टेढी पगडंडियाँ - 20 in Hindi Novel Episodes by Sneh Goswami books and stories Free | टेढी पगडंडियाँ - 20

टेढी पगडंडियाँ - 20

 

टेढी पगडंडियाँ 

 

20 

 

किरण उस दिन पूरी खुश थी । हर औरत का सपना होता है एक घर जिसे वह अपने तरीके से सजा सके , सँवार सके और आज उसका यह सपना पूरा हो गया था । आज वह इस कोठी की मालकिन हो गयी थी । उसके पैर जमीन पर नहीं पङ रहे थे । उसकी तकदीर इस तरह चमकेगी , आज से पाँच महीने पहले उसने सोचा न था । वह एक एक चीज को छू कर देखती । उसे कई कई बार कपङे से पौंछती । यहाँ से उठाकर वहाँ करती नाचती फिर रही थी । उसने बाबाजी की फोटो के सामने सिर झुकाया । उनसे मन ही मन माफी माँगी । इन पाँच महीनों के शुरुआती दिनों में उसने निरंजन को मन ही मन कितना कोसा था । जी भर कर गालियाँ दी थी अपने मन में । यहाँ तककि उसके मर जाने की कामना भी कर डाली थी एक दिन । पर आज अगर ये निरंजन न होता तो क्या उसे बङे भाई और भाभी मिलते । यह इतनी सुंदर सी कोठी उसके नसीब में होती । उसने आगे बढकर चन्न कौर के पाँव छू लिये । चन्न कौर ने मुस्कुरा कर अवतार सिंह को देखा और दोनों हवेली लौट गये ।
दोपहर में निरंजन और गुरनैब वहाँ आये । निरंजन को वहाँ छोङकर गुरनैब घर लौट गया । किरण ने मीठे चावल बनाये थे । आज इस घर में उसकी पहली रसोई थी । उसने थाली में जर्दाचावल निकाले और निरंजन को थाली पकङा दी । फिर बसंत और देसराज को उनका हिस्सा देने गयी और पकङाकर तुरंत लौट आई । तब तक निरंजन ने शहर के नामी होटल से रोटी सब्जी मँगा ली थी । किरण ने रोटी परोसी और दोनों रोटी खाने लगे । रोटी खाने के बाद वे बातों में खो गये । वह दोपहर किरण ने निरंजन के साथ इस घर को सजाने के लिए चीजें गिनने में बिताई । क्या क्या शहर से खरीद कर लाना है । कहाँ रखना है । कैसे क्या सजाना है । पहले क्या जरुरी है । यह सब सोचते विचारते दोपहर से शाम हुई और शाम से रात । इस बीच गुरनैब दो बार आकर लौट गया था । दोनों को बातों में मगन और खुश देख उसका टोकने का मन ही नहीं किया ।
अब घर जाना ही होगा - निरंजन खोसे पहनकर जाने के लिए तैयार हो गया । किरण का मन अभी भरा नहीं था ।
थोङी देर और रुक जा न , फिर चले जाना ।
जाना तो पङेगा न । वैसे जाने को तो मेरा मन भी नहीं कर रहा पर सुबह आना है तो इस समय जाना होगा ।
किरण ने बेमन से निरंजन को रास्ता दे दिया । दोनों दरवाजे तक साथ आये । निरंजन ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की तो वह दूर तक उसे जाते हुए तबतक देखती रही जब तक वह अंधेरे में मिलकर गायब नहीं हो गया । जब उसकी परछाई तक दिखनी बंद हो गयी तो उसने ठंडी साँस भर कर दरवाजा बंद किया । फिर वह धीरे धीरे चलती हुई अंदर आकर बिस्तर पर टेढी हो गयी । सूने घर में अकेले रहने का उसका यह पहला अवसर था । वहाँ उसके मायके में इकलौती झोंपङी थी जिसमें वह माँ , बापू और बीरे के साथ सोती थी । यहाँ इस गाँव में आने के बाद वह घेर में चार महीने से कुछ दिन ज्यादा रही थी । निरंजन वहां भी शाम होते ही घर चला जाता था पर बसंत और देसराज वहीं घेर में शोर करते घूमते रहते थे । बसंत तो लगभग बीरे की उम्र का ही था जिसके रहते उसे एक पल के लिए भी अकेलापन महसूस नहीं हुआ था । आज न बीरा था न बसंत । और तीन कमरों वाली इस कोठी में वह अकेली लेटी थी । उसे घबराहट महसूस हुई । उसने उठकर लाईट जलाई । फ्रिज से पानी लेकर पिया । लाईट जलती छोङकर वह दोबारा सोने की कोशिश करने लगी पर नींद तो आज उसकी बैरन हो गयी थी ।
अचानक किसी ने दरवाजा खटखटाया । उसने घङी देखी । अभी रात के साढे बारह बजे थे । इस समय कौन हो सकता है जो आधी रात को दरवाजा खटखटाने आ गया । वह उठकर दरवाजे तक गयी पर दरवाजा खोलने की उसकी हिम्मत न हुई । एक बार उसका मन किया कि बसंत या देसराज को हाँक लगाले पर पैर जैसे जम गये थे । कुंडा लगातार बज रहा था । आखिर उसने हिम्मत जुटाई और डरते डरते पूछा – कौन है ?
मैं हूँ चाची , गुरनैब ।
उसने दरवाजा खोल दिया । गुरनैब कमरे की ओर बढा – चाचा कहाँ है ?
चाचा , वह तो तीन घंटे पहले ही यहाँ से चला गया था । नौ बजे होंगे उस समय । ज्यादा से ज्यादा सवा नौ ।
पर घर तो वह अब तक नहीं पहुँचा । कहाँ रह गया होगा । इंतजार कर करके बीजी ने लेने भेजा है ।
यहाँ से तो चला गया । घर जाने के लिए ही बोलकर गया था , फिर अभी तक पहुँचा क्यों नहीं ।
कुछ कह रहा था क्या
नहीं तो ऐसा तो कुछ नहीं कहा । हाँ , कह रहा था कि कल सवेरे आना है तो अब जाना चाहिए । फिर मोटरसाईकिल स्टार्ट की और चला गया ।
गुरनैब को चिंता होने लगी थी पर उसने किरण को होंसला दिया – तू फिक्र मत कर । मैं देखता हूँ । तू दरवाजा बंद करके सो जा ।
गुरनैब जैसे आया था , वैसे ही लौट गया ।. किरण ने दरवाजा बंद किया और कमरे में आ गयी । नींद तो पहले ही गायब हो गयी थी . अब उसमें चिंता और मिल गयी थी ।
ये निरंजन आखिर गया तो गया कहाँ
सुबह गिलपत्ती के कुछ लङके गाँवों से दूध इकट्ठा करके शहर में घर घर दूध देने का काम करते थे । ये लङके साढे चार बजे घर से निकलते । फिर गाँव गाँव जाकर दूध इकट्ठा करते और छ बजे शहर पहुँचा देते । इनमें से एक लङके की नजर सङक के किनारे खून से लथपथ निरंजन पर पङी तो वह बुरी तरह से चीखा । आवाज सुनकर साथ के खेतों में जंगलपानी के लिए लोटा लिए जाते लोग आ जुटे ।
अरे ये तो निरंजनसिंह है । हवेली वालों का छोटा सरदार । ये यहाँ इस हालत में ।
किसी ने दौङकर हवेली में खबर कर दी थी ।

 

बाकी कहानी अगली कङी में ...

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