टापुओं पर पिकनिक - 65 in Hindi Novel Episodes by Prabodh Kumar Govil books and stories Free | टापुओं पर पिकनिक - 65

टापुओं पर पिकनिक - 65

आगोश और तेन का काम धड़ल्ले से चल पड़ा था। अब आगोश का एक पैर भारत में रहता और दूसरा जापान में। वह आता- जाता रहता।
जब वो भारत आता तो आने से पहले मधुरिमा से एक बार ये ज़रूर पूछता था कि तनिष्मा को उसके नाना- नानी से मिलवाने ले चलना है क्या?
मधुरिमा ये कह कर टाल जाती कि पहले इसे नाना- नानी बोलना सिखा दूं, फ़िर चलेंगे।
तेन मुस्करा कर रह जाता।
उन्होंने कई टूर सफ़लता से संपन्न करवा लिए थे। वे किसी भी एक सुंदर सी जगह को चुनते और तब महंगे विज्ञापनों के ज़रिए लोगों को वहां की सैर कराते। उनके इंतजाम से तमाम रईस लोग बेहद खुश होते और उन पर पैसा बरसता।
आगोश अपना विलक्षण दिमाग़ दौड़ा कर तरह- तरह के थीम पर भ्रमण आयोजित करता और फ़िर उसकी एक्सक्लूसिव तैयारी करता। टूर बेहद कामयाब और लोकप्रिय होते। 
कभी केवल होने वाली दुल्हनों के लिए मनोरम टूर आयोजित किया जाता जिसमें उन्हें दुनिया भर के उन गंतव्यों की सैर कराई जाती जो हनीमून के लिए बेहतरीन डेस्टिनेशन हो सकते हों। 
कभी वो कलाकारों को लेकर दुनिया के सबसे खूबसूरत स्थानों पर जाते। तो कभी तमाम ज्वैलर्स को ऐसे शांत और सुदूर स्थानों की सैर कराते जहां विश्व भर की आदिवासी और जनजातीय आबादी के बदन पर उन्हें एक से एक नायाब और मौलिक आभूषण दिखाए जाते। भ्रमण से लौट कर ये महत्वाकांक्षी व्यापारी उन गहनों के आधुनिक और कीमती रूप गढ़ते और मोटा मुनाफा कमाते।
जिस तरह पारम्परिक एशियाई देशों में युवा होती लड़की की पहली बार "नथ" उतारने की परंपरा लोकप्रिय है उसी तरह एक गुमनाम से अफ़्रीकी द्वीप पर युवा होते पुरुष का "तेज" उतारने की परंपरा भी अत्यधिक लोकप्रिय थी। 
दुनिया के रईस युवा वहां जाते और उन्हें ये अत्यंत बीहड़ किंतु आनंददायक यात्रा कराई जाती। आदिवासियों की तरह रहने वाले इस समुदाय में किशोर होते लड़के को अजीब तरह के उत्तेजक गहने पहनाए जाते और फ़िर उससे विवाह की लालसा रखने वाली स्त्री अपने पूर्ण प्राकृतिक रूप में नृत्य करते हुए अपने और उसके मित्रों की उपस्थिति में अपने होने वाले पति को उन आभूषणों से एक- एक कर रहित करती। 
ढेरों रूपए खर्च करके लोग ये तमाशे देखने जाते।
दुर्गम पहाड़ियों की खौफ़नाक कंदराओं को पार करके बेहद शांत और रमणीक सागर तट पर ये रस्म चांदनी रात में आयोजित होती और दुनियाभर के रसिक- रईस अपनी दौलत के बल पर इसके निर्विघ्न साक्षी बनते। धन चांदनी रात में चंदा की किरणों की तरह बरसता।
आगोश ने अपने आप को काम में डुबो ही दिया था।
तेन का घर भी सागर किनारे एक छोटे से द्वीप पर था।
इस बार आगोश जब घर गया तो साजिद से उसे बहुत सारी जानकारी मिली। उसके सामने अपने पिता के मकसद का एक बड़ा खुलासा हुआ।
साजिद ने बड़ी चतुराई से सब कुछ पता लगा लिया था।
उसके पास काम करने वाला लड़का सुल्तान और अताउल्ला की भी खोज- खबर ले आया था।
किसी भव्य मॉल की तरह बनने वाली वो इमारत भी पूरी तरह बन कर तैयार हो चुकी थी जो डॉक्टर साहब ने दिल्ली के नज़दीक बनवाई थी।
ये एक अत्याधुनिक सुविधाओं वाला सात सितारा हॉस्पिटल था जो अब लगभग कार्यशील हो गया था।
आज की दुनिया में किसी चिकित्सालय का होना तो लोगों के लिए धर्मार्थ कार्य ही कहा जाएगा, किंतु यदि किसी अच्छे काम के पीछे कोई अनैतिक इरादा छिपा हो तो सारी बातें ही संदिग्ध और मनुष्य विरोधी हो जाती हैं... आगोश की सबसे बड़ी चिंता और घृणा यही थी।
वह यही सोच- सोच कर तिलमिला जाता था कि आख़िर उसके पिता में ये दो मानसिकताएं एक साथ कैसे निवास कर लेती हैं। एक ओर इंसान को शरीर के कष्टों से मुक्ति दिलाना तो दूसरी ओर छल- कपट से उसी इंसान के जिस्म को मंडी बना कर उससे मुनाफा कमाना। स्वास्थ्य को लेकर बनी मान्यताओं और कानून को तोड़ना तथा इस बेगैरतन मंसूबे से नोट कमाना!
आख़िर क्या पाना होता है ऐसे लोगों को?
गोश्त के गहने पहन कर कितने दिन तक अमर हो सकेंगे ये दुष्ट लोग?
ओह! अपने पिता को दुष्ट कह देने के लिए आगोश को ईश्वर क्षमा करे।
साजिद ने पता लगाया था कि डॉक्टर साहब केवल औषधि-शास्त्र को ही ज़हरीला नहीं बना रहे बल्कि जीवन के एक और पवित्र माने जाने वाले पेशे पर भी बेहूदा हमला बोल रहे हैं। वो चिकित्सा-शिक्षा का भी मुंह काला कर रहे हैं।
कैसे?? क्या हुआ?
साजिद ने बताया कि डॉक्टर साहब एक भव्य दिखने वाले निजी मेडिकल कॉलेज से जुड़ कर धन के सहारे ग़लत लोगों को प्रवेश दिलाने के धंधे में भी लिप्त हैं। धन पिशाचों के ये बच्चे अगर योग्यता न होने पर भी पैसे के सहारे डॉक्टरी की डिग्री हासिल कर लेंगे तो कल ये भी बीमारों के जिस्म से खिलवाड़ करके पैशाचिक वृत्ति से ही पैसा कमा सकते हैं।
आगोश को नींद नहीं आती थी। वह बिस्तर पर देर रात तक अकेला पड़ा सोचता रहता था कि जिस तरह दुनियां से सबको डरा कर रखने वाले प्राणी डायनासोर लुप्त हो गए, काश, वैसे ही इन व्यवस्था को सड़ा कर रखने वाले भ्रष्टाचारी लोगों की प्रजाति भी हमेशा के लिए विलुप्त हो जाए। 
जिन लोगों को पढ़ाई- लिखाई में रुचि न होने के चलते अच्छे कॉलेजों में प्रवेश नहीं मिल पाता था उन्हें पैसा कमाने की मशीन बनाने के लिए उनके रईस घर वाले लाखों- करोड़ों रुपए घूस के रूप में देकर ऐसे कॉलेजों में जबरन घुसा देते थे। 
फ़िर डॉक्टर की डिग्री लेकर ये जल्लाद जैसी मानसिकता वाले लोग जन- सामान्य के जीवन से खेलने के लिए मैदान में उतर आते थे। किसी मजबूर बीमार व्यक्ति के शरीर को ये पैसा कमाने का यंत्र समझने लगते थे।
साजिद के भेजे आदमी ने ये गोरखधंधा अपनी आंखों से देखा।
बड़े - बड़े रईसों, नेताओं, उद्योगपतियों, ठेकेदारों और अफसरों से उनके नालायक बच्चों को डाक्टर बनाने के लिए लाखों- करोड़ों रुपए ले लिए जाते।
फ़िर उन्हें बाक़ी सब विद्यार्थियों के साथ ही परीक्षा की दौड़ में बैठाने का नाटक रचा जाता।
उस दिन सुल्तान जिस बस को चला रहा था उसमें ऐसे ही विद्यार्थी परीक्षा केंद्र में भेजने के लिए बैठाए गए थे। ग्यारह बजे से शुरू होने वाली परीक्षा के लिए इन निकम्मे विद्यार्थियों को आठ बजे ही बुला लिया गया और बस में बैठा कर परीक्षा केंद्र ले जाने के नाम पर पहले सुल्तान इनकी बस को शहर से दूर एक निर्जन स्थान पर ले गया।
वहां एक छायादार पेड़ के नीचे गाड़ी रोक कर एक दलालनुमा बिके हुए अध्यापक ने उन बच्चों को ऑब्जेक्टिव- टाइप प्रश्नों के संभावित उत्तर बोल- बोल कर रटवा दिए। किसी नर्सरी राइम की भांति इन तोतों को उत्तर याद करवा कर बस को परीक्षा केंद्र की ओर ले जाया गया।
परीक्षा का समय होते ही ऐन वक्त पर इन विद्यार्थियों को परीक्षा भवन में घुसाया गया ताकि इनका अन्य विद्यार्थियों से कोई संपर्क- संचार नहीं हो सके।
इस तरह जो बच्चे साल भर कभी किताब के दर्शन करते हुए नहीं देखे गए वो परीक्षा में सफ़लता का परचम लहराते हुए देखे गए।
दूसरी ओर सामान्य घरों के वो बच्चे जो अपनी मेहनत और भाग्य के भरोसे साल भर तक कड़ी मेहनत से पढ़ाई करते हुए अपने परिजनों के सपनों को सहलाते रहे परीक्षा में विफलता की मोहर लगवा कर नाकाम घोषित हो गए।
ऐसे सार्वजनिक दुष्कर्म में अगुआ बन कर डॉक्टर साहब जैसे लोग शामिल थे तो वहीं गुंडागर्दी से तमाम काले कारोबार को संरक्षण देते सुल्तान और अताउल्ला जैसे प्यादे भी।
बड़े -बड़े दफ्तरों में बड़े- बड़े ओहदों पर बैठे सफ़ेदपोश लोग और उनकी पीठ पर अपना वरदहस्त धरे उनसे भी माननीय- सम्माननीय देश और समाज के कर्णधार लोग!
जिस दिन पहली बार किसी राजा ने जनता के कारोबार- व्यवहार के लिए रुपया या पैसा बनाया होगा, उसने कहां सोचा होगा कि ये बेजान ठीकरे किसी दिन भगवान की तरह पूजनीय हो जाएंगे और चंदा व सूरज की तरह लोगों के दिमाग़ की परिक्रमा करेंगे!

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