टापुओं पर पिकनिक - 82 in Hindi Novel Episodes by Prabodh Kumar Govil books and stories Free | टापुओं पर पिकनिक - 82

टापुओं पर पिकनिक - 82

डॉक्टर साहब अर्थात दिवंगत आगोश के पिता का अब ज़्यादा समय दिल्ली में ही बीतता था। उनकी पत्नी भी अब घर में अकेली रह जाने के कारण ज़्यादातर उनके साथ ही रहती थीं। यहां का उनका लंबा- चौड़ा बंगला अक्सर ख़ाली ही पड़ा रहता।
उनकी क्लीनिक में भी अब काफ़ी कुछ बदलाव आ गए थे। केवल उनकी ही नहीं, बल्कि शहर के बाक़ी अधिकांश निजी हॉस्पिटल्स, नर्सिंग होम्स और क्लीनिक भी अब अधिकतर इसी ढर्रे पर चल पड़े थे।
वहां नए- नए नौसिखिया डॉक्टर्स बैठते किंतु विशेषज्ञों के नाम पर ढेर सारे प्रतिष्ठित पुराने डॉक्टर्स की नाम पट्टिका लगी रहती।
मरीजों को इस भ्रम में रखा जाता कि जैसे ये सब काबिल अनुभवी डॉक्टर्स भी यहीं बैठते हैं पर असलियत ये थी कि ये नामधारी चिकित्सक महीनों में एक बार वहां आकर शक्ल दिखाते। उसके बदले में मोटी रकम उन्हें घर बैठे ही पहुंचाई जाती।
उनके भ्रम में अप्रतिष्ठित कॉलेजों से निकले, अधकचरी शिक्षा पाए ये नौसिखिया डॉक्टर्स मरीजों से भारी फ़ीस वसूलते।
पेशे की एथिक्स की जम कर धज्जियां उड़ाई जाती थीं। मरीज़ की जेब देख कर रोग की भयावहता समझाई जाती।
जिन हाथों में रोगी के परिजन डॉक्टर को भगवान समझ कर उसकी जान सौंपते वही हाथ इलाज करने से पहले मरीज की जेब में हाथ डाल कर ये टटोलते कि मरीज़ के पास मेडिकल की कौन सी बीमा पॉलिसी है? फ़िर उसकी अधिकतम सीमा तक दोनों हाथों से उसे लूटा जाता, चाहे इससे बेचारे मरीज के शरीर का कीमा ही क्यों न बन जाए। उसके बेवजह ढेरों टेस्ट और जांचें करवाई जाती।
इतना ही नहीं, बल्कि ये जांचें भी डॉक्टरों की अपनी पसंदीदा लैबों में कराने पर ज़ोर डाला जाता। ताकि वहां से भी डॉक्टर को मनमाना कमीशन मिल सके।
फ़िर सिलसिला शुरू होता रोगी को अकारण दवा, इंजेक्शंस और महीनों चलने वाली गोलियां देने का। ज़रा- ज़रा सी बात में महंगे ऑपरेशंस बताने का।
मज़े की बात ये थी कि प्राकृतिक, घरेलू व आयुर्वेदिक नुस्खे को धीमा बता कर मरीजों को इन पांच सितारा अस्पतालों में खींचा जाता और फिर वो ही महीनों अथवा जीवनभर चलने वाले इलाज रोगी को बताते। हज़ारों और लाखों के बिल बनते।
इन तथाकथित डॉक्टरों का कुतर्क ये होता कि जब हमने डॉक्टरी पढ़ने में बेतहाशा धन ख़र्च किया है तो अब हम उसकी वसूली क्यों न करें?
जबकि डॉक्टरी पढ़ने ही नहीं, बल्कि उसमें नाकाबिल होते हुए भी प्रवेश पाने के लिए भी चोर - दरवाज़े से अकूत धन ख़र्च किया जाता।
इन लालची अमानुषिक वृत्ति के सौदागरों के काले बोझ तले ईमानदारी और सच्चाई से काम करने वाले चिकित्सक भी पिसते।
इस तरह जगह- जगह पर एक पवित्र पेशे पर बट्टा लगा कर उसे निरंतर बदनाम किया जा रहा था।
और आगोश के पिता तो इस सब से भी कहीं आगे थे। बेबस, लाचार मरीजों के इलाज के दौरान शरीर के नाज़ुक, अहम अंग निकाल लेना और फ़िर उसकी तिजारत करना उनका शगल बन चुका था। उनका संपर्क और रैकेट अब दुनिया भर में फ़ैला था तथा वो करोड़ों रुपए की काली कमाई करने में लगे हुए थे।
जगह - जगह पर महंगी व नकली दवाओं में उनके भारी कमीशन तय थे।
इंपोर्टेड दवा और इंजेक्शंस के नाम पर वो विवश लोगों से मनमानी वसूली कर रहे थे।
उनके जूनियर लोगों और अन्य सहायक लोगों में भारी आपराधिक वृत्ति वाले लोग जगह पा चुके थे।
और ये सब सफ़ेदपोश संभ्रांत दिखने वाले लोगों की मिलीभगत से हो रहा था।
उनका हॉस्पिटल दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था और उसका नाम अब देश की सीमाओं से बाहर भी ख्याति पाने लगा था।
आगोश के जाने के बाद से ही उसकी मम्मी को कुछ अजीब से दौरे पड़ने लगे थे। उनकी तबीयत भी अब ठीक नहीं रहती थी।
एक दिन डॉक्टर साहब रात को बेडरूम में जब उनके साथ थे, तो रोती हुई पत्नी ने उनसे एक फरमाइश कर डाली। वैसे इसे फरमाइश कहना तो ग़लत ही होगा क्योंकि फरमाइश तो अक्सर ख़ुशी से की जाती है। पर आगोश के इस दुनिया से जाने के बाद डॉक्टर साहब की पत्नी के तो कोई सुख या ख़ुशी आसपास भी नहीं फटकती थी। ऐसे में कैसी फरमाइश?
तो उन्होंने अपने पति से एक इल्तिज़ा कर डाली। वो चाहती थीं कि उनके हॉस्पिटल के सामने बड़े से अहाते में बने शानदार बग़ीचे के बीचोंबीच आगोश की एक मूर्ति लगाई जाए!
लो, इसमें भला डॉक्टर साहब को कैसा ऐतराज होता?
उनकी मांग फ़ौरन मंज़ूर हो गई और डॉक्टर साहब इस उधेड़बुन में लग गए कि आगोश की कैसी मूर्ति वहां स्थापित करवाई जाए।
आगोश की मम्मी जानती थीं कि ये काम यदि डॉक्टर साहब के भरोसे छोड़ दिया गया तो उनकी मंजूरी मिल जाने के बावजूद इसमें देर होती रहेगी क्योंकि ऐसा काम कभी उनकी प्राथमिकता में तरजीह नहीं पाएगा। हां भर देना अलग बात थी।
अतः उन्होंने इस काम की ज़िम्मेदारी आगोश के दोस्तों को ही देने का मानस बनाया।
उन्होंने एकदिन सिद्धांत, मनन और साजिद को घर बुलवा भेजा।
तीनों को डिनर का न्यौता दिया गया।
वैसे भी आगोश के जाने के बाद से सब कुछ अस्त- व्यस्त हो गया था। उसकी मम्मी चाहती थीं कि इस बहाने आगोश के दोस्तों को एक बार फ़िर से इकट्ठा तो करें। ये सच था कि पुराने दिन तो अब वापस लौटाए नहीं जा सकते थे पर उनकी यादों को याद करने का ये बहाना भी तो कोई कम सुकून देने वाला नहीं था।
कैसा- कैसा सा तो लगा सबको एकसाथ खाने की मेज पर आगोश के बिना बैठना।
उसकी मम्मी ने ढेर सारी चीज़ें बनवाई थीं, हां ये बात और थी कि कुछ तो ऐसा ज़रूर था जो किसी का भी स्वाद हमेशा जैसा नहीं आया।
और इसी बीच खाने के दौरान मम्मी ने वो प्रस्ताव रखा, जिसकी स्वीकृति वो डॉक्टर साहब से पहले ही ले चुकी थीं।
- बेटा, तुम लोग इन दिनों ज़्यादा व्यस्त तो नहीं हो, मुझे तुमसे एक ज़रूरी सहायता लेनी है। उन्होंने कहा।
- अरे आंटी, आप आदेश तो कीजिए, हम किसमें व्यस्त होंगे? मनन ने कहा।
- बताइए आप? सिद्धांत भी बोल पड़ा।
- बेटा, अपने हॉस्पिटल के सामने जो बड़ा गार्डन है न...
उनकी बात अधूरी रह गई, बीच में ही साजिद बोल पड़ा- गार्डन कहां है, वहां तो पार्किंग है...
- अबे यहां नहीं, दिल्ली में... सिद्धांत बोल तो पड़ा पर उसे एकाएक ख्याल आया कि आंटी के सामने ही वो ये किस तरह बोल गया। उसने झेंप कर होठ काटा और नीचे गर्दन करके धीरे से बोला- आंटी यहां की नहीं, दिल्ली वाले बड़े हॉस्पिटल की बात कर रही हैं, हैं न आंटी?
- हां रे वही तो, यहां तो जगह ही कितनी सी है। आंटी ने कहा।
- यहां तो पुराना बंगला था, उसी में एक्सटेंशन करके क्लीनिक बनाया तो ज़्यादा जगह कैसे मिलती? सामने तो सड़क थी। मनन ने जैसे सफ़ाई दी।
आंटी बोल पड़ीं- तुम लोगों को तो क्या पता होगा, जब मैं यहां आई थी तब तो ये सारा जंगल था, यहां कुछ भी नहीं था, आगोश तो तब पैदा ही नहीं हुआ था।
- आगोश पैदा भी नहीं हुआ था? मनन आश्चर्य से बोला।
- बात तो सुन न... सिद्धांत ने उसे टोका। - आगोश कैसे होता? जब आंटी नई- नई शादी होकर ही यहां आई थीं तो..
- क्यों नहीं हो सकता, ये भी तो हो सकता है कि अंकल- आंटी कहीं और से यहां आए हों, आगोश तब हो ही चुका हो। मनन ने मानो हार न मानते हुए कहा।
- नहीं बेटा, हम कहीं से नहीं आए, ये तो आगोश के दादाजी की पुश्तैनी हवेली थी, इस क्लीनिक वाली जगह पर तो तीन ऊंची- ऊंची छतरियों में दादाजी के पिताजी की बैठक थी। वो नामी वकील थे।
- अच्छा आंटी। छतरियों में बैठक? मनन ने आश्चर्य व्यक्त किया।
- तू आंटी को बोलने देगा या तू ही बोलेगा... काम तो सुन, आंटी क्या बता रही हैं। साजिद ने जैसे मनन को डांट लगाई।
और तब आंटी फ़िर से एकाएक गंभीर हो गईं। वो कुछ भीगी सी आवाज़ में बोलीं- तुम लोग किसी से आगोश की एक सुंदर सी मूर्ति बनवाओ...
बात अधूरी ही रह गई क्योंकि आंटी का गला रूंध गया। तीनों गंभीर हो गए।


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