Vah ab bhi vahi hai - 2 in Hindi Novel Episodes by Pradeep Shrivastava books and stories PDF | वह अब भी वहीं है - 2

वह अब भी वहीं है - 2

भाग - 2

मेरी भाभी असल में बहुत खुशमिजाज, खुले दिमाग वाली साफ ह्रदय महिला थीं। और मैं उनकी हंसी-मजाक का अर्थ कुछ और ही लगा बैठा था। विलेन बनने के अपने सपने को लेकर मैं उनसे बतियाता था। मगर जल्दी ही उन्होंने यह समझाना शुरू कर दिया कि, 'ये विलेन-ईलेन बनने का पागलपन छोड़ो, काम-धंधा आगे बढ़ाओ। वहां बड़े-बड़े जाकर ठोकरें खाते हैं। दर-दर भटकते हैं।'

मैं कहता, 'सब खाते होंगे। मैं नहीं खांऊगा, क्योंकि मैं फ़िल्मों में जितने विलेन देखता हूं, उन सबसे शानदार है मेरा शरीर। मैं छः फिट से ज़्यादा लम्बा हूं।' फिर मैं उन्हें अपने बाइसेप्स दिखता। अपनी ताकत के बारे में बताता।

एक दिन उन्होंने इस पर मुझे चिढ़ा दिया। कहा, 'गलैइचा (कालीन) गाड़ी में रखते समय तो कांख मारते हो, वहां हिरोइनों को उठाकर क्या खाक भागोगे।'

तब उनकी यह ठिठोली मुझे व्यंग्य से ज्यादा अपमान लगी थी। मुझे लगा जैसे उन्होंने मेरी मर्दानगी को चुनौती दी है। मैं एकदम बिलबिला पड़ा और आगा-पीछा सोचे बिना, आगे बढ़ कर एक झटके में उन्हें उठा लिया। अपने चेहरे की ऊंचाई तक। मेरी इस हरकत पर वह एकदम गुस्से में आकर चीख पड़ीं थीं, 'मुझे नीचे उतारो।'

मगर मैंने अपनी ताक़त के गुमान में, आंगन का एक चक्कर लगाकर ही उन्हें नीचे उतारा। उनकी आंखों में आंसू आ गए थे। वह विसूरते हुई बोलीं, 'आज के बाद मुझे हाथ लगाया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। तुम्हारी भलाई इसी में है कि अब मेरी छाया से भी दूर रहना। मैं ये अपमान कभी नहीं भुलूंगी। मैं नहीं जानती थी कि तुम ऐसी गंदी हरकत मेरे साथ करोगे। अरे! इतना ही जोश है तो चले क्यों नहीं जाते विलेन बनने।'

समीना झटके से उन्हें ऊपर उठाने, फिर नीचे उतारने में, मेरे हाथ उनके शरीर के उन हिस्सों को भी छू गए थे, जो मुझे किसी भी सूरत में नहीं छूने चाहिए थे। छूने क्या उस ओर मेरी नज़र भी नहीं उठनी चाहिए थी। मैं डर गया कि, शाम को भइया, अम्मा-बाबू सबको पता चलते ही कोहराम मच जाएगा। लेकिन न जाने क्या सोच कर भाभी ने किसी से कुछ नहीं कहा। निश्चित ही वह नहीं चाहती थीं कि घर में टूटन की नींव पड़े। उस दिन बाहर जाने के बाद मैं बहुत देर रात में घर आया। खाना भी बाहर ही खाकर आया। भाभी का बनाया खाना नहीं खाया। उनकी बात मुझे गहरे चुभ गई थी।

अब मैं पहले से ज़्यादा इस माया-नगरी के बारे में सोचने लगा। काम-धाम से मन अब और ज्यादा उचटने लगा था। मगर दूसरी तरफ भाभी कुछ दिन की चुप्पी के बाद फिर बोलने लगीं। जल्दी ही वो फिर पहले की तरह व्यवहार करने लगीं। ऐसे जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। ऐसी निर्मल, साफ हृदय थीं भाभी। लेकिन मैं मुर्खाधिराज इससे और गलत-फ़हमी पाल बैठा। मैं उनसे और ज़्यादा खुले मजाक करने, उन्हें छूने पकड़ने लगा। फिर जल्दी ही होली में उनके साथ वो हरकत कर बैठा, जिसकी पश्चाताप की अग्नि में आज भी जल रहा हूं। भाभी की ससुराल में वह चौथी होली थी। परंपरा के अनुसार उन्होंने अपनी पहली होली मायके में मनाई थी। भइया भी गए थे। चौथी होली तक भतीजा करीब डेढ़ साल का हो चुका था।

भतीजी भाभी के पेट में आ चुकी थी। वह तीन महीने की हो चुकी है, यह सूचना भी पूरे परिवार को हो चुकी थी। हंसी-ठिठोली, रंग-गुलाल दो-तीन दिन पहले से शुरू हो चुका था। तभी मेरे दिमाग में गंदा विचार आया, और होली के दिन मैंने चोरी से उन्हें भांग खिला दी। जब भांग चढ़ गई और भाभी लगीं बहकने, हंसने तो मैंने उन्हें रंग से सराबोर कर दिया।

सारे भाई-बाबू घर के बाहर चबूतरे पर डटे हुए थे। मैं भी वहां जाता और मौका देखते ही फिर अंदर आ जाता। भाभी को रंग लगाता तो वह हंस-हंस कर दोहरी हो जातीं। जब मुझे लगा कि, वह अब पूरी तरह भांग के नशे में टुन्न हैं, तो फिर उन्हें रंग लगाने के बहाने पीछे से जकड़ कर पकड़ लिया। एक हाथ उनके ब्लाउज के अंदर डाल कर अंग से खिलवाड़ करने लगा। दूसरा हाथ उनके पेट पर खिलवाड़ कर रहा था। कोई देख न ले इसलिए जल्दी ही मैं बाहर चला गया।

मगर मन न माना तो कुछ ही देर में फिर अंदर आ गया। इस बार वही हरकत फिर दोहरा रहा था कि भाभी बिफर पड़ीं । मगर हंसे तब भी जा रही थीं । मेरी यह गंदी हरकत अचानक ही आ पहुंचीं अम्मा ने देख ली। वह आगबबूला हो उठीं। मुझे गाली देते हुए बाहर भगा दिया। दांत पीसती हुई बोलीं, 'हरिमियऊ बड़का देइखि लेई तो काट डारी तोहका।'

उन्होंने भाभी को भी खूब डांटा-फटकारा। भाभी का नशा उतरने के बाद उन्होंने उनसे जो भी कहा हो, परिणाम यह हुआ कि, उन्होंने मुझसे बात करनी बंद कर दी। अम्मा भी उसके बाद मुझसे सीधे मुंह बात न करतीं, साथ ही हमेशा यही कोशिश करतीं कि, दुकान की बजाए ज़्यादा वक़्त घर पर ही बिताएं। इससे मेरी बेचैनी और बढ़ गई। फिर मैंने तय कर लिया कि चाहे जैसे हो दो-तीन महीने में ज़्यादा से ज़्यादा पैसा बटोर कर निकल लूंगा विलेन-किंग बनने माया-नगरी के लिए।

अब इस घटना को सोचकर ही मैं कांप उठता हूं कि, मेरे जैसा उजड्ड, मूर्ख शायद ही कोई होगा कि, गर्भवती भाभी के साथ ऐसी शर्मनाक हरकत करते समय इतना तक न सोचे कि इससे उन्हें और गर्भस्थ शिशु, दोनों को नुकसान पहुँच सकता है। दोनों की जान खतरे में पड़ सकती है। लेकिन अगर मैं इतना अच्छा, विवेकवान होता तो यह घिनौना काम करता ही क्यों ? क्यों तीन महीने में बाप-भाई, अम्मा-भाभी सबके विश्वास का कत्ल करके जितनी रकम, ज़ेवर बटोर सकता था, बटोर कर मुंबई भाग आता विलेन-किंग बनने। इतना पैसा, ज़ेवर इस योजना के साथ ले आया था कि, छह-सात महीने कोई काम न मिले तो भी मुझे भूखा न रहना पड़े। कहां रहूंगा इस बात को लेकर भी बहुत सोचा-विचारा, लेकिन कोई रास्ता न निकला तो यह तय करके आया कि, वहीं चलकर देखूंगा, वहीं कोई रास्ता निकाल लूंगा। पहले बड़वापुर छोड़ कर वहां पहुंचूं तो।

जब चला तो ट्रेन में सारे सफर विशेषज्ञ बहसबाज़ों की तीखी बहसबाज़ी के बीच भी यही सोचता रहा कि कैसे क्या करूंगा? और यदि सफल न हुआ तो क्या करूंगा? घर लौटने पर घर वालों से लेकर परिचित, रिश्तेदार सब ताना मारेंगे। आधे रास्ते पहुंचते-पहुंचते इस उधेड़-बुन का भी हल निकाल लिया कि, जो भी हो सफल हुए बिना लौटूंगा नहीं। न सही विलेन-किंग, कुछ भी ऐसा करूंगा कि, करोड़पति बनकर ही पहुंचूं, जिससे सब मेरे पीछे-पीछे नाचें।

उस वक़्त मेरे मन में भाभी को लेकर बड़ा गुस्सा था। गुस्सा नहीं बल्कि यह कहूं कि जहर भरा हुआ था। जिससे बार-बार यही सोचता कि, जब करोड़पति बनकर लौटूंगा तो भाभी को अपना पिछलग्गू बना कर ही छोडूंगा। आज सोच कर ही आंखें भर आ रही हैं कि, एक भली महिला के लिए मैं इतना गंदा सोचता था। उस महिला के लिए जिसने मुझे एक अच्छा इंसान, एक अच्छा देवर समझ कर एक भाभी का प्यार-स्नेह दिया था। उन्हें कितना दुख हुआ होगा मेरी नीचतापूर्ण हरकत से, जो मैंने उनके साथ की थी।

मगर यह सारी बातें पीछे छूट गईं विलेन-किंग बनने के आगे। खैर जब मुंबई रेलवे स्टेशन शिवाजी टर्मिनल पहुंचा तो थकान के मारे पूरा बदन टूट रहा था। रिजर्वेशन के कारण राहत जरूर थी। स्टेशन पर हर तरफ इंसान दिख रहे थे। फिल्मों में इस स्टेशन पर जैसी रेलम-पेल देखा करता था, मुझे साक्षात स्टेशन पर उससे भी कहीं ज़्यादा दिखी, और डरावनी भी।

स्टेशन से बाहर आकर मुझे लगा कि, मेरे सपनों की दुनिया मेरे लिए बहुत से रास्ते खोले हुए होगी, लेकिन यहां तो रास्ते ही रास्ते थे। लोगों, गाड़ियों से भरे रास्ते। मशीनों की तरह दौड़ते-भागते लोगों से भरे रास्ते। किसी भी के लिए पलभर को भी न रुकने वाले लोगों से भरे रास्ते। कुछ पल को मैं हिल गया अंदर तक। लेकिन फिर एक रास्ते पर बढ़ गया। वह सड़क कहां को जाती है यह भी नहीं पता था। बस दिशाहीन सा, हक्का-बक्का सा इधर-उधर देखता बढ़ता जा रहा था। जब पैरों की थकान, पेट की आग ज़्यादा बढ़ी तो मुझे होश आया। मगर कहां जाऊं, कहां ठहरूं कुछ भी पता नहीं था। भूख से परेशान होकर सोचा पहले कुछ खांऊ-पीऊं फिर आगे बढ़ूं।

एक होटल में खाने-पीने के बाद जब जान में जान आई तो मैंने बैग से वह पॉकेट डॉयरी निकाली, जिसमें बड़ी मुश्किल से कई हीरो-हीरोइन, डायरेक्टर्स के पते और फ़ोन नंबर लिखे थे। कई दोस्तों ने यहां रहने वाले अपने दोस्तों के नंबर दिए थे। दोस्तों वाले नंबरों पर एक नज़र डालने के बाद एक पी.सी.ओ. पर पहुंच कर एक के दोस्त को फोन मिलाया। उससे बड़ी उम्मीद थी कि, वह फ़िल्मों में काम मिलने तक मेरी मदद करेगा। ख़ासकर मेरे रहने की समस्या का समाधान जरूर करेगा।

भदोही में जिस दोस्त ने नंबर दिया था उसने बड़ी उम्मीद बंधाई थी। मगर सिर मुड़ाते ही ओले पड़े। डायल करते ही एक्सचेंज़ ने बताया कि नंबर ही गलत है। डायरी में बडे़ ध्यान से देख कर कई बार डायल किया कि, कहीं मैं गलती न करूं। लेकिन हर बार एक ही ज़वाब मिला कि नंबर गलत है। मतलब दोस्त ने फर्जी नंबर दिया था। उसने डींगे हांकी थी कि, यहां उसका दोस्त है, और कोई फर्जी नंबर दे दिया था। फिर एक-एक करके जितने नंबर थे सब ट्राई किए। सारे या तो गलत निकले या फिर जिनके बताए गए थे, उनके न होकर किसी और के निकले। समीना मैं इससे इतना आहत हुआ कि, जिन-जिन लोगों से नंबर लिए थे उन सबको चुन-चुन कर खूब गाली दी। मां-बहन से लेकर ऐसी कौन-सी गाली थी जो न दी हो। सब दोस्तों ने मेरे साथ मजाक किया था। मेरी भावना, मेरे सपने को मेरा पागलपन समझ कर मेरे साथ खिलवाड़ किया था।

सारे दोस्तों को गाली देता, पी.सी.ओ. से बाहर निकलकर मैं फिर दिशाहीन सा चल दिया एक तरफ। इधर-उधर करीब आधे घंटे तक भटकने के बाद मैं एक बड़ी सी बिल्डिंग के सामने उसकी छाया में बैठ गया। पसीने से तरबतर था। हालांकि अप्रैल के महीने में मैं इससे ज़्यादा तेज़ गर्मी में भी घर पर रुकता नहीं था। जंगीगंज, गोपीगंज से लेकर भदोही तक घूमा करता था। मगर यहां उससे बहुत कम गर्मी के बावजूद पस्त हो गया था। मन में अब यह बात ज़्यादा प्रबल होने लगी थी कि, कहीं पैर फैलाने भर को भी जगह मिल जाए तो दो-चार घंटे सो लूं। साथ ही यह भी दिमाग में चल रहा था कि रात कहां बिताऊंगा। साथ में जो पैसे, गहने घर से चोरी करके लाया था उसकी चिंता अलग सांसत में डाले हुए थी।

यही कोई डेढ़ घंटा उधेड़-बुन में बीता होगा कि, अचानक दिमाग में एक बात आई और उसके साथ ही उम्मीद की किरणें भी नज़र आने लगीं। मैंने सोचा कि इस माया-नगरी में टैक्सी, आटो-रिक्शा ड्राइवर ज़्यादातर पूर्वांचल के ही हैं। तो अगर आटो-रिक्शा स्टैंड पर चल कर वहीं कहीं रुकूं, और उन सब पर नज़र रखूं, उनमें जो भला मानुष दिखे उससे बातचीत करूं, कहूं कि आफ़त का मारा हूं, गरीब हूं, काम की तलाश में आया हूं, फिलहाल अब सिर छिपाने की जगह का कुछ जुगाड़ करा दो, जिससे काम तलाशने में आसानी हो। आज भी यह बचकानी बात याद कर हँसी आती है। लेकिन उस समय यही बचकानी बात संयोग से काम आ गई थी।

यह बात दिमाग में आते ही मैं एकदम से उठ खड़ा हुआ। और आते वक़्त जिस आटो-रिक्शा स्टैंड को छोड़ आया था वहीं पहुंच गया। इधर-उधर टहलता-मंडराता रहा। ऑटो-रिक्शा वालों पर नज़र गड़ाए रहा। मगर न जाने ऐसा क्या भ्रम हुआ कि, मुझे हर ऑटो वाला ही पूर्वांचल का दिखने लगा। मैं ऐसा भ्रमित हुआ कि, कुछ ही देर में कईयों से पूछ लिया कि क्या तुम यू.पी. के पूर्वांचल से हो? बदले में झिड़की और खिल्ली मिली। मैं नर्वस होने लगा और फिर एक कोने में बैठ गया। थकान से मेरी हिम्मत और टूटी जा रही थी। बैठे-बैठे कोई घंटाभर बीत गया।

मैं क्या करूं, कहां जाऊं, कुछ सुझाई नहीं दे रहा था। तभी एक ऑटो आकर रुका। उसके ड्राइवर ने उतर कर पीठ सीधी करने की गरज से एक अंगड़ाई सी ली, फिर अपनी सीट को बोनट की तरह आगे की तरफ खोला और पानी की बोतल निकाली। वह बड़ी बोतल किसी कोल्ड ड्रिंक की थी। उसने ढक्कन खोलकर मुंह धोया, फिर कुल्ला कर कुछ पानी पिया, और पीछे की सीट पर आराम से बैठ गया। मैं उसे देखता रहा। यही कोई दस मिनट बीता होगा कि, उसने हैंडिल से लटके एक छोटे से झोले से गुल की छोटी डिब्बी निकाली और हथेली पर थोड़ा सा लेकर गुल करने लगा। यह देख कर अंदर ही अंदर मेरी बांछें खिल गईं।

यह बात बिलकुल साफ हो गई कि, यह आदमी सिर्फ पूर्वांचल ही का नहीं बल्कि निश्चित ही भदोही, काशी या आस-पास का होगा, क्योंकि गुल करने की लत वाले ज्यादातर इन्हीं जगहों पर ही हैं।

मैं उसे बराबर देखता रहा और अंदर ही अंदर यह भी तय कर लिया कि, यह जैसे ही गुल कर लेगा इससे बात करूंगा और कहूंगा कि मदद करे। यह अपनी ओर का आदमी है, जरूर कुछ करेगा। कोई रास्ता तो दिखाएगा ही। मेरे अंदर एक नया जोश, उत्साह सा पैदा हो गया था। फिर वह जैसे ही गुल कर के सीट पर आराम करने की मुद्रा में बैठा, वैसे ही मैं उसके पास चला गया। मैं अंदर ही अंदर डरा हुआ था कि, वह कहीं चला न जाए। मैंने जैसे ही कुछ बोलना चाहा, उसके पहले ही उसने कहा, 'अभी कहीं नहीं जाना।'

मैंने उसकी बात को अनसुना कर जैसे ही पूछा कि क्या वह काशी या भदोही का रहने वाला है, यह सुनते ही वह तनकर सीधा बैठ गया, और मेरी ओर आंखें तरेर कर एक क्षण में मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, फिर थोड़ा ताव दिखाते हुए बोला, 'क्यों? तुझे क्या? कौन हो तुम?' उसके इस रूखे व्यवहार से मैं हड़बड़ा गया। मगर अपने को पुनः संभालते हुए कहा, 'नहीं ऐसा कुछ नहीं, मैं भदोही से आया हूं। जहां जाना था वहां का पता कहीं खो गया है।'

हड़बड़ी में मैं एकदम झूठ बोल गया और फंस गया। वह बिदक कर बोला, 'तो मैं क्या करूं? मैं तेरा पता ढूंढू क्या? पता खो गया है तो जहां से आया है, वहीं वापस चला जा।'

उसके व्यवहार से अंदर ही अंदर गुस्सा तो बहुत आया लेकिन जज्ब कर गया और फिर कहा, 'नहीं, ऐसा नहीं है। आपको गुल करते देखा, तो मुझे लगा कि, आप भी उधर के होंगे .... मैं अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि, वह फिर बीच में ही बोल पड़ा। मगर मैंने भी हिम्मत नहीं हारी और अपनी बात समझा कर ही माना। उससे जान ही लिया कि, वह कहां का है। लेकिन यह बताने से पहले उसने मुझसे मेरा पूरा बहीखाता जान लिया। तब बताया कि, वह भदोही का तो नहीं, हां उसके पास ही के 'सुरियांवा' का रहने वाला है। परिवार अब भी वहीं है। वह पिछले कुछ सालों से यहां है। काम-धंधे की तलाश में आया था और ऑटो चलाने लगा, ठीक-ठाक कमाई हो जाती है।

समीना आज भी मैं मुंबई में अपना वह पहला दिन भूला नहीं हूं। उस ऑटो वाले को भी भुला नहीं पाया हूँ, जिसका नाम बाबूराम मौर्या था। बाद में वह कई साल मेरा मित्र बना रहा, फिर एक दिन जब अचानक गायब हुआ तो आज-तक उसका कुछ पता नहीं। उस दिन उसने मुझे एक धर्मशाला में ठहरा दिया था। जो भायखला के पास था। जाते समय एक पता लिखकर दिया और कहा, 'इस होटल का मालिक मुझे जानता है। उसको मेरा नाम बताना, हो सकता है तुम्हारे लिए कुछ कर दे।' जाते-जाते मुझसे चार सौ रुपए भी ले गया। इस तुर्रे के साथ कि, 'इसे भाड़ा मत समझना। तेरे साथ ज़्यादा समय रहा, धंधे का बड़ा खोटी हुआ है। मालिक को दिन भर का कोटा देना होता है।'

बाद के दिनों में यह भी पता चला था कि ऑटो उसी का था। किसी मालिक-वालिक को पैसा नहीं देना था। लेकिन सब से बड़ी बात यह थी कि, उसने मुझे इस माया-नगरी में एक आधार दे दिया था। जहां से मैं अपने सपने को पूरा करने का प्रयास कर सकता था। खैर जब बाबूराम चला गया तो भी मेरे मन में उसके लिए धन्यवाद का कोई भाव नहीं आया था। मेरे मन में एक ही बात थी कि, वह मुझसे ज़्यादा पैसे ले गया। समीना पहले दिन की वह पहली रात भी नहीं भूलती।

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Indu Talati

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