टेढी पगडंडियाँ - 21 in Hindi Novel Episodes by Sneh Goswami books and stories Free | टेढी पगडंडियाँ - 21

टेढी पगडंडियाँ - 21

 

टेढी पगडंडियाँ

 

21

 

रात अपने अंतिम पङाव पर थी । चांद अपनी यात्रा पूरी कर लौट चुका था । नीले आसमान का रंग राख जैसा हुआ पङा था । तारे गायब हो चुके थे । पर सूरज ने अपनी किरणें बिखेरनी शुरु नहीं की थी । शबनम की बूंदें सारी धरती पर बिछी हुई थी तो घास गीली थी । पेङों की पत्तियाँ कोहरे में लिपटी हुई ऐसे लग रही थी जैसे काले रंग के घोल में से निकालकर सूखने डालने के लिए पेङों पर लटका दी गयी हों । गुरद्वारे में पाठी ने पाठ करना शुरु कर दिया था । गाँव के इकलौते शिवमंदिर में घंटे और शंख की मिलीजुली आवाजें आने लगी थी । गाँव ने अपना ओढा हुआ खेस तहाया और लोटा लेकर खेत की ओर चल पङा । कुछ लोग नहा धोकर गुरद्वारे , मंदिर की ओर चले ।
अवतार सिंह अभी अभी सोकर उठा था । उसने उठकर मंजा टेढा किया था और नलके पर मुँह धोने जा ही रहा था कि यह खबर लिए हुए गाँव के तीन चार लोग हवेली आ पहुँचे । उनकी बात सुनते ही उसके हाथ से परना और लोटा छूट कर नीचे गिर गया । बदहवास सा वह उसी हालत में बाहर दौङा । उसके पीछे पीछे गाँव से आये लोग भी दौङते हुए हवेली से बाहर हो गये । चन्न कौर ने अभी चूल्हा जलाया ही था । पतीली उसके हाथ में ही रह गयी । पति को यूँ जाते देख कर उसका माथा ठनका – क्या हुआ जी । ऐसे कैसे चल दिये । कहाँ जा रहे हो – वह पीछे पीछे भागी पर तब तक वे लोग दरवाजा पार कर गये थे तो वह अंदर पलटी - गुरनैब वे गुरनैब , बाहर देख तो सही , क्या हुआ है । उठ वे जलदी , देख वे जाके – वे अधीर होके पुकार उठी ।
गुरनैब ने सारी रात चाचे को ढूँढते हुए निकाली थी और थक हार कर तीन बजे ही लौटा था । अभी थोङी देर पहले ही उसकी आँख लगी थी । माँ की आवाज सुनते ही आँखें मलता हुआ बाहर आ गया – क्या हुआ बीजी ।
ओये देख तो जाके । बाहर हुआ क्या है । तेरा बाप अभी सोके उठा ही था । मुँह धोने के लिए नलके पर गया । अभी मुँह धो ही रहा था कि गाँव के दो तीन आदमी घबराये से आये और उसे साथ ले गये । वह जैसे खङा था , उसी तरह उनके साथ चला गया । न पगङी बाँधी । न जूती पहनी । रात के उन्हीं कपङों में चला गया । मेरा दिल बहुत घबरा रहा है ।
अगली बात सुनने के लिए गुरनैब वहाँ नहीं रुका । वह भी बाहर चल पङा । दूर से ही सङक के किनारे बङी भीङ लगी दिख रही थी । लोग यहां वहाँ झुंड में खङे चर्चा कर रहे थे ।
ट्रक निकल गया है ऊपर से ।
ट्रक ओए ! क्या कह रहा है यार । ट्रक आधी रात को गाँव में कहाँ से आया । यहाँ गाँव में तो दिन में भी साल दो साल में कोई एक ट्रक आता है । फिर आधी रात में कैसे ?
हाँ ओए , अब तो किसी के मकान की उसारी का काम भी नहीं चल रहा कि ईंट रेता लेकर कोई ट्रक आया हो ।
पर है तो ये ट्रक ही । देख कच्ची सङक पर टायरों के निशान बने हैं । देखा तूने कैसे सीने के ऊपर से दो बार टायर निकला है । पसलियाँ टूट गयी है ।
पीछे से टक्कर लगी है । बचने के लिए मोटरसाइकिल सङक से नीचे किनारे पर उतारा हुआ है ।
गुरनैब ने आगे बढकर देखा । खून के समंदर में निरंजन सीधा लेटा हुआ था । नाक और मुँह से भी खून बह रहा था । सफेद कुरता पजामा खून से लाल हो गया था ।
ओए , भाग के हवेली से कार निकाल कर लाओ - उसने भीङ में से किसी लङके से पुकारकर कहा - चाचे को शहर लेके जाना है । चोट लगी है । अभी पट्टी करवा देंगे । ठीक हो जाएगा ।
लङका अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ । अवतार सिंह नीचे सङक किनारे मिट्टी में ही गुमसुम हुआ बैठा था । गाँव के सयाने लोगों ने उसे कंधे से पकङ रखा था । वह बोखलाया सा भाई को देखे जा रहा था ।
गुरंनैब ने इंतजार नहीं किया । तुरंत जाकर कार ले आया और निरंजन को कार में डालकर शहर ले चला । गाँव के अति उत्साही लङकों ने भी अपने वाहन निकाले और पीछे लगा लिये । अवतार सिंह को लङकों ने अपनी कार में बैठा लिया ।
दौङती हुई कार चंद मिनटों में अस्पताल के आँगन में जा खङी हुई । शहर के नामी डाक्टर ने निरंजन को देखते ही अपनी रिपोर्ट में लिखा – ब्राट डैड । ज्यादा खून बह जाने से निरंजन ने रात को ढाई बजे ही दम तोङ दिया था ।
पुलिस केस बन गया था इसलिए पुलिस मौके पर पहुँच गयी पर अवतार सिंह और गुरनैब ने एफ आई आर कराने से मना कर दिया ।
“ क्या य़े सब करके मेरा शेर वापिस आ जाएगा “
पोस्टमार्टम के नाम पर भी दोनों ने हाथ जोङ कर मना कर दिया था – देखिए , पहले ही बेचारे की बहुत दुर्गति हो चुकी है । पोस्टमार्टम के नाम पर और चीर फाङ मत करिये डाक्टर साहब । हमने न तो कोई मुकद्दमा लङना है , न क्लेम लेना है तो चीरफाङ कराकर क्या करेंगे । देह का सत्यानाश करना हुआ न पोस्टमार्टम ।
सरदार साहब , आप इस इलाके के जाने माने आदमी है । छोटे सरदार के साथ हुआ यह हादसा कोई छोटी बात नहीं है । कोई दुशमनी या किसी पर शक है तो बताइये , हम उसे छोङेंगे नहीं – थानेदार ने एक बार फिर से टोका था अवतार सिंह को ।
गुरनैब ने हाथ जोङ दिये थे । छोटी बङी कई औपचारिकताओं के बाद लाश उन्हें सौंप दी गयी थी । जब वे निरंजन को लेकर हवेली पहुँचे , सारा गाँव हवेली में जमा था । पल भर में हवेली में रोना धोना मच गया । गुरनैब का दिमाग सुन्न हो गया था । जैसे जैसे कोई उसे बताता जाता , वह कर रहा था पर उसकी सोचने समझने की शक्ति खतम हो चुकी थी और अवतार सिंह को तो लग रहा था , किसी ने उसका आधा शरीर काटकर फेंक दिया हो । बिना एक हाथ , एक पैर और एक आँख के वह कैसे जिएगा , यह सोच सोच कर वह रोये जा रहा था । शाम को दिन ढलने से पहले निरंजन का अंतिम संस्कार हो गया ।

 

शेष कहानी अगली कङी में ...

 

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Jarnail Singh

Jarnail Singh 2 months ago

interesting story

Manya

Manya 2 months ago

S Nagpal

S Nagpal 2 months ago

sneh goswami

sneh goswami 2 months ago