Pyar ke Indradhanush - 20 in Hindi Novel Episodes by Lajpat Rai Garg books and stories PDF | प्यार के इन्द्रधुनष - 20

प्यार के इन्द्रधुनष - 20

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दुनिया के प्रत्येक धर्म में व्रत-त्योहारों का महत्त्व है। व्रतों का प्रावधान जहाँ वैयक्तिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित है, वहीं त्योहार-उत्सव सामाजिक व्यवस्था में हर्षोल्लास का संचार बनाए रखने के लिए मनाए जाते हैं; किसी महान् ऐतिहासिक घटना अथवा समाज के महानायक के योगदान की स्मृति में मनाए जाते हैं ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उनसे प्रेरणा लेकर सत्कार्यों की ओर उन्मुख हों। व्रत रखने के पीछे वैज्ञानिक सोच है। व्रत रखने से शरीर में से विषैले पदार्थों का उत्सर्जन होता है और शरीर स्वस्थ रहता है। हमारे ऋषि-मुनियों तथा धर्माचार्यों ने साधारणत: अशिक्षित जनता को इस ओर प्रवृत्त करने के लिए हर व्रत को धर्म के साथ जोड़ दिया ताकि धर्म के भय से ही साधारण जनता समय-समय पर व्रत-उपवास रखकर स्वयं को स्वस्थ रख सके। व्रत को उपवास भी कहते हैं। उपवास का अर्थ है परमात्मा के निकट होना। अत: व्रत में केवल भोजन का त्याग ही नहीं होता, अपितु मन को एकाग्र करना भी अभीष्ट होता है। मन की संकल्प शक्ति बढ़ने से इच्छित परिणाम सहज में मिल जाता है।

हिन्दू धर्म द्वारा प्रतिपादित अनेक व्रतों में से करवा चौथ का व्रत अति महत्त्वपूर्ण है। इस दिन सुहागिन स्त्री अपने पति की लम्बी आयु की कामना करती हुई सारा दिन व्रत रखती है। किंवदंती है कि सावित्री ने अपनी संकल्प शक्ति से अपने पति सत्यवान को यम के चंगुल से मुक्त करवा लिया था।

करवा चौथ वाले दिन दोपहर में डॉ. वर्मा ने रेनु को फ़ोन किया। नमस्ते के आदान-प्रदान के पश्चात् डॉ. वर्मा ने रेनु को करवा चौथ के व्रत की बधाई दी और स्पन्दन का हाल-चाल जाना। रेनु के मन में जो था, आज उसने मुखर होकर कह ही दिया - ‘दीदी, मैंने तो इनकी लम्बी आयु के लिए व्रत रखा है, लेकिन आप तो सदैव इनकी ख़ुशियों की कामना करती रहती हैं।’

‘हाँ मेरी बहन, मैं सदैव मनु और अब स्पन्दन की भी ख़ुशियों की कामना करती हूँ। यह ठीक है कि मेरा व्रत आदि के दिखावे में विश्वास नहीं है। यदि होता तो मैं भी ज़रूर व्रत रखती।’

रेनु ने परिहास भरा उलाहना देते हुए कहा - ‘दीदी, आप इनकी और गुड्डू की ख़ुशियों की कामना करती हैं, लेकिन इस छोटी बहन को भूल जाती हैं।’

‘अरे, नहीं रे। जब मनु और स्पन्दन ख़ुश होंगे तो क्या रेनु उस ख़ुशी के ताप से अछूती रहेगी! अब तुम्हीं बताओ, आज तुम जो व्रत कर रही हो, क्या केवल मनु की लम्बी आयु के लिए कर रही हो? नहीं, इसके पीछे तुम्हारा स्वार्थ भी है। यदि मनु की लम्बी आयु होगी, वह खुश रहेगा तो इसका फ़ायदा तुम्हें ही तो मिलेगा। रेनु, स्त्री और पुरुष मिलकर एकात्म हो जाते हैं। … सदा सुहागिन रहो, यही आशीर्वाद है मेरा तुम्हारे लिए।’

‘दीदी, शब्दों से धन्यवाद नहीं कर सकती। आपके चरण चूमना चाहती हूँ। शाम को आ जाओ, इकट्ठे खाना खाएँगे।’

‘रेनु, अभी कुछ नहीं कह सकती। छह-साढ़े छह बजे फ़ोन करके बताऊँगी।’

सूर्यास्त होने के साथ ही आकाश में बादल घिरने लगे थे। डॉ. वर्मा सोचने लगी, लगता तो नहीं कि ये बादल जल्दी हटने वाले हों! यदि चन्द्रमा को इन बादलों ने अपनी गिरफ़्त में ही रखा तो सुहागिनें, जिन्होंने आज व्रत रखा है, कैसे अर्घ्य देंगी और व्रत तोडेंगीं। वह अभी इसी पर चिंतन कर रही थी, उसने अभी रेनु को फ़ोन नहीं किया था कि उसके मोबाइल पर स्पन्दन की फ़ोटो फ़्लैश करने लगी। उसने फ़ोन के चिह्न को स्वाइप किया तो मनमोहन का घबराया हुआ स्वर सुनाई दिया। जो उसने बताया, वह यह था - उसका जीजा ऑफिस से निकलने के बाद शराब पीकर अपने स्कूटर पर घर की ओर जा रहा था। शायद अधिक पी हुई होने के कारण उससे स्कूटर का बैलेंस नहीं बन पा रहा था। पीछे से आती कार के ड्राइवर की बहुत कोशिश के बावजूद भी स्कूटर डिवाइडर से टकरा गया। हेलमेट न पहने होने के कारण जीजा के सिर में गहरी चोट आई है। पी.सी.आर. वैन एक्सीडेंट साइट के नज़दीक ही खड़ी थी। पुलिस वालों ने जीजा को अस्पताल पहुँचा दिया है। तुम इमरजेंसी वार्ड में देखो, मैं भी पहुँच रहा हूँ।

डॉ. वर्मा ने मनमोहन के जीजा को कभी नहीं देखा था, किन्तु उसे उनका नाम मालूम था। उसने मोबाइल बन्द किया। डॉक्टर वाला कोट पहना और तुरन्त इमरजेंसी वार्ड में पहुँच गई। ड्यूटी दे रहे डॉक्टर ने उसे बताया कि मरीज़ की हालत बहुत गम्भीर है, क्योंकि चोट गहरी होने के कारण खून बहुत बह गया है। फिर भी कोशिश कर रहे हैं। हेड सर्जन को कॉल भेज दी गई है। शायद ऑपरेट करना पड़े।

मनमोहन ने डॉ. वर्मा को फ़ोन करने के पश्चात् मंजरी को यह दु:खद समाचार दिया और कहा कि श्यामल को लेकर जल्दी से अस्पताल आ जाए। जब मनमोहन अस्पताल पहुँचा तो डॉ. वर्मा इमरजेंसी वार्ड में ही थी। उसने मनमोहन को स्थिति की गम्भीरता से अवगत कराया और बताया कि जीजा जी बेहोश हैं। एक्सीडेंट होते ही पुलिस कांस्टेबल ने जब उन्हें सँभाला तो तुम्हारा मोबाइल नम्बर पुलिस को उन्होंने स्वयं ही बताया था। रास्ते में ही जीजा जी बेहोश हो गए थे।

कुछ देर में ही मंजरी और श्यामल भी पहुँच गए। अपने पति की हालत देखकर मंजरी की आँखें भर आईं। डॉ. वर्मा ने उसे ढाढ़स बँधाया और वार्ड से बाहर ले आई। बाहर आकर मंजरी मनमोहन के गले लगकर रोने लगी और विलाप करने लगी - ‘सुबह घर से लड़कर निकले थे। अच्छा होता, मुझे ही दो-चार लात-घूँसे और मार लेते, यह नौबत तो न आती।’

मंजरी का प्रलाप सुनकर डॉ. वर्मा ने मनमोहन को एक तरफ़ ले जाकर पूछा - ‘दीदी के कहने का क्या मतलब है?’

तब मनमोहन ने उसे मंजरी के घर की स्थिति के बारे में संक्षेप में बताया कि किस तरह जीजा जी छोटी-छोटी बातों पर दीदी को प्रताड़ित करते हैं और उनके द्वारा तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा शराब में उड़ा देने के कारण घर-खर्च के लिए दीदी को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। इसीलिए विवाह के कुछ दिनों बाद ही उसने अपना ठिकाना अलग कर लिया था, ताकि रेनु पर रोज़-रोज़ की किच-किच का बुरा असर न पड़े।

डॉ. वर्मा ने मनमोहन को बताया कि मरीज़ की हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि ऑपरेशन के बाद भी ठीक होने के चाँस बहुत कम हैं। अत: अस्पताल में ऑपरेशन के लिए ‘हाँ’ न करके इंजेक्शन-दवाइयों से ही इलाज करने के लिए कहना अधिक उचित होगा। तदनुसार मनमोहन ने मंजरी को श्यामल से दूर ले जाकर सारी बातें बताईं और कहा कि सिवाय दुआ करने के कुछ नहीं हो सकता। मंजरी डॉ. वर्मा की क़ाबिलियत से पूरी तरह वाक़िफ़ थी, इसलिए उसने कहा - ‘भइया, तुम डॉक्टर को ऑपरेशन के लिए मना कर दो। मेरे नसीब में सुख तो शायद लिखा ही नहीं।’

‘दीदी, जब तक साँस हैं, तब तक आस है। परमात्मा भली करेंगे। डॉ. वर्मा ने अपनी ओर से अच्छे-से-अच्छा ट्रीटमेंट करने के लिए कह दिया है।’

डॉ. वर्मा मंजरी, मनमोहन और श्यामल को अपने क्वार्टर पर ले गई। वासु को खाना बनाने के लिए कहा तो मंजरी ने कहा - ‘डॉ. वर्मा, प्रह्लाद तो घर हो आता है, बहू के कई बार फ़ोन आ चुके हैं। उसका व्रत खुलवाकर आ जाएगा। मैं तो व्रत इनके ठीक होने पर ही खोलूँगी। श्यामल तुम्हारे साथ ही खा लेगा।’

डॉ. वर्मा ने मनमोहन को सम्बोधित करते हुए कहा - ‘देखो! आज आकाश में तो बादल छाए हुए हैं। चन्द्रमा दिखाई देने के तो चाँस हैं नहीं। तुम घर जाकर टी.वी. ऑन कर लेना। हर चैनल पर प्रकट होते चन्द्रमा की तस्वीरें देखने को मिलेंगी। रेनु को वहीं चन्द्रमा के दर्शन करवा के उसका व्रत खुलवा देना। कहीं नादानी में वह भूखी रही तो स्पन्दन को फ़ीड कैसे देगी?’ थोड़ा रुककर हँसते हुए कहा - ‘मैं रेनु को फ़ोन करके कह देती हूँ कि तेरा चाँद भेज रही हूँ। इसे देखकर ही अपना अर्घ्य दे लेना। दीदी को चन्द्रमा के दर्शन मैं यहाँ करवा दूँगी।’

डॉ. वर्मा की हल्की-फुल्की बात से कुछ क्षणों के लिये उदासी दूर हो गई। श्यामल ने कहा - ‘मामू, डॉ. आंटी ठीक कह रही हैं। जल्दी से घर जाओ और मामी की इंतज़ार ख़त्म करो।’

डॉ. वर्मा के कहने और श्यामल द्वारा उसके समर्थन के पश्चात् मनमोहन तो चला गया और डॉ. वर्मा सोचने लगी, तकनीकी विकास के साथ पारिवारिक रिश्तों में मान-सम्मान की भावना का कितना ह्रास हुआ है। पहले परिवार के छोटे सदस्य बड़े-बुजुर्गों के लिए आदरसूचक सम्बोधन का प्रयोग करते थे। अब तो दादा जी दादू, चाचा जी चाचू, मामा जी मामू बनकर रह गए हैं। दादी, ताई, चाची, मामी, मासी आदि के साथ ‘जी’ लगाना भी बच्चे भूल गए हैं। या कह लो कि उन्हें सिखाया ही नहीं जाता।

मनमोहन घर जा चुका था। टी.वी. पर समाचारों के बीच जब चन्द्रमा को देखकर व्रती महिलाओं द्वारा अर्घ्य दिए जाने की तस्वीरें दिखाई जाने लगीं तो डॉ. वर्मा ने बहुत आग्रह करके मंजरी का व्रत खुलवा दिया और उसके ना-ना करते भी उसे एक चपाती खिला ही दी।

जब मनमोहन वापस अस्पताल आया तो रेनु भी उसके साथ थी। मनमोहन और मंजरी इमरजेंसी वार्ड की ओर जाने लगे तो रेनु ने डॉ. रवि को कहा - ‘दीदी, आप गुड्डू को सँभालो, मैं भी जीजा जी को देख आऊँ।’

स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए रेनु को किसी ने रोका नहीं, किन्तु डॉ. वर्मा ने इतना ज़रूर कहा - ‘रेनु, मनमोहन और दीदी यदि वहाँ रुकना चाहें तो रुक जाएँगे, लेकिन तुम जल्दी वापस आ जाना।’

रात को दो बजे के लगभग नर्स ने मनमोहन को सूचित किया - ‘सॉरी सर, योर पेशेंट इज डेड।’ सुनते ही मंजरी की चीख निकल गई। नर्स ने डॉ. वर्मा के कनेक्शन को देखते हुए इतना ही कहा - ‘सर, टेक केयर ऑफ योर सिस्टर। इट्स इमरजेंसी वार्ड।’

मनमोहन ने मंजरी को ढाढ़स बँधाते हुए शान्त कराया और रेनु को फ़ोन किया। पहली बार में उसे गहरी नींद के कारण पता नहीं चला, किन्तु दूसरी बार रिंगटोन बजने पर जब उसने मनमोहन की थरथराती आवाज़ सुनी तो पूरी बात सुनने से पहले ही वह रोने लगी। उसने डॉ. वर्मा के बेडरूम के दरवाज़े को हल्के से थपथपाया। उसकी हालत देखते ही डॉ. वर्मा समझ गई कि जो होना था, हो चुका था। उसने रेनु को कहा - ‘बाहर मौसम ठंडा है। दूसरे, स्पन्दन सोई हुई है। तुम उसके पास रहो। मैं जाकर देखती हूँ।’ कहकर उसने कंधों पर शॉल डाला और पहुँच गयी मनमोहन और मंजरी के पास। उसने मनमोहन को सांत्वना दी और मंजरी को सँभालने लगी। फिर उसने मनमोहन को कहा - ‘अब ‘बॉडी’ तो सुबह पोस्टमार्टम के बाद ही मिलेगी। मंजरी को बड़ी मिन्नतें करके घर चलने के लिए राज़ी किया। रेनु बैठी उन्हीं की प्रतीक्षा कर रही थी। जैसे ही उन्होंने घर में कदम रखा, रेनु मंजरी के गले लगकर रोते हुए बोली - ‘दीदी, आपने जीजा जी की लम्बी आयु के लिए व्रत रखा और परमात्मा ने आज ही उन्हें हमसे छीन लिया। हाय रे, कैसी है तेरी लीला, प्रभु!’

डॉ. वर्मा ने रेनु को समझाया - ‘ईश्वर की इच्छा के आगे किसी का ज़ोर नहीं चलता। सब्र करने के सिवा कोई चारा नहीं।’ फिर मंजरी को सम्बोधित करते हुए कहा - ‘दीदी, शाम से आप परेशान हैं, थोड़ा आराम कर लो।’

मंजरी - ‘मोहन भइया, मैं श्यामल के साथ घर चलती हूँ। सुबह आ जाएँगे।’

डॉ. वर्मा - ‘दीदी, इस समय स्कूटर पर जाना ठीक नहीं। मैं तुम्हें कार में छोड़ आती हूँ।’

मनमोहन ने डॉ. वर्मा की बात का समर्थन करते हुए कहा - ‘मैं भी साथ चलता हूँ। डॉक्टर, मैं दीदी के पास रहूँगा, रेनु तुम्हारे पास रहेगी। मैं सुबह दीदी को लेकर आ जाऊँगा।’

मंजरी - ‘नहीं भइया, तुम डॉ. वर्मा के साथ वापस आ जाना। वापसी पर रात के समय डॉ. वर्मा के साथ तुम रहोगे तो मुझे चिंता नहीं होगी। सुबह हम खुद आ जाएँगे।’

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