टेढी पगडंडियाँ - 18 in Hindi Novel Episodes by Sneh Goswami books and stories Free | टेढी पगडंडियाँ - 18

टेढी पगडंडियाँ - 18

 

टेढी पगडंडियाँ 

 

18 

 

जैसे ही चन्न कौर ने दोनों को अपने कमरों में जाने का आदेश दिया , अब तक असमंजस में पङे चाचे भतीजे को भाभी के हुक्म से जैसे सहारा मिल गया - हाँ जी भाभी , खाना खा लिया । बस अब जा ही रहे हैं ।
दोनों चाचा भतीजा थाली पर से उठे । हाथ मुँह धोकर अपने अपने कमरों में चले गये । सिमरन गुरनैब को देखते ही चारपाई छोङकर उठ बैठी – आज पंचायत में क्या हुआ जी , बताओ न ।
गुरनैब ने सिलसिलेवार पूरी घटना कह सुनायी ।
वो इतने सारे लोग आए और बिना कुछ बोले चुपचाप चले गये – सिमरन को विश्वास नहीं हो रहा था ।
हाँ तो , भाभी ने सबको शरबत पिलाया , फिर लड्डू दिये । एक एक खाने को और पाँच पाँच घर ले के जाने को । किरण को भी बुलाया था पापा ने । थानेदार ने जोर दे के पूछा भी – कोई बात कहनी है आप में से किसी को , कोई शिकायत ? पर वे तो कुछ बोले ही नहीं । न बैठे । न किरण ही कुछ बोली । वे लोग जैसे आए थे , वैसे ही खङे खङे चले गये ।
वो लङकी .. ।
वहीं है घेर में ।
वह अब यहीं रहेगी ?
और अब वह कहाँ जाएगी । अब तो उसे यहीं रहना पङेगा ।
मुझे तो चाची की फिकर हो रही है । उनका क्या होगा ?
चाची का क्या होना है । चाची तो चाची है । जैसे पहले घर में रहती है , वैसे ही रहेगी । उनकी जो जगह घर में है , उसे कौन बदल रहा है । चल अब सो जा । सुबह उठना भी है ।
गुरनैब करवट बदलकर सोने की कोशिश करने लगा । पर नींद किसे आती । न गुरनैब को आई न सिमरन को । दोनों अपनी अपनी सोच में जागना सोना करते रहे ।
निरंजन अपने कमरे में गया तो जसलीन करवट बदल कर चादर में लिपटी लेटी हुई थी । निरंजन भी चुपचाप करवट लेकर लेट गया । दोनों ने सारी रात उसी तरह लेटे लेटे बिता ली । न जसलीन ने कुछ पूछा , न निरंजन ने कोई जवाब दिया । अपने अपने खोल में सिमटे दोनों ने जागकर रात काटी ।
सुबह दिन रोज की तरह ही निकला । हमेशा की तरह बसंत दूध लेकर आया । हमेशा की तरह सिमरन और जसलीन ने सबको मक्खन डली लस्सी के साथ मिस्से परौंठे परोसे । चन्न कौर ने अवतार सिंह और देवर को सुनाकर कहा – ले आए , ठीक है । पर वह कमीनो की बेटी मेरी हवेली की दहलीज पर नहीं चढेगी । सुना सबने । उसकी हर जरुरत का मैं ध्यान रखूँगी । गहना गट्टा , पोशाकें , रोटी सब वक्त पर मिलेगी उसे । पर इस घर में वह नहीं आयेगी । ठीक है ।
निरंजन ने उठकर भाभी के पैर छुए और जीप पर सवार होकर चाचा भतीजा शहर चले गये ।
अगले दो तीन दिन बिना किसी हलचल के बीत गये । चौथे दिन अचानक घेर के साथ वाले खेत में ईंटें और रेत बजरी के ट्रक आ उतरे । यह खेत गाय भैंसों के लिए चारा बोने के काम आता था । अवतार और चन्न कौर ने भूमि पूजन किया और कोठी की नींव रखवायी । हूँ , तो भाईजी इन तीन दिनों में कोठी का नक्शा बनवाने मे व्यस्त रहे थे । सारा काम अकेले कर रहे थे ।
भाईजी इसकी क्या जरूरत है । वह रह रही है न घेर में । वहीं ठीक है ।
तू चुप कर । तुझे ज्यादा पता है क्या - भाभी ने निरंजन को चुप करवा दिया ।
तुरंत आठ मिस्त्री और बीस मजदूर काम पर लग गये । ठेकेदार हर रोज सुबह शाम हवेली पर हाजरी लगाता । अपना प्रोजेक्ट दिखाता । अवतार सिंह और चन्न कौर से हिदायतें लेता और मजदूरों से काम करवाने चला जाता । तीन महीने में कोठी तैयार देने का वादा किया था उसने । इसलिए काम फुर्ती से चल निकला ।
निरंजन का दिन अब तीन चार घंटे घेर में बीतता और शाम और रात हवेली में । जसलीन का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था । चन्न कौर के सामने वह सामान्य रहती पर निरंजन के सामने पङने से वह बचने की कोशिश करती । उसके मान को ठेस पहुँची थी । पति ने उसके होते एक और औरत रख छोङी थी , इसे उसका दिल और दिमाग गवारा नहीं कर रहा था । अपमानित महसूस कर रही थी वह इसलिए उसने निरंजन और गुरनैब दोनों से बात करना छोङ दिया था । निरंजन ने अपनी तरफ से उसे मनाने की कोई कोशिश भी नहीं की । दोनों अपने अपने किले में तलवारें भांजे युद्ध के लिए तैयार थे । सिर्फ पहल कौन करे , इसका इंतजार हो रहा था । या फिर वक्त के साथ सब कुछ सामान्य होने का विश्वास था । जिंदगी जैसे तैसे चल रही थी ।
अभी इस घटना को दस दिन बीते होंगे कि एक दिन सुबह दिन निकलते ही निरंजन के दोनों साले आ पहुँचे ।
ये क्या सुन रहे है भाई जी ।
क्या सुना भई तुम लोगों ने ।
तब तक चन्न कौर लस्सी के कङे वाले गिलास लेकर आ गयी थी ।
आओ भाई , आओ । क्या हालचाल हैं । घर में मासीजी और मौसा जी कैसे हैं । बच्चे ठीक हैं न ।
हम तो ठीक हैं बहना । पर यहाँ के बङे चर्चे सुन रहे हैं बाहर ।
पता नहीं तुम लोगों ने क्या सुना बाहर । सुनी सुनाई आधी अधूरी बात पर यकीन नहीं करना चाहिए ।
ये निरंजन ने कोई लङकी रख छोङी है । हमारी बहन के बारे में नहीं सोचा । न उसने , न आप लोगों ने ।
जसलीन मेरी छोटी बहन है भाई । इस हवेली की शान है वह । उसकी हर जरुरत की जिम्मेदारी मेरी । तुम लोग उसकी चिंता न करो । मैं उसका पूरा ध्यान रखूँगी ।
अवतार सिंह ने भी भरोसा दिलाया – जंगीरे , तू फिकर मत कर । जमींदारों के तो सौ औरतों से रिश्ते होते हैं , सारी औरतें घरवाली थोङा होती हैं । बेवकूफी तो हो गयी पर वह हमसे बाहर नहीं जा सकता । यह घर जसलीन का है , जसलीन का ही रहेगा ।

 

बाकी कहानी अगली कङी में...।

 

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sneh goswami

sneh goswami 3 months ago

Divya Goswami

Divya Goswami 2 months ago

Jarnail Singh

Jarnail Singh 3 months ago

ek baar fir se padh kar maza aaya