Jalpralay - 2 in Hindi Science-Fiction by सूरज books and stories PDF | जलप्रलय-एक रिवेंज - भाग 2

जलप्रलय-एक रिवेंज - भाग 2

भाग - 2

धांय! धांय! धांय! सहसा तीन फायर हुए। पहला निशाना गुलाब के हाथ में थमी रायफल थी जो तुरंत छिटक कर दूर जा गिरी, बाकी दो का निशाना उसके दोनों घुटने थे पर राइफल हाथ से छिटकने और अचानक हुए इस अप्रत्याशित हमले से वह लड़खड़ा गया, जिससे दोनों निशाने चूक गए।

"पकड़ लो इसे, भागने न पाये।" वातावरण मे एक रौबदार आवाज गूंजी।

कई सारे सिपाही गुलाब की तरफ लपके।

गुलाब कुछ समझ पाता उसके पहले ही दो सिपाहियों ने उसकी दोनों बाहें पकड़ ली, वह कसमसाया, पर पकड़ मजबूत थी। वे उसे एक साइड ले जाने लगे। उधर गोताखोर धीरे धीरे जलपरी की तरफ बढ़ने लगे, जलपरी की आँखों मे फिर दहशत छाने लगी।

गुलाब जाते हुए बेबस नजरों से जलपरी की तरफ मुड़-मुड़ कर देख रहा था, जलपरी भी जैसे कृतज्ञता और पश्चाताप के भाव से असहाय सी कातर दृष्टि से उसे ही देखे जा रही थी।

तभी वहां खडे लोगो की आंखें आश्चर्य से चौड़ी होती चली गई। अचानक आकाश से एक नीले प्रकाश का घेरा नील के ऊपर पड़ा, जिसने पूरी तरह से नील को अपनी गिरफ्त में ले लिया, उस प्रकाश का कोई स्रोत आकाश में कहीं नजर नहीं आ रहा था, कुछ ही सेकंड बाद नील वहां से गायब हो चुकी थी।

अभी तक लोग उस जादुई प्रकाश और जलपरी के गायब होने की घटना को पचा भी नहीं पाए थे कि एक और आश्चर्य उनकी प्रतीक्षा कर रहा था, एक तेज हवा का झोंका उनके पास से गुजरा, जब तक कोई कुछ समझ पाता एक आठ फिट का अजीबो गरीब प्राणी हवा मे प्रकट हुआ जिसका पूरा शरीर मनुष्यो जैसा, मुंह भेड़िये जैसा था और इसके साथ ही पीठ पर पाँच पाँच फिट लंबे और करीब तीन तीन फिट चौड़े पंख उगे हुए थे।

इससे पहले की कोई कुछ समझ पाता वह प्राणी गुलाब की दोनों बाहें अपने दोनों हाथो मे जकड़ कर समुद्र की तरफ ले उड़ा, उसके उड़ते ही वे दोनों सिपाही जिंहोने गुलाब को कसकर पकड़ रखा था, अचानक से हुई इस अकल्पनीय घटना की वजह से गुलाब के साथ साथ वे भी कई फिट तक ऊपर उठते चले गए पर जैसे ही उन्हे वस्तु स्थिति का बोध हुआ उन्होने हड्बड़ाकर तुरंत गुलाब की बाहे छोड़ दी जिस वजह से वे धम्म से धरती पर आ गिरे।

सभी विस्फारित नेत्रो से मुंह बाए हुए इस आश्चर्यजनक घटना को देखे जा रहे थे। उन्हे अपनी आंखो पर भरोसा ही नहीं हो रहा था।

"फ.. फ.. फायर... फायर!" गुलाब पर गोली चलाने वाले इंस्पेक्टर हरिओम ने उस प्राणी को जब गुलाब को इस तरह उड़ा कर ले जाते हुए देखा तो क्षणभर अवाक रहने के पश्चात लड़खड़ाती हुई जुबान से सिपाहियों को एकाएक उस विचित्र जीव पर फायर करने का आदेश दिया पर अब देर हो चुकी थी क्योंकि वह जीव उनकी गोलियों की रेंज से बाहर निकल चुका था।

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गुजरात के तिथल समुद्र तट से करीब अस्सी नब्बे किलोमीटर दूर लगभग पाँच छ्ह वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ एक समुद्री टापू, जो अत्यंत घने बड़े बड़े वृक्षो और तरह तरह की कंटीली झाड़ियों से भरा पड़ा था। पेड़ो के घने झुंड के बीच एक खाली स्थान पर चारो तरफ हड्डियों के टुकड़े बिखरे पड़े थे। सूर्य डूबने को था, घने पेड़ो से आच्छादित होने के बावजूद कुछ किरणे अभी भी कोई कोना तलाश कर जहां तक पहुच सकती थी पहुँचने की कोशिश कर रही थी। झींगुरों की झनझनाहट शुरू हो चुकी थी। सड़े हुए मृत जीव सी दुर्गंध लिए हुए वातावरण थोड़ा डरावना और मनहूसियत भरा था। कई सारी छोटी बड़ी चट्टानें आस पास पड़ी हुई थी। उन्ही चट्टानों मे से एक पर काफी डरा हुआ गुलाब लगभग सिमटा सा बैठा हुआ था। उसके कपड़े और यहाँ तक की जूते भी काली रेत से सने पड़े थे, जिसके कण चट्टान पर भी बिखरे हुए थे। यद्यपि वह बहुत साहसी और बहादुर था पर आज जो उसने देखा उसकी कल्पना तो उसने कभी सपने मे भी न की थी। वह डरा हुआ उस विचित्र जीव को ही देखे जा रहा था जो उससे कुछ ही दूरी पर चहल कदमी कर रहा था। उस जीव का मुख किसी भेड़िये जैसा था, सामान्य से थोड़े बड़े कान, जो की ऊपर की तरफ नुकीले थे, सीधा ऊपर उठे हुए थे। बाकी शरीर एकदम मनुष्यो की तरह साँचे मे ढला था पर उसमे भी थोड़ी भिन्नता थी। उसके हाथो और पैरो के पंजो की बनावट एकदम बाज जैसी थी और वे मनुष्यों से अपेक्षाकृत जांघों की तरफ मोटे और नीचे की तरफ पतले होते चले गए थे, देखने मे वे काफी मजबूत लग रहे थे। पीठ पर पाँच पाँच फिट लंबे पंख थे उसका पूरा शरीर छोटे छोटे काले बालो से भरा पड़ा था, अंगारो की तरह लाल आंखे गोल और सामान्य से थोड़ी बड़ी थी। उसका पूरा शरीर स्याह काला था। वह बड़े आराम से चहल कदमी कर रहा था। उसकी चाल से ही पता चल रहा था कि वह काफी फुर्तीला था।

"तुम मुझ पर विश्वास कर सकते हो।" उस विचित्र जीव ने सन्नाटे को भंग करते हुए कहना शुरू किया। "मैं भले ही मनुष्यो से, पक्षियों से, अन्य जीवो से भिन्न हूँ पर फिर भी तुम मुझपर भरोसा कर सकते हो, और मैं तो कहता हूँ कि तुमको भरोसा करना ही चाहिए। तुम एक नेक दिल इंसान हो ऐसा मेरा मानना है क्योंकि अब तक के जीवन काल मे मैंने ऐसा मनुष्य नहीं देखा जो किसी अन्य जीव के लिए अपनी जान जोखिम मे डाले, पर तुमने ऐसा किया, काफी दिनों से मुझे तुम्हारे जैसे मनुष्य कि खोज थी जो आज जाकर पूरी हुई।" वह विचित्र प्राणी अपनी पतली सी पर तीव्र आवाज मे बोलता जा रहा था।

गुलाब अवाक था। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। कि यह जीव, जो मनुष्यों ही नहीं उसके जीव विज्ञान मे ज्ञात, यहाँ तक कि जिसके होने कि कल्पना धरती तक पर भी नहीं कि जा सकती, वह तो मनुष्यों की भाषा बोल रहा था, बोल ही नहीं रहा था बल्कि धारा प्रवाह बोले जा रहा था। उसकी बातें सुनकर अब उसका डर कम हो रहा था, वह धीरे धीरे सहज हो रहा था।

"पर आप हो कौन? और आपको मुझ जैसे इंसान कि तलाश क्यों है?" गुलाब ने थोड़ी हिम्मत जूटा कर पूछा, उसके मन में अभी भी डर बना हुआ था, उस जीव की आकृति ही ऐसी थी।

"मैं कौन हूँ? इसके पीछे एक लंबी कहानी है, फिर भी इतना तो बता सकता हूँ कि मैं तुम मनुष्यों के दिमाग की ही उपज हूँ और मेरे जैसे कई अन्य जीव भी हैं जिनकी कल्पना तुमने स्वप्न मे भी न कि होगी।

"मनुष्यों की उपज? यह कैसे हो सकता है?" गुलाब विस्फारित नेत्रो से उस जीव को ही देखे जा रहा था, उसे भरोसा ही नहीं हो पा रहा था उसकी बातों पर....

"हाँ, मनुष्यों की उपज, आदि मानव काल से ही मनुष्य अपने बुद्धिबल की बदौलत निरंतर अपनी सुविधाओ को ध्यान मे रखते हुए अपने जीवन को सुगम बनाने के लिए तरह तरह की खोजे और आविष्कार करता आया है, जिनमे आग और पहिये के आविष्कार मील के पत्थर साबित हुए, फिर तरह तरह की फसलो की खोज ने उनके भोजन की समस्या को भी हल कर दिया। उसने मांस, दूध, दही आदि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तरह तरह के पशुओं को पालना शुरू किया जिससे उसका दर दर भटकना बंद हो गया और उसका जीवन पहले से कहीं बेहतर और सुगम बन गया पर मनुष्य मात्र अपने जीवन को सुगम बनाने तक ही सीमित नहीं रहा, जैसे जैसे उसका जीवन सरल सुविधा जनक बनता गया उसकी महत्वाकांक्षाएं बढ़ती ही गयी, जिसका प्रथम प्रमाण कम्पास की खोज थी। अभी तक तो वह सिर्फ अपने भोजन और वस्त्र के लिए ही संघर्ष करता आया था पर अब उसमें अधिक से अधिक प्रभुत्व और संपत्ति जुटाने का भूत सवार हुआ जिसके चलते उसने दूर दराज की जगहों से व्यापार करना शुरू किया। अब जबकि संपत्ति और प्रभुत्व के लिए होड मची तो असुरक्षा की भावना प्रबल होना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी इसी असुरक्षा की भावना के चलते कबीलों से विकसित होते होते आधुनिक विश्व के बड़े बड़े देश आस्तित्व में आए। इस क्रम में न जाने कितने युद्ध हुए, न जाने कितनी सभ्यताएं उजाड़ हुई, दो दो विश्वयुद्ध इसी प्रभुत्व और असुरक्षा की भावना की वजह से हुए...." इतना कहकर वह थोड़ा सा रुका, वह धीरे धीरे आगे बढ़ता हुआ गुलाब के पास वाली चट्टान पर बैठ गया।

"तरह तरह के खतरनाक परमाणु हथियार जो आज आस्तित्व मे हैं वे सब इसी प्रभुत्व और असुरक्षा की भावना की वजह से हैं....." उसने फिर से कहना शुरू किया।

गुलाब बहुत ध्यान से उसकी बाते सुन रहा था उसका डर अब लगभग खत्म हो चुका था, उस विचित्र जीव की बातों मे उसकी दिलचस्पी बढ़ती ही जा रही रही थी।

"इसी क्रम में जनसंख्या भी तेजी से बढ़ी जिससे खाद्य प्रदार्थों की कमी होने लगी इस कमी को पूरा करने के लिए अनाजों की पैदावर बढ़ाने हेतु तरह तरह के प्रयोग किए गए......." सहसा इतना कहते कहते वह जीव रुक गया, उसकी दृष्टि ऊपर की तरफ आसमान में स्थिर हो गयी।

अचानक उसने झपटकर गुलाब की बांह पकड़ी और तेजी से घने पेड़ो के बीच उड़ चला।

"भड़ाक!!!!!!..... " ज़ोरदार धमाका हुआ उस निर्जन टापू पर, गुलाब उस जीव की अचानक इस हरकत से पहले ही हक्का बक्का था धमाके की आवाज सुनकर जब उसने लटके लटके ही पीछे मूड कर देखा तो उसके पूरे शरीर में सिंहरन दौड़ गयी, जिस चट्टान पर वह अभी कुछ देर पहले बैठा था वह टुकड़े टुकड़े होकर हवा में उड़ रही थी।

क्रमशः----

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ashit mehta

ashit mehta 8 months ago

GAJENDRASINH MAKVANA