टेढी पगडंडियाँ - 19 in Hindi Novel Episodes by Sneh Goswami books and stories Free | टेढी पगडंडियाँ - 19

टेढी पगडंडियाँ - 19

 

टेढी पगडंडियाँ

 

19

 

अवतार सिंह और चन्न कौर ने जंगीर और सतबीर को शांत करने की भरसक कोशिश की । भई होनी को कौन बदल सकता है । शायद यही सब होना किस्मत में लिखा था । जो होना था , सो हो गया । पर देखो , निरंजन जसलीन का पूरा ख्याल रखता है । हर समय उसी के पास होता है । तुम यह समझो कि घेर की साफ सफाई के लिए एक नौकरानी रख ली है । बाकी हम हैं न जसलीन का ध्यान रखने के लिए । उसे शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा । उसकी हर जरुरत का पूरा पूरा ध्यान रखा जाएगा । तुम लोग उसकी तरफ से निश्चिंत हो जाओ ।
वे दोनों भाई सिर झुकाये सुनते रहे । चन्न कौर ने उनके लिए बेसन की पिन्नियाँ और दूध के गिलास मंगवाये पर दोनों ने हाथ जोङ लिये – भा जी , आप तो जानते ही हैं , बेटी के घर का पानी भी हमें हराम है । बस एक बार जसलीन से मिल लें , फिर निकलते हैं ।
जसलीन अंदर भाइयों की राह ही देख रही थी । भाई अंदर आये तो उसके आँसू बाँध तोङ कर बह निकले । उसने खुद को सम्भाला । चुन्नी के सिरे से आँखें पौंछी और चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान ले आई । जंगीर उसका बङा भाई था और सतबीर उससे तीन साल छोटा । इन भाइयों के साथ लङती झगङती वह बङी हुई थी । भाइयों की जान बसती थी उसमें ।
जंगीर ने आगे बढकर बहन के सिर पर हाथ धर दिया – तू चिंता क्यों करती है बहन । तेरे भाई जिंदा हैं अभी । तू बता , क्या चाहती है ?
जसलीन ने मन कङा किया – भाई , मैं क्या बोलूँ । तुम्हारे कुश लगते ने अच्छा नहीं किया । मैं तो उसके जीते जी ही विधवा हो गयी ।
जंगीर ने बहन का मुँह देखा और एक झटके से कमरे से बाहर हो गया । अवतार सिंह वहीं ड्योढी में ही खङा था । उन्होंने एक दो मिनट अवतार सिंह से रसमी सी बात की और दोनों भाई जीप दौङाते लौट गये ।
चन्न कौर ने वाहेगुरु का शुक्र किया कि निरंजन और गुरनैब दोनों इस समय घर पर नहीं थे । नहीं तो गरमी गरमी में न जाने क्या हो जाता । गरम खून होता है इन लङकों का । गुस्सा तो जैसे नाक पर ही रखा रहता है । न जाने आराम से बातें करते करते कब लङ पङें । कतल कर देना तो इनके बाएँ हाथ का खेल है । ऊपर से जिस तरह ये दोनों लङके आए थे , कलेजा हिल गया था ।
जब वह ब्याही आई थी तो उसकी दोनों ननदें एक चौदह साल की थी और एक आठ साल की । और यह निरंजन तो तीन साल का भी नहीं हुआ था । कभी लगा ही नहीं कि देवर है । गुरनैब हुआ तो दोनों भाइयों की ही तरह पले । इकट्ठे पढे , इकट्ठे खेले । बीजी जब अकालचलाना कर गयी तो चन्न कौर ने ही उसे माँ बनकर संभाला था । निरंजन ने भी कभी भाभी या भाई की कही कोई बात नहीं टाली थी ।
जसलीन का रिश्ता चन्न कौर ने अपनी बुआ की ननद की बेटी से किया था । लङकी सुंदर थी । बी ए पास थी । दो भाइयों की इकलौती बहन थी । खानदानी लोग थे । सब कुछ ठीक था । जिंदगी आराम से चल रही थी कि ये किरणवाला पंगा आ पङा ।
किरण ने भी यह खबर सुनी और डरके मारे वह चार रातें सो न सकी । निरंजन और गुरनैब जब भी आते , उसे दिलासा देते । दिन बीतते गये और जब झगङा फसाद नहीं हुआ तो फिर वह ये सब भूल कर सामान्य हो गयी ।
उधर कोठी का काम पूरी रफ्तार से चल रहा था । खेत के बाहर की तरफ चारदिवारी कर दी गयी थी । पगडंडी के किनारे पर लोहे का बङा सा फाटक लग गया था । अंदर से एक छोटा दरवाजा पीछे बरसीम के खेत में खुलता था जहाँ से घेर में जाया जा सकता था । दो महीने में दो कमरे , रसोई , स्नानघर और शौचालय बनकर तैयार हो गये । अब बिजली और लकङी का काम बाकी रहा । गुरनैब ने अपनी पसंद के वाश बेसिन , लाईटें , पंखे , स्विच , टूटियाँ सब खरीदे । तीनों काम एक साथ होने लगे । एक तरफ बढई दरवाजे बना रहा था । दूसरी ओर पलंबर टूटियाँ , फ्लश और वाशबेसिन फिट कर रहे थे । तीसरी ओर इलैक्ट्रीशियन बिजली की फिटिंग में लगे थे । पाँच महीने में कोठी बनकर तैयार हो गयी । चन्नकौर और सिमरन ने खुद गुरनैब के साथ शहर जाकर जरुरत का सारा सामान खरीदा । डबलबैड , गद्दे , चादरें , तकिये से लेकर रसोई के बरतन तक और मिक्सी से लेकर फ्रिज और टी वी तक सब सामान आ गया । और किरण की गृहस्थी इस नये घर में बस गयी ।
किरण ने नया घर देखा तो उसे अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं हुआ । कहाँ तो बीङ तलाब की वह टूटी फूटी झुग्गी थी जहाँ वह जन्मी पली थी , जहाँ आज भी उसका परिवार रहता था । गरमी के मौसम में बुरी तरह से तपती तो हर बरसात में वह झुग्गी टपकने लगती । और कहाँ यह खूबसूरत सा घर जिसमें उसकी जरुरत का सारा सामान जँचा हुआ था । आज उसे निरंजन की कमी बहुत खली । निरंजन उसके पास अक्सर दोपहर को ही आता था । वह भी दो तीन घंटे से ज्यादा कभी नहीं रुका । अक्सर आँधी की तरह आता और तूफान की तरह लौट जाता । उसने कभी उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की क्योकि वह जानती थी कि जितना समय उसे मिल रहा है , वह भी किसी और से चुराया हुआ है । इसलिए जितना मिल रहा था जो मिल रहा था , उसी में पूरी संतुष्ट रहती ।
आज उसे अपने भाई , बहन , माई , बापू सभी शिद्दत से याद आये । काश वे आ पाते तो देखते कि उनकी बेटी यहाँ रानी की तरह से रह रही है । चन्न कौर और अवतार उसे छोटी बहन की तरह मानते थे । उसके लिए हर छोटी बङी सुविधा जुटा रहे थे । ये क्या कम बात थी ।

 

बाकी कहानी अगली कङी में ...

 

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