टापुओं पर पिकनिक - 69 in Hindi Novel Episodes by Prabodh Kumar Govil books and stories Free | टापुओं पर पिकनिक - 69

टापुओं पर पिकनिक - 69

- ये कोई चिंता की बात नहीं है आंटी, आप टेंशन मत लीजिए। मनन ने कुछ सकुचाते हुए कहा।
वैसे इन तीन - चार दिनों में वो आगोश की मम्मी के साथ काफ़ी घुल- मिल गया था और आगोश के जापान चले जाने के बाद भी कभी- कभी आगोश के घर उसकी मम्मी से मिलने आता रहता था।
वो आगोश की मम्मी का अकेलापन और मायूसी समझता था इसीलिए उनके बुलाने पर कभी - कभी चला आता था।
लेकिन आगोश की मम्मी ने अब उससे जो शंका जाहिर की थी उससे वह थोड़ा चिंतित हो गया था।
मम्मी ने उसे जो काम सौंपने की लंबी- चौड़ी भूमिका बांधी थी वो दरअसल यही था कि आगोश की मम्मी आगोश को लेकर काफी परेशान थीं।
अब उन्होंने मनन को साफ- साफ ही बताया था कि उन्हें आगोश की ज़िन्दगी को लेकर सचमुच शंका होने लगी है। आगोश कैसा है, उसे घर - गृहस्थी बसाने की कोई चाह ही नहीं है।
अब देखो, उसकी उम्र भी बढ़ती जा रही है। अरे, जो लड़के आजकल देर तक शादी नहीं करते उसका कोई न कोई कारण ज़रूर होता है। किसी को नौकरी की फ़िक्र होती है, किसी पर घर की ज़िम्मेदारियां होती हैं, किसी के बड़े भाई- बहन कुंवारे होने के कारण वो शादी की नहीं सोच पाता... पर यहां ऐसा क्या है? ये क्यों शादी की तरफ़ ध्यान नहीं देता? इसे क्या कमी है!
- आंटी, वो स्वाभिमानी है, पहले अपने पैरों पर खड़ा होकर अपना पैसा कमाना चाहता है। मनन ने आगोश का पक्ष लेते हुए कहा।
- तू कुछ भी कह, मुझे तो लगता है वो लड़कियों से मिलना ही नहीं चाहता। मम्मी बोलीं।
शुरू में मनन ने इस बात को बहुत हल्के- फुल्के लिया। बल्कि उसने तो आंटी की बात हंसी में ही उड़ा दी। वह बोला- ये कोई प्रॉब्लम नहीं है! अभी तो हमारे दोस्तों में से भी कई ने शादी नहीं की।
- अरे बेटा, मेरी बात समझ! मैं दूसरी बात कह रही हूं। लड़के शादी नहीं करते तो कोई बात नहीं, चलो, कर लेंगे... पर वो लड़कियों के पीछे पागल तो रहते हैं.. उन्हें पटाने के मौक़े तो ढूंढते रहते हैं... उनसे दोस्ती गांठने की जोड़-तोड़ तो करते हैं! पर इस आगोश को देख, ये तो लड़कियों को कुछ समझता ही नहीं। इसे किसी लड़की से कुछ होता ही नहीं।
- पर आंटी, हमने तो सुना था कि आगोश ने आपके यहां काम करने वाली लड़की का किस अपने पापा के सामने ही ले लिया था...
जोश - जोश में मनन कह तो गया पर सहसा उसे ख़्याल आया कि वो दोस्तों से नहीं बल्कि आगोश की मम्मी से मुखातिब है तो वो संकोच से चुप हो गया।
पर मम्मी को उसका इस तरह खुल कर बोलना अच्छा लगा, बोलीं- बेटा, ये एबनॉर्मल बिहेवियर है... लड़की से इश्क होने या शारीरिक संपर्क का दिखावा वही लड़के करते हैं जो वास्तव में लड़की से उत्तेजित नहीं होते। जिनका शरीर लड़की का बदन नहीं चाहता! वरना तो लड़के इन बातों को छिपाते हैं, चोरी- छिपे करते हैं।
मनन सन्न रह गया। ये बड़ी बात नहीं थी कि आगोश की मम्मी खुल कर उससे ये सब बातें कह रही थीं बल्कि बड़ी बात ये थी कि वो शायद सही कह रही थीं।
मनन को याद आया कि आर्यन और मधुरिमा ने किस तरह खुलेआम आगोश के सामने ही संबंध बना लिया और उस समय भी आगोश बिना विचलित हुए बैठा शराब पीता रहा था... सच में, हम सब लोग रिसॉर्ट में भी उसका अलग सा व्यवहार देख ही रहे थे।
- क्या सोच रहा है? यही काम बताने वाली थी मैं तुझे। बेटा, अबकी बार आगोश यहां आए तो तू पता लगाना कि उसके मन में क्या है!
मनन हंसने लगा।
मम्मी थोड़ी दृढ़ता से बोलीं- मैं तुझे इनाम दूंगी। तेरी शादी में तेरी बहू को हीरों का हार दूंगी...तू तो मुझे किसी तरह आगोश का दिल टटोल कर बता दे।
उस दिन रात को मनन ने सिद्धांत को ये सब बताया कि आगोश की मम्मी उससे आगोश के बारे में क्या- क्या कह रही थीं तो सिद्धांत तुरंत बोल पड़ा- साले, उन्हें डाउट हो रहा है कि कहीं आगोश "गे" तो नहीं है। वो ये नहीं जानती हैं कि आगोश अपने डैडी के कारनामों के कारण गुस्से में रहता है और घर- बार बसाने के बारे में कुछ नहीं सोचता, उनकी बातों का जवाब नहीं देता।
मनन कुछ गंभीर हो गया। उसे इस बात पर आश्चर्य हो रहा था कि उसका ध्यान इस बात पर क्यों नहीं गया? वो ये सोच ही नहीं पाया। सिद्धांत ने छूटते ही समझ लिया।
- ज़रूर ये ही बात होगी... वरना घर बार बसाने या शादी करने की अभी कौन सी उसकी उम्र निकल गई... हम सब भी तो बैठे हैं अभी ऐसे ही.. हमने कहां शादी की है? मनन बोला।
- ले बेटा, तेरी बहू के लिए हीरों के हार का इंतजाम हो गया, अब शादी के लिए लड़की का भी इंतजाम कर ले। सिद्धांत ने कहा।
- यार, पर आंटी के दिमाग़ में ये बात आई कैसे? मनन ने भोलेपन से पूछा।
- अबे, सिम्पल है न, आगोश तेन के साथ जैसे घुल मिल गया और जापान पहुंच गया उससे उन्हें संदेह होता होगा... उन्हें अभी ये कहां मालूम है कि तेन शादी- शुदा है, वो मधुरिमा को शादी करके ही अपने साथ ले गया है! सिद्धांत ने समझाया।
- हां यार, हो सकता है। मनन ने कहा। मनन कुछ सोच कर बोला- मैं कल आंटी को पूरी बात बता दूंगा कि मधुरिमा की शादी किस तरह तेन के साथ हुई है और जापान में आगोश तेन के साथ नहीं रहता। उसने वहां  अपनी कंपनी बनाई है।
- मधुरिमा के घरवालों को पता चल गया तो वो आकर सबसे पहले तेरे जूते मारेंगे। सोच ले। सिद्धांत ने मनन को डराया।
मनन चुप हो गया।
सिद्धांत बोला- और पता चलेगा ही, तू जैसे ही ये बात आगोश की मम्मी को बताएगा वो फ़ौरन फोन करके मधुरिमा की मम्मी से पूछ लेंगी।
मनन को असमंजस में पड़ा देख कर सिद्धांत बोला- मस्त रह, तू भी चुप लगा जा। आगोश आयेगा तब देखा जाएगा। उसकी मम्मी भी अब तुझे क्यों बुलाएंगी, जब आगोश यहां है ही नहीं।
- यार मुसीबत है, जवान होने के बाद शादी नहीं करो, लड़की नहीं पटाओ तो घर वाले क्या- क्या सोचने लग जाते हैं... शादी करो, शादी कर ली तो बच्चे पैदा करो... साला ये देश कभी नहीं सुधर सकता... ये जनसंख्या का वर्ल्ड रिकॉर्ड बना कर ही रहेगा। एक दिन चाइना को पीछे छोड़ कर नम्बर वन होकर ही रहेगा। मनन जैसे बड़बड़ाने लगा।
सिद्धांत हंस कर बोला- तू कॉन्डोम्स की फैक्ट्री खोल ले... और हाथ हिलाता हुआ गाड़ी में बैठ गया।
आख़िर साजिद के अब्बू ने साजिद और मनप्रीत को जापान जाने की अनुमति दे दी।
- बेचारा कब से दिन- रात मेहनत कर रहा है, थोड़े दिन उसे भी घूम फ़िर आने दो, साजिद की अम्मी की ये सिफारिश काम कर ही गई।
पर मज़े की बात ये थी कि साजिद की अम्मी ने साजिद को जब ये खुशखबरी दी तो इस तरह से दी कि साजिद हत्थे से ही उखड़ गया। वह गुस्से से उबल पड़ा और अम्मी से ही भिड़ गया।
अब्बू से परमीशन मिल जाने के बाद अम्मी साजिद के कमरे में आकर चहकती हुई बोलीं- ले ज़िद्दी, तेरे अब्बू ने तुझे घूमने जाने की रजामंदी दे डाली है रे! बेकरी का काम जावेद को लेकर वो ख़ुद देख लेंगे थोड़े दिन। और वैसे भी मनप्रीत तो है ही यहां!
साजिद ने उन्हें गुस्से से देखते हुए कहा- बेग़म को यहीं छोड़ कर हनीमून पर जाऊं???
बेटे साजिद के इस तेवर से अम्मी एकदम सहम गईं। चारों ओर से सबके हंसने की आवाज़ आई।
अम्मी घर में और सब बच्चों की तरह साजिद को उसके घर के नाम, ज़िद्दी से ही पुकारती थीं। पर अब निकाह के बाद साजिद इस नाम से चिढ़ता था। उसे लगता था कि कम से कम दुल्हन के सामने तो उसे उसके पूरे नाम से ही पुकारा जाए।
उसका ऐतराज़ देख कर अम्मी मनप्रीत को भी उसके इसी नाम से पुकारतीं। शादी के बाद शुरू के कुछ दिन तो उन्होंने मनप्रीत को आयशा कहना शुरू कर दिया था। पर मनप्रीत इस नाम से पुकारने पर कोई जवाब या प्रतिक्रिया ही नहीं देती थी। वह भी चिढ़ती।
हार कर अम्मी ने उसे मनप्रीत ही बुलाना शुरू किया।
सारा मोहल्ला समझ गया कि शादी- ब्याह के लिए धर्म परिवर्तन का ढोंग केवल देश के कानून और पंडित - मौलवियों के दिखावे के लिए है। इस स्वांग का असल ज़िंदगी में कोई मतलब नहीं।
वैसे भी जाति- धर्म तो नेताओं को वोट गिनने के लिए चाहिए।
जीवन में तो जो जैसा है वो वैसा ही रहना है!