरे से निकल गया। रोबी भी उसके पीछे झपटी, मगर द्वार बंद हो चुका था। रोबी दोनों हाथों से दरवाजा पीटने लगी। 

“बेकार है मिस रोबी!” बाहर से विनोद की आवाज सुनाई पड़ी—”यह दरवाजा ऐसा नहीं है जिसे दुसरे लोग खोल या बंद कर सके। ”

रोबी निराश हो कर फिर सोफे पर आकर बैठ गई। 

लगभग पाँच मिनट बाद कमरे का द्वार फिर खुला। रोबी ने गर्दन घुमाई। 

विनोद कमरे में प्रविष्ट हो रहा था, मगर अब उसके हाथ में एक थैला था। रोबी की आंखें जैसे ही उससे मिली वैसे ही उसने थैला फर्श पर उलट दिया। बहुत से छोटे छोटे सांप रेंगते हुए रोबी की ओर बढ़े। 

रोबी चीख कर सोफे पर खाड़ी हो गई। 

“मेरा काम समाप्त हो गया—” विनोद ने अट्टहास लगाते हुये कहा—”जब क्लिपेटरा अपने पापों के सामने विवश हो गई थी तो उसने अपने आपको सांप से डसवा लिया था, और आज तुम्हें भी यही करना होगा। ”

रोबी ओर जोर जोर से चीखने लगी। 

“चीख क्यों रही हो –” विनोद ने जहरीले स्वर में कहा-”क्या तुम्हारे कानों में उन निर्दोषों की चीखे नहीं गूंज रही है, जिन्हें तुम्हारे कारण सिसिक सिसिक कर अपनी इज्ज़त का सौदा करना पड़ा..चीखो मत ! तुम्हारे पापों का उचित दंड यही है। यह छोटे बड़े सांप तुम्हारे एक एक अंग को डसेंगे। तुम्हारे कपड़ों के अंदर घुस कर कुलबुलाएंगे । तुम इनसे किसी प्रकार न बच सकोगी!”

रोबी की टांगें कांपने लगीं और आंखों से आंसू बहने लगे। सांप अपनी पतली जबानें निकाले उसके सामने रेंग रहे थे। दो एक फन काढ कर खड़े हो गये थे। दो चार सोफे पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे। 

“हटाओ इन्हें –” रोबी चीख कर बोल”जंगली, हिंसक ...तुम आदमी नहीं बल्कि हिंसक पशु हो...इन्हें हटाओ...मैं तुम्हें सब कुछ बता दूँगी। ”

“नहीं मिस रोबी! तुम्हारे पाप तुम्हारे सामने खड़े हैं। मरने से पहले अपने पापों का प्रयाषित कर लो ताकि नर्क में तुम्हें यातनायें न भोगनी पड़े!”

“इन्हें हटाओ—” रोबी चीखी---”मै तुम्हें सब कुछ बता दूँगी। ”

“गुड !” विनोद ने कहा और एक एक सांप को पकड़ कर थैले में बंद करने लगा। जब सब बंद हो गये तो उसने पूछा—”हां अब बताओ ?”

“लिली, चिथं रोड की कोठी नंबर ४ में कालेज की एक प्रिंसिपल की हैसियत से रहती है। ”

“और नरेन् ?” विनोद ने पूछा। 

“मैं नारेन के बारे में कुछ नहीं जानती। वह मेरे सामने कभी अपनी असली शक्ल सूरत में नहीं आया इसलिये मैं यह कह सकती हूं के उसके कई रूप है। ”

“अच्छा बैठ जाओ—” विनोद ने कहा और थैले का मुंह बंद कर के ख़ुद भी एक कुर्सी पर बैठ गया। 

रोबी भी उसी सोफे पर बैठ गई और कहने लगी—

“नारेन कभी अपने असली रूप में मुझसे नहीं मिला और न मैं उसके बारे में कुछ जानती ही हूं। ”

“वह तुम तक पहुंचा कैसे?”

“डेडी!” रोबी ने आंसू पोंछते हुये कहा –”डेडी सोने के स्मगलर है। उन्होंने ही एक रात नारेन से मेरा परिचय कराया था। नारेन काले सूट में था और उसका चेहरा छिपा हुआ था। वह शराब पी रहा था और डेडी नशे में बद मस्त थे। परिचय कराने के बाद वह एक प्रकार बे होश हो गये। तब नारेन ने मुझे मेरे ही कई चित्र दिखाये। यह चित्र ऐसे थे कि उनके बारें में कुछ बताते हुए उझे लज्जा लग रही है। उस रात के बाद वह मुझ पर अपने अधिकार मजबूत करता गया और मैं उसकी मुट्ठी में बंध गई। फिर उसने मुझे ट्रेनिंग सेंटर बुलवाया जहां लड़कियों को यह सिखाया जाता है कि---”

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