टेढी पगडंडियाँ - 15 in Hindi Novel Episodes by Sneh Goswami books and stories Free | टेढी पगडंडियाँ - 15

टेढी पगडंडियाँ - 15

 

टेढी पगडंडियाँ

 

15

 

सुबह रोज की तरह दिन निकला । सरदारनी चन्न कौर की सारी रात उसलवट्टे लेते बीती थी फिर भी वह अपने नियत समय पर उठ गयी । नित्य कर्म किया । स्नान करके जपजी साहब का पाठ किया । अरदास की । तब तक आसमान में सूरज की किरणें अपनी लाली बिखेरने लगी थी । दिन निकलते ही चन्न कौर ने जीप निकलवायी और खुद चलाती हुई घेर में जा पहुँची । घेर में सन्नाटा पसरा हुआ था । बसंत और देसराज पशुओं को चारा पानी खिला रहे थे । सरदारनी की आवाज सुनकर दोनों घबरा गये । मलकिन तो कभी इधर आती नहीं । आज भोर में ही कैसे पधारी । सरदारनी ने जीप अंदर ही लगा ली । -
कहाँ है वो लङकी ?
सत श्री अकाल मलकिनी
सत श्री अकाल , मैंने पूछा , लङकी ...
बसंत ने बात पूरी नहीं होने दी – उधर , छोटे सरदार के कमरे में ।
चन्न कौर जीप से उतर कमरे की तरफ चल पङी । कमरा उङका हुआ था । एक ठोकर से खुल गया । किरण दरवाजे से सटी दीवार के साथ चिपकी बैठी थी । अभी नहा कर निकलने से उसका चेहरा ओस में भीगी कली जैसा उजला दीख रहा था । घने काले केश पीठ पर फैले हुए थे । रो रोकर आँखें सूज गयी थी और लाल सुर्ख हो गयी थी । चेहरा डर से पीला पङ गया था पर खूबसूरती और ज्यादा निखर आई थी । चन्न कौर कुछ पल दहलीज पर ही खङी रही फिर दो कदम आगे बढकर पलंग पर बैठ गयी । -
“ क्या नाम है तेरा लङकी “ ?
किरण ... किरण के मुँह से बङी मुश्किल से आवाज निकली ।
“ तू ठीक है न “?
तबतक बसंत दरवाजे पर आ गया था – बीबी जी इसने तो कलसे रोटी का एक निवाला नहीं खाया । रात जो हवेली से रोटी लाया था , ज्यों की त्यों रखी है । जब से आई है , रोये जा रही है ।
जानती हूँ मैं , इतनी परेशानी में रोटी हलक से नीचे कैसे उतरती । जा जीप में परौंठे और थरमस रखी है । निकाल ला । और तू इधर मेरे पास आ किरण ।
किरण वैसे ही घुटनों में सिर दिये उकङू बैठी रही । बसंत रोटी और चाय पकङाकर अपना काम करने चला गया ।
उठ , दो कौर खा ले । ऐसे कैसे भूखी प्यासी बैठी रोती रहेगी । उठ भी – चन्न कौर ने उसे कंधे से पकङकर हिलाया तो वह चन्न कौर के कदमों में गिर पङी । काफी देर तक वैसे ही लेटी पैर पकङकर रोती रही । चन्न कौर ने उसे जी भर रो लेने दिया । जब वह रो कर थक गयी तो चन्न कौर ने पानी लाकर उसका मुँह धुलाया बस अब और नहीं जितना रोना था रो ली । अब आँख से एक बूँद आँसू नहीं गिरना चाहिए । लो चुपचाप रोटी खाओ । किरण ने अब आँख उठाकर चन्न कौर की ओर देखा । गठा हुआ सूतवां बदन , गोरापन मिला तांबियां रंग , मझोला कद , मक्खन मलाई जैसे नाजुक हाथ पैर , तीखे नैन नक्श और चेहरे पर अनोखा तेज । अंग अंग से अभिजात्य दिखाई दे रहा था ।
किरण से इस औरत की उपेक्षा न हुई । उसने सिर नीचा किये परोंठे खाने शुरु कर दिये । एक परौंठा खाकर उसने हाथ खींच लिया । सरदारनी के चेहरा संतोष से दमक उठा ।
ये हुई न बात । अब ठीक है ।
कहाँ रहती हो ?
जी बीङ तलाब !
बठिंडा में ?
मैं पढती थी कालेज में बी ए के पहले साल में ।
घर जाना चाहती है ?
किरण की आँखों के सामने वे सारी लङकियाँ गुजर गयी जो पति की छोङी हुई होने की वजह से मायके में आकर रह रही थी । परिवार में उनकी हैसीयत बंधुआ मजदूर जैसी थी । दिन भर काम करने के बाद आधा पेट रोटी मिलती । ऊपर से हजारबातें सुनने को मिलती । समाज के ताने मेहने सहने और परिवार की उपेक्षा झेलने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा था । दो तीन विधवाएँ भी थी गाँव में । पूरा दिन भाभियों की चाकरी करती । गाँव के घरों में छोटे छोटे काम करती तब जाकर उन्हें एक समय रोटी नसीब होती , वह भी सौ जली कटी सुनने के बाद । किसी तीज त्योहार , शादी बियाह में हिस्सा लेने की उन्हें इजाजत न थी । कुछ साल पहले उसके टोले की एक लङकी का बलात्कार हुआ तो वह और उसके माँ बाप तीनों जन ने फाँसी लगा ली थी । लोकअपवाद सुनने की हिम्मत न थी । अगर वह घर गयी तो क्या समाज उसे सहजता से अपना पायेगा । उस हालात में कहाँ जाएगी वह । एक पल में ही वह इतना कुछ सोच गयी ।
सरदारनी ने दोबारा पूछा – बोल क्या इरादे हैं
कहाँ जाऊँगी जी अब – उसके मुँह से अचानक निकला ।
तब ठीक है , आराम से रह ।
चन्न कौर जैसे आई थी , वैसे ही जीप चलाती धूल उङाती चली गयी । घर पहुँची तो बाहर दरवाजे के पास पुलिस वालों का मोटरसाईकिल खङा था । तुरंत उसने चाय और पिन्नियाँ बैठक में पहुँचाई और अवतार को भीतर आने का इशारा किया ।
अवतार ने भीतर आते ही पूछा – ये सुबह सुबह कहाँ ले गयी थी आज सवारी ।
ये पुलिस ... यहाँ क्या
बसस्टैंड से कल एक लङकी उठा ली किसी ने । उसी के बारे में पूछताछ करने आये हैं ।
चन्न कौर ने संक्षेप में सारी कहानी कह सुनाई । साथ ही यह भी बताया कि वह किरण से मिल कर आ रही है । बङी प्यारी बच्ची है । आप जैसे भी हो , ये मामला संभाल लो । उसने अलमारी से एक लाख रुपया लाकर पति के हाथ में रख दिया ।
अवतार ने वह नोटों की गड्डी थानेदार को देते हुए कहा – मालकों बच्चे से नादानी हो गयी पर हम बङों को तो बात सम्भालनी पङेगी न । आप जैसे भी हो उनकी अरजी वापिस करवा दो ।
थानेदार ने गड्डी जेब के हवाले करके अवतार सिंह को दो चार बातें समझाई और साथी को लेकर चला गया ।

 

बाकी कहानी अगली कङी में ...

 

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