The festival of sun worship is wonderful, Chhath and worship materials in Hindi Spiritual Stories by Mukteshwar Prasad Singh books and stories PDF | अद्भूत है सूर्य उपासना का पर्व छठ एवं पूजन सामग्रियां

अद्भूत है सूर्य उपासना का पर्व छठ एवं पूजन सामग्रियां


छठ पर्व-8से11 नवम्बर 2021 पर विशेष आलेख
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हिंदुओं का महापर्व ‘छठ’ वर्ष में दो बार नेम निष्ठा और धार्मिक आस्था के साथ कार्तिक एवं चैत्र माह के शुक्ल पक्ष चतुर्थी से लेकर सप्तमी तिथि यानी चार दिनों तक मनाया जाता है। ‘छठ’ को तुरंत फलदायक, मनोकामना सिद्धि व संतान रक्षक पर्व कहा जाता है। इस पर्व में छठी मैया एवं सूर्य की उपासना की जाती है। कौन है षष्ठी मैया ? क्यों की जाती है सूर्य पूजा ? इस पावन पर्व के अवसर पर यह जानकारी हमारी आस्था को और पुख्ता बनाती है।
'छठी मैया’ की पूजा का संबंध ‘स्कन्ध’ अर्थात् भगवान कार्तिकेय के जन्म से जुड़ा है। छठ का पौराणिक नाम ‘स्कन्ध षष्ठी’ है। शिव पुराण और रुद्र संहिता के चतुर्थ खंड में स्कन्ध (कार्तिकेय) के जन्म का वर्णन ’ब्रह्मा’ जी ने सुनाया। भगवान शिव के काम भाव से गंगा में ‘स्कन्धकार’ जीव का प्रादुर्भाव हुआ जिसका स्वरुप स्कन्ध के समान था। सिर-मुख स्पष्ट नहीं थे। गंगा ने अजीब आकार के जीव को मातृ मोह त्याग किनारे फैले सरकंडे के जंगल में फेंक दिया। उसी जंगल में ‘छह’ कार्तिकाएं निवास करती थीं। असहाय जीव को पाकर सभी द्रवित हो उठीं और स्कन्धाकार जीव को पालने का निश्चय कर ज्योंहि सीने से लगाया कि स्कन्ध रूपी देह से छह सिर मुख प्रकट हो गये। छह मुखों से बालक ने कार्तिकाओं का स्तनपान कर शीघ्र ही बहादुर पराक्रमी व तेजस्वी बालक के रुप में बाल सुलभ क्रीड़ा करना शुरु किया। तेजस्वी बालक का नाम ‘स्कन्ध’ पड़ा, परन्तु कार्तिकाओं की ममता से जीवन पाये ‘स्कन्ध’ का दूसरा नाम “कार्तिकेय” हुआ। कार्तिकेय की सभी छह माताएं यानी “षष्ठ माता” कालांत्तर में षष्ठी मैया से “छठी मैया” कहलायी।
संतान वाली माताएं ‘षष्ठी माता’ अर्थात् “छठी मैया” की आराधना कर अपनी संतान की रक्षा एवं सफलता की कामना पूर्ण हेतु कठिन साधना कर उन्हें प्रसन्न करती हैं। दूसरी ओर छठ में सूर्य की पूजा भी प्रमुखता से की जाती है। इसके संबंध में भी हमारे धर्मग्रन्थों में विस्तार से उल्लेख मिलता है। सूर्य पूजा का प्रचलन रामकाल से ही है, जिसका विस्तार महाभारत काल से आगे बढ़कर वर्तमान काल तक है। आज सूर्य पूजा धूमधाम एवं श्रद्धा से मनाया जा रहा है। रामकाल में राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या अपने पिता के साथ मधुश्रवा नामक वन में आखेट पर गयी। उसी वन में एक घास -लत्तर से आवृत आकृति के बीच दो चमकते मणिस्वरुप वस्तु को देख अचंभित हो गयी। जिज्ञासावश सुकन्या ने एक सींक उठाकर उस चमकते मणिस्वरुप वस्तु पर प्रहार किया। सींक की नोक चुभते ही एक कराह निकली और खून बहने लगे। चमकते वस्तु दो आँखें थी। खरपतवार आच्छादित वह आकृति, ऋषि च्यवन की देह थी। जिसपर लंबे समय तक तपस्या रत रहने के कारण, जंगली खरपतवार उग आये थे। भयंकर वेदना से दग्ध ऋषि की तपस्या भंग हो गयी। सुकन्या को अपने इस कृत पर घोर पश्चाताप हुआ। ऋषि की दशा देख सुकन्या ने अपने पिता से ऋषि की सेवा जंगल में रहकर करने की आज्ञा मांगी तथा कठोर निर्णय लेते हुए वृद्ध ऋषि को अपना पति स्वीकार कर पिता शर्याति से आशीर्वाद मांगा। राजा यह सुन स्तब्ध रह गये।
परंतु सुकन्या की जिद के सामने झुकना पड़ा। घायल च्यवन ऋषि की सेवा सुकन्या ने तन मन से किया। जंगली जड़ी-बूटियों से घायल आंखों की चिकित्सा करने लगी एवं देखने से लाचार ऋषि को कंद-मूल, फल खिलाकर स्वस्थ करने में जुट गयी। जंगल में ही सुकन्या ने एक नागकन्या को जलाशय में खड़ी होकर सूर्य पूजा करने का उद्देश्य पूछा। नागकन्या ने बताया- सूर्य पूजा से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और तुरंत मनोकामना पूरी होती है। सुकन्या ने नागकन्या द्वारा बतायी विधि से सूर्य की कठोर उपासना की। सूर्य के प्रसन्न होने पर वे वरदान देने के लिए प्रकट हुए। सुकन्या अपने वृद्ध पति, ऋषि च्यवन की आँखों की रोशनी देने तथा स्वस्थ होने का वर मांगा। सूर्य ने सुकन्या को मनोकामना पूर्ति का वर दिया। सैकड़ों वर्षों का बूढ़ा ऋषि च्यवन जवान, सुंदर देह यष्टि का ‘ऋषि कुमार’ बन गया तथा उनकी आँखों की दृष्टि भी लौट आयी। इस तरह सुकन्या की सूर्य पूजा सफल हुई और दोनों युवा पति-पत्नी बने। महाभारत काल में सूर्य की पूजा श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब द्वारा किये जाने का वर्णन है।
श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्बवंती के गर्भ से उत्पन्न पुत्र साम्ब अति सुंदर था। सुंदरता के मद में वह नारद को चिढ़ाया करता था तथा गोपियों से निर्लज्जतापूर्ण व्यवहार करता था। नारद की शिकायत पर अपने उच्छृंखल पुत्र साम्ब को भगवान कृष्ण ने श्राप दे दिया। शापित साम्ब की सुंदर देह पर श्वेत दाग उभर आये। साम्ब काफी दुखी रहने लगा। इधर नारद साम्ब को देख ग्लानि से भर उठे। नारद ने साम्ब को शाप मुक्ति का उपाय बताते हुए सूर्य उपासना की सलाह दी। मुनि ने साम्ब को सूर्य के बारह राशियों की पूजा विभिन्न नक्षत्रों में करने को कहा। राजकुमार साम्ब ने सूर्य (अर्क) की 12 भिन्न राशियों में विभिन्न बारह स्थलों पर घूम-घूम कर पूजा की। उनकी अंतिम पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी को संपन्न हुआ। पूर्णाहुति के साथ साम्ब पुनः सुंदर हो गये। उनके शरीर के दाग गायब हो गये। कहा जाता है कि राजकुमार साम्ब ने जिन बारह स्थलों पर सूर्य की पूजा की कालांतर में सूर्य उपासक राजाओं द्वारा भव्य सूर्य मंदिर बनाये गये। राजभाषा विभाग बिहार से सूचीबद्ध साहित्यकार व विविध विषयों के लेखक मुक्तेश्वर मुकेश के अनुसार सूर्य पुराण में वर्णित उन्हीं बारह स्थलों पर आज विकसित मंदिरों का अस्तित्व है, जहाँ ‘छठ पर्व’ मनाने व्रतियां पहुंचती हैं। ये सूर्य मंदिर है – ‘बालार्क’, ‘देवार्क’, ‘लोलार्क’, ‘कोणार्क’, ‘दर्शनार्क’, ‘चाणार्क’, ‘उलार्क’, ‘पुष्यार्क’, ‘अंगार्क’, ‘मार्कण्डेयार्क’ एवं ‘वेदार्क’,। इन बारह सूर्य मंदिरों में छह तो बिहार में ही अवस्थित हैं, जहां धूमधाम से छठ के अवसर पर सूर्य की पूजा की जाती है। पुण्यार्क सूर्य मंदिर-पंडारक (पटना), उलार्क सूर्य मंदिर, दुल्हिन बाजार (पटना) अंगार्क- ओंगारी (नालंदा), देवार्क- देव (औरंगाबाद), बालार्क वड़गाँव, पावापुरी (नालंदा), मार्कण्डेयार्क- कन्दाहा (सहरसा) में है। इन मंदिरों की छठ पूजा महिमामंडित है। इस तरह पूरा पूर्वोत्तर भारत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष चतुर्थी से सप्तमी तक उदयाचल एवं अस्ताचल सूर्य के अर्घ्य दान तक भक्तिमय वातावरण में डूबा रहता है। चार दिनों तक मनाने के कारण यह महाछठ पर्व कहलाता है।
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उदयाचल सूर्य अर्घ्यदान के साथ छठ महापर्व की समाप्ति हो गयी।सूप मॆं रखे चढावे का विश्लेषण करने बैठा हूं तो अद्भूत तथ्य सामने आये.यह प्रकृति से प्रकृति की पूजा है.षष्ठी माता और सूर्य पूजा में जल,थल,नभ के फल,कन्द,मूल और तना से जल में खडा होकर सू्र्य किरणों को समर्पित की जाती है.आइये एक नजर डालें।जलीय फल सिंघारा,पनियाला,मखाना.
थलीय कन्द-शकरकंद,सूथनी,हल्दी,अदरख.
थलीय मूल-मूली.तना-गन्ना,अनानास।
नभफल-नारियल,सेव नासपाती,संतरा,केला,अंगूर,अनार,अमरूद,टाभ,सीताफल(सरीफा)،सुपारी ।
सूखाफल-छुहारा,किसमिस,बादाम,मुनक्का.
दलहन/अनाज-चना,चावल,मूंगफली,जौ.
खाद्य तेल-सरसों तेल, घी,वनस्पति घी.पान.
अन्य सामग्री-गुड,चीनी,कपूर,लौंग,रूई का अलता,दीया,बाती,उपला,बद्धी, सिंदुर,अगरवत्ती,केलापात,आम्रपल्लव,दूब,फूल,माला.वांस -सूप,डाला,छैटी.सूती/रेशमी चादर.धोती,साड़ी।
हो सकता है कि चढावे का कई नाम छूट गया हो,पर वर्णित सभी सामग्रियों की गिनती करें तो सूची में वाबन नाम हैॆं।जरा सोचिये इन सामानें के क्रय विक्रय का क्या गणित होगा.चढावों की सामग्रियों से सजनॆ वाले बाजार के आपूर्तिकर्ता व्यवसायी एक माह पूर्व से हीं स्थानीय फुटकर दुकानदारों तक विविध सामग्रियों को पहुंचाने में लग जाते हैं।अरबों का व्यापार होता है,इसलिए छठ महापर्व का दूसरा रूप वृहत्तर व्यवसाय भी है।
सानाजिक समरसता का मिसाल भी है छठ महापर्व.अधिकांश फल विक्रेता मुस्लिम समुदाय के होते हैं जिनके पास हिन्दुओं से अधिक चढावे के सामानों की जानकारी रहती है।स्वच्छता के साथ धो पोछकर फलों, कंदों, मूलों के बेचते हैं।

मुक्तेश्वर सिंह मुकेश