Stree - 22 in Hindi Novel Episodes by सीमा बी. books and stories PDF | स्त्री.... - (भाग-22)

स्त्री.... - (भाग-22)

स्त्री......(भाग-22)

मैं सोने की बेकार कोशिश कर रही थी। नींद का आँखो में नामो निशान नहीं था और मेरा भी सो जाने का मन भी नहीं कर रहा था......वो अपने कमरे में चले गए और दरवाजा भी लॉक करने की आवाज आयी। उस रात माँ पिताजी और सबकी बहुत याद आ रही थी, माँ के जाने की चिट्ठी मैं लिखना चाह रही थी ये सोच कर कि उन्हें आना चाहिए, पर मामाजी ने कहा कि बहु रहने दो, बहुत समय लगता है आने जाने में, बेकार ही वो लोग परेशान होंगे घर की ही बात है रहने दो। वैसे भी महीनों से गाँव से कोई खबर नहीं आयी न ही कोई आया, लगता है माँ पिता का साथ बेटी के लिए बस ब्याह तक होता है, क्या माँ बाप भी बेटी की शादी करके उसे भूल जाते हैं!! जो वो बेटी की कोई खोज खबर ही नहीं लेते!! बस इसी वजह से ही तो मैंने भी चिट्ठी नहीं लिखी।
पूरी रात बस दिल कभी गाँव में भाग जाता तो कभी सासू माँ की याद आ जाती। पति को याद करने वाली कोई याद ही नहीं थी, पर फिर भी एक रिश्ता जो हम दोनो के बीच था वो भी तो दम तोड़ गया। मैं सिर्फ अपने पति की ही गलती क्यों मानूँ, मेरे माँ बाप की भी तो गलती है जिन्होंने मेरे और मेरे पति की उम्र ता फर्क न देखा या फिर शहर से आए रिश्ते को हाथ से न निकल जाए का लोभ छोड़ न पाए!! पर ये भी तो सच है कि उम्र का फासले को छोड़ दिया जाए फिर भी तो उनकी शारीरिक कमी हमारी खुशियों में रूकावट थी!! मैं बस अपने आप से सवाल जवाब में उलझी रही, ऐसी कई रातें मैंने यूँ ही तो गुजारी हैं पहले भी कभी अपने को कोसा तो कभी अपनी किस्मत को.....पर उससे हुआ क्या? मैं तो अपनी शादी निभाने के लिए दोस्ती के रिश्ते में भी खुश रहने की कोशिश कर रही थी।। रात के आखिरी पहर में थोड़ी देर के लिए नींद आ गयी, पर जल्दी ही आँख खुल गयी। आज तो जिसको घर बेचना है, उससे मिलना है। आज फिर तीनों बहन भाई मिलने वाले हैं। सुनील भैया उन्हें यहीं लाने वाले हैं। मैं जल्दी से नाश्ता बनाने की तैयारी कर रही थी। मेरे पति भी तैयार हो चुके थे। हम दोनो ने नाश्ता किया, उसके बाद मैं बाई के साथ बाकी काम निपटाने लगी।कुछ ही देर में सुनील भैया और सुमन दीदी आ गए थे, जिस आदमी ने आना था वो कुछ देर में आते ही होंगे कह कर आपस में बातें करने लगे। "भाभी अगर ये फ्लैट भाई साहब ने वापिस करना है तो आप अपने पुराने वाले घर में शिफ्ट हो जाओ, हम दोनों को हिस्सा नहीं चाहिए, हाँ भाभी सुमन ठीक कह रही है, आप कहाँ रहेंगी, उतना पैसा तो नहीं मिलेगा कि आप दूसरा मकान खरीद लो, फिर हम दोनों अपने अपने घर मैं अच्छे से हैं"। सुनील भैया और सुमन दीदी की बात सुन कर मन भर आया ऐसे लगा जैसे छाया और राजन है, जो अपनी बहन को तकलीफ में नहीं देखना चाह रहे। " दीदी और भैया, आप लोगो ने इतना सोचा मेरे लिए, इतना ही काफी है। "माँ ने आप दोनों को नहीं आपके बच्चों को हिस्सा दिया है, तो बच्चों को अपनी नानी और दादी का आशीर्वाद मिलना ही चाहिए। मैंने वर्कशॉप और अपने रहने की जगह फाइनल कर ली है। नीचे काम और उपर घर तो मुझे आने जाने में परेशानी भी नहीं होगी और आप दोनो जब मर्जी मिलने आ सकते है, जैसे अब आते हैं। रिश्ता हम दोनो का टूटा है, पर मैं आप दोनों से अपना रिश्ता कभी नहीं तोड सकती"। "हाँ भाभी हम तो आते रहेंगे आप भी कुछ भी परेशानी हो, हम दोनो को बस फोन कर देना हम आ जाएँगें"। दोनो ने मिलकर कहा तो मेरे मुँह से "हाँ
जरूर" निकलना ही था। वैसे भी इस बड़े से शहर में उनके सिवा मैं किसे जानती थी? कुछ देर में ही वो भी आ गए जिनके लिए सब इकट्ठा हुए थे। डील पक्की हो गयी और पेमेंट की तारीख भी बता दी कि 3 महीने में पूरी पेमंट हो जाएगी। उनके जाने के बाद मैंने सुनील भैया और सुमन दीदी से पूछा, "ये सारे सामान का क्या करना है? आप लोगों को कुछ चाहिए तो ले लिजिए"!! "भाभी हमारे घर में तो जगह ही नही है, आप को तो सारा सामान चाहिए तो आप ही ले जाइए"। मैंने कहा कि ठीक है भैया मैं अपनी जरूरत का ले जाऊँगी। मैंने इन्हें थैंक्स बोला कि वो मेरा साथ दे रहे हैं। मेरे पति पर अब तो वो मेरे पति भी नहीं रहे, खैर फिलहाल मेरे पति ही कहूँगी, वो चुपचाप हमारी बातें सुन रहे थे। अब सब काम हो गया है तो मैं शाम को निकलूँगा, काम भी देखना है। ठीक है भाई साहब, आप आते रहना और फोन पर भी बात करते रहना, हमारी FD का एमाउंट जब आएगा तो मैं आपके बैंक में जमा करा दूँगा, कह कर दोनों भाई बहन चले गए और मेरे पति अपने जाने की तैयारी कर रहे थे। मैंने दोनो अगूंठी उनको दे दी ये कह कर की इनसे मिलने वाले पैसे जैसे माँ ने कहा वैसे खर्च कर दीजिएगा। उन्होंने चुपचाप रख ली...... दोपहर का खाना खा कर वो अपना बैग ले कर चले गए, बिना कुछ कहे तो मैंने भी उनके जाने के बाद दरवाजा ब्द कर लिया। उनके जाने के बाद मैं सो गयी। काफी दिनों के दिमागी तनाव और देर तक जागते रहने से खूब नींद आयी.....मुझे उठ कर अच्छा लग रहा था। बहुत दिनों बाद मैंने अपने लिए अपनी पसंद का खाना बनाया और चाव से खाया। कितने साल हो गए थे मैंने प्याज टमाटर वाला पुलाव नहीं खाया था। राजन और छाया को पुलाव में हल्दी पसंद नहीं थी पर मुझे पसंद थी। माँ मेरी पसंद का कम ही बनाती थी क्योंकि दोनो छोटे मुँह बना लेते थे। पुलाव के साथ आम का अचार खा कर बहुत तृप्ति का एहसास हुआ। माँ हमेशा कहती थी कि लड़कियों को मन मारना आना चाहिए, नहीं तो आगे जा कर ससुराल में रचती बसती नहीं, शायद सही कहती हो माँ!! पर मेरे लिए तो वो सही नहीं था, मन मार कर भी रिश्ता नहीं बचा, ऊपर से पति ने मेरे चरित्र की धच्चियाँ भी उड़ा दी!! क्या मैं तब कुछ कह नहीं सकती थी?? खुद से ही मेरा सवाल था और ये सवाल मेरा जमीर मुझसे कई बार पूछता है। मैं जानती हूँ कि मैं कह सकती थी,पर कहने से क्या होता? मैं जितना उसको गिराती, उतना नीचे मुझे पहले गिरना पड़ता। सबको उनकी कमी बता कर भी कुछ हासिल नहीं होना था तो उन्होंने जो वजह बतायी ,वही सही। शादी बेमेल तो थी ही, कहाँ मैं इतनी खूबसूरत और रिश्ते को जीने को आतुर और प्यार कि कितनी ललक थी मेरे अंदर और कहाँ मेरे पति जितना स्वभाव में ठंडे उतने ही तन और मन से भी हताश। मैं चाहती तो डाँस टीचर शेखर को अपने करीब आने देती और वो पा लेती जिसकी चाह मुझे थी। शरीर प्यार करने में असफल हो सकता है, पर प्यार तो शब्दो और भावों के सहारे भी किया जा सकता है। मैं ऐसा नहीं कर पायी, क्योंकि मैं इतना तो जान गयी थी क् अगर पुरूष बाहर संबंध बनाता है तो कितनी सहजता से कह देता है कि तुझसे मन भर गया या तू एक ठंडी औरत है इसलिए बाहर जाता हूँ, पर औरत आज तक नहीं कह पायी अपने पति से कि तुम बिल्कुल ठंडे हो, इसलिए मैं बाहर किसी आदमी के साथ सो गयी!! पुरूष अगर औरत की कमी और अपनी जरूरत का रोना रो कर कई औरतों से संबंध बनाए तब भी कमी औरत की ही मानी जाएगी और गाली भी औरत को ही दी जाएगी और अगर औरत यही काम करके आ जाए तो उसे घर से निकाल दिया जाएगा और गाली भी मिलेगी।।। तो कोई बताएगा कि ये दोहरी मानसिकता के कानून किसने बनाए?? ये भी तो पुरूष ने ही बनाए हैं? पिसना औरत को ही है, गाली भी और तिरस्कार भी। अपने पति से चरित्रहीन का तमगा ले कर मन किया कि एक बार चरित्रहीन हो कर ही देख लेती, कम से कम ये लांछन तो सच होता।।मेरे अंदर की औरत मेरी इच्छाओं को जगाती है, मैं बहुत बुरी बनना चाहती हूँ, हाँमुझे वो सब चाहिए जिसकी मैं हकदार हूँ, पर क्या करूँ, मैं अच्छी औरत ही बनी रहना चाहती हूँ और दबा देती हूँ अपनी इच्छाओं को। मैंने पढ़ा था कि नारी को हमारे देश में पूजा जाता है, और कहा जाता है कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाऎ देवताओं का वास होता है। अब इस कलयुग में तो पुरूष ने नारी को पंगु ही बना दिया है, कभी पिता तो कभी पति बन कर कभी भाई तो कभी समाज बन कर औरतों के सब फैसले खुद ही कर लेते हैं, पर जानकी अपनी जिंदगी का फैसला अब खुद करेगी। मैं मन ही मन एपनी बातोॆ को दोहरा रही थी, अपने आपको याद करा रही थी। कभी कभी सोचती हूँ कि माँ, पिताजी ने कितने चाव के साथ मेरा नाम जानकी रखा होगा या पता नहीं ये नाम रखते हुए क्या सोचा होगा!! पर उस युग में भी माता सीता के हिस्से में सिर्फ दुख आए और इस युग में मेरी जैसी जानकियाँ दुख ही दुख पा रही होंगी बस कारण अलग होंगे.......उनके जितना वनवास तकरीबन मैंने भी भोग ही लिया है, 12 बरस का वनवास ही तो रहा मेरे लिए......सुबह हो गयी थी एक लंबी अकेली रात के बाद और मैं बॉल्कनी में खड़ी सड़क को निहार रही थी....जिसको रौंदते हुए हम चलते जाते हैं अपनी मंजिल की तरफ......!!!
क्रमश:
स्वरचित
सीमा बी.

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